ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद के बीच फंसी देशभक्ति

बुरहानपुर जिले के मोहद गांव के 15 लड़कों पर से राजद्रोह का मुकदमा हटाकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का मुकदमा कायम किया जाना यह बताता है कि इस घटना के गंभीर सियासी निहितार्थ हैं. हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद से ही हिंदुत्व लगातार इस बात को प्रचारित और प्रसारित करता रहा है कि यहां के मुसलमानों की सहानुभूति और प्रतिबद्धता पाकिस्तान के साथ है. संघ परिवार गोएबल्स की उस रणनीति पर शुरू से काम कर रहा है कि अगर एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो जनता उसे सच मान लेती है. इसी प्रयोग को उसनें बड़ी चतुराई के साथ भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले क्रिकेट मैच के दरम्यान भी इस्तेमाल किया है.

मध्य प्रदेश के एक गांव मोहद की घटना इस मायने में अलग है कि पहली बार खुद राज्य हिंदुत्व के इस तर्क को कि देश के मुसलमानों की सहानुभूति पाकिस्तान के साथ है, को वैधता प्रदान कर रहा है. यह घटना जाहिर करती है कि भारतीय राज्य के अंदर मुसलमानों को देशद्रोही बताने को लेकर कितना ज्यादा उतावलापन है. मोहद की घटना से पहले तक मुसलमानों को देशद्रोही कहने के लिए आतंकवाद के मामले में फंसाया जाता था, लेकिन पहली बार राज्य के द्वारा क्रिकेट के बहाने मुसलमानों को देशद्रोही बताया जा रहा है.

हिन्दुत्व की इन साज़िशों का पर्दाफाश भी हो चुका है. जब कर्नाटका के बीजापुर के पास श्रीराम सेना के कुछ कार्यकर्ताओं को पुलिस ने पाकिस्तानी झण्डा फहराने के जुर्म में पकड़ा था. पहले तो श्रीराम सेना के कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान का झण्डा फहराया और घटना के अगले दिन आरोपियों की गिरफ्तारी न होने के चलते प्रशासन के खिलाफ धरना भी दिया. जब पुलिस ने इस घटना में संलिप्त श्रीराम सेना के 6 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया तो श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक ने बयान दिया कि इस घटना में हमारे कार्यकर्ताओं की कोई भूमिका नहीं है, बल्कि इस साजिश में आरएसएस के लोग शामिल हैं.

पिछले कुछ सालों में कई ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिसमें कश्मीर के उन मुस्लिम विद्यार्थियों को निशाना बनाया गया, जो कश्मीर से बाहर रहकर पढ़ रहे हैं. 23 फरवरी 2014 को भारत पाकिस्तान मैच के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में मेरठ के स्वामी विवेकानन्द सुभारती यूनिवर्सिटी के 67 कश्मीरी छात्रों को पहले सस्पैंड किया गया और फिर उन पर राजद्रोह का मुकदमा कायम किया गया. हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में राजद्रोह का मुकदमा हटा लिया गया. इन कश्मीरी लड़कों के कमरों में पत्थरबाजी की गयी. घटना के कुछ समय के बाद कई सारे लड़के कॉलेज छोड़कर वापस कश्मीर लौट गए. इस घटना के बिलकुल आस-पास इसी आरोप के चलते ग्रेटर नोएडा के शारदा युनिवर्सिटी के 4 कश्मीरी लड़कों को हॉस्टल से निकाला गया. हरियाणा में तो भारत पाकिस्तान मैच के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जब संगठित हिन्दुत्व ने कश्मीरी छात्रों पर हमला किया है. दरअसल हिन्दुत्व के लिए कश्मीर के लोगों को पाकिस्तान के साथ जोड़ना बहुत मुश्किल नहीं है लेकिन पिछले कुछ एक सालों में हिन्दुत्व ने अपनी इस रणनीति का विस्तार कश्मीर से इतर देश के दूसरे हिस्सों में भी किया है.

भोजपुर (बिहार) जिले के पीरो में 12 अक्तूबर 2016 को सांप्रदायिक हिंसा को अंजाम दिया गया. मुसलमानों के ताजिया जुलूस पर होने वाली पत्थरबाजी को वैधता देने के लिए पाकिस्तान के समर्थन में होने वाली नारेबाजी का तर्क गढ़ा गया. इस हिंसा में मुसलमानों की कई दुकानों को जलाया गया, कई सारे लोग घायल हुए. (इस घटना को विस्तार से देखने के लिए ‘बिहार: पूर्वनियोजित थी पीरो में हुई सांप्रदायिक हिंसा– शरद जायसवाल व लक्ष्मण प्रसाद की रिपोर्ट’ को जनराजनीती.कॉम पर देखा जा सकता है.)

मोहद की तर्ज पर ही 20 जून 2017 को चैम्पियन्स ट्रॉफी के फ़ाइनल मैच में पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी करने के जुर्म में तीन नाबालिग लड़कों को उत्तराखंड के मंसूरी से गिरफ्तार किया गया था. दरअसल यह गिरफ्तारी हिंदुत्ववादी संगठनों के द्वारा थाने में दी गयी तहरीर के आधार पर हुई थी. ठीक इसी आरोप के चलते तीन लड़कों की गिरफ्तारी उज्जैन जिले के खमरिया गांव से भी हुई थी. हिंदुत्व का यह प्रयोग सिर्फ हिंदी भाषी राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर इसे अमल में लाया जा रहा है.

चैंपियन्स ट्राफी के मैच के दरम्यान कई गिरफ्तारियां उन राज्यों में भी हुईं, जहां पर गैर भाजपाई सरकारें हैं. मसलन दक्षिणी कर्नाटका के कोडागु के होसाकोटे गांव से 4 लड़कों को, कुर्ग पुलिस ने 3 लड़कों को, केरल में बड़िया डुक्का पुलिस ने 23 लोगों को व केरल में ही कसरगोड के पास चक्कूडल कुंबदाजे से 20 लोगों को गिरफ्तार किया गया. मजेदार बात यह है कि इन सारी गिरफ्तारियों के पीछे हिंदुत्ववादी संगठनों का दबाव काम कर रहा था. इन गिरफ्तारियों के लिए बाकायदा धरना प्रदर्शन व सम्बंधित थाने में मुकदमा भी दर्ज कराया गया था. अब हिन्दुत्व के लिए यह जरूरी नहीं रह गया है कि इस तरह की साज़िशों को वहीं रचा जाएगा, जहां पर उनकी अपनी सरकार है. इसलिए हमें हिन्दुत्व और बीजेपी के बीच के रिश्तों और फर्क की भी ईमानदारी से पड़ताल करनी होगी. बहुसंख्यक समाज के बीच में सांप्रदायिक विचारधारा की जड़ें इस कदर पैठ कर गयी हैं कि एक सेकुलर सरकार को भी हिन्दुत्व के सामने नतमस्तक होना ही होगा या एक सेकुलर सरकार की सेकुलरिज्म को लेकर कमजोर प्रतिबद्धता के रूप में भी इसे देखा जा सकता है.

बुरहानपुर पुलिस के द्वारा 15 मुसलमानों की गिरफ्तारी, अगले दिन कोर्ट के अंदर ‘राष्ट्रवादी’ वकीलों के द्वारा यह कहना कि देश विरोधी लोगों का केस कोई नहीं लड़ेगा, कोर्ट के बाहर हिन्दुत्ववादी संगठनों का नारेबाजी करना और हर बार की तरह इस बार भी मीडिया के द्वारा उन पंद्रह लोगों को कटघरे में खड़ा करने की रणनीति यह बताती है कि एक घटना जिसकी स्क्रिप्ट पहले से तैयार थी. हिन्दुत्व ने अपने एजेंडे के लिए जो श्रम विभाजन किया, उसके अनुसार कहानी के सभी पात्रों ने पूरी मेहनत और लगन से अपनी-अपनी भूमिकाएं अदा कीं. सरकार, पुलिस, मीडिया, हिन्दुत्ववादी संगठन, न्यायपालिका सभी संगठित हिंदुत्व से पर्याप्त दिशा-निर्देश लेते हुए आगे बढ़ रहे थे और बुरहानपुर में सफलता मिलने ही वाली थी. लेकिन सुभाष कोली नाम के व्यक्ति ने संगठित हिंदुत्व के मंसूबों पर पानी फेर दिया. मोहद गाँव में रची गयी साजिश के केंद्र में प्रत्यक्ष तौर पर कोई हिन्दुत्ववादी संगठन शामिल नहीं था. बल्कि पुलिस की अगुवाई में यहां पर एक साजिश को अंजाम दिया गया था. हिन्दुत्ववादी पुलिस ने जिस व्यक्ति को इस घटना का प्रत्यक्षदर्शी व गवाह बताया, उसी सुभाष कोली ने पुलिस के द्वारा गढ़ी गयी कहानी पर सवाल खड़ा कर दिया. पुलिस की और ज्यादा किरकिरी होती इससे पहले ही घटना के मुख्य साजिशकर्ता टीआई संजय पाठक का तबादला कर दिया गया. इस तबादले के बाद भी बुरहानपुर के आला पुलिस अधिकारियों ने कहा कि टीआई संजय पाठक का तबादला मोहद की घटना की वजह से नहीं बल्कि किसी दूसरे मामले के चलते किया जा रहा है. स्क्रॉल.इन में छपी एक स्टोरी में भी भोपाल में बैठे पुलिस के उच्च अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि ‘टीआई पाठक को इसलिए सज़ा नहीं दी गई कि उन्होने कोई फर्जी केस गढ़ा है बल्कि इसलिए दी गई है कि उन्होने सही शिकायतकर्ता का चुनाव नहीं किया है. उनका ये गलत चुनाव ही पुलिस को महंगा पड़ा’.

