सर्वे: नोटबंदी से 15 लाख लोगों की गई नौकरी

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नई दिल्ली। एक सर्वे में खुलासा हुआ है कि नोटबंदी के बाद से भारत में लगभग 15 लाख लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ी हैं. अगर आंकडा लगाया जाये तो एक कमाऊ शख्स पर घर के चार लोग आश्रित रहते हैं तो इस लिहाज से पीएम नरेंद्र मोदी के एक फैसले से 60 लाख से ज्यादा लोगों को रोटी के लिए परेशान होना पड़ा है.

सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीएमआईई) ने सर्वे में नौकरियों का आंकड़ा पेश किया है. सीएमआईई के कंज्यूमर पिरामिड हाउसहोल्ड सर्वे से पता चलता है कि नोटबंदी के बाद जनवरी से अप्रैल 2017 के बीच देश में कुल नौकरियों की संख्या घटकर 405 मिलियन रह गई थी जो कि सितंबर से दिसंबर 2016 के बीच 406.5 मिलियन थी. यानी नोटबंदी के बाद नौकरियों की संख्या में करीब 1.5 मिलियन अर्थात 15 लाख की कमी आई.

देशभर में हुए हाउसहोल्ड सर्वे में जनवरी से अप्रैल 2016 के बीच युवाओं के रोजगार और बेरोजगारी से जुड़े आंकड़े जुटाए गए थे. इस सर्वे में कुल 1 लाख 61 हजार, एक सौ सड़सठ घरों के कुल 5 लाख 19 हजार, 285 युवकों का सर्वे किया गया था. सर्वे में कहा गया है कि तब 401 मिलियन यानी 40.1 करोड़ लोगों के पास रोजगार था. यह आंकड़ा मई-अगस्त 2016 के बीच बढ़कर 403 मिलियन यानी 40.3 करोड़ और सितंबर-दिसंबर 2016 के बीच 406.5 मिलियन यानी 40.65 करोड़ हो गया. इसके बाद जनवरी 2017 से अप्रैल 2017 के बीच रोजगार के आंकड़े घटकर 405 मिलियन यानी 40.5 करोड़ रह गए. मतलब साफ है कि इस दौरान कुल 15 लाख लोगों की नौकरियां खत्म हो गईं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि आठ नवंबर 2016 को लागू हुई नोटबंदी का व्यापक प्रभाव इन महीनों में पड़ा है. हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सितंबर से दिसंबर 2016 में खत्म हुई तिमाही में भी नोटबंदी के आंशिक प्रभाव पड़े हैं. सर्वे रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जनवरी 2016 से अक्टूबर 2016 तक श्रमिक भागीदारी 46.9 फीसदी थी जो फरवरी 2017 तक घटकर 44.5 फीसदी,  मार्च तक 44 फीसदी और अप्रैल 2017 तक 43.5 फीसदी रह गई. यानी कल-कारखानों और उद्योगों में आई मंदी की वजह से श्रमिकों को काम नहीं मिले जिससे लाखों लोगो के सामने खाने पीने का संकट गहरा गया था जिसका असर अब तक देखा जा सकता है.

 

संसद की कैंटीन के खाने में निकली मकड़ी

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नई दिल्ली। संसद की कैंटीन के खाने में मकड़ी मिली है. लोकसभा में एक अधिकारी के मुताबिक उन्होंने संसद में खाना ऑर्डर किया था. जिसमें मकड़ी मिली. इस वजह से उनकी तबीयत भी खराब भी हो गई. दो साल पहले संसद की कैंटीन में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खाना खा चुके हैं.

घटना 18 जुलाई की है. संसद की कैंटीन में लोकसभा के क्लास वन अधिकारी श्रीनिवासन पहुंचे थे. उन्होंने खाने में पोंगल और दही चावल का ऑर्डर दिया. जैसे ही उन्होंने खाना शुरू किया. प्लेट में उन्हें बड़ी सी मकड़ी दिखी.

श्रीनिवासन ने बताया की “खाने के दो निवाले ही खाए होंगे कि मेरी तबीयत बिगड़ने लगी. उल्टियां आने लगीं. तभी मेरी नज़र प्लेट में मौजूद मकड़ी पर पड़ी तो मैं खाना छोड़कर खड़ा हो गया और कैंटीन स्टाफ से शिकायत की.’’

संसद की कैंटीन में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी खाना खा चुके हैं. दो साल पहले पीएम मोदी ने सांसदों के साथ कैंटीन में खाना खाया था. अब सोचिए जिस कैंटीन में पीएम मोदी खाना खाते रहे हैं उसके खाने में ऐसी मकड़ी मिली तो इस घटना ने कैंटीन की साख पर सवालिया निशान लगा दिए हैं.

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जिस अधिकारी श्रीनिवासन के खाने की प्लेट में मकड़ी मिली थी. उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले उनके खाने में एक कीड़ा मिला था. इस बार भी उन्होंने फूड कमेटी से शिकायत की लेकिन एक्शन की बजाय सिर्फ आश्वासन मिला.संसद की कैंटीन सस्ते दामों पर अच्छा खाना परोसने के लिए जानी जाती है.

