उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में दलित समाज की दो युवतियों की मौत और मध्यप्रदेश में जीआरपी थाने में पुलिसकर्मियों द्वारा एक बुजुर्ग और एक नाबालिग दलित की पिटाई का मामला तूल पकड़ चुका है। इन दोनों घटनाओं को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर ये दोनों घटनाएं भारत में दलितों पर होने वाले अत्याचार की इंतहा को बताती है। मामला इतना संदिग्ध है कि यू-ट्यूब इसको दिखाने के पहले तमाम बंदिशे लगा रहा है। लेकिन आप लिंक पर जाकर यह वीडियो देख सकते हैं।
यूपी और एमपी में दलित अत्याचार की घटनाओं से रोष
यूपी के गांव में सड़क नहीं, एक घंटे तक मरीज को चारपाई पर ढोया
उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के मऊ तहसील क्षेत्र के घुरेटा गांव में एक घटना भारत की असल तस्वीर बताने को काफी है। यह घटना बताती है कि भारत जिस विकास का ढिंढ़ोरा पीटता है, उसकी झलक अभी भी देश के कई गांवों से और खासकर वंचित समाज की बस्तियों से कोसो दूर है। एक्टिविस्ट और ट्राइबल आर्मी के संस्थापक हंसराज मीणा इस घटना को सामने लेकर आए हैं और कई सवाल उठाया है। उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर घटना का पूरा विवरण देते हुए लिखा-
माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, मैं आपके संज्ञान में चित्रकूट जिले के मऊ तहसील क्षेत्र के घुरेटा गांव की एक हृदयविदारक घटना सामने लाना चाहता हूं, जो न केवल प्रशासनिक असफलता बल्कि सरकार की ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा का भी प्रतीक है। घुरेटा गांव के निवासियों को एक गंभीर मरीज को अस्पताल तक ले जाने के लिए चारपाई पर एक किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ा, क्योंकि गांव में एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी। यह घटना सरकारी तंत्र की उस गंभीर विफलता को उजागर करती है, जो आज भी भारत के दूरदराज इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने में असमर्थ है।
इस गांव में न तो सड़क की कोई व्यवस्था है और न ही कोई नजदीकी अस्पताल। जिला मुख्यालय से मात्र 30 किमी की दूरी पर होने के बावजूद यहां के निवासियों को इस प्रकार की अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। यह घटना केवल एक गांव की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। क्या यह उन ग्रामीणों के अधिकारों का हनन नहीं है, जिन्हें आप स्वास्थ्य सुविधाएं देने का वादा करते हैं? सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में विकास के बड़े-बड़े दावे किए हैं, लेकिन जब ग्रामीणों को अपनी जीवनरक्षक सेवाओं के लिए चारपाई पर एक किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है, तो यह उन सभी दावों की पोल खोलता है।
यह बेहद शर्मनाक और दुखद है कि 21वीं सदी के भारत में भी ऐसे दृश्य देखने को मिल रहे हैं। मैं आपसे निवेदन करता हूं कि इस घटना को गंभीरता से लेते हुए तुरंत कार्रवाई करें और घुरेटा गांव के साथ-साथ अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को सुदृढ़ करने के लिए ठोस कदम उठाएं। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों को जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं स्वास्थ्य, शिक्षा, और परिवहन उपलब्ध कराए। आशा है, आपकी सरकार इस मामले को प्राथमिकता देगी और इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए त्वरित कार्रवाई करेगी।
माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, मैं आपके संज्ञान में चित्रकूट जिले के मऊ तहसील क्षेत्र के घुरेटा गांव की एक हृदयविदारक घटना लाना चाहता हूं, जो न केवल प्रशासनिक असफलता बल्कि सरकार की ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा का भी प्रतीक है। इस गांव के निवासियों को… pic.twitter.com/hL8ToLpeMA
— Hansraj Meena (@HansrajMeena) August 27, 2024
आरक्षण में वर्गीकरणः दलित समाज के दिग्गजों ने खोला मोर्चा, देखिए किसने क्या कहा
आरक्षण में वर्गीकरण के खिलाफ दलित समाज के दिग्गजों ने देश भर में मोर्चा खोल दिया है। 21 अगस्त 2024 को इसको लेकर देश भर में प्रदर्शन हुए। आम से लेकर खास तक, दलित-आदिवासी समाज के तमाम लोगों ने सड़कों पर उतर पर अपना विरोध जताया। इस दौरान दलित दस्तक ने अपने यू-ट्यूब चैनल के लिए तमाम लोगों से बातचीत की। इसमें आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद, दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. जितेन्द्र मीणा जैसे दिग्गजों ने अपनी बात रखी।
वर्गीकरण के खिलाफ प्रदर्शन देश भर में हुए। देश के अलग-अलग हिस्सों में अंबेडकरवादी संगठनों ने सड़क पर उतर पर इसका विरोध किया और इसे समाज को तोड़ने की साजिश कहा।
लैटरल एंट्री पर गरमाई सियासत, बहुजन नेताओं ने खोला मोर्चा