इस पूरी घटना में टीआई संजय पाठक की भूमिका तब और संदिग्ध हो गयी, जब थाने में बंद 15 लड़कों में से एक लड़के ने ये कहा कि मोहद के स्थानीय बीजेपी नेता ने पाठक को दो हज़ार रूपये की तीन से चार गड्डी दी थी. इस संबंध में एक खबर हिन्दी के एक दैनिक अखबार में प्रकाशित हुई थी. यह भी कहा गया कि क्योंकि पाठक की पहुंच सीधे आरएसएस के बड़े नेताओं से है इसलिए पुलिस के बड़े आलाधिकारी भी उसके खिलाफ बोलने से कतरा रहे हैं.

सुभाष कोली के सामने आने के बाद इस घटना में कुछ भी छुपा नहीं रह गया था. और एक मात्र विपक्ष यानि कांग्रेस के लिए मैदान बिल्कुल साफ था. हमने जब नागरिक समाज के नुमाइंदों (खास तौर पर मुसलमानों) से इस बारे में जानने की कोशिश की कि घटना के बाद विपक्ष अथवा कांग्रेस की क्या भूमिका है? उन सभी का कहना था कि कांग्रेस हमें पीछे से सहयोग कर रही है. कांग्रेस का इस मुद्दे पर चोरी छिपे मुसलमानों के साथ खड़े होने का मतलब यही है कि एक सेकुलर पार्टी यह नहीं चाहती है कि इसकी तनिक भी भनक हिंदुओं को लगे. क्योंकि अगर हिंदुओं को गलती से भी मालूम पड़ गया कि इस मुद्दे पर कांग्रेस मुसलमानों का साथ दे रही है तो उसका हिन्दू वोट दूर जा सकता है. यह काफी मजेदार इसलिए है कि देश की सबसे बड़ी सेकुलर पार्टी अब चोरी छिपे सेकुलरिज्म को बचाए रखना चाहती है. जबकि सांप्रदायिक ताक़तें खुलकर नंगा नाच कर रही हैं.

इस पूरी घटना का सबसे दुखद पहलू यह है कि खुद मुस्लिम समाज के बड़े हिस्से में भी इस बात को लेकर एक आम सहमति बन चुकी है कि अगर हमने या कांग्रेस ने इस घटना (मोहद) को उठाया तो इसका फायदा भी बीजेपी को ही मिलेगा क्योंकि तब बीजेपी के लिए सांप्रदायिक आधार पर गोलबंदी करना ज्यादा आसान होगा. यह आम धारणा पूरे देश के पैमाने पर दिखती है. देश की सेकुलर पॉलिटिक्स ने मुसलमानों के बीच इस बात के लिए सहमति निर्मित कर ली है कि अगर हम आपके सवालों को उठाएंगे तो इसका फायदा बीजेपी को ही होगा.

इसे मॉब लिंचिंग की तमाम सारी घटनाओं में भी देखा जा सकता है. इसलिए देश के मुसलमानों के पास इस तंत्र पर या भाग्य पर भरोसा करने के सिवाय कोई अन्य विकलप नहीं है. खुद मुस्लिम समाज के द्वारा इस घटना के इर्द गिर्द होने वाली पूरी सियासत मेमोरंडम देने या कोर्ट में पीआईएल करने तक ही सीमित हो चुकी है.

मोहद गांव से पुलिस के द्वारा जिस तरह से 15 मुस्लिम लड़कों को गिरफ्तार किया गया व कुछ और नहीं बल्कि पुलिस के द्वारा गांव में घुसकर मुसलमानों पर किया गया हमला था. क्योंकि पुलिस उन्हें उनके घर से घसीटते और मारते-पीटते हुए थाने में लायी. कई सारे लड़कों को दाढ़ी और टोपी देखकर, बिना उनका नाम पूछे ही पुलिस उठा ले गयी. थाने में लाने के साथ एक बार फिर से उनकी बेरहमी से पिटाई की गयी. थाने में पुलिस ने जिस भाषा का प्रयोग इन 15 पीड़ितों के साथ किया कि ‘तुम्हारी कौम को ख़त्म कर दिया जाएगा’, ‘बीपीएल कार्ड को ख़त्म कर दिया जाएगा’, ‘एक रूपए का अनाज खाते-खाते मस्ती आ गयी है’, ‘तुम्हारी मां के साथ सोने के लिए पाकिस्तान से लोग आये थे’. यह भाषा सिर्फ पुलिस के सांप्रदायिक चरित्र को ही उजागर नहीं करती है बल्कि कल्याणकारी राज्य से लाभान्वित होने वाले तबके के प्रति उनके अन्दर व्याप्त नफरत को भी उजागर करती है. वो सारे नागरिक अधिकार, जिसे भारतीय राज्य ने बमुश्किल और काफी जद्दोजेहद के बाद इस देश की आम जनता को दिए थे.

अब वही चीज़ें देश के मध्यम वर्ग की आंख का कांटा बन चुकी हैं. लगभग इसी तरह की बहस उस समय भी हुई थी, जब जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी नारे लगाये गए थे. मीडिया के एक धड़े ने उस समय भी इसी बहस को चलाया था कि मध्यम वर्ग के द्वारा दिए गए टैक्स से ही कल्याणकारी योजनाओं को संचालित किया जाता है और उसी पैसे से संचालित सरकारी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों द्वारा देशविरोधी गतिविधियां संचालित होती हैं. इसलिए ऐसे संस्थानों को बंद कर दिया जाना चाहिए. नवउदारवाद ने पिछले तीन दशकों में एक ऐसी पीढ़ी को तैयार किया है जो न केवल कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से नफरत करता है बल्कि इन योजनाओं से लाभान्वित होने वाले वंचित समूह से भी बेपनाह नफरत करता है.

मोहद की घटना देश भर में मुसलमानों के साथ हो रही सांप्रदायिक हिंसा कीएक कड़ी मात्र है. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ पर हिन्दुत्व को डिफेंसिव होना पड़ा और वह भी सिर्फ सुभाष कोली के चलते. मोहद की घटना का असली नायक सुभाष कोली है. अगर सुभाष पुलिस की साजिश का भंडाफोड़ नहीं करते तो हिंदुत्व अपने प्लैंक पर कामयाब हो चुका था और इसके साथ ही उन 15 लड़कों का भविष्य भी दांव पर लग जाता. पुलिस की तरफ से मिलने वाली धमकियों के बावजूद वह अकेले उन पंद्रह लड़कों के पक्ष में खड़ा रहा. आज के समय में ऐसी मिसाल बहुत मुश्किल से नज़र आती है. यह घटना बताती है कि यदि बहुसंख्यक समाज का कोई व्यक्ति किसी घटना विशेष के सन्दर्भ में ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ सांप्रदायिक साजिशों के खिलाफ खड़ा होता है तो ये हिंदुत्व के लिए मुश्किल भरा हो सकता है.

सुभाष कोली को सलाम…

शरद जायसवाल, सहायक प्रोफेसर महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय ईमेल- sharadjaiswal2008@gmail॰com

शो में आने के पैसे नहीं मिलेंगे:बिग बॉस

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कलर्स पर प्रसारित होना वाला रियलिटी शो बिग बॉस का सीजन 11 जल्द ही शुरू होने वाला है. टीवी पर सबसे पॉपुलर ये शो फिर से एक बार चर्चा में है. इस बार के शो में एक नया ट्विस्ट भी जुड़ रहा है. आम जनता तो इस शो से जुड़ेगी पर उन्हें पैसे नहीं दिए जाएंगे.

बॉलीवुडलाइफ की रिपोर्ट के मुताबिक आम लोग जो इस शो में हिस्सा लेंगे उन्हें पैसा नहीं दिया जाएगा वो फ्री में बिग बॉस शो से जुड़ेगें. ये आम लोग बिग बॉस के घर में हुए टास्क और अच्छी टीआरपी के बदौलत ही स्पेशल बोनस से सिर्फ पैसा कमा पाएंगे.

आपको बता दें कि इस बार ऐसे कंटेस्टेंट की तलाश कर रहे हैं जो एक ही फैमिली से हों. ऐसे ही कुछ कंटेस्टेंट और उनकी फैमिली को सेलेक्ट भी कर लिया गया है जो बिग बॉस के घर में आपस में भिड़ते नजर आएंगे. आपको शो में मां-बेटी, पिता-बेटा और भाई-बहन की जोडि़यां दिख सकती हैं. अब शो का ये नया तड़का कितनी टीआरपी खींच पता है की नहीं.

मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को ले डूबा GST, सूचकांक 9 साल पुराने लेवल पर

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देश में जुलाई में माल एवं सेवा कर, जीएसटी लागू होने के बाद विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट आयी है. क्योंकि इस दौरान नये आर्डर और उत्पादन में कमी रही. पिछले साल दिसंबर के बाद इसमें पहली बार गिरावट आई है. पिछले साल नोटबंदी के बाद दिसंबर माह में विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई थी.