मोदी के राज में कट्टरता की ओर बढ़ रहा है भारत: न्यूयॉर्क टाइम्स

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न्यूयार्क। भारत में भाजपा सरकार आऩे के बाद जिस तरह का माहौल बना है वह अन्य देशों से भी छुपा नहीं है. अंग्रेजी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने संपादकीय में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर लेख प्रकाशित किया है, जिसमें उन्होंने मोदी सरकार पर सवाल खड़े किए हैं. संपादकीय में 2014 के बाद से भारतीय इकॉनमी को धीमा बताया गया है. अखबार में लिखा है कि 2014 में नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री मिली प्रचंड जीत उनके वादों और हिंदू राष्ट्रवादी छवि की ही देन हैं जबकी सुदृढ़ इकॉनमी और लोगों के सुनहरे भविष्य को लेकर वादे करके चुनाव जीता.

अखबार के मुताबिक ‘नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ग्रोथ काफी धीमी रही और नौकरियों को लेकर ध्यान नहीं दिया गया. उनके राज में असहिष्णुता फैलाई गई, जो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए खतरा है. जब से मोदी ने कार्यभार संभाला तब से गौमांस के सेवन करने का आरोप लगाकर लोगों का मारा गया,  जिनमें से अधिकतर मुस्लिम हैं.

संपादकीय में लिखा गया कि ‘मोदी ने इस मामले पर सिर्फ पिछले महीने ही बोला. तब कुछ नहीं कहा जब उनकी सरकार ने बूचड़खानों के लिए गाय की बिक्री को लेकर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तक खारिज कर दिया था.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे एक तरह से सांस्कृतिक कलंक को लागू करने के समान बतते हुए लिखा कि इस पेशे से मुस्लिम और निचली जाति के हिंदू पारंपरिक रूप से जुड़े हैं जिनको अनदेखा करके उन पर अत्याचार लगातार जारी हैं.

 

जंतर-मंतर पर किसानों का विरोध प्रदर्शन

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नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के मंदसौर से चली ऐतिहासिक किसान मुक्ति यात्रा देश के 6 राज्यों से होते हुए 13 दिनों बाद राजधानी दिल्ली पहुंच गई है. इस अवसर पर देश भर से आये किसानों ने जंतर-मंतर पर आयोजित किसान संसद में ज़ोरदार हुंकार भरी. इसके साथ ही यात्रा का दूसरा चरण शुरू हो गया है जिसे 150 से अधिक किसान संगठनों का समर्थन है. किसानों के अधिकार की इस लड़ाई का समर्थन करने के लिए देशभर से हजारों किसान पहुंचे और अपना समर्थन दिया. किसान मुक्ति संसद में दो मुख्य मांगे रखी गई. पहली, फसल का पूरा दाम मिले और दूसरी, किसानों को पूर्णरूप से कर्जमुक्त किया जाए.

तमिलनाडु के किसान नेता अय्याकन्नू के नेतृत्व में तमिलनाडु के किसानों ने किसान मुक्ति संसद को अपना समर्थन दिया. वहीं महाराष्ट्र के उन किसानों के बच्चों ने जिन्होंने आत्महत्या कर ली है, किसान मुक्ति संसद में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपना दुख जाहिर किया. जंतर मंतर पर उपस्थित इन बच्चों में से एक अशोक पाटिल ने कहा, ‘मुझे दुख है क्योंकि मेरे पिता ने आत्महत्या की है लेकिन मैं इस देश के सभी किसानों को बताना चाहता हूँ कि आत्महत्या के विकल्प को छोड़कर हमें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा’.

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के नेताओं के आह्वान पर सत्तापक्ष और विपक्ष के सांसदों ने किसान मुक्ति संसद में हिस्सा लेकर किसानों की माँगों का भरपूर समर्थन मिला. धर्मवीर गांधी (आम आदमी पार्टी), तपन कुमार सेन (सीपीएम), शरद यादव (जेडीयू), अली अनवर (जेडीयू), मोहम्मद सलीम (सीपीएम), जितेंद्र चौधरी, सीताराम येचुरी, अरविंद सावंत (शिवसेना), बीआर पाटिल (कांग्रेस), शैलेन्द्र कुमार (जेडीयू), मोहम्मद मदरुद्ददुजा, शंकर दत्ता के अलावा कई अन्य सांसदों ने किसानों की मांगों का समर्थन करते हुए किसान मुक्ति संसद में शामिल हुए.

किसान मुक्ति संसद में बोलते हुए, एमपी राजू शेट्टी ने सांसदों का आह्वान करते हुए कहा कि सभी सांसद,संसद जाने से पहले जंतर-मंतर आएँ और किसानों की माँगों का समर्थन करें।मेधा पाटेकर ने कहा कि सरकार की किसान और आदिवासी विरोधी नीतियों से पूरा देश परेशान है और अब हम आर-पार की लड़ाई करने के लिए तैयार हैं.

जंतर-मंतर की जनसभा को सम्बोधित करते हुए अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक वीएम सिंह ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि ये सरकार किसानों का हक़ नहीं देने वाली है. हमें अपना हक छीन कर लेना होगा. उन्होंने मंदसौर से आये किसानों का मंच पर बुलाकर स्वागत भी किया. सभा को सम्बोधित करते हुए योगेंद्र यादव ने कहा कि किसानी का दो तिहाई काम करने वाली महिलाओं ने इस किसान मुक्ति संसद को ऐतिहासिक बना दिया है. वहीं प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार बड़े पूंजीपतियों और कम्पनियों को लाभ पहुंचाने के लिए किसानों को कुचलने पर उतारू है.

