रिक्शा चालक के बेटे ने एथलेटिक्स में बनाया ऑल इंडिया रिकॉर्ड

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नई दिल्ली। कहते हैं अगर इंसान जिंदगी में कुछ पाने की ठान ले तो वो किसी भी परिस्थितियों में कठिन से कठिन रास्ते को भी पार कर लेता है. उसकी हिम्मत और मेहनत उसका नसीब बदल देती है. ऐसा ही कारनामा दिल्ली की मलीन बस्ती में रहने वाले निसार अहमद ने कर दिखाया.

आजादपुर रेलवे स्टेशन के पास स्थित बड़ा बाग की झुग्गियों में रहने वाले निसार ने दिल्ली स्टेट एथलेटिक्स प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता है. निसार ने 100 और 200 मीटर की स्प्रिंट प्रतियोगिता में ये मेडल हासिल किया है. इससे भी खास बात यह है कि उन्होंने नेशनल लेवल के अंडर-16 खिलाड़ियों के रिकॉर्ड तोड़े हैं.

100 मीटर की रेस उन्होंने सिर्फ 11 सेकंड में पूरी की, पुराना रिकॉर्ड 11.02 सेकंड का था. 200 मीटर की रेस में भी उनकी फुर्ती काबिल-ए-तारीफ रही, महज 22.08 सेकंड में उन्होंने रिकॉर्ड अपने नाम किया है, जोकि पिछले रिकॉर्ड से 0.3 सेकंड कम है.

निसार अहमद के पिता ननकू अहमद रिक्शा चलाते है और मां घरों में साफ-सफाई का काम करती हैं. प्रतियोगिता जीतने के बाद जब निसार पदक लेने के लिए जा रहे थे उस समय उनके पिता रिक्शा चलाने में और मां घर में काम करने में व्यस्त थीं.

16 साल के निसार आजादपुर के बड़ा बाग के पास रेलवे ट्रैक की बस्ती के दस बाई दस के कमरे में रहते हैं. इसी कमरे में उनके मां-पिता और बहन रहती हैं. घर के एक कोने में निसार की ट्रोफी और मेडल उनकी तस्वीर के साथ सजे हैं.

निसार अहमद की दौड़ का सफर चार साल पहले शुरू हुआ. अशोक विहार- 2 के गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सेकंडरी स्कूल में पढ़ने वाले निसार कहते हैं, ‘स्कूल में मेरे टैलंट को मेरे फिजिकल एजुकेशन टीचर सुरेंद्र कुमार ने पहचाना. उन्होंने मुझे काफी प्रेरित किया, यहां तक दूध पीने के लिए पैसे तक दिए.’

वो आगे बताते है, ‘तीन साल पहले उनकी मुलाकात कोच सुनीता राय से हुई. फिर छत्रसाल स्टेडियम में ट्रेनिंग की शुरुआत हुई. यहां से मेरी स्ट्रेंथ और बढ़ी, मैं रोज 6-6 घंटे एक्सरसाइज और प्रैक्टिस करता हूं.’

निसार ने 2014-15 में नेशनल लेवल पर खेला और सेमी फाइनल तक पहुंचे. इंटर जोनल लेवल पर कई रिकॉर्ड इनके नाम दर्ज है. 2016 में स्कूल लेवल पर नेशनल गेम्स-कालीकट में दो गोल्ड और दो ब्रॉन्ज जीते.

इसी साल दिल्ली स्टेट ऐथलिटिक मीट में 100 मीटर में गोल्ड और 400 मीटर में सिल्वर मेडल उनके नाम रहा. पिछले तीन साल में हर बार उन्हें बेस्ट ऐथलीट का खिताब मिला है.

निसार कई बार अपने घर के हालात के बीच हताश हो जाते हैं मगर उनकी कोच सुनीता राय उन्हें रुकने नहीं देतीं. वह कहती हैं, ‘हम उसे अकेला नहीं छोड़ सकते. वह जूनियर नेशनल गेम्स में चुना जा चुका है, मुझे यकीन है कि वो इंटरनेशनल लेवल पर कॉमनवेल्थ, ओलिंपिक्स के लिए जा सकता है.’