विनिर्माण क्षेत्र में आई इस गिरावट के बाद रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दर कम करने की मांग पर दबाव बढ़ गया है. रिजर्व बैंक की मौद्रिक समीक्षा बैठक शुरू हो रही है. निक्की इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स पीएमआई जुलाई में 47.9 रहा है जबकि जून में यह 50.9 अंक पर था. फरवरी, 2009 के बाद यह विनिर्माण सूचकांक का सबसे निचला स्तर है. जुलाई का यह आंकड़ा 2017 में कारोबारी स्थिति में गड़बड़ी को दर्शाता है. पीएमआई सूचकांक के 50 अंक से ऊपर रहना विनिर्माण गतिविधि में तेजी को दर्शाता है जबकि इससे नीचे यदि यह रहता है तो यह सुस्ती को दर्शाता है.

आईएचएस मार्कटि में प्रधान अर्थशास्त्री और इस रिपोर्ट की लेखिका पोल्लीन्ना डी लीमा ने कहा, भारत में विनिर्माण वृद्धि जुलाई में थम गयी और इसका पीएमआई करीब साढे आठ साल में अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया. इस तरह की रिपोर्ट है कि इस क्षेत्र पर माल एवं सेवा कर के क्रियान्वयन का बुरा असर पड़ा है. इस सर्वेक्षण के अनुसार जीएसटी के क्रियान्वयन का मांग पर असर पड़ा है. उत्पादन, नये आर्डर और खरीद गतिविधियां वर्ष 2009 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई. लीमा ने कहा, मांग में कमजोरी के रुख, अपेक्षाकृत निम्न लागत वाला मुद्रास्फीति दबाव तथा फैक्ट्री गेट पर अपेक्षाकृत रियायती शुल्क जैसी स्थिति से मौद्रिक नीति में ढील के लिये ताकतवर साधन उपलब्ध करा दिया है.

मौद्रिक नीति में नरमी से आर्थकि वृद्धि में सुधार की अच्छी संभावना है. रिजर्व बैंक ने सात जून को जारी अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में कोई बदलाव नहीं किया था. आरबीआई गवर्नर उर्जति पटेल ने तब कहा था कि बैंक मुद्रास्फीति के निम्न स्तर को लेकर पूरी तरह सुनिश्चित होना चाहता है. फैक्ट्री आर्डर में कमी आने से हातोत्साहित कंपनियों ने जुलाई में उत्पादन में कमी कर दी.

फ्लिपकार्ट ने किया ई बे इंडिया विलय का काम पूरा

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नई दिल्ली: ई वाणिज्य क्षेत्र की बड़ी कंपनी फ्लिपकार्ट ने आज कहा कि उसने ई बे इंडिया के परिचालन का विलय पूरा कर लिया है. इसी के साथ ई बे डॉट इन अब फ्लिपकार्ट समूह की कंपनी कहलाएगी. इस करार की घोषणा अप्रैल में की गई थी, जब फ्लिपकार्ट समूह ने प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी वैश्विक कंपनियों ई बे, टेनसेंट और माइक्रोसॉफ्ट से 1.4 अरब डॉलर जुटाए थे.

फ्लिपकार्ट में इक्विटी हिस्सेदारी के बदले में ई बे ने 50 करोड़ डॉलर का नकद निवेश किया और अपना ई बे डॉट इन कारोबार फ्लिपकार्ट को बेच दिया. यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब एक दिन पहले ही छोटी प्रतिद्वंद्वी कंपनी स्नैपडील ने कहा था कि वह संभावित विलय संबंधी सभी बातचीत बंद कर रही है. स्नैपडील ने फ्लिपकार्ट का नाम तो नहीं लिया लेकिन इस बात की काफी चर्चा है कि दोनों ही पिछले पांच महीने से विलय पर बातचीत कर रही थी.

फ्लिपकार्ट ने एक बयान में कहा, ”तत्काल प्रभाव से ई बे डॉट इन का स्वामित्व और परिचालन फ्लिपकार्ट के पास होगा. लेकिन ई बे डॉट इन फ्लिपकार्ट के हिस्सा के तौर पर स्वतंत्र निकाय रहेगी.” बयान में कहा गया है कि इस विलय के फलस्वरुप फ्लिपकार्ट के ग्राहकों को ई बे पर मौजूद विविध वैश्विक वस्तुओं तक पहुंच होगी और ई बे के ग्राहकों को अनोखे भारतीय वस्तुओं तक पहुंच मिलेगी

जानिए सच, दलित प्रेमी जोड़े को न्यूड कर पूरे गांव में घुमाया

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नई दिल्ली। इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में दलित जोड़े को गांव के लोग नंगा घुमा रहे हैं और उन्हें प्रताड़ित कर रहे हैं. इस वीडियो में गुजरात मॉडल पर सवाल उठाते हुए पूछा गया है कि आखिर दलितों पर अत्याचार कब रुकेंगे. गुजरात में इस साल के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में गुजरात का बता कर इस वीडियो को शेयर करने वालों की कमी नहीं है

इस वीडियो में एक लड़के और लड़की को निर्वस्त्र कर न केवल घुमाया गया है, बल्कि पहले लड़की को लड़के के कंधे पर और फिर लड़की के कंधे पर लड़के को बैठने पर मजबूर किया गया है. पीछे शोर मचाकर उन्हें घुमाते हुए लोग ढोल पीट रहे हैं. गिर जाने पर इस जोड़े को पीटा भी जाता है. तमाशबीन बनी भीड़ में शामिल कुछ लोग वीडियो बना रहे हैं. हालांकि इस वीडियो की हकीकत कुछ और ही है

फेसबुक पर इस वीडियो को वायरल कर सवाल किया गया है कि आखिर दलितों पर अत्याचार कब रुकेगा. स्मरण रहे कि अगले साल के अंत में गुजरात में विधान सभा चुनाव है.इस वीडियो को अब तक 66000 से ज़्यादा बार देखा जा चुका है और 1100 से ज़्यादा बार शेयर किया जा चुका है.

इस घटना की जांच की गई तो पता चला कि यह वीडियो गुजरात नहीं बल्कि राजस्थान का है. बांसवाड़ा में 19 अप्रैल 2017 को यहां के शंभूपुरा गांव में एक आदिवासी लड़के और लड़की को निर्वस्त्र कर के गांव भर में घुमाया गया था और उनके साथ मारपीट भी हुई थी. मारपीट करने वालों में लड़के और लड़की के पिता, चाचा और दूसरे रिश्तेदार भी शामिल थे.

दिहाड़ी मजदूरी करने वाले इस आदिवासी प्रेमी जोड़े को प्यार करने की सजा दी गई. इस जोड़े को लगा कि उनके घर वाले शादी की अनुमति नहीं देंगे तो दोनों घर से भाग गए. बाद में इन्हे खोज कर गांव लाया गया. इनके रिश्ते को गांव की बेइज़्ज़ती समझ इन्हे प्रताड़ित किया गया. यह वीडियो जब पुलिस तक पहुंची तो पुलिस ने इस मामले में 18 लोगों को गिरफ्तार किया.

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने दिया इस्तीफा

नई दिल्ली। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया यानी NITI आयोग के वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. 31 अगस्त पनगढ़िया के कार्यकाल का आखिरी दिन होगा. अरविंद पनगढ़िया नीति आयोग के पहले वाइस चेयरमैन बनाए गए थे, नीति आयोग का गठन मोदी सरकार ने योजना आयोग की जगह पर किया है.

तात्‍कालिक रूप से शिक्षा क्षेत्र में लौटने की बात कहकर उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया है. अरविंद पांच जनवरी, 2015 को नीति आयोग के उपाध्‍यक्ष बने थे. प्रसिद्ध अर्थशास्‍त्री पनगढ़िया आर्थिक उदारीकरण के पैरोकार माने जाते रहे हैं.

भारतीय-अमेरिकी अर्थशास्‍त्री अरविंद नीति आयोग के उपाध्‍यक्ष बनने से पहले कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे हैं. वह इससे पहले एशियाई विकास बैंक के मुख्‍य अर्थशास्‍त्री रहे हैं. इसके अलावा वह वर्ल्‍ड बैंक, अंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोष, विश्‍व व्‍यापार संगठन और अंकटाड में भी काम कर चुके हैं. उन्‍होंने प्रतिष्ठित प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली है.

पनगढि़या ने तकरीबन 10 किताबें लिखी हैं. भारत के संदर्भ में उनकी किताब India: The Emerging Giant खासी चर्चित रही. यह पुस्‍तक 2008 में प्रकाशित हुई थी. 2012 में यूपीए सरकार के कार्यकाल में पद्मभूषण से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है.

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने जब नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल की आलोचना की थी और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध किया था तो दुनिया के जो दो बड़े अर्थशास्त्री मोदी के बचाव में आगे आए वो थे प्रो जगदीश भगवती और अरविंद पनगढ़िया.

