ट्रांसजेंडर्स को फ्री एजुकेशन देगा IGNOU

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नई दिल्ली। देश के ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए एक खुशखबरी है. ट्रांसजेंडर्स की उच्च शिक्षा के लिए बड़ा फैसला लेते हुए इंदिरा गांधी नैशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू) ने सभी ट्रांसजेंडर्स स्टूडेंट्स को मुफ्त में एडमिशन देने का फैसला लिया है. अभी तक इग्नू सेक्स वर्कर्स, जेल में बंद कैदियों और बुनकरों को फ्री एजुकेशन मुहैया कराती रही है.

लखनऊ की क्षेत्रीय निदेशक मनोरमा सिंह के अनुसार, ‘ट्रांसजेंडरों को फ्री एजुकेशन की यह सुविधा देश भर के सभी सेंटरों पर चलाई जाएगी. हमने इस संदर्भ में ट्रांसजेंडर्स ऐक्टिविस्ट से मदद मांगी है. हमारी इस मुहिम का मकसद थर्ड जेंडर्स में भी एजुकेशन को प्रमोट करना है.’ भारत में 54 क्षेत्रीय सेंटरों के साथ ही 3 हजार से अधिक स्टडी सेंटर्स हैं. अकेले यूपी में ही करीब 150 स्टडी सर्कल हैं.

अधिकारियों ने बताया कि किसी भी यूनिवर्सिटी में रेग्युलर बैचलर कोर्स करने के लिए ट्रांसजेंडर्स के लिए शायद ही कोई प्रोविजन है. अगर कहीं ट्रांसजेंडर्स के लिए ऐडमिशन फॉर्म में कोई विकल्प है भी, तो उन्हें फॉर्मल डॉक्युमेंट के अभाव में दूर कर दिया जाता है. इग्नू में ऐडमिशन के लिए ट्रांसजेंडर्स को ट्रांसफर और माइग्रेशन के जैसा कोई डॉक्युमेंट नहीं प्रोवाइड कराना पड़ेगा.

उनकी पहचान को आधार या फिर किसी अथॉरिटी से जारी सर्टिफिकेट से ही वेरिफाई किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि अन्य स्टूडेंट्स की ही तरह ट्रांसजेंडर्स भी अपनी पसंद के किसी प्रोग्राम में इनरोल हो सकते हैं. इस दौरान उन्हें सभी तरह की मदद दी जाएगी. सोशल साइंस, साइकोलॉजी, साइंस, टूरिज्म, मैनेजमेंट, एजुकेशन में इग्नू 228 ऐकडेमिक और प्रोफेशनल कोर्स ऑफर करता है. इग्नू के जुलाई सत्र में एडमिशन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. सर्टिफिकेट प्रोग्राम के लिए अप्लाई करने का अंतिम दिन 16 जुलाई और अन्य प्रोग्राम के लिए अंतिम दिन 31 जुलाई है.

भारत के बौद्धों की स्थिति पर जारी इस उत्साहजनक रिपोर्ट को पढ़िए

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भारत में बौद्ध धर्म तेजी से बढ़ रहा है, ना सिर्फ बढ़ रहा है बल्कि इस धर्म को मानने वाले लोगों का विकास भी तेजी से हो रहा है. वह आगे बढ़ने में तमाम वर्ग और धर्म के लोगों को पीछे छोड़ रहे हैं. हाल ही में आई इंडिया स्पैंड की रिपोर्ट बताती है कि अन्य धर्मों के मुकाबले बौद्धों का विकास तेजी से हो रहा है.

इस रिपोर्ट से जुड़ा दूसरा सच यह भी है कि भारत में बौद्ध धर्म को मानने वाले ज्यादातर लोग दलित हैं. इस धर्म में आने से पहले उनकी शिक्षा दर और विकास दर बहुत धीमी थी, लेकिन बौद्ध धर्म में आते ही उनके हालत में आश्चर्यजनक रूप से सुधार हुआ है. खास कर नवबौद्धों के शिक्षादर में विशेष रूप से बढ़ोतरी हुई है.

रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 84 लाख बौद्ध में 87 प्रतिशत दूसरे धर्म से परिवर्तित लोग हैं. इनमें से भी अधिकतर दलित समाज से आने वाले लोग हैं. आंकड़ों के अनुसार ऐसे बौद्धों की लैंगिक समानता और शिक्षा की दर देश के बाकी दलितों से काफी बेहतर है. रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में शिक्षा के मामले में बौद्ध समाज 81.29 प्रतिशत, हिंदू 73.27 प्रतिशत, एससी 66.07 प्रतिशत है. अगर इसको राष्ट्रीय औसत के तौर पर देखें तो यह 72.98 प्रतिशत है. इन आंकड़ों से साफ जाहिर होता है कि बौद्धों का शिक्षा स्तर अन्य धर्मों से ऊपर है.

रिपोर्ट में महिलाओं की हालत सुधरने की बात भी कही गई है. बौद्ध धर्म में महिलाओं को जितना सम्मान और बराबरी का दर्जा मिलता है, शायद यही वजह है कि बौद्ध धर्म में लिंगानुपात का स्तर भी अन्य सभी धर्मों से बेहतर है. बौद्ध धर्म में प्रति एक हजार पुरूष पर 965 महिलाएं हैं. अगर राष्ट्रीय स्तर पर इसका औसत निकाला जाए तो प्रति हजार पुरूष पर 943 महिलाएं हैं. छोटे परिवार में यकीन करने में भी बौद्ध धर्म के लोग सबसे आगे हैं. इस धर्म में 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों का राष्ट्रीय औसत 13.59 प्रतिशत के विपरीत बौद्ध समुदाय में बच्चों की दर 11.62 प्रतिशत है.

मध्य प्रदेश: कर्ज न चुका पाने के कारण किसान ने की आत्महत्या

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नई दिल्लीमध्यप्रदेश के किसानों की मौत का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा. हर दिन किसी न किसी किसान की मौत की खबर सामने आ रही है. अब तक, मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं के दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं. उसमें एक नाम और शामिल हो गया है. सीहोर में एक 50 वर्षीय किसान कर्ज से परेशान होकर फांसी के फंदे पर झूल गया.

इससे पहले कर्ज से परेशान एक और किसान ने 1 जुलाई को सागर जिले के खुराई इलाके में चलती ट्रेन के सामने कूदकर आत्महत्या कर ली थी. मृतक किसान प्रेमलाल अहिरवाल (24) निवासी सेमराहाट थाना खुरई का रहने वाला था. ग्रामीणों के अनुसार युवक ने 2.5 लाख रुपये में अपनी जमीन साहूकार के पास गिरवी रखी हुई थी. इसके साथ ही गांव व क्षेत्र के अन्य लोगों का भी उसे लगभग 30 हजार रुपए कर्ज देना था.

इससे पहले 2 जुलाई को मंदसौर जिले के दौरवाड़ी गांव के अन्य किसान लाल सिंह ने भी जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी. उनके पास से 9 पेज का सुसाइड नोट भी मिला है. शुक्रवार को भी वित्तीय संकट के चलते एक और किसान देना महारिया ने अपने घर में फांसी के फंदे से लटकर आत्महत्या कर ली. राज्य के मंदसौर जिले में कर्ज माफी के लिए हुए किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद से अब तक, मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं के दो दर्जन से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं. विपक्षी दल कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि आंदोलन के बाद प्रदेश में अब तक 50 किसान खुदकुशी कर चुके हैं.

गौरतलब है कि किसान आंदोलन के दौरान 6 जून को भड़की हिंसा के चलते पुलिस की गोली से 5 किसानों की मौत हो गई थी. इसके बाद 6 व 7 जून को आक्रोशित भीड़ ने राजमार्ग पर लगभग 30 ट्रकों को आग लगा दी थी.