जब वंचित समाज आरक्षण में वर्गीकरण के फैसले की समीक्षा करने में जुटा है, लैटरल एंट्री यानी बिना किसी परीक्षा के जॉइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी जैसे पदों को भरने का फरमान जारी हो गया है। 17 अगस्त को आए इस नोटिफिकेशन को लेकर बहुजनों में खासा गुस्सा है। सामाजिक न्याय की संस्थाओं के साथ-साथ बहुजन नेताओं ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है।
बसपा सुप्रीमों मायावती ने इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और इस भर्ती को गलत, असंवैधानिक और गैर कानूनी बताया है। बसपा सुप्रीमों ने कहा कि-
केन्द्र में संयुक्त सचिव, निदेशक एवं उपसचिव के 45 उच्च पदों पर सीधी भर्ती का निर्णय सही नहीं है, क्योंकि सीधी भर्ती के माध्यम से नीचे के पदों पर काम कर रहे कर्मचारियों को पदोन्नति के लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। इन सरकारी नियुक्तियों में SC, ST व OBC वर्गों के लोगों को उनके कोटे के अनुपात में अगर नियुक्ति नहीं दी जाती है तो यह संविधान का सीधा उल्लंघन होगा। और इन उच्च पदों पर सीधी नियुक्तियों को बिना किसी नियम के बनाये हुए भरना बीजेपी सरकार की मनमानी होगी, जो कि गैर-कानूनी एवं असंवैधानिक होगा।
वहीं, दूसरी ओर आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने भी इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी को घेरते हुए उन्होंने कहा है कि परम् पूज्य बाबा साहब डॉo भीमराव अंबेडकर जी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाकर, संविधान को माथे पर लगाने वाले प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार उसी संविधान की किस कदर हत्या करने पर तुली है लेटरल एंट्री का यह नोटिफिकेशन इसका जीता जागता उदाहरण है।
केंद्र सरकार द्वारा अपनी विचारधारा के 45 लोगों को बिना कोई परीक्षा पास किए बैकडोर से मंत्रालयों में बैठाने के लिए एक बार फिर से विज्ञापन निकाल दिया है। जिसमें किसी भी पद पर कोई आरक्षण नहीं है।
नगीना सांसद चंद्रशेखर का आरोप है कि इन पदों की अघोषित योग्यता ये है कि अभ्यर्थी संघ से जुड़ा हो और राजनैतिक तौर पर भाजपा की विचारधारा लिए काम करता हो। न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए चंद्रशेखर ने कहा कि OBC/SC/ST में जबरन क्रीमी लेयर खोजने वाले माननीय न्यायमूर्तियों और केंद्र सरकार से सवाल इन पदों पर इन वर्गों का तथाकथित क्रीमीलेयर कहां चला जाता है? चंद्रशेखर ने सड़क से लेकर संसद तक इसके खिलाफ आवाज उठाने की बात कही है।
गौरतलब है की ये पहला मौका नहीं है। इससे पहले मोदी सरकार लेटरल एंट्री के नाम पर 2017 से 2023 के बीच लगभग 52 नियुक्तियां कर चुकी है, जिनमें कोई आरक्षण नहीं दिया गया। यह नियुक्ति “राजनैतिक सरपरस्ती” के चलते मिल गई। लेटरल एंट्री के ज़रिए भरे जाने वाले इन पदों में 𝟒𝟓 जॉइंट सेक्रेटरी, डायरेक्टर और डिप्टी सेक्रेटरी हैं।
अगर 𝐔𝐏𝐒𝐂 परीक्षा के माध्यम से इन यह नियुक्ति करती तो 𝟒𝟓 में से तकरीबन 𝟐𝟑 अभ्यर्थी दलित, पिछड़ा और आदिवासी वर्गों से चयनित होकर आते लेकिन आरक्षण और संविधान विरोधी केन्द्र की भाजपा सरकार ने चोर दरवाजे यानि बैकडोर से खास जातियों और विचारधारा के चहेतों को मंत्रालयों में बैठाने का प्रबंध कर लिया है। हालांकि बहुजन समाज ने भी साफ कर दिया है कि अब वह इस मुद्दे पर चुप बैठने वाली नहीं है और सरकार से दो-दो हाथ करने को तैयार है।
आरक्षण मुद्दे पर फुल फॉर्म में बसपा सुप्रीमो, सरकार से लेकर विपक्ष को ललकारा
अमूमन यह कम होता है कि बसपा प्रमुख मायावती बार-बार मीडिया के सामने आएं। लेकिन आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर उठे बवाल के बीच बसपा सुप्रीमों फुल फार्म में हैं। 4 अगस्त को मीडिया को संबोधित करने और प्रधानमंत्री एवं सरकार से संसद सत्र के दौरान बिल को पास करने की मांग करने वाली बहनजी 10 अगस्त को फिर मीडिया के सामने आईं। तेवर सख्त थे तो सरकार और आवाम दोनों को साफ संदेश था।
लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आश्वासन देने भर से काम नहीं चलेगा। केंद्र सरकार को संसद का सत्र बुलाकर अनुसूचित जाति/जनजाति और क्रीमीलेयर मामले में आरक्षण की स्थिति साफ करनी चाहिए। मायावती ने आरोप लगाया कि इस मामले में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ठीक से पैरवी नहीं की। प्रधानमंत्री की नीयत अगर साफ है तो संसद का सत्र समय से पहले स्थगित नहीं करना चाहिए। विशेष सत्र बुलाना चाहिए।