बेटे तैमूर के साथ सैफ और करीना की तसवीर हुई वायरल

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नई दिल्‍ली। बॉलीवुड अभिनेता सैफ अली खान, अभिनेत्री करीना कपूर के बेटे तैमूर के जन्‍म के कुछ समय बाद से ही अपनी पुरानी शेप में वापस आने के लिए जिम में पसीना बहा रही हैं, वहीं सैफ अपनी फिल्‍मों की शूटिंग में बिजी थे. लेकिन अब दोनों बिजी मम्‍मी-पापा नन्‍हे तैमूर को लेकर वेकेशन पर निकल चुके हैं. सैफ और करीना दोनों ही नन्‍हे तैमूर को लेकर स्विटजरलैंड रवाना हो गये है. बॉलीवुड का ये क्‍यूट कपल भले ही सोशल मीडिया पर नहीं है लेकिन इस वेकेशन की खूबसूरत तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है. इन तस्‍वीरों में तैमूर बेहद क्‍यूट लग रहे हैं. बता दें कि तैमूर का जन्‍म  साल 20 दिसंबर 2016 को हुआ था और इसके बाद से हीं तैमूर की कई खूबसूरत तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है.

करीना-सैफ और तैमूर एकसाथ नजर आ रहे हैं. करीना और सैफ 25 जुलाई को मुंबई से रवना हुए थे जिसकी कुछ तसवीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी. इन तस्‍वीरों में सैफ की गोद में तैमूर नजर आये थे. करीना ने एक इंटरव्‍यू में खुलासा किया था कि वो दोबारा काम शुरू करना चाहती हैं लेकिन बेटे से दूर जाने को लेकर थोड़ा परेशान भी हो जाती हैं. करीना ने बताया था कि तैमूर बहुत क्‍यूट है और वह हमेशा उन्‍हें देखना चाहती हैं. तैमूर को पसंद नहीं है कि वह उन्‍हें बार-बार किस करें लेकिन करीना एक दिन में उन्‍हें 20 हजार बार किस करती हैं.

करीना कपूर ने अपने एक बयान में कहा था कि, इसके अलावा उसके लुक्‍स के पीछे मेरे घी खाने का भी योगदान है. और सोचिए आपको लगता है कि घी सिर्फ फैट बढ़ाता है.’ करीना ने अपने एक और इंटरव्‍यू में कहा था कि उनका बेटा उनके इस दुनिया का सबसे खूबसूरत बच्‍चा है. करीना को तैमूर की तस्‍वीरें लेने से भी कोई दिक्‍कत नहीं है. करीना के अनुसार, “मुझे लगता है कि वक्त बदल रहा है और जहां भी हम जाते हैं, हमारी तस्वीरें ली जाती हैं, जो हमारी सामान्य जिंदगी का हिस्सा है. मैं जितना संभव हो सके तैमूर की सामान्य तरीके से परवरिश करना चाहती हूं, तो फिर उसके साथ अलग तरह से व्यवहार क्यों करना चहिए? मुझे मीडिया द्वारा उसकी तस्वीरें लेने से कोई दिक्कत नहीं है.

शादी करने पर मिलेगा स्मार्टफोन और 20 हजार रूपए

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश सरकार गरीब लड़कियों की शादी कराएगी. यूपी सरकार के खर्चे पर सामूहिक विवाह कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा. इस तरह के आयोजनों में सांसद और विधायक के अलावा समाज के प्रतिष्ठित लोगों को भी बुलाया जाएगा. खास बात यह है कि अब तक इस योजना के तहत दी जाने वाली राशि बीस हजार रुपये में कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी और उसे कन्या के खाते में जमा कर दिया जाएगा. इसके साथ ही एक स्मार्ट फोन का उपहार भी उसे मिलेगा. समाज कल्याण विभाग ने इसका प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विवाह कराने की जिम्मेदारी डीएम के जिम्मे: मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के पहले चरण में 71400 लड़कियों की शादी कराएगी. पांच से अधिक विवाह होने पर यह समारोह क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत, नगर निगम और नगरपालिका परिषद के स्तर पर आयोजित किया जाएगा. जिलाधिकारी एक विवाह कार्यक्रम समिति का गठन करेंगे.

नकदी के साथ बर्तन और कपड़े भी मिलेंगे: समिति ही टेंट, विवाह संस्कार, पेयजल आदि की व्यवस्था कराएगी. पहले जहां इस योजना के तहत लाभार्थी को 20 हजार रुपये का अनुदान दिया जाता था, वहीं अब सरकार 35 हजार रुपये खर्च करेगी. इसमें बीस हजार कन्या के खाते में, दस हजार से कपड़े, बिछिया, पायल, सात बर्तन, एक जोड़ी वस्त्र और स्मार्ट फोन खरीदा जाएगा. पांच हजार रुपये पंडाल आदि आदि के लिए अधिकृत निकायों को दिया जाएगा.

योजना का लाभ 15 फीसदी अल्पसंख्यकों को भी समारोह में सामान्य व्यक्ति व संस्थाएं भी उपहार दे सकेंगी. यदि कोई ऐसा करना चाहेगा तो पहले इसकी सूचना देनी होगी. साथ ही उपहार देने वाले का नाम, संख्या और अनुमानित मूल्य सूची बद्ध करके सूचना पटल पर प्रदर्शित भी करना होगा. इस योजना में अनसूचित जाति-जनजाति 30 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग 35, सामान्य वर्ग 20 और अल्पसंख्यक वर्ग की 15 प्रतिशत भागीदारी होगी.

नीतीश कुमार ने तोड़ा महागठबंधन और जनता का विश्वासः शरद यादव

पटना। बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल पर जनता दल-यूनाइटेड (जेडीयू) के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने पांच दिन औपचारिक रूप से असंतोष जताया तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने झट से उसपर अपनी प्रतिक्रिया दे दी. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साफ शब्दों में कहा, जिनके मन में भी जो सवाल हैं वे पार्टी फोरम में उठाएं.

बिहार में एनडीए की सरकार बनने के बाद जदयू की पहली कार्यकारिणी की बैठक 19 अगस्त को पटना में होगी. सीएम नीतीश ने कहा कि वे कोई भी फैसला लेने से पहले ये जरूर सोचते हैं कि पार्टी हित में क्या है. उन्होंने ये भी कहा कि लालू यादव के साथ गठबंधन तोड़ने और बीजेपी के साथ सरकार बनाने से पहले सारी बातें शरद यादव को बता दिया गया था. पिछले साल 70 वर्षीय शरद यादव को जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर नीतीश कुमार को दे दी गई थी.

शरद यादव की नाराजगी पर नीतीश कुमार ने कहा कि उम्मीद है कि चीजें अपने आप दुरुस्त हो जाएंगी. जदयू की बिहार इकाई महत्वपूर्ण है और यह निर्णय मेरी उपस्थिति में लिया गया. यदि किसी को तकलीफ है तो पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपनी बात रख सकता है. माना जाता है कि नीतीश कुमार ने इशारों-इशारों में पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव को यह जताने की कोशिश की है शरद यादव की सोच और फैसले से उन्हें बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.

शरद के साथ विपक्षी नेता सीपीआई के राज्यसभा सांसद डी राजा भी कह चुके हैं कि बिहार में जिस तरह से नई सरकार का गठन हुआ उससे शरद यादव नाखुश हैं. इसके अलावा लालू प्रसाद यादव भी बीजेपी के खिलाफ लड़ने के लिए शरद यादव को नेतृत्व के लिए आमंत्रित कर चुके हैं.

गौरतलब है कि शरद यादव ने सोमवार को संसद भवन परिसर में मीडिया से बातचीत में कहा कि बिहार में महागठबंधन टूटने से मुझे काफी तकलीफ हुई है. महागठबंधन बनाने के लिए नीतीश, लालू और मैंने काफी मेहनत की थी. जनता का विश्वास किसी भी सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है.

भारत की शिक्षा व्यवस्था और वर्ण-माफिया

भारत में आजादी के बाद इंजीनियरिंग, विज्ञान, मेडिसिन, मेनेजमेंट या दर्शन मानिविकी और समाज विज्ञान की पढ़ाई करने वाले तबके पर और उसकी समाज-देश के प्रति नजरिये पर गौर करना जरुरी है. भारत के इस सुदीर्घ दुर्भाग्य और हालिया “गोबर और गौमूत्र” के विराट दलदल को समझने के लिए हमें इस पीढ़ी के मन को और “वर्ण माफिया” के काम करने के तरीके को समझना होगा.

आजादी के बाद पहली पीढ़ी के ये तकनीकी बाबू और सामाजिक विज्ञानी या साहित्यकार और दार्शनिक भी अधिकांशसवर्ण परिवारों से आये हैं जिन्हें समाज मे बदलाव की कोई जरूरत महसूस नहीं होती. उन्हें अपने परिवार, रिश्तेदारों या समुदाय के बाहर किसी के जीने मरने या शोषण से कोई सहानुभूति नहीं होती इसलिए वे यथास्थितिवादी बनकर उभरे हैं. उन्होंने विज्ञान, तकनीक, मैनेजमेंट और मेडिसिन सहित समाज विज्ञान और दर्शन और स्वयं तर्कशास्त्र आदि की पढ़ाई को इतना मेकेनिकल बना दिया है कि उसमें आलोचनात्मक विश्लेषण और क्रिटिकल थिंकिंग का कोई स्कोप ही नहीं रह गया है.

सवाल ये है कि भारत में इंजीनियरिंग मेडिसिन और विज्ञान पढ़ने वालों के सामाजिक सरोकार कैसे कम से कमतर होते जा रहे हैं. क्यों ये लोग पैसा कूटने की मशीन बनकर अपने ही अन्धविश्वासी अनपढ़ और गरीब लोगों का शोषण करते हैं? क्यों इनमें सामान्य सी मनुष्यता और सामाजिक हितचिन्तना पैदा नहीं होती?