 

राजस्थान के 3 छात्रों ने एजुकेशन के लिए बनाए 95 ऐप

राजस्थान। स्टार्टअप के दौर में युवाओं की क्रिएटिविटी उन्हें बेहतर मुकाम दिला रही है. शहरों में ही नहीं, कस्बे से लेकर गांवों तक युवाओं का टैलेंट अब देश-दुनिया में छाने लगा है. यहां हम आपको कॉलेज ड्रॉप आउट कर कुछ क्रिएटिव करने वाले दोस्तों की कहानी बता रहे हैं, जिन्होंने अपने यूनीक आइडिया से न केवल स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ हल्का कर दिया, बल्कि किताबी ज्ञान को विस्तृत कर टेक्सटबुक्स की जरूरत ही खत्म कर दी. इन्होंने ज्ञान-विज्ञान के 95 मोबाइल ऐप बनाए हैं.

दरअसल, हम बात आरडीएस यानि राहुल, देवेन्द्र और साहिल की कर रहे हैं. अलवर जिले के तीनों युवा जिन्होंने अपने नाम के आधार पर ही आरडीएस एजुकेशन कार्यक्रम तैयार किया है. बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद तीनों दोस्तों ने आगे की पढ़ाई की शुरुआत की, लेकिन इंट्रेस्ट कुछ अलग करने का था इसलिए कॉलेज ड्रॉपआउट किया और स्कूली सिलेबस से किताबी ज्ञान को डिजिटलाइज्ड कर दिया.

तीनों दोस्तों ने एनसीईआरटी सिलेबस की सभी बुक्स को फेसबुक के मैंसेजर पर मैंसेजर इंटेलिजेंट बोर्ड बनाकर समेट लिया. यानि किसी भी क्लास का स्टूडेंट किसी भी विषय का कोई चेप्टर पढ़ना चाहे तो मैसेंजर पर आरडीएस एजुकेशन टाइप कर पढ़ सकते है. हालांकि, अभी उनका कार्य सीबीएसई और राजस्थान बोर्ड के पाठ्यक्रम पर भी चल रहा है. इसे भी वे जल्द डिजिटलाइज्ड करेंगे.

एनआईटी छोड़कर आए साहिल का कहना है कि इसका उन्हें देशभर से रिस्पोंस मिल रहा है. रशिया में एमबीबीएस कोर्स के लिए राहुल यादव का सिलेक्शन भी हो गया, लेकिन अपने दोनों दोस्तों के साथ किए काम को आगे बढ़ाने के मकसद से उन्होंने मोबाइल ऐप तैयार करने पर जोर दिया. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए जीके, जीएस और तमाम स्कूली विषयों से जुड़े 95 ऐप तैयार कर डाले.

साथी देवेन्द्र के साथ युवाओं ने इस आइडिया को इंप्लीमेंट किया. इनका मानना था कि बच्चे केवल मोबाइल पर गेम खेलने का ही काम करते हैं, लेकिन इसे पढ़ाई में भी काम लिया जाना चाहिए. इस कार्य के लिए उन्हें गूगल की ओर से भी सराहना मिली है. बहरहाल, ये युवा भी उसी अलवर जिले से ताल्लुक रखते हैं जहां कुछ समय पर मोबाइल ऐप बनाने वाले इमरान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सराहा था. अब इन्हें उम्मीद है कि इस कार्य में उन्हें सरकार से भी प्रोत्साहन मिल सके ताकि स्टूडेंट्स के लिए वे अपने काम को और आगे बढ़ा सकें.

अंडर 17 विश्व कप का ऐसे राजनीतिक फायदा उठाएगी मोदी सरकार

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Fifa football world cup

नई दिल्ली। केंद्र सरकार इस वर्ष 6 से 28 अक्टूबर तक भारत में पहली बार होने वाले अंडर-17 फुटबॉल विश्व कप का राजनीतिक फायदा उठाने की पूरी तैयारी कर रही है. फुटबॉल की वैश्विक संस्था फीफा के इसका खर्च उठाने से इनकार करने के बावजूद केंद्रीय खेल मंत्रलय टूर्नामेंट की शुरुआत के एक दिन पहले ही खुद दस करोड़ रुपये खर्च करके उद्घाटन समारोह आयोजित करने को तैयार है. इस कार्यक्रम का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे.

खेल मंत्रलय के एक अधिकारी ने कहा कि पांच अक्टूबर को राजधानी के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में यह समारोह आयोजित होगा. 90 मिनट के कार्यक्रम में 15 मिनट प्रधानमंत्री के भाषण के लिए रखे गए हैं. दिल्ली में होने वाले मैच जवाहर लाल नेहरू (जेएलएन) स्टेडियम में होने हैं, लेकिन उद्घाटन ध्यानचंद स्टेडियम में आयोजित करने के सवाल पर अधिकारी ने कहा कि फीफा के हिसाब से टूर्नामेंट में उद्घाटन समारोह की कोई जगह नहीं है, लेकिन हम यह करना चाहते थे.

सूत्रों के मुताबिक फीफा ने विश्व कप की आयोजन समिति को साफ कह दिया है कि इसके लिए उसके द्वारा इस टूर्नामेंट के आयोजन के लिए दिए जा रहे करीब 70-80 करोड़ रुपये से एक भी पैसा नहीं खर्च किया जाए. यही नहीं, वह इसमें होने वाले मार्च पास्ट के लिए भाग लेने वाली टीमों के खिलाड़ियों को भी नहीं भेजेगा और जेएलएन स्टेडियम भी नहीं देगा.

इसके बाद आयोजन समिति ने इस कार्यक्रम को हॉकी के लिए प्रयोग में आने वाले ध्यानचंद स्टेडियम में आयोजित कराने का निर्णय लिया. उद्घाटन समारोह पर फिजूलखर्ची के सवाल पर अधिकारी ने कहा कि यह देश के गौरव की बात है कि यहां पर पहली बार अंडर-17 फीफा विश्व कप हो रहा है. हम अपनी संस्कृति दुनिया को दिखाना चाहते हैं. कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जा रही है. इसके अलावा उद्घाटन में समारोह दुनिया के कुछ बड़े फुटबॉल खिलाड़ियों को भी बुलाने की योजना है.

पाकिस्तानी लड़की को भारत में शादी के लिए नहीं मिल रहा वीजा

इस्लामाबाद। पाकिस्तान के कराची की सादिया और लखनऊ के सईद की प्रेम कहानी बस एक वीजा की मोहताज बन कर रह गई है. एक अगस्त को इन दोनों की शादी होनी है, लेकिन वीजा नहीं मिल पाने की वजह से शादी रुकने की कगार पर पहुंच गई है. सादिया और सईद की शादी तय होने के बाद उनके परिजनों ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग पर वीजा के लिए अर्जी दी थी, लेकिन उनकी यह अर्जी खारिज हो गई थी. इस बात से परेशान होकर, सादिया ने अब विदेश मंत्री विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मदद की गुहार लगाई है. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक सादिया ने कहा, “मुझे काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है. उच्चायोग ने हमारी अर्जी को दो बार खारिज कर दिया था और ऐसा करने के पीछे कोई कारण भी नहीं दिया. हम लोग बीते एक साल से वीजा हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.”

सादिया के मुताबिक दोनों देशों के संबंधों के बीच आई कड़वाहट के चलते उनके परिवार को वीजा नहीं मिल पा रहा. खबर के मुताबिक, सादिया ने ट्वीट कर विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज से मदद मांगी है.उन्होंने ट्वीट किया है कि, “इस बेटी की मदद करिए प्लीज. अब मेरी आखिरी उम्मीद आप ही हैं.” सादिया और सईद की शादी साल 2012 में तय की गई थी. सादिया अपने परिवार के साथ लखनऊ में शादी की तारीख पक्की करने आई थीं. रिश्ता तय होने के बाद दोनों परिवारों के बीच बातचीत जारी रही लेकिन उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि उनकी शादी एक वीजा की मोहताज हो जाएगी.