आपको बता दें कि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की ओर से आयोजित किसान मुक्ति यात्रा जंतर-मंतर पहुंच गयी है. 6 जून को मन्दसौर के किसानों पर गोलीबारी हुई थी. उसके एक माह बाद 6 जुलाई से 18 जुलाई तक देश के 6 राज्यों से होते हुए किसान मुक्ति यात्रा निकाली गयी. यह यात्रा 6 जुलाई को मध्यप्रदेश के मन्दसौर से शुरू होकर महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश होते हुए दिल्ली पहुंची है.

पीएम के कहने पर भी धंधा बंद नहीं कर रहे गौरक्षक: शिवसेना

मुंबई। शिवसेना ने गौरक्षकों को एक बार फिर आड़े हाथों ले लिया है. शिवसेना ने गौ रक्षा के नाम पर लगातार हो रही हिंसा मामले में बुधवार को भारतीय जनता पार्टी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है. शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में लिखे आर्टिकल में गौरक्षा की तुलना ‘बिजनेस’  से की है. इसमें कहा गया कि ये लोग पीएम मोदी के लगातार निर्देशों और अनुरोध के बाद भी अपनी दुकान बंद नहीं कर रहे हैं.

शिवसेना ने कहा है कि पाकिस्तान चाहता है कि भारत के हिन्दू और मुस्लिम इस तरह के तुच्छ मुद्दों पर लड़ते रहें और धर्म के नाम पर देश बंट जाए. इसके बाद उन्होंने पूछा कि उस समय “कथित गौरक्ष”  कहां थे जब अमरनाथ में निर्दोष लोगों को मारा जा रहा था सबको पता है कि जिस ड्राइवर ने उस वक्त कई लोगों की जान बचाई वह खुद भी मुस्लिम था.

शिवसेना ने निशाना साधा कि किस तरह कई भाजपा शासित राज्यों में ही बीफ पर बैन नहीं है, जबकि अन्य में लगा है. शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी पूछा कि “यह गौरक्षक कौन हैं जो लोगों की जान ले रहे हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी इस पर सवाल करने लगे हैं. क्या पाकिस्तान एक बार फिर भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगा कराना चाहता है? हम भारतीय को सोचने की जरूरत है की देश किस और जा रहा है, हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई के बीच कुछ लोग अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं जिनकी समझ होना बहुत जरुरी हो गया है.

 

डंडों से बांध कर दलित युवक की पिटाई

अलीगढ़। उत्तर प्रदेश के अलीगढ में एक बार फिर दलित युवक की पिटाई का सनसनीखेज मामला सामने आया है. उच्च जाति के लोगों ने दलित किशोर को पेड़ से बाध कर डंडों से पिटाई की है. पीड़ित परिवार ने पुलिस से पूरे मामले की शिकायत की है.

जातिवादी गुंडों ने इसका वीडियो भी बना लिया है. जिसे अब सोशल मीडिया पर वायरल किया जा रहा है. वीडियों में दलित किशोर को डंडे से बांध रखा है, और अश्लील हरकत करते हुए पिटाई कर रहे हैं. इस दौरान जातिवादी गुंडों ने किशोर के कपड़े उतार कर अश्लील वीडियो बनाया. विरोध करने पर जमकर मारपीट की गई है.

ईनाडु इंडिया के मुताबिक, घटना थाना अकराबाद के पिलखना इलाके की है. बताया जा रहा है कि पीड़ित को घर से बुला कर इलाके के दबंग लोग जंगल की ओर ले गये. वहां दलित किशोर के साथ गाली गलौज, मारपीट, अश्लीलता की गई है.

थाने पहुंचे पीड़ित परिवार को पहले तो पुलिस ने भगा दिया फिर मामला बढ़ता देख शिकायत दर्ज कर ली है. हालांकि अभी भी पीड़ित परिवार को न्याय के लिए अधिकारियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं.

जग्गा जासूस की एक्ट्रेस ने किया सुसाइड

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गुरूग्राम। कुछ दिन पहले रिलीज हुई रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ की ‘जग्गा जासूस’  में नजर आई एक्टर बिदिशा बेजबरुआ ने बीते दिन गुरुग्राम में आत्महत्या कर लिया. असम की रहने वाली बिदिशा एक्टर और सिंगर थीं और हाल ही में अपने पति के साथ मुंबई से गुरुग्राम शिफ्ट हुई थी. बिदिशा जानी-मानी टीवी पर्सनलिटी थी और कई स्टेज शो भी होस्ट कर चुकी थीं.

जानकारी के अनुसार पुलिस को मौके से कोई भी सुसाइड नोट नहीं मिला है. इस मामले में पुलिस ने उनके पति को गिरफ्तार कर लिया है.

गुरुग्राम पुलिस के पीआरओ ने बताया कि, ‘बिदिशा के पिता ने उसके पति पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह रोज बिदिशा को मानसिक रूप से परेशान करता था और उससे तंग आकर बिदिशा ने खुदकुशी कर ली. सुशांत लोक थाने में सुसाइड के लिए उकसाने का केस दर्ज हो चुका है.

यही नहीं, पुलिस उपायुक्त (पूर्व) दीपक सहारन ने बताया कि, ‘बिदिशा के पिता को कुछ अनहोनी की आशंका हो गई थी क्योंकि वह सोमवार शाम से ही फोन रिसीव नहीं कर रही थी. इसकी खबर उन्होंने पास के ही पुलिस थाने में दी। पुलिस ने मौके पर पहुंच कर पाया कि दरवाजा अंदर से बंद है. जब दरवाजा तोड़कर पुलिस अंदर गई तो उसे पंखे से लटका पाया गया.