स्कूल-कॉलेज के शिक्षा जगत का उदाहरण लिया जा सकता है. उसके जरिये समझना आसान होगा कि कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर शिक्षा का जैसा व्यवसायीकरण और अपराधीकरण हुआ है वह चौंकाने वाला है.

पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में या इटली में जिस तरह से कबीलाई परिवारवाद और वंश आधारित माफिया चलता है उसी तरह भारत में “वर्ण माफिया” चलता है. इसे अकादमिक जगत में न्यायपालिका, प्रशासन और राजनीति में काम करते हुए आसानी से देखा जा सकता है. अन्य देशों का माफिया स्वयं को अपराधी महसूस करता है. उसमें एक ख़ास किस्म का आत्मग्लानि का भाव भी होता है कि वे गलत कर रहे हैं. लेकिन भारत का “वर्ण माफिया” शास्त्र और धर्म के गर्भ से जन्मा है. उसमें किसी तरह का कोई अपराध भाव या आत्मग्लानि नहीं होती इसीलिए इस माफिया को समझ पाना और इसे उखाड़ फेंकना एक असंभव सा काम बन गया है.

इस माफिया को समझने के लिए एक प्रयोग कीजिए अपने किसी मित्र से पूछिए कि भारत में सफल या समृद्ध लोगों की कल्पना करते हुए उनके सरनेम या जातिनाम बताये. आपको आश्चर्य होगा कि आपको ये सभी सरनेम ‘सवर्ण द्विजों’ के हीमिलेंगे. ये सरनेम आपको न्यायपालिका, सरकार, व्यापार, शिक्षा और प्रशासन इत्यादि के सभी आयामों में दबदबा बनाये हुए नजर आयेंगे. इसका क्या मतलब हुआ?

इसका ये मतलब हुआ कि समाज को ज़िंदा रहने के लिए भी जितने जरुरी विभाग-आयाम हैं उन सब पर “वर्ण माफिया” बैठा हुआ है. आप अनाज मंडियों और व्यापार में झांककर देखिये आपको “वैश्य वर्ण माफिया” बैठा मिलेगा. उस माफिया से बचकर कोई दूसरी जाति या सरनेम वाला व्यक्ति या समूह व्यापार या उद्यमिता नहीं कर सकता. न्यायपालिका और शासन, सरकार सहित धर्म में देखिये वहां “ब्राह्मण वर्ण माफिया” जमा हुआ है. वे कभी भी भारत में अपने वर्ण के दबदबे को कम नहीं होने देना चाहते, उनका न्यायबोध शासन बोध या शासन-प्रशासन का तरीका असल में आत्मरक्षण और यथास्थिति के रक्षण को समर्पित होता है. इसी तरह शिक्षा जगत को देखिये वहां भी “सवर्ण माफिया” ही मिलेगा.

शिक्षा जगत को गौर से देखिये वहां कौन से सरनेम या जातिनाम वाले लोग विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, डीन, चांसलर या वाइस चांसलर हैं? निश्चित ही सब के सब निर्विवाद रूप से ‘सवर्ण द्विज हिन्दू’ हैं. अब आगे देखिये कि शिक्षा, शिक्षण, प्रशिक्षण और ज्ञान विज्ञान, तकनीक सहित मानविकी, समाज विज्ञान आदि विषयों में भारत में रिसर्च और नवाचार क्यों इतना कमजोर और फटेहाल है? किन लोगों पर इसकी जिम्मेदारी डाली जानी चाहिए? दलितों आदिवासियों और उनके आरक्षण पर देश को कमजोर करने का आरोप लगता है लेकिन उनकी कुल जमा संख्या इन अकादमिक संस्थानों में दो प्रतिशत भी नहीं हैं.

भारत में 90 से 95 प्रतिशत पद सभी अकादमिक संस्थानों, स्कूलों कॉलेजों विश्वविद्यालयों में सवर्ण द्विज हिन्दुओं द्वारा भरे हुए हैं. अगर भारत सामूहिक रूप से शिक्षा जगत में फिसड्डी बना हुआ है तो ये सवर्ण द्विज हिन्दुओं की सोची समझी साजिश है, ये कहना गलत होगा कि ये उनकी कमजोरी के कारण हुआ है. मैं ये कहना चाहुंगा कि ये उनकी सफलता है वे जो चाहते हैं, वैसा कर रहे हैं. वे भारत को कमजोर गुलाम अशिक्षित और पिछड़ा बनाये रखना चाहते हैं इसके लिए वे जानते हैं क्या करना है और कैसे करना है. ये काम वे हजारों साल से कर रहे हैं. वे बहुत कुशल और सफल लोग हैं उन्हें मूढ़ या कमजोर कहना स्वयं में मूढ़ता होगी.

मैं इसे सोची-समझी साजिश क्यों कह रहा हूँ? ये बहुत गहरी और जरुरी बात है आइये इसे सरल भाषा में समझते हैं.

शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षर ज्ञान और कमाकर खाना सीखना नहीं होता है. शिक्षा का अर्थ होता है एक मनुष्य होने के नाते अपने विशिष्ट व्यक्तित्व और अपने जमीर को पहचानते हुए अपने और अपने समाज के बारे में निर्णय लेकर उस पर अमल करने की ताकत हासिल करना. शिक्षा को इंसान बनने का या निर्णय लेने की ताकत हासिल करने का जरिया भी कहा जा सकता है. ऐसी शिक्षा का मतलब होगा कि व्यक्ति या समाज अपनी जिन्दगी, समाज की जिन्दगी और देश की जिन्दगी के बारे में तटस्थ और वैज्ञानिक ढंग से सोच सके और उसे बेहतर बनाने के लिए जमीनी कदम उठा सके.

अगर भारत की जनता में इस तरह की सोच पैदा होगी तो लोग सवाल उठाएंगे कि औरतों को बराबरी का हक क्यों नहीं है? क्यों उन्हें सैकड़ों साल तक शिक्षा, सम्मान और प्रेम से वंचित रखा गया? क्यों लाखों करोड़ों औरतों को उनके पतियों की लाशों पर ज़िंदा जलाया जाता रहा है? क्यों दलितों और स्त्रियों को एकजैसा घृणित समझते हुए हजारों साल तक शिक्षा और राजनीतिक सामाजिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से वंचित रखा गया है? क्यों भारत की रक्षा का एकमुश्त ठेका क्षत्रियों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत दो हजार साल तक युद्धों में हारता रहा है और कम से कम एक हजार साल गुलाम रहा है? क्यों शिक्षा का एकमुश्त ठेका ब्राह्मणों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत अनपढ़ और अन्धविश्वासी बना हुआ है? क्यों व्यापार का एकमुश्त ठेका वैश्यों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत इतना गरीब और बेरोजगार क्यों बना हुआ है?

भारत में अगर शिक्षा सच में ही फ़ैल जाए और दलितों, बहुजनों आदिवासियों की अधिकतम जनसंख्या तक पहुंच जाए तो फिर इतनी बड़ी संख्या पर हजारों साल से नियन्त्रण रखने वाले, इनका खून चूसने वाले धर्म और समाज व्यवस्था का क्या होगा? कौन फिर भगवान् से डरेगा? कौन जात-पात को मानते हुए बिना शर्त बेगार या गुलामी करेगा? कौन फिर लोकतंत्र में एक बोतल एक नोट के बदले चुपचाप वोट देकर पांच साल के लिए सो जायेगा? कौन फिर मंदिर मस्जिद के नाम पर दंगा करेगा? कौन होगा जो नसबंदी या नोटबंदी पर सवाल न उठाएगा? फिर कौन आंख कान बंद करके भक्ति करेगा? ये वास्तविक प्रश्न हैं जो भारत में शिक्षा के लिए जिम्मेदार लोग शिक्षा के संबंध में कुछ भी नया करने से पहले अपने आपसे जरुर पूछते हैं.

वे जब ये सवाल अपने आपसे पूछते हैं तो उन्हें उनकी “अंतरात्मा” से एक बड़ा भयानक उत्तर मिलता है. उन्हें उत्तर मिलता है कि वाकई अगर भारत की जनता शिक्षित हो गयी तो उनका “वर्ण माफिया” दस साल के भीतर मिट्टी में मिल जाएगा. इसीलिये वे अपने मुट्ठी भर लोगों को सत्ता बनाये रखने के लिए भारत की अस्सी प्रतिशत जनता को और स्वयं भारत को अज्ञान और अंधविश्वास के दलदल में फसाए रखते हैं. इसीलिये वे बहुत सोचे-विचारे ढंग से स्कूलों-कॉलेजों सहित पूरे शिक्षातंत्र को निकम्मा और बेकार बनाये रखते हैं.