कांग्रेस और भाजपा पर एक साथ हमला बोलते हुए बहनजी ने कहा कि बीजेपी और कांग्रेस आरक्षण के खिलाफ हैं। क्रीमीलेयर के बहाने आरक्षण खत्म करने की कोशिश की जा रही है। इनकी सरकारों में नौकरियों को खत्म कर संविदा पर तैनाती आरक्षण खत्म करने की ही कोशिश है। प्रेस कांफ्रेस में बसपा सुप्रीमों ने सभी राजनीतिक दलों को कठघरे में खड़ा किया और कहा कि सभी राजनीतिक दलों को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अपने समर्थकों और एससी-एसटी समाज से अपील करते हुए बसपा प्रमुख ने लोगों से आरक्षण के मुद्दे को लेकर एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि अगर अब आवाज नहीं उठाई तो हमेशा के लिए आरक्षण से वंचित रहना पड़ेगा। देश की दिग्गज नेता ने राष्ट्रीय स्तर पर जाति जनगणना की भी मांग उठाई।
साफ है कि आरक्षण के मुद्दे ने बहुजन समाज पार्टी और उसकी मुखिया मायावती को बड़ा मौका दे दिया है। वह इस मुद्दे के जरिये जहां सीधे अपने खोए हुए जनाधार से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं तो वहीं, दलित समाज को एकजुट होने का संदेश देकर उन्होंने साफ कर दिया है कि बसपा इस मुददे का नेतृत्व करने और सरकार से लड़ने के लिए तैयार है।
विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देना भूलीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
25 जुलाई 2022 को द्रौपदी मूर्मू भारत की 15वीं राष्ट्रपति बनी थीं। जब वो राष्ट्रपति बनी तो उनकी आदिवासियत पहचान को लेकर भाजपा ने खूब ढिंढ़ोरा पीटा। कहा गया कि देश में पहली बार आदिवासी समाज का व्यक्ति और वो भी महिला शीर्ष पद पर पहुचेंगी। लेकिन वही राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर बधाई देना भूल गईं। इसको लेकर आदिवासी समाज के लोगों ने आपत्ति, अफसोस और विरोध जताया है।
सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर काफी सक्रिय रहने वाले हंसराज मीणा ने एक्स पर पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का विश्व आदिवासी दिवस पर दिये गए संदेश का साझा करते हुए लिखा-
कभी देश में राष्ट्रपति हुआ करते थे। संयुक्त राष्ट्र संघ की गाइडलाइन के आधार पर प्रति वर्ष 9 अगस्त को बधाई संदेश दिया जाता था। एक वर्तमान राष्ट्रपति है जो आदिवासी होते हुए भी देश के 15 करोड़ लोगों को बधाई संदेश तक नहीं देती। किस बात का गर्व करें? शर्म आती हैं।#विश्व_आदिवासी_दिवस pic.twitter.com/1BpUw4yhJd
— Hansraj Meena (@HansrajMeena) August 9, 2024
राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू फिलहाल विदेश दौरे पर हैं। 4 अगस्त को वह फिजी, न्यूजीलैंड और तिमोर लेस्ते देशों की यात्रा पर निकली। प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया के आधिकारिक एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी और तस्वीर दोनों है। अपनी इस यात्रा में राष्ट्रपति जहां भी जा रही हैं, और जिस राष्ट्राध्यक्ष या महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल हो रही हैं, उसकी तस्वीरें और जानकारी लगातार साझा की जा रही है।
9 अगस्त को इस आधिकारिक एक्स हैंडल से जो पोस्ट किये गए हैं। उसमें नीरज चोपड़ा को पेरिस ओलंपिक में रजत पदक जीतने की बधाई दी गई है, जबकि अन्य में वीडियो जारी किया गया है, जिसमें राष्ट्रपति मूर्मू न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में इंडियन कम्यूनिटी रिसेप्शन को संबोधित कर रही हैं। इस दिन विश्व आदिवासी दिवस से जुड़ा कोई पोस्ट नहीं दिख रहा है। राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू की ताजा पोस्ट तिमोर लेस्ते से 10 अगस्त को साढ़े 11 बजे की है, जिसमें वो पूर्व राष्ट्रपति वी.वी.गिरी की जयंती पर उनकी तस्वीर के सामने झुककर उनको श्रद्धांजलि दे रही हैं। यानी अभी भी वह अपने विदेशी दौरे पर ही हैं।
President Droupadi Murmu paid floral tributes to Shri V.V. Giri, former President of India, on his birth anniversary at Dili, Timor-Leste. pic.twitter.com/Y6DrXqR8GF
— President of India (@rashtrapatibhvn) August 10, 2024
यहां सवाल यह उठता है कि जब राष्ट्रपति और उनके साथ चल रहे स्टॉफ को हर किसी की जयंती और पेरिस ओलंपिक में चल रही प्रतिस्तपर्धाओं की जानकारी है और वो लगातार राष्ट्रपति के जरिये इससे जुड़े संदेश भी दे रहे हैं तो आखिर वह विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देना कैसे भूल गए। हो सकता है कि इसके लिए राष्ट्रपति भवन का स्टॉफ जिम्मेदार हो, लेकिन आदिवासी समाज का होने के नाते राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू का भी विश्व आदिवासी दिवस को भूल जाने को दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो और क्या कहा जाए। संभवतः यह पहली बार है जब कोई राष्ट्रपति विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देना भूल गया है। एक सवाल यह भी है कि क्या यह सरकार की आदिवासी समाज को लेकर किसी अलग तरह की राजनीति की शुरुआत तो नहीं?
आरक्षण में कोटे पर नया हंगामा शुरू, अब क्या करेगा दलित समाज?
सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की खंडपीठ के द्वारा एक अगस्त को आरक्षण में वर्गीकरण और क्रीमी लेयर को लेकर टिप्पणी की थी। इसके बाद दलित समाज के भीतर से विरोध उठना शुरू हो गया। इस बीच 9 अगस्त को इस बारे में केंद्र सरकार ने बयान जारी कर स्थिति को साफ किया है। केंद्र सरकार की ओर केद्रीय मंत्री अश्विनी वार्ष्णेय सामने आए। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर नहीं होगा। हालांकि एससी-एसटी आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर केंद्र ने चुप्पी साध रखी है। ऐसे में यह आंदोलन आगे कैसे बढ़ेगा, इसको लेकर दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने सोशल एक्टिविस्ट और विचारक डॉ. सतीश प्रकाश से चर्चा की। देखिए चर्चा का वीडियो-
आरक्षण में वर्गीकरण पर कांग्रेस की भूमिका पर भड़के अंबेडकरवादी
सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण में वर्गीकरण के फैसले के बाद तेलंगाना सरकार ने इसके पक्ष में फैसला लेना शुरू कर दिया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने यहां तक कहा कि आरक्षण में वर्गीकरण के फैसले को लागू करने वाला तेलंगाना पहला राज्य बनेगा। इसको लेकर अंबेडकरवादी समाज का एक तबका नाराज हो गया है। दलित एक्टिविस्ट और चिंतक सतीश प्रकाश ने इसको लेकर कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा है। उनके निशाने पर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी भी हैं, जो पूरे लोकसभा चुनाव के दौरान संविधान बचाने की बात करते हुए दिखे। सतीश प्रकाश ने कांग्रेस और राहुल गाँधी पर कई आरोप लगाए हैं।
दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने सतीश प्रकाश से इस संबंध में दलित दस्तक के यू-ट्यूब चैनल के लिए चर्चा की। देखिए क्या है उनके तर्क-
कितना संवैधानिक है आरक्षण में बंटवारे का SC का फैसला, सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट के.एस चौहान ने किया विश्लेषण
आरक्षण में वर्गीकरण को लेकर एक अगस्त को दिये गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बहस तेज हो गई है। इस पर चर्चा चल रही है कि यह फैसला कितना सही और संविधान सम्मत है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील एडवोकेट के. एस चौहान ने दलित दस्तक के संपादक अशोक दास से विस्तृत बात की और बताया कि इस फैसले के संवैधानिक मायने क्या है। दलित दस्तक के यू-ट्यूब चैनल पर हुई इस चर्चा का वीडियो लिंक हम यहां दे रहे हैं। सुनिये कितना न्याय संगत है सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण पर फैसला-
SC-ST उपजातियों को मिल सकेगा अलग से कोटा, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
एससी-एसटी आरक्षण में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 जजों की पीठ ने 2004 में ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसी/एसटी जनजातियों में सब कैटेगरी नहीं बनाई जा सकती है।
इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच ने 6-1 के बहुमत से फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अंदर भी कई वर्ग बनाए जा सकेंगे। ऐसे में राज्य सरकारें अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के अंदर आने वाले किसी एक वर्ग को ज्यादा आरक्षण का लाभ दे सकेंगी।
जस्टिस बीआर गवई ने फैसला लिखते हुए कहा कि ईवी चिन्नैया फैसले मामले में कुछ खामियां थीं। यहां आर्टिकल 341 को समझने की जरूरत है जो सीटों पर आरक्षण की बात करता है। उन्होंने कहा कि मैं कहना चाहता हूं कि आर्टिकल 341 और 342 आरक्षण के मामले को डील नहीं करता है। फैसला सुनाने वाले सात सदस्यीय पीठ में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस बी आर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एससी शर्मा शामिल रहे। पीठ ने 6-1 के बहुमत से फैसला सुनाया है।
पीठ ने कहा कि राज्यों के पास आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति में उप-वर्गीकरण यानी Sub Classification करने की शक्तियां हैं। कोर्ट ने कहा कि कोटा के लिए एससी, एसटी में उप-वर्गीकरण का आधार राज्यों द्वारा मानकों एवं आंकड़ों के आधार पर उचित ठहराया जाना चाहिए।
जस्टिस बी आर गवई ने सामाजिक लोकतंत्र की आवश्यकता पर दिए गए बीआर अंबेडकर के भाषण का हवाला दिया। जस्टिस गवई ने कहा कि पिछड़े समुदायों को प्राथमिकता देना राज्य का कर्तव्य है, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के केवल कुछ लोग ही आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। जमीनी हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि एससी/एसटी के भीतर ऐसी श्रेणियां हैं, जिन्हें सदियों से उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उप-वर्गीकरण का आधार यह है कि एक बड़े समूह में से एक ग्रुप को अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
हालांकि इस बारे में बहुमत से अगर राय रखने वाली जस्टिस बेला त्रिवेदी ने अपने फैसले में लिखा कि मैं बहुमत के फैसले से अलग राय रखती हूं। उन्होंने कहा कि मैं इस बात से सहमत नहीं हूं जिस तरीके से तीन जजों की बेंच ने इस मामले को बड़ी बेंच को भेजा था। तीन जजों की पीठ ने बिना कोई कारण बताए ऐसा किया था।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कई बातों का जिक्र किया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आरक्षण को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। इस मामले में यह भी आशंका है कि राज्य सरकारें अपने चुनावी फायदे के लिए इसका अपने तरीके से इस्तेमाल कर सकती हैं।बहुजन नेताओं ने खोली बजट की पोल, सुनिये बहन मायावती, चंद्रशेखर आजाद और अखिलेश यादव ने क्या कहा
जब भी बजट पेश होता है सरकार उसके कसीदे पढ़ती है तो विपक्ष खामियां निकालता है। लेकिन पक्ष -विपक्ष से इतर बजट को बहुजन समाज के नेता भी अपनी नजर से देखते हैं कि आखिर बजट में देश के बहुजन समाज के लिए क्या है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट पेश करने के बाद बसपा सुप्रीमों मायावती, आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बजट में सरकारी चालाकियों की पोल खोलकर रख दी है।
काँवड़ यात्रा में दुकानों पर नाम, कहीं उपचुनाव को लेकर सीएम योगी का दांव तो नहीं?