वहीं पहले कई बार ऐसी खबरें सामने आई हैं, जब दोनों मुल्कों के लोगों ने शादी करने का फैसला लिया हो और बाद में उन्हें अलग होना पड़ा हो. इसी साल मार्च महीने में ऐसे ही एक जोड़े के अलग होने की खबर सामने आई थी. पाकिस्तान के अकबर दुरानी को एक हिंदू लड़की से प्यार हो गया था. दोनों की दोस्ती सोशल मीडिया पर हुई थी. दोनों ने शादी की,लेकिन अकबर को मार्च महीने मे वापिस उसके देश पाकिस्तान भेज दिया गया था. वहीं हाल ही में भारतीय महिला उजमा के पाकिस्तान से वापिस लौटने की खबर भी सुर्खियों में रही थी. उजमा ने दावा किया था कि उसे पाकिस्तान में जबरन शादी को मजबूर किया गया था.

 

दिल्ली: SC/ST आयोग का गठन जल्द

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नई दिल्ली। राजधानी में दलितों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए दिल्ली सरकार अनुसूचित जाति/जनजाति आयोग के गठन के लिए तेजी से कार्यरत हो गई है. विधानसभा सत्र के दौरान दिल्ली के एससी/एसटी विभाग के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने कहा कि सरकार इस मामले में अन्य राज्यों में स्थित आयोग का अध्ययन कर रही है और जरूरी जानकारियां जुटा रही है.

उन्होंने कहा कि इस आयोग के बनने के बाद राजधानी में दलित वर्ग पर होने वाले किसी भी अत्याचार, अपराध को रोकने में इस आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी. बनने वाला आयोग प्रशासन से भी जवाब-तलब कर सकता है. इसके अलावा तेलंगाना राज्य की तर्ज पर दिल्ली में भी दलित वर्ग के सहयोग के लिए एससी/एसटी वेलफेयर फंड के लिए एक्ट बनाया जाएगा. मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने बताया कि तेलंगाना सहित अन्य राज्यों में गठित वेलफेयर फंड का अध्ययन कर रहे हैं, रिपोर्ट तैयार होते ही सरकार बिल लाएगी जो दलितों के लिए सुरक्षा और सम्मान के स्तर में इजाफा करेगा.

उन्होंने कहा कि दलित वर्ग के विकास के लिए केंद्र और राज्य स्तर पर कई योजनाएं लाई गई हैं, लेकिन कई बार इन योजनाओं से जुड़े फंड का दूसरे मद में इस्तेमाल कर दिया जाता है. इस समस्या से निजात पाने के लिए दिल्ली सरकार इस एक्ट को लागू करने के लिए सक्रिय हो गई है, ताकि दिल्ली में रहने वाले दलित वर्ग के विकास में किसी तरह की कोताही न बरती जाए और उन पर किसी भी तरह का अत्याचार न हो सके.

अपनी विचारधारा को मूलरूप में पहचान दिलानी होगीः सूरजपाल चौहान

Dalit Lekhak manch

नई दिल्ली। दलित लेखक संघ ने दो जुलाई (रविवार) को ‘समकालीन दलित साहित्य की वैचारिकी के औजार’ पर विचार-विमर्श का आयोजन किया गया. जिसमें अनेक दलित विचारकों ने हिस्सा लिया. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे माननीय कर्मशील भारती ने इस अवसर पर कहा कि हमें अपने मुहावरे, शब्द और विचार खुद ही गढ़ने होंगे जिससे समतामूलक समाज की परिकल्पना की जा सके. उन्होंने आगे कहा कि हमें सामाजिक बदलाव के लिए साहित्य लिखना होगा न कि बदला लेने हेतु.

मुख्य वक्ताओं में शामिल जगदीश प्रसाद जेंद ने कहा कि हमें पहले अपनी समकालीनता को पहचानना होगा कि एक दलित साहित्यकार की क्या जिम्मेदारी हो. क्योंकि यह हमारा भोगा हुआ समय और व्यथा है. प्रलोभनों से आंदोलन को होने वाले नुक्सान से बचाना होगा. इसके लिए जन-सामान्यों को इसकी वैचारिकी से अवगत करना अतिआवश्यक है.

कार्यक्रम का संचालन कर रहे हीरालाल राजस्थानी ने शुरुआती भूमिका बनाते हुए कहा कि हमें अपने नायकों के वैचारिक टूल्स से वर्तमान परिस्थितियों का समाधान निकालते हुए आगे बढ़ना होगा. उनके विचारों को दोहराने भर तक सीमित ना रहकर उन्हें जीवन में उतरना जरुरी. शीलबोधि ने कहा कि दलित साहित्य के नाम पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है. जबकि दलित साहित्य कि वैचारिकी क्या है, किस तरह स्थापित हो और कैसे विचार को कार्यविन्त करना है. इस पर विचार, चिंतन और मंथन कर दर्शन में बदलने की आवश्यकता है तथा अपने कार्मिक विकास को समझना और जानना होगा.

डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने वक्तव्य में कहा कि अनेकों उत्पीड़न की घटनाओं को सिरे से समझना होगा जो लगातार बढ़ती जा रही हैं. दलित साहित्य में समताजनक भाषा के प्रयोग की जरुरत जान पड़ती है तथा गैर सामाजिक लोगों के प्रलोभनों से बचना होगा. डॉ. मुकेश मिरोठा ने कहा कि दलित विमर्श पर अब भी हम एक मत नहीं हैं. अतिवादियों ने डॉ. अम्बेडकर और गौतम बुद्ध को पूजापाठ तक सीमित करने की कोशिश की है. जबकि उनके मूल विचारों को समझना व मानना बहुत जरूरी है, वरना इससे आंदोलन वैचारिक रूप से कमजोर पड़ जायेगा.

रजनी तिलक ने दलित लेखन में समग्रता बनाये रखने की बात को प्रमुखता से रखा तथा साथ ही यह भी अपील कि के लेखक और कार्यकर्ताओं को एक साथ मिलकर अमानवीयता के खिलाफ आंदोलन करने होंगे. सूरजपाल चौहान ने कहा हमें अपनी विचारधारा को मूलरूप में पहचान दिलानी होगी क्योंकि यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है. हमें दिग्भ्रमिता से बचते हुए जातियों के खोल से बहार आना होगा. संजीव कौशल ने संक्षेप में अपनी बात रखते हुए कहा कि किसी भी साहित्य के टूल्स जन संवाद से ही आते हैं. जब तक लेखनी में पैनापन नहीं आएगा तब तक सामाजिक बदलाव की अपेक्षा ख्याल भर ही है.

पूनम तुषामड़ ने अपने आलेखपाठ में कहा कि पिछले दो दशक में दलित साहित्य जितना समृद्ध हुआ है. यह दलित साहित्य का स्वर्ण काल कहा जा सकता है. डॉ. कुसुम वियोगी ने अपने वक्तव्य में कहा हमें अलग- अलग जातियों में बंटने से बचना होगा. चाहे सामाजिक हो, राजनैतिक हो या फिर साहित्य की ही बात क्यो ना हो! इन सब में डॉ. अम्बेडकर की वैचारिकी ही कारगर साबित होती है. डॉ. अम्बेडकर के मूल चिंतन से भटकी बिखरी छितरी जातियो को एक छतरी के नीचे आकर आज जुड़ना बहुत जरुरी है. दलित लेखको को वैश्वीकरण के दौर मे अपनी दृष्टि को सम्रगता से विस्तार देना होगा. तभी दलित लेखन की सार्थकता है.