भारत के स्कूलों-कॉलेजों की व्यवस्था देखिए. वहां विज्ञान, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि किस ढंग से और क्यों पढ़ाया जाता है. विज्ञान को तोता रटंत की तरह पढ़ाने का असल कारण क्या है? समाज विज्ञान में लोकतांत्रिक चेतना और मानवाधिकार सहित समता और बंधुत्व की आदर्शों की बात को गायब करने का क्या कारण है? पहली कक्षा से बारहवी कक्षा तक अम्बेडकर, फुले, पेरियार, अछूतानन्द, गोरख, कबीर और नानक को शिक्षा से गायब कर देने का क्या कारण है? इन सवालों के साथ फिर ये भी सोचिए कि जिस वर्ण के कर्मकांडी और अन्धविश्वासी लोगों का समाज और शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा है. उनका विज्ञान से या यूरोपीय वैज्ञानिक चेतना से या यहां गिनाये गए अम्बेडकर, कबीर जैसे नामों से क्या रिश्ता है? क्या वे सच में भारतीयों को विज्ञान या अम्बेडकर, पेरियार या कबीर सिखाने के हक में हैं? क्या बच्चों को सही अर्थ में विज्ञान सिखाने के बाद या कबीर पढ़ाने के बाद उन्हें अन्धविश्वासी देवी देवताओं गुरुओं आदि की भक्ति में झोंका जा सकता है? क्या वास्तव में विज्ञान सिखाने के बाद गुरुपूर्णिमा पर अंधविश्वास का चरणामृत उन्ही छात्रों को पिलाया जा सकता है? इन सबका एक ही उत्तर है – नहीं!

अगर भारत में सही तरीके की शिक्षा फ़ैल जाए तो न तो सवर्ण द्विज माफिया को कोई छात्र/छात्रा चरण स्पर्श करेगा, न पोंगा पंडित बाबाओं धर्मगुरुओं की गुलामी करेगा, न ही इनके फैलाए दंगों में लड़ने के लिए तैयार होगा. अब सवाल ये है कि भारत की शिक्षा और समाज पर नियन्त्रण रखने वाले लोग क्या ये सब होने देना चाहते हैं? अगर वे ये होने देना चाहते हैं तो उन्हें पिछले सत्तर सालों में या उसके भी पहले ज्ञात दो हजार साल के इतिहास में किसने रोका था? बात एकदम साफ़ है कि ये वर्ण माफिया जान बूझकर समाज को शिक्षा से वंचित बनाता आया है ताकि इसका एकाधिकार इस देश पर बना रहे.

कल्पना कीजिये अगर सच में ही यूरोपीय ढंग की वैज्ञानिक शिक्षा भारत में फ़ैल गयी तो शिक्षा, न्यायपालिका, शासन-प्रशासन आदि में मलाई खा रहे इस “वर्ण माफिया” के पास भारत की ऐतिहासिक रूप से लंबी गुलामी, कमजोरी, कायरता और धर्मान्धता सहित वर्तमान में जारी करोड़ों-करोड़ों गरीबों के शोषण और दमन से जुड़े सवालों के क्या जवाब होंगे? किसानों की आत्महत्या या मजदूरों के पलायन के सवालों के इनके पास क्या उत्तर हैं? ये वे सबसे गंभीर सवाल हैं जो भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू शासक हजारों साल से टालते रहे हैं. ये सवाल अगर दलितों, आदिवासियों, बहुजनों और स्त्रीयों के मन में आ गया तो वे इस वर्ण माफिया को उखाड़ फेकेंगे.

इसका सीधा अर्थ ये निकलता है कि इस सवाल को उभरने से बचाने के लिए इस देश की शिक्षा व्यवस्था को लूला-लंगड़ा और अंधा-बहरा बनाये रखना जरुरी है. अभी वर्ण माफिया के “दैवीय आधिपत्य” को ही धर्म समझने वालों ने शिक्षा के साथ जो व्यवहार करना शुरू किया है उसे भी देखा जाना चाहिए. वे यूरोपीय ढंग की वैज्ञानिक और क्रिटिकल थिंकिंग पैदा करने वाली शिक्षा से भयानक ढंग से डरे हुए हैं. उन्हें पता है कि जैसे यूरोप में इस शिक्षा ने पुनर्जागरण लाकर धर्म और भगवान को उखाड़ फेंका है उसी तरह उनके धर्म और भगवन को भी ये शिक्षा उखाड़ फेंकेगी. इसीलिए भारत का वर्ण-माफिया हजारों साल से शिक्षा को बर्बाद करने का संगठित षड्यंत्र चलाता आया है.

भारत की अस्सी प्रतिशत बहुजन आबादी को और कुल जनसंख्या की पचास प्रतिशत स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने वाले शास्त्र रचना कोई सामान्य बात नहीं है. ये वर्ण-माफिया को बनाये रखने की धर्मसम्मत और शास्त्रसम्मत रणनीति रही है. ये आज भी जारी है. इसी राजनीति ने भारत को अनपढ़, विभाजित, कमजोर, डरपोक और गरीब बनाया है.

सोचिये अगर भारत के अस्सी प्रतिशत दलित और शूद्र शिक्षित हो सकते, शस्त्र और शास्त्र उठा सकते तो मुट्ठी भर मंगोल, शक, हूण, यूनानी या ब्रिटिश भारत को जीत सकते थे? भारत बार बार हारा क्योंकि अस्सी प्रतिशत जनता न किताब उठा सकती थी न तलवार उठा सकती थी. आज भी इन अस्सी प्रतिशत को दबाने और सताने में ही भारत की कुल जमा समझदारी और ताकत खर्च हो रही है इसीलिये भारत किसी भी क्षेत्र में अपने समकक्ष देशों या यूरोप अमेरिका से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है.

जिस घर में मुखिया अपने ही परिवार के शोषण और दमन में अपनी सारी ताकत खर्च किये दे रहा हो उसका पड़ोसियों से बार बार हार जाना एकदम स्वाभाविक सी बात है. भारत का सवर्ण माफिया अपने ही अस्सी प्रतिशत जनसंख्या के खिलाफ षड्यंत्र और अपराध करता रहता है इसलिए उन्हें दुनिया के अन्य सभ्य देशों के बराबर खड़े होने की तैयारी का समय ही नहीं मिलता. घर के भीतर घमासान मचा हुआ है, भारत के अंदर महाभारत और राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र का दबदबा बना हुआ है, ऐसे में पडौसियों से हारने और पिटने से कौन बच सकता है? यही भारत का कुल जमा इतिहास है.

शिक्षा और नवजागरण को रोके रखने के लिए भारत का वर्ण-माफिया बहुत बड़ी कीमत चुकाता आया है. भारत की गुलामी से बड़ी कीमत क्या हो सकती है? इस पर मजा देखिये कि जिन लोगों ने भारत को अशिक्षित कमजोर और विभाजित रखकर इसे गुलाम बनने और हारने पर मजबूर किया वे आज हमें राष्ट्रवाद सिखा रहे हैं. और शिक्षा सहित शिक्षा के पूरे तंत्र को बर्बाद करने का सबसे बड़ा प्रयास भी आरंभ कर चुके हैं.

जयंती विशेषः इस दलित साहित्यकार ने सिर्फ एक दिन स्कूल जाकर लिख डाला 34 उपन्यास

अपने छात्र जीवन में मैं साहित्य का छात्र नहीं रहा. बाद के दिनों में भी कविताओं से कम ही लगाव रहा. इसके बावजूद मुझे रविंद्रनाथ टैगोर का नाम पता है, हिंदी-अंग्रेजी के नामचीन कथाकारों-साहित्यकारों के बारे में जानता हूं. फिर आखिर अण्णाभाऊ जैसा महान साहित्यकार कैसे छूट सकता है. कुछ मराठी मित्रों से उनके बारे में काफी कुछ जानने को मिला तो यह भी साफ हो गया कि आखिर मैं उनके बारे में बहुत क्यों नहीं जान पाया. वजह उनका दलित होना है. वाल्मीकि से लेकर रैदास और फिर डॉ. अम्बेडकर तक दलित समाज के महापुरुषों के विचारों को दबाया जाता रहा है. ब्राह्मणवादी समाज की यह कोशिश रही है कि न तो इनके विचार दलित समाज तक पहुंचे और न ही नई पीढ़ी अपने इन महापुरुषों के बारे में जान पाए.

अन्नाभाऊ साठे का जन्म 1 अगस्त 1920 में हुआ. उनका पूरा नाम तुकाराम भाऊ साठे था लेकिन वह अण्णाभाऊ साठे के नाम से विख्यात हैं. वह विश्वविख्यात साहित्यकार हैं. वह महाराष्ट्र के दलित परिवार में जन्मे. महज एक दिन के लिए स्कूल गए. लेकिन इसी एक दिन की सीख ने उन्हें सामाजिक प्रताड़ना की अवहेलना सहने की दीक्षा दे दी. उन्होंने ठान लिया कि जिस व्यवस्था ने उन्हें प्रताड़ित किया है, अपनी प्रतिभा से एक दिन उसके मुंह पर तमाचा जरूर मारेंगे. जिस स्कूल में उन्हें अपमानित होना पड़ा था उन्होंने दुबारा कभी उसका मुंह तक नहीं देखा. मुंबई में साईन बोर्ड के अक्षरों को देखकर और उन्हें बोर्ड पर रंगकर उन्होंने पढ़ना और लिखना सीखा. और मनुवादी व्यवस्था से जूझते हुए खुद को साबित भी किया.

मूलरूप से मराठी में लिखने वाले अण्णाभाऊ के कलम की ताकत इतनी थी कि विश्व के 27 भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद किया गया. वह दलित-जीवन का सशक्त चित्रण करनेवाले पहले बड़े लेखक थे. उन्होंने विविध कहानियां लिखी. उनकी रचना में समाज के निम्न स्तर के शोषितों, पीड़ितों के जीवन का संसार दिखाई देता है. उन्होंने जो जीवन जिया उसी का चित्रण किया. उसमें कल्पना का अंश नहीं था. उनके पात्रों को रोटी-कपड़ा-मकान की मूलभूत जरूरतों के लिए खून-पसीना एक करना पड़ता था और सामाजिक अवमानना को भी झेलना पड़ता था. इसी परिवेश में विद्रोह के बीज बोए जाते हैं. आनेवाले परिवर्तन की आहट इन कथाओं में सुनी जा सकती है.