पुलिस बिदिशा के फेसबुक और व्हाट्सऐप की जांच कर रही है. वहीं असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से केस की जांच की मांग की है. जल्दी ही बिदिशा की मौत का कारण पता लग जायेगा.

उच्च जाति की लड़की से शादी की तो सवर्णों ने पीटकर मार डाला

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त्रिची। तमिलनाडु के त्रिची जिले में एक दलित कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी गई. आरोपियों ने दलित युवक पर उनके खेत में लगे प्लास्टिक नल को तोड़ने का आरोप लगाया था. पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. परिजनों का आरोप है कि मृतक के उच्च जाति में शादी करने की वजह से उसकी हत्या की गई है.

कत्ल की यह घटना त्रिची जिले के थिरुपंजी गांव की है. मृतक कथीरसन (21) ऑटो चलाकर परिवार का गुजारा करता था. कथीरसन के पड़ोस में रहने वाले वी. थांगारसु और उसके बेटे टी. भास्कर, टी. सुरेश ने उस पर नल तोड़ने का आरोप लगाया.

आरोपियों ने कथीरसन को पकड़ लिया और उसके हाथ-पैर बांधकर मार्केट की ओर ले गए. आरोपियों ने कथीरसन की लोहे की रॉड से बेरहमी से पिटाई की. अपने पति को बचाने के लिए आई कथीरसन की पत्नी के साथ भी आरोपियों ने मारपीट की.

इसके बाद आरोपी कथीरसन को पुलिस के पास ले जाने की बात कहकर अपने साथ ले गए और उसकी हत्या कर दी. कथीरसन के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने तीनों आरोपी बाप-बेटों को गिरफ्तार कर लिया. आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा और SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है.

मृतक कथीरसन

दलित संस्था के डायरेक्टर ए. काथिर के मुताबिक, कथीरसन ने 6 महीने पहले शादी की थी. कथीरसन दलित था और उसने कल्लर जाति (उच्च जाति) से संबंध रखने वाली नंदनी से शादी की थी. इस शादी से कई लोग नाराज चल रहे थे.

परिजनों का आरोप है कि आरोपियों ने कथीरसन की पिटाई के दौरान उसकी शादी को लेकर अपशब्द भी कहे थे. बहरहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है.

जन्मदिन विशेषः जानिए क्यों 2008 तक अमेरिका के आतंकियों के लिस्ट में थे नेल्सन मंडेला

Nelson Mandela

अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग के विचारों को मानने वाले नेल्सन मंडेला को अफ्रीका के गांधी के नाम से भी जाना जाता है. 18 जुलाई 1918 को मंडेला का जन्म बासा नदी के किनारे ट्रांस्की के मवेंजो गाँव में हुआ था.

चलिए जानते है मंडेला से जुड़ी कुछ अनसुनी बातों के बारे में…

  • मंडेला के माता-पिता ने उनका नाम रोहिल्हाला रखा था, मंडेला को नेल्सन नाम उनके टीचर ने दिया था.
  • महज 12 साल की उम्र में मंडेला के पिता कि मौत हो गई थी.
  • मंडेला अपनी फैमली में स्कूल जाने वाले इकलौते बच्चे थे.
  • नेल्सन मंडेला ने अपने कॉलेज के दिनों से ही भेदभाव की लड़ाई शुरु कर दी थी. जिसके चलते उनको कॉलेज से निकाल दिया था.
  • 1944 में मंडेला African National Congress में शामिल हो गए थे. वह दिन भर कहीं छिपे रहते थे और केवल रात में ही बाहर आते थे. इस वजह से मीडिया ने उनको ‘द ब्लैक पिमपर्नल’ नाम दिया था.
  • अगस्त 1962 में मजदूरों को हड़ताल के लिए उकसाने के कारण उन पर 2 साल केस चला. 12 जुलाई 1964 को उनको उम्रकैद कि सज़ा सुनाई गई. 27 साल की कैद में नेल्सन मंडेला हमेशा पतली चटाई पर सोते थे.
  • 10 मई 1994 को नेल्सन मंडेला साउथ अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने.
  • मंडेला ने 80 साल की उम्र में मोजाम्बिक की प्रथम महिला ग्रासा माकेल से शादी की थी.
  • मंडेला भारत रत्न पाने वाले दूसरे विदेशी नगरिक थे.
  • 2008 तक भी नेल्सन मंडेला का नाम अमेरिका की आतंकियों की लिस्ट में था. ऐसा इसलिए क्योंकि वो और अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के अन्य नेता एक समय पर रंगभेद के खिलाफ लड़ी गई लड़ाई का हिस्सा थे.
  • लंबे समय तक सांस की बीमारी से जूझने के बाद 95 वर्ष की उम्र में नेल्सन मंडेला की मृत्यु हो गयी थी.
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अनु रानी ने भाला फेंक में जीता स्वर्ण

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गुंटूर। नेशनल रिकॉर्ड धारक अनु रानी ने राष्ट्रीय अंतरराज्यीय एथलेटिक्स चैंपियनशिप के पहले दिन सोमवार को महिलाओं के भाला फेंक का स्वर्ण पदक जीता. अनु रानी ने 54.29 मी. तक भाला फेंका. हरियाणा की पूनम रानी (51.14 मी.) ने दूसरा और कर्नाटक की रश्मि शेट्टी (47.76 मी.) ने तीसरा स्थान हासिल किया.