स्वादिष्ट भोजन में कंकड़ की तरह है कर्नाटक का हिंदी विरोध!

छात्र जीवन में अनायास ही एक बार दक्षिण भारत की यात्रा का संयोग बन गया. तब तामिलनाडु में हिंदी विरोध की बड़ी चर्चा होती थी. हमारी यात्रा ओडिशा के रास्ते आंध्र प्रदेश से शुरू हुई और तामिलनाडु तक जारी रही. इस बीच केरल का एक हल्का चक्कर भी लग गया. केरल की बात करें तो हम बस राजधानी त्रिवेन्द्रम तक ही जा सके थे. यह मेरे जीवन की अब तक कि पहली और आखिरी दक्षिण भारत यात्रा है.

80 के दशक में की गई इस यात्रा के बाद फिर कभी वहां जाने का संयोग नहीं बन सका. हालांकि मुझे दुख है कि करीब एक पखवाड़े की इस यात्रा में कर्नाटक जाने का सौभाग्य नहीं मिल सका. दक्षिण की यात्रा के दौरान मैंने महसूस किया कि तामिलनाडु समेत दक्षिण के राज्यों में बेशक लोगों में हिंदी के प्रति समझ कम है. वे अचानक किसी को हिंदी बोलता देख चौंक उठते हैं. लेकिन विरोध का स्तर दुर्भावना से अधिक राजनीतिक है.

तामिलनाडु समेत दक्षिण के सभी राज्यों में तब भी वह वर्ग जिसका ताल्लुक पर्यटकों से होता था, धड़ल्ले से टूटी–फुटी ही सही लेकिन हिंदी बोलता था. उन्हें यह बताने की भी जरूरत नहीं होती थी कि हम हिंदी भाषी है. बहरहाल समय के साथ समूचे देश में हिंदी की व्यापकता व स्वीकार्यता बढ़ती ही गई. अंतरराष्ट्रीय शक्तियों व बाजार की ताकतों ने भी हिंदी की व्यापकता को स्वीकार किया और इसका लाभ उठाना शुरू किया. लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद कर्नाटक में अचानक शुरू हुआ हिंदी विरोध समझ से परे हैं. वह भी उस पार्टी द्वारा जिसका स्वरूप राष्ट्रीय है.

आज तक कभी कर्नाटक जाने का मौका नहीं मिलने से दावे के साथ तो कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूं. लेकिन मुझे लगता है कि इस विरोध को वहां के बहुसंख्य वर्ग का समर्थन हासिल नहीं है. यह विरोध सामाजिक कम और राजनीतिक ज्यादा है. क्योंकि मुझे याद है कि तकरीबन पांच साल पहले एक बार बेंगलुरू में उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ कुछ अप्रिय घटना हो गई थी. इसी दौरान मुंबई समेत महाराष्ट्र के कुछ शहरों में भी परप्रांतीय का मुद्दा जोर पकड़ रहा था. जिसके चलते हजारों की संख्या में इन प्रदेशों के लोग ट्रेनों में भर–भर कर अपने घरों को लौटने लगे. लेकिन कुछ दिनों बाद आखिरकार अंधेरा मिटा और उन राज्यों के लोग फिर बेंगलुरू समेत उन राज्यों को लौटने लगे, जो उनकी कर्मभूमि है.

मुझे याद है तब अखबारों में एक आला पुलिस अधिकारी हाथ जोड़े उत्तर-पूर्व से वापस बेंगलुरू पहुंचे लोगों का स्वागत करते हुए खबर और फोटो प्रमुखता से अखबारों में छपी थी. यह तस्वीर देख मेरा मन गर्व से भर उठा था. मुझे लगा कि देश के हर राज्य को ऐसा ही होना चाहिए. जो धरतीपुत्रों की तरह उन संतानों को भी अपना माने जो कर्मभूमि के लिहाज से उस जगह पर रहते हैं. आज तक मैंने कर्नाटक में हिंदी विरोध या दुर्भावना की बात कभी नहीं सुनी थी. लेकिन एक ऐसे दौर में जब भाषाई संकीर्णता लगभग समाप्ति की ओर है, कर्नाटक में नए सिरे से उपजा हिंदी विरोध आखिर क्यों स्वादिष्ट भोजन की थाली में कंकड़ की तरह चुभ रहा है, यह सवाल मुझे परेशान कर रहा है.