घनश्याम हो या इमरान अब हर किसी को अपने फलों की दुकान पर अपना नाम लिखना होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे उत्तर प्रदेश में कांवड़ मार्गों पर खाने पीने की दुकानों पर ‘नेमप्लेट’ लगाने का सख्त आदेश जारी कर दिया है। आदेश में साफ कहा गया है कि हर हाल में दुकानों पर संचालक और मालिक का नाम लिखा होना चाहिए, इसके साथ ही उसे अपनी पहचान के बारे में बताना होगा। कहा जा रहा है कि कांवड़ यात्रियों की आस्था की शुचिता बनाए रखने के लिए ये फैसला लिया गया है।
हालांकि योगी आदित्यनाथ के इस बयान के बाद सूबे में सियासत तेज हो गई है। इस बारे में जब पहली बार मुजफ्फरनगर जिले में फैसला लिया गया था, तभी समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर हमला बोलते हुए न्यायालय से इस बारे में स्वतः संज्ञान लेने की अपील की थी। अखिलेश का कहना था कि-
… और जिसका नाम गुड्डू, मुन्ना, छोटू या फत्ते है, उसके नाम से क्या पता चलेगा? माननीय न्यायालय स्वत: संज्ञान ले और ऐसे प्रशासन के पीछे के शासन तक की मंशा की जाँच करवाकर, उचित दंडात्मक कार्रवाई करे। ऐसे आदेश सामाजिक अपराध हैं, जो सौहार्द के शांतिपूर्ण वातावरण को बिगाड़ना चाहते हैं।
तो वहीं बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती ने भी न सिर्फ योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, बल्कि सीएम योगी की राजनीतिक चाल को भी बेनकाब कर दिया है। बहनजी ने एक्स पर एक बयान जारी कर कहा है कि-
यूपी व उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कावंड़ मार्ग के व्यापारियों को अपनी-अपनी दुकानों पर मालिक व स्टाफ का पूरा नाम प्रमुखता से लिखने व मांस बिक्री पर भी रोक का यह चुनावी लाभ हेतु आदेश पूर्णतः असंवैधानिक। धर्म विशेष के लोगों का इस प्रकार से आर्थिक बायकाट करने का प्रयास अति-निन्दनीय।
— Mayawati (@Mayawati) July 19, 2024
यूपी व उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कावंड़ मार्ग के व्यापारियों को अपनी-अपनी दुकानों पर मालिक व स्टॉफ का पूरा नाम प्रमुखता से लिखने व मांस बिक्री पर भी रोक का यह चुनावी लाभ हेतु आदेश पूर्णतः असंवैधानिक। धर्म विशेष के लोगों का इस प्रकार से आर्थिक बायकाट करने का प्रयास अति-निन्दनीय है। यह एक गलत परम्परा है जो सौहार्दपूर्ण वातावरण को बिगाड़ सकता है। जनहित में सरकार इसे तुरन्त वापस ले।
अपने बयान में बहनजी ने इसे चुनावी लाभ लेने के लिए उठाया गया कदम बताया है। तो क्या यही सच है? क्योंकि लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में भाजपा सिर्फ 33 सीटें जीत सकी थी, जो उसके लिए एक बड़ा झटका था। यूपी में मिली हार के कारण ही मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में अल्पमत में आ गई थी। जिससे मोदी और अमित शाह योगी से नाराज थे।
उसके बाद से ही भाजपा के भीतर सीएम योगी के खिलाफ आवाज उठने लगी है। केशव प्रसाद मौर्य ने तो जमकर मोर्चा खोल दिया है। बताया जा रहा है कि वह ऐसा दिल्ली के इशारे में पर कर रहे हैं। ऐसे में सीएम योगी उपचुनाव वाली 10 सीटों पर बेहतर प्रदर्शन कर विरोधियों को करारा जवाब देने के मूड में हैं। खबर है कि उपचुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर चुनाव लड़ेंगे। 7 सीटों पर सपा और 3 सीटों पर कांग्रेस के चुनाव लड़ने की खबर सामने आ रही है। ऐसे में अगर योगी आदित्यनाथ मैदान मार लेते हैं तो वह दिल्ली को यह मैसेज देने में कामयाब होंगे कि उनमें अखिलेश और राहुल गाँधी दोनों को रोकने की क्षमता है।
यूपी में जिन 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है उसमें से 5 सीटों पर समाजवादी पार्टी, 3 पर भाजपा और 1-1 सीट पर आरएलडी और निषाद पार्टी का कब्जा था। नियम के मुताबिक छह महीने के भीतर इस पर चुनाव कराने होंगे। हालांकि माना जा रहा है कि इस पर जल्दी ही चुनाव हो सकते हैं। ऐसे में काँवड़ यात्रा के बहाने उग्र हिन्दुत्व का चेहरा सामने रखकर योगी आदित्यनाथ सवर्णों के साथ दलितों और पिछड़ों को भी अपने पाले में लाने की तैयारी में हैं। देखना होगा कि उनका यह दांव कितना सटीक बैठता है।
अमेरिका की अंबेडकरवादी संस्था AIC मनाएगी अपना 12वां स्थापना दिवस
12 साल पहले अमेरिका में एक संस्था बनी। नाम था अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, जिसे दुनिया अब AIC के नाम से जानती है। यह संस्था 20 जुलाई 2024 को अपनी स्थापना के 12 वर्ष का जश्न मना रहा है। लेकिन इस बार का जश्न खास है। भारत से अमेरिका गए अंबेडकरवादियों ने मिलकर जब अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर बनाया तब शायद ही किसी को यह अहसास होगा कि यह संस्था एक दिन इतिहास रच देगी। इस संस्था ने महज 12 सालों में भारत के बाहर अमेरिका के वाशिंगटन डीसी के पास मैरीलैंड में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के सबसे ऊंचे स्टैच्यू को बनाकर इतिहास रच दिया।