साठेजी प्रतिबद्ध रचनाकार थे और बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के आंदोलन से भी प्रभावित थे. वे शोषण के और धर्म-पाखंड के विरोधी थे.उनकी कहानियों के चर्चित होने का एक और कारण अपनी रचनाओं द्वारा दलितों के उन्मुक्त जीवन का चित्रण भी था. साथ ही उन पर आदर्शवाद का भी प्रभाव था. उनके समानांतर दलित युवा रचनाकारों को अभिव्यक्ति के खतरे उठाने का अनुकूल वातावरण मिल गया. दलित साहित्य के आंदोलन के रूप में मराठी की साहित्यिक संस्कृति में एक तूफान-सा आ गया.

अण्णाभाऊ ने लिखा ‘जग बदल घालूनू घाव गेले मला सांगूनी भीमराव’ (इस दुनिया को बदलना है. मुझे भीमराव ने यहीं सीखाया है). यह माना जा सकता है कि बाबासाहेब द्वारा शुरु किए गए आंदोलन का साहित्य की दुनिया में सही मायने में प्रतिनिधित्व अण्णाभाऊ ने ही किया. उनकी रचनाओं में संघर्ष एवं वर्णवर्चस्ववादी व्यवस्था के प्रति तथा उसमें पीसने वालों के प्रति कड़वी टिपण्णीयां हैं जो पाठकों को समाज से जोड़े रखती है. यह आज भी होता है इसीलिए अण्णाभाऊ आज भी मराठी साहित्य के महानतम लेखकों मे से एक है.

अण्णाभाऊ ने 34 उपन्यास, 13 नाटक, कई पोवाडा गीत, 14 वगनाटिकाएं और एक प्रवास वर्णन लिखा. उनकी लेखनी किस स्तर की होगी यह इसी से समझा जा सकता है कि उनकी तकरीबन सभी रचनाओं का अनुवाद दुनिया भर की 27 भाषाओं मे किया गया. मराठी साहित्य जगत के शायद ही किसी लेखक को यह सम्मान मिला हो. वहीं अगर भारत देश की बात करें तो भी ऐसे लेखक विरले ही मिलेंगे. लेकिन जहां एक के बाद एक अद्भुत रचना करते हुए उन्होंने अपने साहित्य का अंबार लगा दिया तो दूसरी ओर साहित्य के इस दमकते सितारे की चमक को कम करने की हर संभव कोशिश की जाती रही.

विदेशों में भारत की पहचान को बुलंद करने वाले इस साहित्याकर को अपने ही देश में तमाम उपेक्षाओं का शिकार होना पड़ा. कहने को इनके नाम पर डाक टिकट भी जारी हुआ. महाराष्ट्र में कुछ जगहों पर मूर्तियां भी बनीं. लेकिन जितनी प्रसिद्धी पर इनका हक था, वह उन्हें नहीं मिल सका. मराठी साहित्यकारों की दुनिया ने इस महान साहित्यकार को हमेशा उपेक्षित रखा गया. विदेशों में उन्हें सबसे अधिक सम्मान रशिया में मिला. कहा जाता है कि वह रशिया में इतने प्रसिद्ध थे कि एक वक्त था जब रशिया ने अण्णा के नाम को देखते हुए और उनके भारतीय होने के कारण भारत को बड़ी मदद की थी. लेकिन विदेशों में मान्यता और सम्मान मिलने के बावजूद वह अपने ही देश में आज तक उचित सम्मान नहीं पा सके. 18 जुलाई 1969 को उनका महापरिनिर्वाण हो गया.

14 साल के बच्चे की मौत का कारण बना ऑनलाइन गेम ‘द ब्लू व्हेल’

खूनी इंटरनेट गेम ‘ब्लू व्हेल’ ने मुंबई में एक 14 साल के बच्चे की जान ले ली है. अंधेरी ईस्ट में रहने वाले इस बच्चे ने शनिवार को सातवीं मंजिल से छलांग लगा ली, इस बच्चे को ऑनलाइन सुसाइड गेम का शिकार बताया जा रहा है. अभी तक इस खूनी खेल ने रूस में 130 लोगों की जान ले ली है। मुंबई की घटना में सुसाइड वाली बात का पता मनप्रीत सिंह साहनी के दोस्त के व्हाट्सऐप ग्रुप से चला. मनप्रीत ने पिछले हफ्ते अपने दोस्तों से कहा था कि वह अब सोमवार से स्कूल नहीं आएगा.

आइए जानते हैं क्या है ये खेल, और कैसे ले लेता है टीनएजर्स की जान-

द ब्लू व्हेल गेम’ या ‘द ब्लू व्हेल चैलेंज’ रूस में बना इंटरनेट गेम है. इस गेम में एक-एक कर सारे टास्क पूरे करते रहने पर आखिरी में सुसाइड के लिए उकसाया जाता है. साथ ही हर टास्क पूरा होने के साथ प्लेयर को अपने हाथ पर एक कट लगाने के लिए कहा जाता है. आखिरी में कट के निशान से व्हेल की आकृति उभर कर आती है।

 इस गेम के तहत 50 दिनों का चैलेंज यानि कि खास तरह का टॉस्क का मैसेज सोशल मीडिया पर सर्कुलेट किया जाता है। इस चैलेंज में प्लेयर को हर दिन चैलेंज पूरा करने के लिए उकसाया जाता है। चैलेंज को पूरा करने के बाद इस खूनी खेल के खिलाड़ी को एक प्राइवेट ग्रुप में अपनी सेल्फी पोस्ट करनी होती है, जिसके जरिए उसे बताना होता है कि उसने चैलेंज पूरा कर लिया है। इस गेम का आखिरी चैलेंज आत्महत्या है। यह गेम टीनएजर्स में ज्यादा पापुलर है और उन्हीं की जाने गई है।

किसने शुरू किया यह खूनी खेल

यह गेम रूसी नागरिक फिलिप बुडेकिन ने 2013 में बनाया था. रूस में पहला सुसाइड 2015 में सामने आया था. इसके बाद फिलिप को गिरफ्तार कर लिया गया और उस पर केस चला. सुनवाई के दौरान फिलिप ने बताया कि उनके गेम का मकसद समाज की सफाई करना है. जिन लोगों ने गेम खेलते हुए आत्महत्या की है, फिलिप की नजर में वे ‘बयोलॉजिकल वेस्ट’ थे.

बता दें कि बीते शनिवार को साहनी अपनी बिल्डिंग के सातवें फ्लोर की छत पर चढ़ गया. आस पास रहने वालों ने उसे आवाज दी, लेकिन जब तक वह कुछ कर पाते मनप्रीत अपनी छत से छलांग लगा चुका था.

भारी हंगामे के बीच राज्यसभा में पास हुआ ‘राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग’ बिल

नई दिल्ली। राज्यसभा में नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लास बिल भारी हंगामे के बीच पास हुआ. 31 जुलाई की शाम को इस बिल पर राज्यसभा में वोटिंग शुरू हुई, तो विपक्ष ने संशोधन पेश करने शुरू कर दिए. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत के जवाब के बाद विपक्षी दलों ने अपना संशोधन वापस ले लिया, लेकिन जब बिल के प्रावधानों पर वोटिंग शुरू हुई, तो कांग्रेस के नेता संशोधन पर अड़ गए.

बाद में इस बिल का तीसरे क्लॉज के बिना ही पास करना पड़ा, क्योंकि तब सदन में सत्ता पक्ष के ज्यादातर सदस्य नदारद थे. ये 123वां संविधान संशोधन विधेयक है, जिसके तहत पिछड़ा वर्ग आयोग को भी संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा. सूत्रों का कहना है कि राज्यसभा में सदस्यों की गैरहाजिरी से सरकार की किरकिरी से प्रधानमंत्री मोदी नाराज हैं. मंगलवार को भाजपा संसदीय दल की बैठक है, जिसमें इस मामले पर भाजपा के राज्यसभा सदस्यों की क्लास भी लग सकती है. बैठक में इस पर सांसदों को जवाब देना होगा कि आखिर क्यों वो सदन में मौजूद नहीं थे. संसदीय कार्य मंत्री ने इस पूरे मसले पर अनुपस्थित सांसदों से कारण बताने को कहा है.

दरअसल राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के लिए एक क्लॉज पर संशोधन पेश करने पर राज्यसभा में दिलचस्प स्थिति पैदा हो गयी. विपक्ष की ओर से एक संशोधन के लिए बहुमत हो गया और सरकार के लिए फजीहत की स्थिति पैदा हो गयी. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सत्ता पक्ष के बहुत सारे सांसद सदन में मौजूद ही नहीं थे.