महिलाओं की 3000 मीटर स्टीपलचेज में चिंता यादव ने पहला स्थान हासिल किया. चिंता ने 10:10.22 से. का अपना सर्वश्रेष्ठ समय दर्ज कराया. उत्तर प्रदेश की विजया लक्ष्मी (10:41.41 से.) दूसरे और महाराष्ट्र की वर्षा भवारी (10:48.37 से.) तीसरे स्थान पर रहीं. पुरुषों की 3000 मीटर स्टीपलचेज में तीनों पदक हरियाणा के एथलीटों ने जीते. जयवीर (8:53.04 से.) ने स्वर्ण, नवीन (8:57.23 से.) ने रजत और कर्मवीर (8:59.12 से.) ने कांस्य पदक जीता.

सौम्या बी ने महिलाओं की 20 किमी रेस वॉक का स्वर्ण जीता. सौम्या ने एक घंटा, 42:23.68 से. का समय निकाला. पंजाब की करमजीत कौर (एक घंटा, 44:47.69 से.) ने रजत, जबकि उत्तर प्रदेश की प्रियंका (एक घंटा, 45:44.28 से.) ने कांस्य जीता. केरल की एनवी शीना (12.78 मी.) ने महिलाओं की टिपल जंप का स्वर्ण जीता. रजत कर्नाटक की जायलिन एम लोबो (12.52 मी.) और कांस्य पदक आंध्र प्रदेश की जी कर्तिका (12.51 मी.) ने हासिल किया.

स्नैपडील को 95 करोड़ डॉलर में खरीदेगा फ्लिपकार्ट

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नई दिल्ली। ऑनलाइन रिटेल मार्केट की दिग्गज कंपनी फ्लिपकार्ट ने स्नैपडील के साथ डील करने के लिए उसे अपनी नई पेशकश भेजी है. पुरानी पेशकश में संशोधन के साथ फ्लिपकार्ट अब स्नैपडील खरीदने के लिए 900 से 950 मिलियन डॉलर देने को तैयार है. यह रकम करीब 90 से 95 करोड़ डॉलर बैठेगी. यह जानकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई है.

इस मामले की जानकारी रखने वाले दो लोगों ने बताया कि बैंगलुरु स्थित फर्म ने स्नैपडील के ऑनलाइन मार्केटप्लेस और यूनिकॉटेम को खरीदने के लिए उक्त राशि का भुगतान करने की पेशकश की है. आपको बता दें कि साल 2015 में, स्नैपडील ने एक ई-कॉमर्स प्रबंधन सॉफ्टवेयर और पूर्ति समाधान प्रदाता यूनिकॉमर्स का अधिग्रहण किया था. हालांकि सूत्र ने अपने नाम का खुलासा न करने को कहा है कि क्योंकि इस डील पर अभी दोनों कंपनियों के बीच बातचीत जारी है. एक सूत्र ने बताया कि अब स्नैपडील का बोर्ड इस ऑफर पर विचार करेगा और संभवत: वह इसे स्वीकार भी कर ले.

गौरतलब है कि इससे पहले स्नैपडील ने इससे पहले 80 से 85 करोड़ डॉलर (करीब 5,500 करोड़ रुपये) में अधिग्रहण की फ्लिपकार्ट की पेशकश को ठुकरा दिया था. क्योंकि स्नैपडील के निदेशक मंडल का मानना था कि यह मूल्य कंपनी का सही मूल्यांकन नहीं करता है. बहरहाल, अब यदि स्नैपडील का निदेशक मंडल नई पेशकश को स्वीकार कर लेता है तो उसके बाद दोनों पक्ष बिक्री और खरीद समझौते पर बातचीत कर सकते हैं. बहरहाल, इसमें अभी कुछ सप्ताह का समय लग सकता है. फ्लिपकार्ट और स्नैपडील ने उन्हें इस संबंध में ई-मेल पर भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

डंडे में बांधकर ले जाना पड़ा महिला का शव 

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कटनी। एक तरफ सरकार डिजीटल इंडिया की बात करती है, भारत को बुलदियों पर पहुंचाने के लिए बड़ी बड़ी बातें करती है तो वहीं दूसरी और यातायत के शाधन न होने के कारण शव को डंडो में बांधकर पोस्टमार्टम के लिए ले जाना पड़ रहा है.

यह मध्य प्रदेश के कटनी की है जहां के बरही थाने के एक गांव में आकाशीय बिजली गिरने से मौत  हो गयी थी. जिसके बाद महिला के शव को बांस के डंडे में कपड़े से बांधकर चार किलोमीटर तक पैदल पोस्टमार्टम के लिए लाना पड़ा. गांव से निकली महानदी पर पुल नहीं बना है. इस कारण बरसात के दिनों में गांव का सड़क मार्ग से संपर्क टूट जाता है और केवल नाव ही आने जाने का शाधन रहती है.

बरही थाने के खेरवा गांव की शांति बाई (55) , 16 जुलाई को अपनी बेटी से मिलने के लिए पिपरा गांव गई थी. इसी दौरान दोपहर करीब तीन बजे आकाशीय बिजली गिरने से उसकी मौत हो गई. मौत की सूचना मिलने के बाद उसके परिजन उसे शाम को पिपरा से खेरबा ले गए. रात होने के कारण पुलिस ने पोस्टमार्टम नहीं कराया और परिजन को सौंप दिया. सोमवार को पोस्टमार्टम कराने के लिए परिजनों ने शव को बांस के डंडे से कपड़े में बांधा और चार किलोमीटर तक पैदल चलकर और फिर नाव से नदी पार करके पिपरा गांव लाए.