14 अक्टूबर 2023 को जब AIC की अपनी जमीन पर बाबासाहेब की 12 फुट ऊंची आदमकद प्रतिमा स्थापित हुई थी, तब अमेरिका और कनाडा के तकरीबन दो दर्जन शहरों से 500 अंबेडकरवादी परिवार सहित पहुंचे थे। कार्यक्रम अमेरिका में हो रहा था, लेकिन उसके साक्षी दुनिया भर के अंबेडकरवादी बने। दुनिया भर की मीडिया में इसकी पुरजोर चर्चा हुई, क्योंकि इस स्टैच्यू के अपने मायने थे। इसे स्टैच्यू ऑफ इक्वालिटी का नाम दिया गया है।
दलित दस्तक के संपादक के तौर पर भारत के बाहर इस इतिहास को बनते हुए मैंने भी देखा था और लोगों के उत्साह, भावुकता और इस संस्था के जरिये अंबेडरवाद को अमेरिका में फैलाने के सपने को करीब से महसूस भी किया था।
कर्नाटक सरकार ने किया SC-ST फंड में घपला, अनुसूचित जाति आयोग ने भेजा नोटिस
लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद कांग्रेस पार्टी अपनी छवि को दुरुस्त करने में लगी है। लेकिन सब ठीक हो पाता उससे पहले ही कांग्रेस पर दाग लग गया है। जो राहुल गाँधी लोकसभा चुनाव के दौरान संविधान बचाने की दुहाई देते हुए देश भर में घूमते रहे और दलित और आदिवासी समाज का समर्थन मांगते रहे, कर्नाटक में उन्हीं की सरकार ने एससी-एसटी के लिए आवंटित फंड में हेर-फेर कर दी है।
कर्नाटक सरकार पर एससी/एसटी कल्याण योजनाओं के लिए आवंटित 39,121.46 करोड़ रुपये में से 14,730.53 करोड़ रुपये कांग्रेस की गारंटी योजनाओं के लिए उपयोग किये जाने का गंभीर आरोप लगा है। यह रकम एससी/एसटी कल्याण के लिए आवंटित कुल राशि का 37 प्रतिशत है, जो कि एक बड़ा हिस्सा है। अनुसूचित जाति आयोग ने इस मामले में कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी कर दिया है। और इसके बाद भाजपा सहित तमाम दलों ने सिद्धारमैया की सरकार पर हमला बोल दिया है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष विजय मकवाना ने 11 जुलाई को इस बारे में एक बयान जारी कर कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी करने और जवाब मांगने की बात भी कही है।
कर्नाटक सरकार द्वारा एससी/एसटी कल्याण योजनाओं के लिए आवंटित 39,121.46 करोड़ रुपये में से 14,730.53 करोड़ रुपये (37%) का कांग्रेस की गारंटी योजनाओं के लिए उपयोग किया जाना बेहद निंदनीय है।
— Chandra Shekhar Aazad (@BhimArmyChief) July 12, 2024
मुख्यमंत्री को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एससी/एसटी समुदायों के कल्याण के लिए आवंटित फंड्स… pic.twitter.com/SrJkX5aJH1
इस खबर के सामने आने के बाद कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने चुप्पी साध रखी है। तो बाकी दल, खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस पर हमलावर है। इस मुद्दे पर आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और नगीना से सांसद चंद्रशेखर ने भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिख कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। चंद्रशेखर ने चिट्ठी में लिखा है कि, मुख्यमंत्री को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एससी/एसटी समुदायों के कल्याण के लिए आवंटित फंड्स का उपयोग कानून के अनुसार केवल उनके विकास के लिए किया जाना चाहिए। फंड्स के डायवर्जन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि जो कांग्रेस पार्टी विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में देश की जनता को तमाम गारंटी देकर उनसे वोट मांग रही थी, क्या उसके शासन काल में ये गारंटी दलितों और आदिवासियों की बेहतरी के लिए आवंटित पैसे से पूरी की जाएगी? न्याय यात्रा के जरिये देश के वंचितों को न्याय दिलाने और हर जगह वंचितों की भागेदारी की बात करने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को इसका जवाब देना होगा।
हरियाणा में बसपा और इनेला मिलकर लड़ेंगे चुनाव, जानिये हर डिटेल
हरियाणा के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी और इंडियन नेशनल लोकदल मिलकर चुनाव लड़ेंगे। दोनों दलों के नेताओं ने आज 11 जुलाई को गठबंधन की घोषणा कर दी, जिस पर बसपा सुप्रीमों मायावती ने भी मुहर लगा दी है। खबर है कि गठबंधन में प्रदेश की 90 सीटों में से बीएसपी 37 सीटों पर जबकि इनेलो 53 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। अभय चौटाला गठबंधन के नेता होंगे और सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री बनेंगे। चंडीगढ़ में इनेलो नेता अभय चौटाला, बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार और नेशनल कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद की मौजूदगी में गठबंधन की घोषणा हुई।