इसके आलावा राजेंद्र कुमार, वेद प्रकाश, ड़ा .धर्मपाल पीहल, नरेंद्र भारती व रामसिंह दिनकर ने भी अपने-अपने विचार रखे. उपस्थिति बतौर महिला अधिकार अभियान की सम्पादिका कुलीना, श्री सुधीर, जसवंत सिंह जन्मेजय, एम. एल. मौर्य, सुनीता, कान्ता बौद्ध, अनुराधा कनोजिया, हरपाल सिंह भारती, दिनेश, सलमान, चंद्रकांता सिवाल, पूनम तुषामड़, पुष्पा विवेक, अंजलि भी मौजूद रहे. तथा शोधार्थियो ने भी भाग लिया अंत मे धन्यवाद ज्ञापन बलविंद्र सिंह बलि ने किया.

चलती बस में BJP नेता ने किया रेप

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महाराष्ट्र। बीजेपी नेताओं के कारनामें रूकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. अब एक संगीन मामला महाराष्ट्र के गडचिरौली से सामने आया है. बीजेपी के एक नेता का चलती बस में शारीरिक संबंध बनाने का वीडियो वायरल होने से हड़कंप मच गया है. वायरल वीडियो में सत्ताधारी बीजेपी का एक युवा नेता युवती के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए दिखाई दे रहा है. उस युवती ने आरोप लगाया कि बीजेपी नेता ने नौकरी और शादी का झांसा देकर उसके साथ रेप किया है.

यह मामला गडचिरौली जिले के चंद्रपुर इलाके का है. बस में लगे सीसीटीवी  कैमरे में यह पूरा मामला रिकार्ड हो गया है. वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि बीजेपी नेता रविन्द्र बावनथड़े एक महिला के साथ शारीरिक संबंध बना रहा है. बस में कई यात्री सवार हैं और यह मामला बस की पिछली सीट का है.

वीडियो में मौजूद महिला ने पुलिस में रेप का केस दर्ज कराया. युवती का आरोप है कि उसे नौकरी का झांसा देकर उसके साथ रेप किया गया. साथ ही आरोपी ने उससे शादी का वादा भी किया था वो उससे भी मुकर गया.पुलिस ने युवती की शिकायत पर मामला दर्ज कर लिया है. आरोपी नेता रविन्द्र बावनथड़े अभी फरार चल रहा है. पुलिस उसकी तलाश में दबिश दे रही है. सत्ताधारी पार्टी के नेता से जुड़ा मामला होने के चलते पुलिस इस बारे में कुछ भी बोलने से इनकार कर रही है.

वहीं सेक्स वीडियो वायरल होते ही सियासी गलियारों में भूचाल आ गया. बीजेपी नेताओं ने इस पर किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है. वह मामले से बचने की कोशिस कर रहे हैं और किसी भी बयान को देने से लगातार बच रहे हैं.

 

देश के सबसे अमीर मंदिर में चोरी

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केरल। केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम के पद्मनाभस्वामी मंदिर से हीरे गायब होने की घटना एकदम चौकाने वाली हुई थी, जिसका मामला कोर्ट तक पंहुच गया है. सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार यानी आज इसकी सुनवाई होगी. मंदिर ट्रस्ट की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दी गई रिपोर्ट में सोमवार को यह दावा किया गया था कि मंदिर के खजाने से आठ हीरे गायब हैं.

असल में मंदिर के संचालन की पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है. इस मामले में सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम एमिक्स क्यूरी के तौर पर लगातार सहयोग कर रहे हैं. उन्होंने उच्चतम न्यायालय में एक रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें कहा गया है कि 6 अगस्त 2016 को इस मामले में एफआईआर दर्ज कराई गई थी.

नियम यह है कि मंदिर में रत्नों की कीमतों का एक रजिस्टर मेंटेन किया जाता है. इस रजिस्टर में कम से कम 70-80 साल पहले के आभूषणों की कीमत का लेखा-जोखा है. सुब्रमण्यम की रिपोर्ट के मुताबिक गायब हुए रत्नों और आभूषणों की आधिकारिक कीमत 21.7 लाख रुपए है. हालांकि ये हीरे प्राचीन धरोहर बताए जा रहे हैं, ऐसे में इनका मार्केट रेट कई गुणा ज्यादा हो सकता है. खबरों के मुताबिक जो हीरे गायब हुए हैं, उनका इस्तेमाल भगवान पद्मनाभस्वामी के तिलक में किया जाता है और उन्हें गर्भगृह के पास ही तिजोरियों में रखा जाता था. अब सवाल यह खड़ा हो गया है की ये हीरे गये तो कहां गये क्योंकि मंदिर के खजाने तक किसी भी आम आदमी की पहुंच नहीं है.

 

जाति, लैंगिक, राजनीति और दलित मुक्ति का प्रश्न कोविंद बनाम कुमार

Ramnath Kovind

समाज और संस्थानों में भले ही दलितों का शोषण, भेदभाव और अत्याचार बदस्तूर जारी हो, लेकिन राजनीति में ‘दलित’ शब्द अब तक ब्रांड वैल्यू बनाए हुए है, इसका बाजार गर्म है. कम से कम इतना तो मानना पड़ेगा कि डॉक्टर आंबेडकर और संविधान द्वारा प्रदत्त राजनीतिक समानता अर्थात एक व्यक्ति और एक वोट के अधिकार ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को विवश किया है कि सांकेतिक रूप से ही सही, लेकिन सदियों से उपेक्षित जमात को स्वीकार करें.

भारत में एक व्यक्ति बहुल अस्मिताओं के साथ जन्म लेता है, जिसमें सबसे प्रमुख जातिगत पहचान है. ‘जाति’ जन्मना है और ‘वर्ग’ कर्मणा. धर्म, क्षेत्र, राष्ट्रीयता, भाषा, वर्ग इत्यादि बदले जा सकते हैं, पर जाति नहीं. गर्भधारण से लेकर देहावसान तक जाति वजूद का हिस्सा बनी रहती है.

भारतीय लोकशाही की एक दिलचस्प त्रासदी है कि जब कोई ‘गैर-दलित’ किसी सार्वजनिक संस्था के लिए उम्मीदवार होता है या चुना जाता है तब उसकी जातीय पहचान की नहीं बल्कि उसके तथाकथित ‘गुणों’, अनुभवों और ‘काबिलियत’ की चर्चा होती है. लेकिन अगर कोई अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग से आए तो उसके समुदाय की चर्चा पहले होती है. इसके ऐतिहासिक कारण हैं. गैर-दलित के लिए यह उम्मीदवारी या अधिकार नैसर्गिक मान लिया जाता है, अर्थात यह उसका जन्मजात अधिकार है. ‘दलितों’ का यह अधिकार नहीं है, इसलिए खबर बन जाती है. वहीं दलित अस्मिता के शोर में जस्टिस कर्णन के मामले पर घोर चुप्पी बरती जाती है.

बहरहाल, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया, जो अगले तीन दिन तक मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा का विषय रहा. उसके बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना कर तुरुप का पत्ता खेला. कई मामलों में यह चुनाव दिलचस्प होने वाला है– विशेष रूप से जाति और लैंगिक प्रश्न को लेकर. जरा दोनों उम्मीदवारों के अनुभव और परिचय पर एक नजर डालें.