इसके बाद पुलिस अपने वाहन से महिला के शव को बरही अस्पताल लाई जहां उसका पोस्टमार्टम कराया गया है. वहां के थाना प्रभारी ने जानकारी देते हुए बताया कि खेरबा गांव में नदी पर पुल नहीं बना है जिस कारण वहां बरसात के दिनों में वाहनों का आवागमन बिल्कुल बंद हो जाता है जिसके कारण शव को खेरबा गांव से पिपरा गांव तक पैदल लाना पड़ा.

 

मायावती ने दिया राज्यसभा से इस्तीफा

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नई दिल्ली। मायावती ने मंगलवार को राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया. वे ​सदन में ​अपनी बात रखने का मौका नहीं मिल पाने से नाराज थीं. उन्होंने कहा था- ”अगर मैं सदन में दलितों के हितों की बात नहीं उठा सकती तो मेरे राज्यसभा में रहने पर लानत है. मैं अपने समाज की रक्षा नहीं कर पा रही हूं. अगर मुझे अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया जा रहा है तो मुझे सदन में रहने का अधिकार नहीं है. मैं सदन की सदस्यता से आज ही इस्तीफा दे रही हूं.’’इसके बाद मायावती राज्यसभा से बाहर चली गईं.

बसपा के सतीशचंद्र मिश्रा मायावती के साथ राज्यसभा से बाहर गए. इसके बाद बसपा के सदस्यों ने ‘दलितों की हत्याएं बंद करो’ के नारे लगाए. समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने भी उनका साथ दिया.उनके सपोर्ट में कांग्रेस और तृणमूल सांसदों ने भी वॉकआउट कर दिया. मायावती का समर्थन कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने सवाल किया?, ‘एक दलित नेता को बोलने का अधिकार नहीं है? उन्‍होंने हाउस में नोटिस देकर बात करने का प्रयास किया.’ दरअसल, मायावती को तीन मिनट का वक्त मिला था. उन्होंने सात मिनट लिए. इसके बाद उनकी उपसभापति से बहस हुई.

इससे पहले, राज्यसभा में कार्यवाही के दौरान मायावती ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि उन्‍हें वहां न तो सुना जा रहा है और न ही बोलने दिया जा रहा है इसलिए उन्‍होंने राज्‍यसभा से इस्‍तीफा देने का फैसला किया है. मायावती ने कहा कि सहारनपुर में हिंसा को जातीय हिंसा का नाम दिया गया है, जबकि यह दलितों को डराने-धमकाने की कार्रवाई थी. इस पर सत्ता पक्ष के सदस्यों ने शोरगुल शुरू कर दिया.

मैला ढोने से मुक्ति दिलायेंगे बायो टॉयलेट

रानीखेत। भारत में मैला ढोने की प्रथा अभी भी कई राज्यों में जारी है जिसकी खबरें आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं पर अब विदेशी तकनीक का सहारा लेकर बायो टॉयलट भारत में शुरू होने जा रहे हैं जिससे शहरों के गहरे, प्रदूषित सीवरों से भी मुक्ति मिल सकती है. जिसके लिए जापानी तकनीक से निर्मित बायो टॉयलेट मददगार साबित होंगे. जापान में फूजी की पहाड़ी व वियतनाम में सफल प्रयोग के बाद जापानी बायो टॉयलेट के फार्मूले की शुरूआत उत्तराखंड के कुमाऊं की पर्यटक नगरी रानीखेत से की जाएगी. खास बात यह भी कि इस तकनीक से मानव अपशिष्ट से जैविक खाद भी तैयार की जाएगी.

पर्यावरण व पानी बचाने की मुहिम में जुटी जापानी कंपनी सिवादेंको ने अपने देश में नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में इसी तकनीक से प्रभावी पहल की है. इस टॉयलेट का प्रयोग करने वाले शहर सीवरेज मुक्त हो जाएंगे. घंटा भर में मानव अपशिष्ट को जैविक खाद में बदलने वाले इस टॉयलेट के 70 प्रतिशत पार्ट्स भारत में बनाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को दिया गया है ताकि लागत मूल्य कम होने से सामान्य व्यक्ति भी खरीद सकेगा. फिलहाल, बायो टॉयलेट की कीमत 30 हजार से 14 लाख रुपये तक है.

जानकारी देते हुए, रानीखेत के नैनी निवासी जापानी कंपनी के प्रतिनिधि कमल सिंह अधिकारी ने बताया, मॉडल के रूप में तीन जैविक टॉयलेट यहां लगाए जायेंगे जिसके लिए जमीन भी तलाश ली गई है. बता दें की इस टॉयलेट के कई फायदे होंगे जिसमें मैला ढोने से मुक्ति से साथ सीवरेज की जरूरत भी नहीं होगी. पिट गड्ढे नहीं बनेंगे तो पानी व भूमि भी प्रदूषित नहीं होगी जिसके साथ पानी की बचत भी होगी. गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने सरीखी परियोजनाओं में भारी भरकम बजट से भी मुक्ति मिलेगी.

ऐसे बनेगी जैविक खाद- 

इस तरह के बायो टॉयलेट में लकड़ी का बुरादा व धान की भूसी पड़ी होती है जिसको हीटर 50 डिग्री तक तापमान में बुरादे को जलाएगा जो मानव मल को भी जलाकर राख करेगा और खास उपकरण रोटरी की मदद से उसे जैविक खाद में बदलेगा. हीटर की गर्मी मल-अपशिष्ट में मौजूद बैक्टीरिया व अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवों को खत्म कर देती है. ऐसे में जो उर्वरक तैयार होता है वह साफ सुथरा व कीटाणु मुक्त होता है. जिससे यह बायो टॉयलेट आय का जरिया भी है. खाद तैयार करने के लिए लकड़ी का बुरादा और चावल की भूसी (360 रुपया प्रति कुंतल) का इस्तेमाल होता है.