इस पर मुहर लगाते हुए बसपा सुप्रीमों मायावती ने सोशल मीडिया X पर लिखा-
“बहुजन समाज पार्टी व इण्डियन नेशनल लोकदल मिलकर हरियाणा में होने वाले विधानसभा आमचुनाव में वहाँ की जनविरोधी पार्टियों को हराकर अपने नये गठबंधन की सरकार बनाने के संकल्प के साथ लड़ेंगे, जिसकी घोषणा मेरे पूरे आशीर्वाद के साथ आज चंडीगढ़ में संयुक्त प्रेसवार्ता में की गयी।
हरियाणा में सर्वसमाज-हितैषी जनकल्याणकारी सरकार बनाने के संकल्प के कारण इस गठबंधन में एक-दूसरे को पूरा आदर-सम्मान देकर सीटों आदि के बंटवारे में पूरी एकता व सहमति बन गई है। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह आपसी एकजुटता जन आशीर्वाद से विरोधियों को हरा कर नई सरकार बनाएगी।“
बता दें कि 6 जुलाई को दिल्ली में अभय सिंह चौटाला ने बसपा सुप्रीमों मायावती से मुलाकात की थी। इस दौरान बहनजी और अभय चौटाला के बीच गठबंधन को लेकर लंबी बातचीत हुई थी। जिसके बाद आज गठबंधन का आधिकारिक ऐलान कर दिया गया। चंडीगढ़ में गठबंधन की घोषणा के बाद आकाश आनंद ने कहा कि चुनाव में जीत हासिल होने पर अभय चौटाला जी मुख्यमंत्री होंगे। वहीं दूसरी ओर अभय चौटाला में इस दौरान मुफ्त बिजली और पानी का वादा किया। उन्होंने कहा कि हम ऐसे मीटर लगाएंगे कि बिजली बिल 500 रुपये से कम होगा।
उच्च शिक्षा में भेदभाव को लेकर हंगामा, बहुजनों का सरकार पर गंभीर आरोप
उच्च शिक्षा में भेदभाव को लेकर अक्सर खबरें सामने आती रहती हैं। इसमें दिल्ली और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों के साथ-साथ IIT और IIM जैसे संस्थानों का भी जिक्र होता है। यहां की फैकल्टी में एससी/एसटी की गैरमौजूदगी को लेकर भी सवाल उठते हैं। हाल ही में आईआईटी मद्रास में वंचित समाज के प्रतिनिधित्व को लेकर एक आंकड़ा सामने आया है, जिसके बाद अंबेडकरी आंदोलन के लोग तमाम सवाल उठा रहे हैं।
दरअसल IIT मद्रास को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, उसके मुताबिक वंचित समाज से सिर्फ 9 फैकल्टी हैं, जबकि अगड़ी जातियों के 43 फैकल्टी मेंबर हैं। यानी कि आईआईटी मद्रास में देश की 85 फीसदी आबादी के सिर्फ 9 शिक्षक ही फैकल्टी के रूप में पढ़ा रहे हैं, जबकि 15 फीसदी आबादी वाले अगड़े समाज के 43 फैकल्टी मेंबर हैं। वंचित समाज के वर्गों के अलग-अलग हिस्सेदारी की बात करें तो 9 फैक्ल्टी में एससी समाज के 3, एसटी समाज का एक और ओबीसी समाज के 5 फैकल्टी मेंबर हैं। यह आंकड़ा सूचना के अधिकार के तहत सामने आया है।
इसी तरह दिल्ली विवि में बहुजन समाज के पूर्व एवं वर्तमान शिक्षकों ने एक आईआईएम को लेकर एक आंकड़ा साझा किया है। इसमें देश के चार आईआईएम में भी फैकल्टी का आंकड़ा सामने आया है। इसमें अहमदाबाद में 104, कोलकाता में 86, इंदौर में 104 और शिलांग में 20 मेंबर हैं। इन सभी चारों जगहों पर दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के एक भी सदस्य नहीं हैं। यानी सारे के सारे पदों पर सवर्णों का कब्जा है।
इस आंकड़े के सामने आने के बाद तमाम लोग इसके लिए भाजपा के 10 साल के शासनकाल को जिम्मेदार ठहरा हैं तो भाजपा समर्थक इसके लिए कांग्रेस को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो, चाहे भाजपा की या फिर जनता दल सहित अन्य गठबंधनों की, उच्च शिक्षा में हमेशा से अगड़ी जातियों का दबदबा रहा है। ऐसा लगातार देखने में आता है कि अगड़ी जातियों के लिए मौजूद पदों पर भर्तियां हो जाती है, जबकि एससी, एसटी और ओबीसी के लिए मौजूद पदों को नॉट फाउंड सुटेबल यानी कि उपर्युक्त उम्मीदवार मौजूद नहीं है कह कर खाली छोड़ दिया जाता है। इस तरह अगड़ी जातियों का दखल उच्च शिक्षा में लगातार बढ़ता गया जबकि दलित, पिछड़े और आदिवासी समाज के युवा हाशिये पर रहे।
भाजपा पर भड़के भाजपा के कद्दावर दलित सांसद, कह दिया दलित विरोधी
भारतीय जनता पार्टी के एक दलित सांसद के बयान से केंद्र सरकार बैकफुट पर है और पीएम मोदी मुश्किल में। कर्नाटक के विजयपुरा सीट से सांसद रमेश जिगाजिनागी ने आरोप लगाया है कि भाजपा एक दलित विरोधी पार्टी है और यहां दलितो को दरकिनार कर दिया जाता है। रमेश जिगाजिनागी सात बार सांसद रहे हैं और इस बार वह विजयपुरा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे हैं।
दरअसल रमेश जिगाजिनागी का आरोप है कि ज्यादातर केंद्रीय मंत्री ऊंची जातियों से हैं और दलितों को दरकिनार किया गया है। उन्होंने भाजपा में शामिल होने को लेकर भी अफसोस जताया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा कि कई लोगों ने मुझे बीजेपी में ना जाने की सलाह दी थी, क्योंकि यह पार्टी ‘दलित विरोधी’ है।