आज के दौर में मैंने अनेक ठेठ हिंदी भाषियों को मोबाइल या लैपटॉप पर हिंदी में डब की गई दक्षिण भारतीय फिल्में घंटों चाव से निहारते देखा है. अक्सर रेल यात्रा के दौरान मुझे ऐसे अनुभव हुए हैं. बल्कि कई तो इसके नशेड़ी बन चुके हैं. और अहिंदीभाषियों की हिंदी फिल्मों के प्रति दीवानगी का तो कहना ही क्या. मुझे अपने आस–पास ज्यादातर ऐसे लोग ही मिलते हैं जिनके मोबाइल के कॉलर या रिंगटोन में उस भाषा के गाने सुनने को मिलते हैं जो उनकी अपनी मातृभाषा नहीं है.

मैं जिस शहर में रहता हूं वहां की खासियत यह है कि यहां विभिन्न भाषा के लोग सालों से एक साथ रहते आ रहे हैं. यहां किसी न किसी बहाने सार्वजनिक पूजा का आयोजन भी होता रहता है. प्रतिमा विसर्जन परंपरागत तरीके से होता है, जिसमें युवक अमूमन उन गानों पर नाचते–थिरकते हैं, जिसे बोलने वाले शहर में गिने–चुने लोग ही है. शायद उस भाषा का भावार्थ भी नाचने वाले लड़के नहीं समझते. लेकिन उन्हें इस गाने का धुन अच्छा लगता है तो वे बार–बार यही गाना बजाने की मांग करते हैं, जिससे वे अच्छे से नाच सके. एक ऐसे आदर्श दौर में किसी भी भाषा के प्रति विरोध या दुर्भावना सचमुच गले नहीं उतरती. लेकिन देश की राजनीति की शायद यही विडंबना है कि वह कुछ भी करने-कराने में सक्षम है.

जातिवादियों ने दलित महिला को निर्वस्त्र कर पीटा

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सीकर। देश में ऐसा कोई भी राज्य नहीं हैं जहां दलितों के साथ भेदभाव न होता है. आए दिन भारत किसी न किसी राज्य में दलितों के साथ जातिगत आधार पर भेदभाव और मारपीट की घटना सामने आती है. भारतीय संविधान ने जो ताकत दलितों को दी सवर्णों ने उसे भी छीन लिया और अपना वर्चस्व स्थापित करने में लगे रहते हैं.

राजस्थान के सीकर से भी एक ऐसा ही मामला सामने आया है. सीकर के दांतारामगढ़ थाना क्षेत्र के दुल्हेपुरा गांव में दलित महिला के साथ मारपीट का मामला सामने आया है. एक छोटी सी बात को लेकर आरोपी ने महिला के कपड़े फाड़ दिए और भरे बाजार में निर्वस्त्र कर लाठियों से पीटा. गनीमत रही कि आसपास के लोगों ने उसे बचा लिया. जिससे महिला को ज्यादा गंभीर चोट नहीं आई. अब पीड़ित महिला ने पुलिस को मामले की जानकारी दी है. पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कर पूरी घटना की जांच शुरू कर दी है.

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महिला के बच्चे एक खेत से होकर गुजर रही पगडंडी से जा रहे थे. इन बच्चों का वहां से गुजरना खेत मालिक मंगलचंद जाट को नागवार लगा. इससे नाराज जातिवादी मानसिकता वाले मंगलचंद ने बच्चों की मां के साथ मारपीट की.

पुलिस ने कहा कि दुल्हेपुरा गांव की एक महिला ने मंगलचंद जाट नामक व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाते हुए मामला दर्ज करवाया है. घटना के अनुसार बीते दिन महिला का बेटा व बेटी मंगलचंद के खेत के पास से पगडंडी से होकर जा रहे थे. महिला का आरोप है कि मंगलचंद जाट व उसकी भाभी पप्पूड़ी ने दोनों बच्चों को पकड़कर पिटाई शुरू कर दी. महिला बच्चों को छुड़ाने गई तो देवर-भाभी उसको भी पीटने लगे.