दोनों उम्मीदवार लगभग एक ही आयु वर्ग के हैं. मीरा कुमार स्वतंत्रता-सेनानी व भारत के पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम की बेटी हैं. राजनीति में आने से पहले मीरा कुमार कुछ सालों तक भारतीय विदेश सेवा में कार्य कर चुकी हैं. बिजनौर से पहली बार 1985 में सांसद बनीं, पांच बार सांसद रह चुकी हैं. इसके साथ उनके पास केंद्रीय मंत्री और लोकसभा स्पीकर होने का अनुभव भी है. पहली महिला और दूसरी दलित लोकसभा अध्यक्ष.

रामनाथ कोविंद उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. पेशे से वकील हैं, लोकसभा या विधानसभा में नहीं आए, 1994-2006 तक राज्यसभा के सांसद बेशक रहे हैं और अभी राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने पर बिहार के राज्यपाल पद से इस्तीफा दिया है.

चूंकि इस चुनाव की उम्मीदवारी में दलित अस्मिता का खेल खेला जा रहा है, इसलिए जातिगत समीक्षा जरूरी लगती है. मीरा कुमार जाटव जाति से हैं, जो पूरे भारत में अनुसूचित वर्ग से संबद्ध हैं. रामनाथ कोविंद, कोरी/कोली जाति से हैं जो उत्तर प्रदेश से अनुसूचित जाति से संबद्ध हैं. कई प्रदेशों में उनकी जाति पिछड़े वर्ग से संबंधित है, जैसा कि गुजरात भाजपा अध्यक्ष जीतू वाघाणी बाकायदा पोस्टर निकाल कर यह प्रचार कर रहे हैं कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद इस समुदाय के एक प्रतिष्ठित नेता हैं.

बहरहाल, दोनों उम्मीदवारों में एक बात समान है, दोनों दलित आंदोलन या किसी भी प्रगतिशील आंदोलन की उपज नहीं हैं. एक को अगर विरासती कांग्रेसी दलित नेता कहा जा सकता है तो दूसरे को कागजी भाजपाई दलित नेता! लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्रपति जैसे पद की उम्मीदवारी के लिए उम्मीदवार की घोषणा करते समय उसकी जातीय पहचान की घोषणा जरूरी थी? क्या किसी गैर-दलित की उम्मीदवारी के मामले में ऐसा कभी हुआ? फिर, 19 जून 2017 को कोविंद की उम्मीदवारी की घोषणा करते समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को क्यों कहना पड़ा कि रामनाथ कोविंद दलित समाज से उठकर आए हैं और उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए बहुत काम किया है.

शाह सत्ताधारी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं इसलिए उनकी यह घोषणा कहीं रोहित वेमुला, उना, और सहारनपुर की घटनाओं से उपजे दलित आक्रोश, जिसकी अभिव्यक्ति 21 मई और 18 जून की जंतर मंतर की ऐतिहासिक और अप्रत्याशित रैली में देखी गई, के प्रति हताशा का परिणाम तो नहीं? क्या कोविंद, सरकार और भाजपा के विरुद्ध उभरे दलित आक्रोश को शांत करने की रणनीति के प्रतीक स्वरूप पेश किए गए? जाहिर है इन घटनाओं के अलावा अबाध निजीकरण और आरक्षण जैसे संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना से दलित वर्ग आक्रोशित तो है ही. इन मुद्दों पर दलित नेताओं की चुप्पी ने पूना पैक्ट की याद ताजा कर दी है.

अब प्रश्न है कि क्या किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री बनना दलितमुक्ति का पर्याय है? क्या इससे दलितों के सम्मान, सुरक्षा, रोजगार, अधिकार की समस्या हल हो जाएगी? यदि नहीं तो जाहिर है इस तरह किसी व्यक्ति की जाति को प्राथमिकता देकर उम्मीदवार बनाने का महत्त्व सिर्फ श्रृंगारिक ही है. व्यक्तिगत मुक्ति संभव है, लेकिन जमात की मुक्ति नहीं. इस परंपरा की जड़ें भारतीय इतिहास में देखी जा सकती है– ‘शूद्र’ के राजा बनने के बाद ‘पुरोहित’ घोषणा करता है. अब आप शूद्र नहीं क्षत्रिय हुए और आपका धर्म है वर्णाश्रम धर्म की रक्षा. नंद, मौर्य से लेकर शिवाजी तक में इस परंपरा के साक्ष्य देख सकते हैं. यह अकारण नहीं था कि शिवाजी को काशी के ब्राह्मण के बाएं पैर के अंगूठे से राजतिलक कराना पड़ा था.

लोकशाही की मर्यादा है, किसी न किसी को तो चुनना है. मायावती ने वादे के अनुसार मीरा कुमार के समर्थन में घोषणा कर दी है. बिहार के दलित नेता रामविलास पासवान ने घोषणा की थी कि कोविंद का विरोध दलित का विरोध समझा जाएगा, अब उन्हें बताना होगा कि क्या मीरा कुमार का विरोध दलित महिला का विरोध होगा या नहीं? बिहार में महिला ‘सशक्तीकरण’ के प्रतीक और महादलितों के ‘शुभचिंतक’, कांग्रेस के गठबंधन में चुनाव जीतने और सरकार चलाने वाले नीतीश कुमार के राजनीतिक व्याकरण में राजेंद्र प्रसाद के बाद बिहार से दूसरी राष्ट्रपति उम्मीदवार जगजीवन बाबू की बेटी ‘महादलित’ महिला मीरा कुमार कहां फिट बैठती हैं? महिला आरक्षण और सशक्तिकरण पर मुखर आवाज बुलंद करने वालीं सुषमा स्वराज जैसे नेताओं का निर्णय भी दिलचस्प होगा– पार्टी लाइन या महिला?

-डॉ. रतन लाल, लेखक हिंदू कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के इतिहास विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. जनसत्ता से साभार प्रकाशित

जातिवादी गुंडों ने दलित परिवार पर किया हमला, दिव्यांग बेटे को जमकर पीटा

crime against dalit

शामली। सदर कोतवाली के शांति नगर मोहल्ले में भाजपा नेता के करीबी गुंडों ने अपने आधा दर्जन साथियों के साथ मिलकर दलित परिवार पर हमला कर दिया. हमले में एक महिला सहित कई लोग घायल हो गए. जिसमें एक युवक की हालत नाजुक बनी हुई है.

पीड़ित दलित परिवार ने जब पुलिस से शिकायत की तो पुलिस आनाकानी करने लगी. पुलिस मामले में कार्रवाई करने के बजाए गुंडों की हिमायत करती नजर आई. इतना ही नहीं पीड़ित दलित परिवार और घायलों को पुलिस कोतवाली में ही बैठाए रखा. घायल लोग कोतवाली में ही तड़पते रहे.

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शांति नगर में एक दलित विकलांग युवक की हस्थचलित रिक्शा घर के बाहर खड़ा था. रिक्शा वहां खड़ा देख जातिवादी गुंडा विफर पड़ा और विकलांग युवक की पिटाई शुरू कर दी. थोड़ी देर बाद दोबारा से जातिवादी गुंडे ने अपने आधा दर्जन अन्य साथियों के साथ मिलकर दलित परिवार पर हमला कर दिया. लोगों के हमले से एक महिला सहित कई लोग घायल हो गए. आरोप है कि जातिवादी गुंडा भाजपा नेता का करीबी है. जिससे वह लगातार मोहल्ले में लोगों के साथ मारपीट की घटना को अंजाम देता रहता है.

कोतवाली में शिकायत करने पहुंचे पीड़ित दलित परिवार को पुलिस वहीं बैठा लिया. आरोप है कि गंभीर रूप से घायल युवक को न तो पुलिस ने घर भेजा और ना ही इलाज के लिए अस्पताल. उल्टा पुलिस गुंडों की हिमायत करते हुए पीड़ित परिवार को ही धमकाना शुरू कर दिया.