सांसद का तर्क है कि दक्षिण भारत में सात बार चुनाव जीतने वाले वो अकेले दलित समाज के नेता हैं। मुझे मंत्री पद की मांग करने की कोई जरूरत नहीं है। दरअसल 72 साल के रमेश जिगाजिनागी पहली बार 1998 में लोकसभा चुनाव जीते थे। तब से लेकर अब तक वह लगातार जीतते आए हैं। वह दो बार मंत्री भी रह चुके हैं। यानी कि प्रदेश में वह एक कद्दावर दलित चेहरा हैं। बावजूद इसके उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई, जिसको लेकर उन्होंने खुलकर नाराजगी जाहिर कर दी है।
बता दें कि कर्नाटक में कुल 28 सीटें हैं और बीजेपी ने इस बार आधे से ज्यादा 17 सीटों पर जीत हासिल की है। जबकि एनडीए की सहयोगी जेडीएस ने दो और कांग्रेस पार्टी ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की। कर्नाटक से मोदी मंत्रिमंडल में चार लोगों को जगह दी गई है। इसमें प्रह्लाद जोशी, शोभा करांदलाजे, वी सोमन्ना और जेडीएस के एचडी कुमारस्वामी का नाम शामिल है। मोदी मंत्रिमंडल में विभिन्न समाजों के प्रतिनिधित्व की बात करें तो इस बार मंत्रिमंडल में 29 ओबीसी, 28 जनरल, 10 एससी और 5 एसटी शामिल हैं। ऐसे में जब कर्नाटक से चार लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, रमेश जिगाजानागी का दर्द जायज लगता है।
के. आर्मस्ट्रांग को श्रद्धांजलि देने के बाद बहनजी ने स्टॉलिन सरकार के खिलाफ खोला मोर्चा
तमिलनाडु बसपा के स्टेट प्रेसिडेंट के. आर्मस्ट्रांग की हत्या के बाद बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने जैसे ही तामिलनाडु जाने का ऐलान किया, राजनीतिक हड़कंप मच गया। और फिर जब रविवार 7 जुलाई को वह चेन्नई पहुंची तो स्टॉलिन सरकार के हाथ-पांव फूल गए। बहनजी ने अपनी पार्टी के नेता को श्रद्धांजलि देने के बाद राज्य सरकार से सीबीआई जांच की मांग कर डाली। स्टॉलीन सरकार पर हमला बोलते हुए उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था पर निशाना साधा। उन्होंने सरकार को घेरते हुए कहा कि- “मुझे ये भी मालूम हुआ कि जिन्होंने हत्या की है, वो अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गए हैं। केवल खाना पूर्ति के लिए कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं। हम राज्य सरकार से सीबीआई जांच की मांग करते हैं ताकि असली अपराधी पकड़े जा सकें।”
बसपा सुप्रीमों ने तमिलनाडु सरकार पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि “यह किसी एक दलित नेता की हत्या का मामला नहीं है, बल्कि पूरा दलित समुदाय खतरे में है और कई दलित नेता डरे हुए हैं कि उनकी जान सुरक्षित नहीं है। राज्य सरकार इस हत्या को लेकर गंभीर नहीं है अन्यथा मुख्य दोषी सलाखों के पीछे होते। अगर राज्य सरकार ये मामला सीबीआई को नहीं सौंपती है तो इसका मतलब है कि इसमें उसकी भी मिलीभगत है।”
इस दौरान बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर और मायावती के उत्तराधिकारी आकाश आनंद भी चेन्नई में मौजूद रहें और के. आर्मस्ट्रांग को श्रद्धांजलि दी। दरअसल 5 जुलाई को बसपा के तमिलनाडु प्रदेश अध्यक्ष के. आर्मस्ट्रांग की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या तब की गई, जब वो अपने आवास के बाहर अपने समर्थकों से मिल रहे थे। तभी से बहुजन समाज में रोष है। आर्मस्ट्रांग पेशे से वकील थे और अंबेडकरवादी विचारधारा से जुड़े थे। साल 2006 में निकाय चुनाव में निर्दलीय पार्षद बनने के बाद वह बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे। माना जाता है कि वह बसपा सुप्रीमो मायावती के भी काफी करीब थे। यही वजह रही कि बहनजी अपने वफादार पार्टी कार्यकर्ता को श्रद्धांजलि देने चेन्नई पहुंची।
ऐसे वक्त में जब लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी है और उसके वोट शेयर 3 प्रतिशत से भी कम हो गए हैं, बहनजी का कार्यकर्ताओं के दुख में शामिल होना, पार्टी में नई ऊर्जा भर सकता है।


Dr. Sahib Singh, a prominent dramatist from Punjab is on a tour playing his plays in different cities across Canada. Locally, Chetna Association of Canada and Dynamic Creative Horizons, partnered and together arranged with Singh to perform his play, “Sandookadi Kholh Narainia” at a theatre in White Rock on July 20 and 21.
लगता है सरकार और NCERT भारतीय इतिहास से हड़प्पा सभ्यता, जाति के सवाल, डॉ. आबंडकर के साथ हुए जातीय भेदभाव, सम्राट अशोक, सांची स्तूप, अजंता की गुफाओं आदि को मिटा देना चाहती है। और उसकी जगह अपना एजेंडा थोपना चाहती है। NCERT ने छठवीं क्लास के लिए सामाजिक विज्ञान की जो किताब छापी है, उसे देख कर तो यही लगता है। इस किताब में कई बदलाव किए गए हैं, जो सरकार और NCERT की मंशा पर सवाल उठाने वाले हैं।