सौ किलो जैविक खाद बनाने में बमुश्किल सौ रुपये की ही लागत आती है, जबकि तैयार उर्वरक तीन से चार हजार रुपये में बिक सकता है. अबुधाबी, दुबई, फिलीपींस आदि में मानव अपशिष्ट से तैयार जैविक खाद जापान से खरीदी जा रही है. इसकी कीमत 175 से 1400 रुपये प्रति किलो तक है अगर भारत सरकार इस ओर गंभीरता से ध्यान दे तो बहुत बड़ा बदलाव किया जा सकता है.

 

लड़की के मिनी स्कर्ट पहनने पर लोगों ने सरकार से की गिरफ्तारी की मांग

Women in Saudi Arbia

दुबई। मिनी स्‍कर्ट व क्रॉप टॉप पहने सऊदी युवती के एक वीडियो से सऊदी अरब में सनसनी फैल गयी है. वायरल होने वाले इस वीडियो को युवती ने खुद ही पोस्‍ट किया है. इसके बाद कुछ सऊदी जहां उसकी गिरफ्तारी की मांग कर रहे वहीं कुछ उसके बचाव में हैं.

स्‍थानीय न्‍यूज वेबसाइट ने सोमवार को बताया कि रूढ़िवादी इस्‍लामिक देशों में इस युवती के खिलाफ संभावित कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है जिसने कपड़े के लिए देश के कायदे कानून का उल्‍लंघन किया है. सऊदी में महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर अबाया के नाम से जाना जाने वाला लंबा और ढीला वस्‍त्र पहनना होता है. साथ ही काले कपड़े से अपने बाल और चेहरे को ढकना होता है हालांकि कुछ विशेष लोगों के लिए इसमें रियायत है.

यह वीडियो पहले स्‍नैपचैट पर शेयर किया गया जिसमें उसे रियाध के उशायकिर में सुनसान ऐतिहासिक किले के भीतर टहलते हुए दिखाया गया. माना जाता है कि यह सऊदी अरब का सबसे रूढ़िवादी इलाका है. 18वीं सदी में इसी जगह पर सुन्नी वहाबी इस्लाम के प्रवर्तक पैदा हुए थे. सऊदी अरब का राज परिवार और धार्मिक संगठन सुन्नी इस्लाम के सबसे कट्टर माने जाने वाले वहाबी पंथ को मानते हैं.

ट्वीटर पर कोई युवती की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है तो कोई ड्रेस की स्‍वतंत्रता का हवाला दे इसे अपराध नहीं बता रहा है. फातिमा अल-इस्सा नाम की एक महिला ने इस वीडियो के समर्थन में लिखा, “अगर ये लड़की विदेशी होती तो अब तक उसकी कमर और आंखों के कसीदे पढ़े जाते पर चूंकि वो एक सऊदी है तो उसको गिरफ्तार करने की बातें हो रही हैं.”

जम्मू-कश्मीर की तरह कर्नाटक को भी चाहिए अपना अलग झंडा

karnataka Flag

बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार राज्य के लिए अलग झंडे और सिंबल के लिए एक्शन में आ गई है. सरकार ने 9 सदस्यों की एक कमेटी बनाई है, जिसे झंडा डिज़ाइन करने और सिंबल तय करने का ज़िम्मा दिया गया है. कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, जिसके बाद इसे कानूनी मान्यता दिलाने का काम होगा. अगर यह फ़ैसला लागू हो जाता है तो जम्मू-कश्मीर के बाद देश का दूसरा राज्य होगा, जिसका अपना झंडा होगा. यह कदम ऐसे वक्त में उठाया गया है जब कुछ ही महीने में राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. केंद्रीय मंत्री सदानंद गौड़ा ने इस कदम को खारिज करते हुए कहा कि भारत एक राष्ट्र है इसके दो झंडे नहीं हो सकते.

जहां एक तरफ बीजेपी की सरकार ‘एक राष्ट्र और एक निशान’ की बात करती है वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक सरकार अलग झंडे की मांग करना बड़े विवाद को जन्म दे सकता है. इससे पहले जब 2012 में यह मुद्दा राज्य की विधानसभा में उठाया गया तो उस समय मंत्री गोविंद एम करजोल ने कहा था, फ्लैग कोड हमें राज्य के लिए अलग झंडे की इजाजत नहीं देता. हमारा राष्ट्रीय ध्वज देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता का प्रतीक है.

खबरों के मुताबिक कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने यह कदम इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए उठाया है. कर्नाटक में अलग झंडे की मांग काफी पहले से उठती रही है, जिसे खारिज कर दिया गया था.

दलित उद्धार के लिए सवर्ण संजीव ने छोड़ दी जाति

खगडिय़ा। समाज में अपनी ही पिछड़ी-दलित जाति के लोगों के लिए दिल्ली में बैठकर आंदोलन जैसे कुछ काम करने के बाद अपने बड़े से ड्राइंग रूम में बैठकर जातिविहीन समाज का सपना काफी लोग देखते हैं. ऐसे लोगों को संजीव डोम के बारे में पढ़कर सोचने की जरूरत पड़ेगी. संजीव उस जाति से ताल्लुक नहीं रखते जिन्हें गांवों में ‘डोम’ कहा जाता है. बावजूद इसके उन्होंने अपना सरनेम ‘डोम’ रख लिया है और शहर की अच्छी जिंदगी छोड़कर महादलित बस्ती में कुटिया डालकर रहते हैं. दरअसल यह उन जैसा दिखने की कोशिश है, ताकि वो संजीव को अपने बीच का समझ सके.