पीड़ित महिला का आरोप हें कि जातिवादी गुंडें उन्हें जाति सूचक शब्द का इस्तेमाल करते हुए घर छोड़ने की धमकी दी है. महिला ने बताया कि जातिवादी गुंडें कहते हैं कि यह दूसरी जाति का मोहल्ला है यहां से तुम लोग चले जाओ नहीं तो जान से मार दिए जाओगे.

गुजरात में भाजपा की करारी हार

अहमदाबाद. भारतीय जनता पार्टी के किले में इस बार बड़ी सेंध लगी है. भाजपा को  अपने ही घर में ही करारी हार का सामना पड़ा है. कुल 13 सीटों में 10 सीटों पर भाजपा को करारी हार मिली है.कल 3 जुलाई को गुजरात के दीव नगर पालिका परिषद चुनाव के परिणाम आए हैं. यहां कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए 13 में से 10 सीटें प्राप्त की हैं. इस चुनाव में भाजपा कीरट वाजा के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी, लेकिन वो अपनी ही सीट खुद नहीं बचा पाये.

 चुनाव परिणाम आने के कुछ देर बाद ही कीरट ने अपने पार्टी में अपने पद से इस्तीफा दे दिया. कीरट को कांग्रेस उम्मीदवार ने 17 मतों से हराया. कीरट के नेतृत्व में भाजपा ने बडी जीत की कामना की थी और फिर से 14 साल बाद इस नगर पालिका परिषद पर अपना कब्जा जमाना चाहती थी.

इस चुनाव में फिलहाल के नगरनिगम के अध्यक्ष और कांग्रेस नेता हितेश सोलंकी ने भी जीत दर्ज की है. उन्होंने भाजपा के जीतेंद्र भारया को 598 मतों से हराया. दीव नगर निगम पर बीते दस सालों से कांग्रेस का राज है. बीते शनिवार इस चुनाव का प्रतिशत 72.70 रहा था. इस चुनाव से जाहिर है की बीजेपी का किला दरकना शुरू हो रहा है, जिसका असर अक्टूबर- नवम्बर में होने जा रहे उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव में दिख सकता है.

दलित-उत्पीड़नः यूपी पुलिस ने 31 दलित कार्यकर्ताओं को किया गिरफ्तार

dalit activists arrested

लखनऊ। यूपी पुलिस ने बीते सोमवार को लखनऊ प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे कई दलित कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया. पुलिस ने कहा कि उन्होंने इन कार्यकर्ताओं को इसलिए गिरफ्तार किया, क्योंकि उन्होंने प्रेस वार्ता के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास तक मार्च करने की योजना बनाई थी, जिसकी उन्हें इजाजत नहीं मिली हुई थी.

गिरफ्तार किए गए दलित कार्यकर्ताओं में शामिल रमेश दीक्षित, राम कुमार और रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट एसआर दारापुरी ने बताया कि उन्होंने ‘दलितों के उत्पीड़न’ पर चर्चा के वास्ते प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई थी. दारापुरी ने कहा कि झांसी में रविवार को करीब 50 दलितों को लखनऊ आने से रोक दिया गया. ये लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलना चाहते थे और उन्हें एक विशाल साबुन की टिकिया भेंट करना चाहते थे. यह समूह गुजरात के अहमदाबाद से आ रहा था और वे अपने साथ 125 किलो के साबुन की टिकिया यूपी के सीएम को देना चाहते थे.

dalit activists arrested

गौरतलब है कि मई महीने में यूपी के कुशीनगर जिले के अनुसूचित जाति के लोगों ने आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री के दौरे से पहले स्थानीय प्रशासन ने उन्हें साबुन और शैंपू दिए थे. राज्य के सबसे गरीब समझे जाने मुसहर तबके के लोगों ने कहा था कि कुशीनगर में योगी आदित्यनाथ के कार्यक्रम से पहले उनसे स्थानीय प्रशासन ने अच्छे ढंग से नहा-धोकर आने को कहा था.

गुजरात के दलित समुदाय के लोगों ने कहा कि वह इस मामले को लेकर सांकेतिक विरोध के रूप में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को निजी तौर पर साबुन भेंट करना चाहते थे. पुलिस ने बिना कोई कारण बताए उन लोगों से झांसी में ट्रेन से उतरने को कहा. हालांकि जिन लोगों को ट्रेन से उतारा गया, उन्होंने कहा कि सुरक्षा कारणों से उन्हें ट्रेन से उतरने को कहा गया. इन लोगों को एक स्थानीय गेस्ट हाउस में ले जाया गया और बाद में ट्रेन से वापस अहमदाबाद भेज दिया गया.

GST: सदर और चावड़ी बाजार में 90% बिजनेस ठप

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नई दिल्ली। GST के लागू होते ही बाजारों में इसका गहरा प्रभाव दिखना शुरू हो गया है. दिल्ली के चावड़ी बाजार, सदर और चांदनी चौक मार्केट से इन दिनों बाहरी खरीदार बिल्कुल गायब हैं.  इससे स्थानीय कारोबारियों की परेशानी बढ़ गयी हैं. कारोबारियों का कहना है कि मार्केट में रिटेल का ग्राहक तो है, लेकिन थोक बाजार में ग्राहक नहीं आ रहे हैं. दूसरी तरफ कच्‍चे बिल की वजह से कस्‍टमर को अभी तक कम रेट चुकाने के रूप में जो लाभ मिल था, उस पर भी काफी हद तक लगाम लग गई है. भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के जनरल सेक्रेटरी विजय प्रकाश बताते हैं की दिल्ली के थोक बाजारों में 90 फीसदी कारोबार ठप है. माल का कोई खरीदार नहीं है. जीएसटी की जटिलता के कारण ट्रांसपोर्टर्स भी माल नहीं बुक रहे हैं.  उनका कहना है कि जीएसटी इतना आसान नहीं है जितना बताया गया था. हमसे कहा गया था कि नई टैक्स व्यवस्था पारदर्शी और आसान होगी, लेकिन अब पूरी प्रक्रिया जटिल हो गई है. उन्होंने बताया कि कपड़ा कारोबारियों ने तो अभी तक GST रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया है. दिल्ली में करीब 5 लाख छोटे-बड़े कारोबारी हैं और यहां रोजाना का 1,500 करोड़ रुपये का बिजनेस होता है.

चांदनी चौक सर्व व्यापार मंडल के जनरल सेक्रेटरी संजय भार्गव के मुताबिक  थोक मार्केट में सन्नाटा है. कस्टमर बिल्कुल नहीं हैं. भार्गव का कहना है कि कारोबारियों को जीएसटी के ढांच को समझने में दिक्कत हो रही है.यह नया नियम पूरे भारत पर भारी पड़ रहा है जिसका नुकसान व्यापारियों के साथ-साथ आम जनता को भी हो रहा है.

मान्यवर कांशीराम के पदचिन्हों और आदर्शों पर चलें बहुजन छात्रः दद्दू प्रसाद

Mau confrence

मऊ। डॉ. भीमराव अम्बेडकर युवा कल्याण समिति के द्वारा बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर युवा छात्र सम्मेलन एवं संगोष्ठी का आयोजन किया गया. यह आयोजन रविवार दो जुलाई को मऊ नगर पालिका कम्यूनिटी हॉल में सुबह 10 बजे से शुरू हुआ. सम्मेलन एवं संगोष्ठी का विषय ‘वर्तमान सामाजिक परिदृश्य में युवाओं की भूमिका’ था. जिसमें वक्ताओं ने अपने अपने विचार रखें.

सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि पूर्व मंत्री माननीय दद्दू प्रसाद जी ने कहा कि आज के परिवेश में युवाओं की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है. ऐसे में उन्हें दिशा-निर्देश के साथ जागरूक कर कर्तव्यों के प्रति सचेत करने की आवश्यकता है. हर क्षेत्र में युवाओं को बढ़-चढ़ कर अपनी हिस्सेदारी लेनी चाहिए. युवाओं को बाबा साहेब अम्बेडकर और मान्यवर कांशीराम के पदचिन्हों और आदर्शों पर चलकर विकास की ओर चलने की बात कही.

विशिष्ट अतिथि एमपी अहिरवार समेत कई अन्य वक्ताओं ने भाग लिया. इसके अतिरिक्त कार्यक्रम में समता सैनिक दल के अध्यक्ष बी.डी. सुजात और वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसर अपना वक्तव्य दिया. कार्यक्रम के संयोजक प्रवीण कुमार एडवोकेट ने ही मंच का संचालन किया.

संयोजक प्रवीण कुमार एडवोकेट ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम का आयोजन देश के विभिन्न शहरो के विश्वविद्यालय और कॉलेजों में आयोजित कराए जाएंगे. बहुजन समाज के छात्रों की ये पहल राष्ट्रीय स्तर पर बहुजन छात्रों को सशक्त करना है. इसमें बहुजन छात्रों के राजनितिक सूझ-बुझ व रणनीति के साथ ही भविष्य की योजनाओं पर मंथन कर आगे की दिशा और दशा तय की जायेगी.

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पूर्व ब्लॉक प्रमुख शिवदेनी उर्फ साधू ने कहा कि आज युवाओं में अम्बेडकरवाद पैदा करने की जरूरत है तभी बाबा साहब के सपनो का भारत बनेगा. अख़्तर अली ने युवाओं को मानसिक रूप से मजबूत और बौद्धिक क्रांति के लिए प्रेरित किया. कुनाल किशोर ने राष्ट्रीय बहुजन युवा संगठन बनाने पर बल दिया. रामकन निर्मल ने दलित समाज के युवाओं पर होने वाले शोषण पर चिंता जाहिर की.

डॉ. संजय सुमन ने युवाओं को शिक्षा पर जोर देने के लिए प्रेरित किया. कार्यक्रम का संचालन एडवोकेट प्रवीण कुमार ने किया. इस कार्यक्रम के दौरान मुख्य रूप से अजीत कुमार, सुधीर कुमार चंचल, अश्विनी चौधरी, अभिनव रंजन, राजकुमार, योगेन्द्र. रामअवतार, अनिल, मोहन, मानवेंद्र, विश्राम, राजेश, मुन्ना आदि छात्र मौजूद रहे.

दिल्ली के 5 लाख SC/ST और अल्पसंख्यक छात्रों को नहीं मिली स्कॉलरशिप

Scholarship for sc st obc

नई दिल्ली। गूगल हैंगआउट के दौरान सीएम अरविंद केजरीवाल को कुछ छात्रों ने स्कॉलरशिप ना मिलने की शिकायत की तो सरकार हरकत में आ गई. सरकार ने सारी फाइलों की जांच करवाई जिससे एक बड़ा खुलासा सामने आया. शिकायत में बताया गया कि छात्रों को 16 महीने से स्कॉलरशिप का इंतजार है और केंद्र व दिल्ली सरकार की अलग-अलग स्कीम के तहत 5 लाख से ज्यादा स्कॉलरशिप अभी तक नहीं दी गई है.

रिपोर्ट सामने आने के बाद केजरीवाल ने चीफ सेक्रेटरी को आदेश दिया है कि 15 जुलाई तक हर हाल में करीब 5.57 लाख स्कॉलरशिप जारी कर दी जाए और चाहे इसके लिए रात- दिन काम क्यों न करना पड़े. साथ ही सीएम ने निर्देश दिया है कि रिपोर्ट में जिन अधिकारियों की लापरवाही की बात सामने आई है, उनसे जवाब मांगा जाए. रिपोर्ट का हवाला देते हुए सीएम ने चीफ सेक्रेटरी को लिखा है कि स्कॉलरशिप को लेकर फाइलें पूरे साल किसी मंत्री के सामने पेश नहीं की गई और किसी मंत्री के सामने इस मामले को नहीं रखा गया. संबंधित विभाग के अफसरों ने दिल्ली सरकार को पूरी तरह से अंधेरे में रखा और इस मामले की जांच होनी चाहिए कि ऐसा कहीं जानबूझकर तो नहीं किया गया.

शिकायत मिलने के बाद सीएम केजरीवाल ने डिपार्टमेंट ऑफ एससी, एसटी, ओबीसी, माइनोरिटीज से रिपोर्ट मांगी और डिपार्टमेंट की रिपोर्ट को जांच करने की जिम्मेदारी डॉयलॉग एंड डेवेलपमेंट कमिशन (DDC) को दी. DDC ने स्कॉलरशिप से जुड़ी 34 फाइलों की जांच की, जिसका जिक्र सीएम ने अपने आदेश में भी किया है. सीएम ने लिखा है कि गरीब छात्रों को लंबे समय तक स्कॉलरशिप नहीं दी गई है और वे समझ सकते हैं कि अगर 15 दिन तक भी स्कॉलरशिप मिलने में देर हो जाए तो कितनी मुश्किल होती है. सीएम ने अपनी रिपोर्ट में अधिकारियों की लापरवाही पर सवाल करते हुए पूरे मामले की गहराई से जांच करने के निर्देश दिए हैं.

डीडीसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि केंद्र सरकार द्वारा 7 और दिल्ली सरकार द्वारा 5 स्कॉलरशिप स्कीम को स्पांसर किया जाता है. एससी, एसटी, ओबीसी और माइनोरिटीज स्टूडेंट को इन स्कीमों का फायदा मिलता है. स्कूल और कॉलेज जाने वाले गरीब स्टूडेंट (प्राइवेट व गवर्नमेंट स्कूल) इस स्कॉलरशिप के जरिए अपनी पढ़ाई को आगे जारी रखते हैं. लेकिन सामने आया है कि दिल्ली सरकार की 2015-16 की स्कॉलरशिप जो मार्च 2016 तक मिल जानी चाहिए थी, वह अभी तक नहीं मिल सकी है. इसी तरह से 2016-17 की स्कॉलरशिप मार्च 2017 तक मिलनी चाहिए थी, वह भी छात्रों को नहीं मिल पाई है. डीडीसी ने रिपोर्ट में कहा है कि यह अफसरों की घोर लापरवाही है और ये फाइलें कभी भी सीएम या दूसरे मंत्रियों के सामने नहीं रखी गई. रिपोर्ट में बताया गया है कि 12 में से 2 केंद्र और 5 दिल्ली सरकार की स्कीम के तहत 77 हजार 745 एससी, एसटी, ओबीसी, माइनोरिटी कम्यूनिटी के छात्रों को स्कॉलरशिप का इंतजार है.

केंद्र सरकार की स्कीम के लिए दिल्ली सरकार ने कैंडिडेट्स से ऐप्लीकेशन मांगे और 30 नवंबर 2016 तक 66882 ऐप्लीकेशन आए. केंद्र के निर्देशों के मुताबिक 20 मार्च 2017 तक सभी कैंडिडेट्स का वेरिफिकेशन होना था. डिपार्टमेंट को ज्यादा समय दिए जाने के बाद भी 23 मार्च तक 293 कैंडिडेट्स का ही वेरिफिकेशन किया गया. डीडीसी ने रिपोर्ट में कहा है कि यह दिखाता है कि दिल्ली सरकार के अफसरों ने इस स्कीम को लेकर कितनी लापरवाही बरती है. इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से जो भी दिशा- निर्देश मिल रहे थे, उससे जुड़ी फाइलों को सीएम, डिप्टी सीएम या किसी मंत्री के पास नहीं भेजा गया.