आपको बता दें कि इस विधेयक को पारित कराने के लिए 245 सदस्यीय सदन में मौजूद सांसदों में से दो तिहाई का इसके पक्ष में होना जरूरी था. लेकिन कई मंत्रियों की गैरहाजिरी ने सरकार की मुसीबत बढ़ा दी.विपक्ष का संशोधन 52 के मुकाबले 74 मतों से पारित हो गया. भाजपा के जदयू को मिलाकर सदन में 89 सदस्य हैं. विधेयक पारित नहीं होने पर पिछड़े वर्ग को निराशा को ध्यान में रखते हुए आखिर में नियम तीन को हटाकर जब विधेयक पर मतदान कराया , तो इसके समर्थन में 124 वोट पड़े. किसी ने भी इसके खिलाफ वोट नहीं दिया.

एनकाउंटर में मारा गया आतंकी अबु दुजाना

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा के हकरीपोरा गांव में सुरक्षा बलों ने एनकाउंटर में लश्कर के कमांडर अबु दुजाना और आरिफ को मार गिराया है.

इससे पहले के घटना क्रमों में पुलवामा के हकरीपोरा गांव में मंगलवार सुबह गोलियों के चलने की आवाजें सुनाई दी थीं. दरअसल यहां सुरक्षा बलों का सर्च ऑपरेशन चल रहा था. इसके बाद यहां गोलियां चलने की आवाज़ आई और आतंकियों के साथ सुरक्षा बलों के मुठभेड़ की ख़बर सामने आई थी. इसके बाद यहां सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच एनकाउंटर में सुरक्षा बलों ने 2-3 आतंकवादियों को घेरा हुआ था. बता दें कि अबु दुजाना लश्कर का खूंखार आतंकवादी था और उसके सिर पर लाखों रुपये का ईनाम था.

बीते रविवार को भी जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए एनकाउंटर में सुरक्षाबलों ने दो आतंकियों को मार गिराया था. यह एनकाउंटर पुलवामा के तहाब इलाके में हुआ था. इसके बाद से जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षाबलों ने इलाके को घेर सर्च ऑपरेशन चलाया हुआ था.

जम्मू-कश्मीर के डीजीपी ने अबु दुजाना के पुलवामा एनकाउंटर पर कहा है कि अभी शवों की बरामदगी होना बाकी है. शवों की बरामदगी के बाद उनकी पहचान के बारे में बताया जाएगा. पुलवामा में हुए आंतकियों के साथ मुठभेड़ में दो आंतकियों की मौत के बाद इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है. आंतकियों के साथ मुठभेड़ के बाद इलाके में सुरक्षाबलों पर पत्थरबाज़ी की घटनाएं शुरु हो गई है. इस बीच सूत्रों के हवाले से ख़बर आ रही है कि मुठभेड़ में लश्कर कमांडर अबु दुजाना और आरिफ मारे गए हैं. हालांकि आधिकारिक बयान से इस ख़बर की पुष्टि होनी अभी बाकी है. सूत्रों की मानें तो एनकाउंटर के दौरान घर को बम धमाके से उड़ाने में दोनों आतंकियों की मौत हुई है.

बता दें कि पिछले कुछ समय से कश्मीर में घुसपैठ और मुठभेड़ की घटनाओं में काफी तेजी आई है. पुलिस की तरफ से दी गई जानकारी के मुताबिक इस साल अब तक करीब 102 आंतकियों को सुरक्षाबलों ने मार गिराया है. प्रशासन द्वारा दिया यह आंकड़ा पिछले सात सालों में अब तक का सबसे बड़ी संख्या है. बता दें कि सेना को खबर मिली थी कि पुलवामा में तहाब इलाके के एक गांव में आतंकी छिपे हैं. जिसके बाद सुरक्षाबलों ने घर-घर तलाशी अभियान चलाया था और इसी अभियान के तहत एक घर में छिपे दोनों आतंकियों को घेर सुरक्षाबलों ने एनकाउंटर में दो आंतकवादियों को मार गिरा दिया था.

दूरदर्शन की ”लोगो” प्रतियोगिता, विजेता को 1 लाख का ईनाम

नई दिल्ली। बदलते जमाने के साथ-साथ दूरदर्शन भी बड़े बदलाव में जुट गया है. दूरदर्शन समाचार से लेकर, कार्यक्रमों के प्रस्तुतिकरण उसके कंटेंट को लेकर प्रसार भारती इन दिनों विशेषज्ञों के साथ जुटा है.

इस बीच, लंबे समय से दूरदर्शन की पहचान बन चुके उसके खास ‘लोगो’ को भी बदलने की कवायद शुरू कर दी गई है. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि अपने सबसे पुराने दूरदर्शन चैनल के लिए लोगों का आकर्षण बढ़े इसके लिए ‘लोगो’ डिजाइन में जन-सहभागिता को अपनाया गया है.

पांच दशक से ज्यादा, 58 साल पुराने दूरदर्शन के इस खास चिन्ह में नयापन देने वाले और प्रतियोगिता में विजय होने वाले को बतौर पुरस्कार राशि एक लाख रुपए नगद रखी गई है. अब तक की यह सबसे बड़ी राशि मानी जा रही है. इससे पहले स्वच्छता अभियान के लोगो डिजाइन करने वाले प्रतियोगिता में विजय होने वाले कोल्हापुर के अनंत खसबरदर को प्रधानमंत्री ने 50 हजार रुपए का नगद ईनाम दिया था.

इस लिहाज से दूरदर्शन लोगो डिजाइन करने वाली प्रतियोगिता में विजेता को दोगुनी रकम बतौर पुरस्कार दी जाएगी. डीडी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा है कि दूरदर्शन के लोगो से सालों पुरानी यादें जुड़ी हैं. प्राइवेट चैनलों के कम्पटीशन के चलते युवाओं की एक नई पीढ़ी को इससे जुड़ने की जरूरत है.

इसीलिए भारत के युवा को डीडी से जोड़ने के लिए चैनल नया लोगो लाना चाहता है. डीडी ने आगे कहा है कहा है कि डीडी सभी भारतीयों को नए लोगो डिजाइन कम्पटीशन के लिए आमंत्रित करता है. कम्पटीशन में भाग लेने के लिए आपको 13 अगस्त 2017 तक आवेदन आप कर सकते है. किसी एक शख्स या फिर एक संस्थान के लिए एक ही एंट्री मान्य होगी.

गौरतलब है दूरदर्शन का लोगो लंबे समय से कई लोगों के जहन में बसा है. महाभारत, रामायण, मालगुडी डेज, शक्तिमान और न जाने कितने ही शोप-ओपेरा कार्यक्रमों से देशभर में कई लोगों की यादें डीडी चैनल से जुड़ी हैं.

शिवराज सरकार के खिलाफ ग्रामीणों ने किया ‘कफन सत्याग्रह’

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भोपाल। नर्मदा घाटी में सरदार सरोवर बांध के डूब प्रभावितों के पुनर्वास का सोमवार को आखिरी दिन था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाकर 8 अगस्त कर दिया है. उधर प्रभावितों ने सुबह नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं के साथ खंडवा-बड़ौदा हाईवे पर चक्काजाम कर सरकार के खिलाफ जमकर नारे लगाए. इसके पहले कारंजा चौक पर कफन सत्याग्रह किया गया. इसमें 10 महिला-पुरुषों को सड़क पर लेटाकर सफेद चादर (कफन) ओढ़ाई गई. वहीं कुछ लोग अभी भी पानी में डूबकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं.

चिखल्दा में नर्मदा बचाओ आंदोलन प्रमुख मेधा पाटकर उपवास पर बैठी हैं तो कुछ लोग अपना सामान समेट रहे हैं. गांव के गजानंद सेन नर्मदा नगर में विस्थापन की तैयारी करने में लगे दिखे. वे बेटियों के साथ सामान शिफ्ट करने के लिए लोडिंग वाहन में सामान रखवा रहे थे. उन्होंने बताया नर्मदा नगर में किराए पर मकान लिया है, ताकि डूब आने से पहले परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा सके. उधर, डूब प्रभावित सरकारी मदद की बजाय खुद विकल्प तलाशने में लगे हैं. 400 परिवारों ने स्वयं पुनर्वास की व्यवस्था करने का वचन पत्र दिया है.

डूब प्रभावितों का कहना है सरकार ने बसाहट केंद्र बना दिए, लेकिन बिजली, पानी, सड़क, नाली जैसी कोई सुविधाएं ही नहीं. प्राइवेट कॉलोनियों में सुविधाएं न देने पर कंस्ट्रक्शन एजेंसियों पर कानूनी दबाव बनाया जा रहा है. यह नियम सरकार खुद पर लागू क्यों नहीं कर रही है.

जल सत्याग्रह

शिकायत निवारण प्राधिकरण में 2000 से 2017 तक 25 हजार से ज्यादा मामलों में बसाहटों पर परेशानियों के मामले हैं. 4 हजार से ज्यादा बसाहटों पर समस्याओं से जुड़े मामले भी हैं. बड़वानी जिले में प्रशासन का दावा है कि 38 पुनर्वास स्थलों पर 700 से ज्यादा परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया है. 2392 से ज्यादा परिवार हटने को तैयार नहीं.

उधर, राजघाट स्थित नर्मदा में 24 घंटे में आधा मीटर जल स्तर बढ़ा है. रविवार शाम 6 बजे 120.550 मीटर तक जलस्तर पहुंच गया. शनिवार शाम को 120.000 मीटर जल स्तर दर्ज किया गया था. एक सप्ताह में करीब 3 तीन मीटर पानी बढ़ा है. खतरे का निशान 123.280 मीटर पर है. खलघाट में जलस्तर 128.900 मीटर है.