अगर संजीव की जाति की बात करें तो भारतीय जाति व्यवस्था में संजीव सवर्ण परिवार में जन्मे हैं. दिल्ली के प्रसिद्ध किरोड़ीमल कॉलेज से बीकॉम तक पढ़ाई की. पढ़ाई के बाद संजीव एक बड़े शहर की रंग-बिरंगी दुनिया में रच-बस रहे थे. उन्हें मॉडल बनना था सो वह मॉडलिंग का सपना देख रहे थे. फिर 2005 में पूस की एक रात में अचानक उनका दिमाग घूम गया. सवर्ण होकर महादलितों के साथ उठना-बैठना उनके परिचितों के लिए ‘दिमाग घूमने’ जैसा ही काम था. जिसके बाद उनके मित्रों, रिश्तेदारों का साथ भी छूट गया. जो हुआ उसकी अपनी एक कहानी है. संजीव के अंदर यह बदलाव सन् 2005 में आया. वे बताते हैं कि पूस की सर्द रात थी. गंगा किनारे बिहार के खगड़िया जिले के सुदूर गांव कन्हैयाचक में श्राद्ध का भोज चल रहा था. इस गांव में संजीव के बहन की ससुराल है सो संजीव बहन से मिलने आए थे. जाड़े की उस रात जूठे पत्तलों से खाना बटोर रहे महादलित परिवार के लोगों को देखकर संजीव सकते में आ गए. बहन से मिलकर संजीव दिल्ली तो लौटे, लेकिन मन कन्हैयाचक में उलझ गया था. उनके दिलो-दिमाग में हलचल मची रही. हर रात संजीव को वही रात याद आती. संजीव सोने लेटते तो आंखों में उस रात का दृश्य सामने आ जाता. हर रोज संजीव को वह रात परेशान करने लगी. उनके आंखों की नींद उड़ चुकी थी. आखिर संजीव से बर्दास्त नहीं हुआ और एक दिन दिल्ली से विक्रमशीला एक्सप्रेस पकड़ फिर वह कन्हैयाचक पहुंच गए. अगले दिन से संजीव ने महादलित बस्ती में उठना-बैठना शुरू कर दिया. वे कुछ उन्हें समझ रहे थे, तो कुछ समझा रहे थे. जाहिर है संजीव अपनी बहन के यहां रुके हुए थे. बहन के परिवार वालों को संजीव का महादलितों के साथ उठना बैठना रास नहीं आया. पहले तो संजीव को समझाने की कोशिश हुई. संजीव हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर के जिस काम के लिए आए थे, जाहिर है संजीव को मानना नहीं था. नतीजा महादलित लोगों के साथ उठने-बैठने के ‘अपराध’ में बहन की ससुराल से उन्हें निकाल दिया गया. इसके बाद वह अपने पैतृक गांव शिरोमणि टोला, नयागांव रहने लगे. हालांकि उनका मन वहीं कन्हैयाचक की डोम बस्ती में अटका था. आखिरकार संजीव उन्हीं लोगों के बीच पहुंच गए जिनकी दशा उन्हें बेचैन करती थी. संजीव ने परबत्ता के महादलित डोम टोला में रहना शुरू किया और वहीं एक झोपड़ी बना ली. अब तक तमाम बेचैनियों और परेशानियों से निकलकर संजीव यह मन बना चुके थे कि उन्हें डोम समाज के लोगों के हित के लिए, उनके जीवन स्तर, शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए काम करना है. संजीव ने जागरुकता और शिक्षा को अपना हथियार बना लिया. इसके लिए वे सबसे पहले छुआछूत से लड़े. सामने खुद वो लोग थे, जिनके बीच संजीव ने जन्म लिया था और उनका अब तक का जीवन बीता था. उस क्षेत्र में महादलित बस्ती के लोगों को गंगा की मुख्य धारा में स्नान से रोका जाता था. संजीव ने इस कुप्रथा को दूर करने के लिए 2006 में गंगा तट से परबत्ता तक कलश यात्रा निकाली. महादलित महिला-पुरुषों ने एकत्रित होकर गंगा की मुख्यधारा से जल भरा, जिसके बाद रामधुनी यज्ञ हुआ. उस वक्त यह छुआछूत पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह था. फिर संजीव ने 2009 से लेकर 2012 तक ‘बहिष्कृत चेतना यात्रा’ निकाली. इसमें कुछ तथाकथित बड़े दलित नेता भी आए. तब से संजीव ‘लौट चलो स्कूल की ओर’ अभियान चला रहे हैं. इस अभियान का नतीजा निकला. अब महादलित परिवार के बच्चे स्कूल जाते हैं. उन्होंने जूठन उठाना बंद कर दिया गया है. नशे के खिलाफ भी संजीव की जंग जारी है. संजीव की चर्चा धारावाहिक सत्यमेव जयते में भी हुई. काम को स्वीकृति मिलने लगी, लेकिन वे अब भी जूझ रहे हैं. कहते हैं, “मेरे जैसे बहुत सारे लोगों को बिहार के साथ- साथ अन्य राज्यों की महादलित बस्तियों में जाने की जरूरत है.”