कॉमेडी शो के जज बनकर आ रहे हैं अक्षय कुमार

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मुंबई। अक्षय कुमार अब एकदम नई जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं. वे जल्द ही टीवी पर एक कॉमेडी बेस्ड रिएलिटी शो को जज करते हुए नजर आने वाले हैं. जल्द शुरू हो रहे ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ को अक्षय जज करने वाले हैं. इससे पहले वे जज बने हैं लेकिन कुकिंग और ब्रेवरी शो के. उन्होंने टीवी पर ‘खतरों के खिलाड़ी’ और ‘मास्टरशेफ इंडिया’ को जज किया है.

अब वे सुपर जज बनकर पहली बार किसी कॉमेडी शो पर आएंगे. यह इस शो का पांचवा सीजन है. यह शो 2005 में स्टार प्लस पर शुरू हुआ था. इसी शो ने सुनील पाल, कपिल शर्मा और एहसान कुरैशी जैसे बड़े कॉमेडियन इस इंडस्ट्री को दिए हैं.

हाल ही में अक्की ने इस बारें में अपने इंस्टाग्राम पर भी बात की है. वैसे फिल्मों के लिहाज से अक्षय कुमार काफी व्यस्त हैं. उन्होंने हाल ही में ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ की शूटिंग पूरी की है. अब वे इसके प्रचार में व्यस्त हो जाएंगे क्योंकि इसे 11 अगस्त को रिलीज किया जाना है.

इसके अलावा उन्होंने एक और नई फिल्म ‘गोल्ड’ की शूटिंग भी शुरू कर दी है. इस फिल्म को रीमा कागती निर्देशित करने वाली हैं. फरहान अख्तर और रितेश सिधवानी इसे प्रोड्यूस कर रहे हैं.

खबर का संपादन नागमणि कुमार शर्मा ने किया है.

GST: साबुन, डिटर्जेंट और टू-व्हीलर हुए सस्ते

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नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी हिंदुस्तान यूनीलिवर (एचयूएल) ने अपने कुछ डिटर्जेंट और साबुन के दामों को कम कर दिया है. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था के तहत टैक्स में मिले लाभ को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए कंपनी ने यह कदम उठाया है. यही कारण बताकर देश की सबसे बड़ी दोपहिया निर्माता कंपनी हीरो मोटो कॉर्प ने भी बाइक, स्कूटरों के दामों में 1800 रुपये तक की कटौती की है.

कंपनी ने 250 ग्राम के डिटर्जेट साबुन रिन बार की कीमत 18 रुपये से घटाकर 15 रुपये कर दी है. दस रुपये की कीमत वाली सर्फ एक्सेल की बट्टी के वजन (ग्राम) को 95 ग्राम से बढ़ाकर 105 ग्राम कर दिया है. नहाने के साबुन डव पर भी 33 फीसद ज्यादा की पेशकश की है. कंपनी ने बताया है कि अन्य उत्पादों की कीमतों में बदलाव को भी जल्द बताया जाएगा.

कंपनी के होम केयर ब्रांडों में व्हील, रिन, सर्फ एक्सेल, कम्फर्ट, सनलाइट, विम, होमेक्स इत्यादि शामिल हैं. जबकि पर्सनल केयर में लक्स, लिरिल, हमाम, सनसिल्क, रेक्सोना, लाइफबॉय, डव, पियर्स आदि जैसे ब्रांड हैं. जीएसटी काउंसिल ने साबुन, हेयर ऑयल, डिटजेर्ंट पाउडर, साबुन, टिशू पेपर और नैपकिन जैसे दैनिक उपयोग के सामान को 18 फीसद के टैक्स स्लैब में रखा है.

हीरो मोटोकॉर्प ने भी दिया लाभ: हीरो मोटोकॉर्प ने भी अलग-अलग मॉडलों पर 400 रुपये से लेकर 1,800 रुपये तक की कटौती की है. फिलहाल वास्तविक लाभ अलग-अलग राज्यों में भिन्न होगा, जो जीएसटी से पहले और बाद की दरों पर निर्भर करेगा. कुछ प्रीमियम मॉडलों पर 4,000 रुपये तक की छूट भी है. कंपनी 40 हजार से 1.1 लाख रुपये की रेंज में बाइकों की बिक्री करती है.

एयरलाइंस को देनी होगी जानकारी: नई कर व्यवस्था के तहत लाभ प्राप्त करने लिए कर्मचारियों के टिकट खरीदने वाले बिजनेस हाउसों को जीएसटी पंजीकरण के बारे में एयरलाइंस को जानकारी प्रदान करनी होगी. एक जुलाई से प्रभावी हुआ जीएसटी एयर टिकट पर कुछ इनपुट टैक्स क्रेडिट प्रदान करता है.

पाठ्यपुस्तकों में नहीं होने चाहिए जाति आधारित संघर्ष के विषयःICSSR प्रमुख

braj bihari kumar

नई दिल्ली। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के प्रमुख ब्रज बिहारी कुमार के अनुसार वर्तमान समय में पाठ्यपुस्तकों का उद्देश्य कार्यकर्ता तैयार करना हो गया है, शिक्षित विद्यार्थी नहीं. उन्होंने कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदू-मुस्लिम दंगे और जाति आधारित संघर्ष जैसे विषयों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए.

सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में शोध करने वाले प्रमुख संस्थान का कार्यभार संभालने वाले मानवविज्ञानी कुमार का मानना है कि जवाहरलाल नेहरू जैसे विश्वविद्यालय कार्यकर्ताओं को पोषित-पल्लवित करने का स्थान बनते जा रहे हैं. 76 वर्षीय कुमार का यह भी मानना है कि जाति आधारित संघर्ष और देश में असहिष्णुता जैसे विषय सतही हैं और इन्हें भारतीय समाज के प्रतिबिंब के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

उन्होंने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा,‘पाठ्यपुस्तकें छात्रों को कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) बनाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें शिक्षित करने के लिए होती हैं. दुर्भाग्य से आज पुस्तकें एक एजेंडा के साथ तैयार की जाती हैं और पाठ्यक्रमों में बदलाव जरूरी हो गया है.छात्रों की सोच और उनके विकास में हिंदू-मुस्लिम दंगे और जाति आधारित टकराव जैसे विषय नहीं होने चाहिए.’

कुमार ने कहा,‘आज पाठ्यपुस्तकें बुरी स्थिति में हैं. मैंने सामाजिक विज्ञान की किताब में एक नक्शा देखा जिसमें जम्मू कश्मीर को भारत के बाहर दिखाया गया, वहीं एक और नक्शे में पूर्वोत्तर को भारत में नहीं दिखाया गया. हमारी पाठ्यपुस्तकों में कई खामियां हैं.’उन्होंने बताया,‘मैंने इस मुद्दे को रेखांकित करते हुए पूर्व एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी को दो पत्र भी लिखे थे लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला.

उन्होंने जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों पर निशाना साधते हुए कहा,‘जब छत्तीसगढ़ में एक ही परिवार के कई लोगों का सामूहिक संहार कर दिया जाता है और जेएनयू में उल्लास मनाया जाता है और हत्यारों के समर्थन में मार्च निकाला जाता है, तो इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता कि यह किस तरह का विश्वविद्यालय है.’

कुमार ने जेएनयू के संदर्भ में कहा कि वे खुद को सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक दिखाते हैं लेकिन जब वे राष्ट्रीयता की भावनाओं को आहत कर रहे हैं और शिक्षा का नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं को तैयार करने का स्थान बनते जा रहे हैं तो वे उत्कृष्ट होने का दावा नहीं कर सकते. करदाता इसलिए अपना पैसा नहीं देते कि कार्यकर्ता तैयार किये जाएं.