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आरोपियों ने उसके कपड़े फाड़ दिए व जाति सूचक गालियां भी दी. इसके बाद आरोपी उसे पीटते हुए घसीटकर बाजार में ले गए वहां पूरी तरह से निर्वस्त्र कर हाथ, पैर व जांघों पर लाठियों से बुरी तरह से पीटा. शोर-शराबा सुनकर आसपास के लोगों ने छुड़वाया. थानाप्रभारी सुरेन्द्र सैनी ने बताया कि मामला दर्ज कर लिया गया है. मामले की जांच एसटी सेल के पुलिस उपाधीक्षक कर रहे हैं.

गोरक्षकों पर सख्त हुआ सुप्रीम कोर्ट, हर राज्य में तैनात होंगे नोडल अधिकारी

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नई दिल्ली। गोरक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्यों को नया निर्देश जारी किया. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को हर जिले में नोडल अधिकारी तैनात करने के निर्देश दिए जो इस तरह की हिंसा की घटनाओं को रोकने और इसे अंजाम देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कदम उठाएं.

कोर्ट ने राज्यों को एक सप्ताह में अपना टास्क फोर्स बनाने के लिए कहा है, जिसमें वरिष्ठ पुलिसकर्मियों को नोडल अधिकारी के रूप में रखा जाएगा. कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिवों से कहा कि वे गोरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा को काबू में करने के लिए उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करें.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा कि गोरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए कदम उठाने का निर्देश राज्यों को देने की उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है या नहीं?

गोरक्षा के नाम पर बने संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर दायर की गई जनहित याचिका पर 7 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और छह राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. याचिकाकर्ता तहसीन पूनावाला ने राजस्थान के अलवर इलाके में हुई एक घटना का हवाला देते हुए गोरक्षा के नाम पर दलितों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा को रोकने की मांग की थी.

21 जुलाई को हुई अंतिम सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को किसी भी तरह की हिंसा की रक्षा नहीं करने के लिए कहा था और साथ ही गाय सुरक्षा की आड़ में हिंसक घटनाओं पर प्रतिक्रिया मांगी थी.

पहले ही दिन खराब हो गई लखनऊ की मेट्रो, 2 घंटे फंसे यात्री

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लखनऊ। बड़े जोर शोर से शुरू की गई लखनऊ मेट्रो में पहले ही दिन खराबी आ गई. मंगलवार को इसका उद्घाटन हुआ था और बुधवार से ये आम लोगों के लिए शुरू हो गई थी. लेकिन मेट्रो की पहले ही दिन की यात्रा अच्छी नहीं रही.

यह करीब एक घंटे तक आलमबाग स्टेशन पर खड़ी रही और बाद में इसे ले जाने के लिए दूसरी मेट्रो बुलानी पड़ी. इस दौरान मेट्रो में फंसे यात्रियों को सीढ़ी की मदद से उतारा गया. करीब एक घंटे तक मेट्रो में फंसे रहने के बाद ये लोग जब बाहर आए तो उनके चेहरे पर डर साफ दिख रहा था.

हालांकि दो घंटे की मशक्कत के बाद समस्या का समाधान कर लिया गया. मेट्रो फिर लखनऊ की पटरियों पर दौड़ पड़ी. मंगलवार सुबह छह बजे के आसपास आम लोगों के लिए यह मेट्रो ट्रांसपोर्ट नगर से चली. इसमें LMRC के एमडी सहित बड़े अधिकारी और मीडिया के कई लोग सफर कर रहे थे. टीपी नगर से यह चारबाग स्टेशन पहुंची और इसके बाद आलमबाग पहुंची. वहीं जाकर यह मेट्रो खराब हो गई. करीब एक घंटे तक वह वहां खड़ी रही.

एक दिन पहले मंगलवार को ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और राज्यपाल राम नाइक की उपस्थिति में मेट्रो की शुरुआत की गई. उद्घाटन के दौरान सीएम योगी ने कहा कि समय पर योजना का पूरा होना काफी बड़ी बात है. मेट्रो की शुरुआत सीमित समय पर पूरा करने पर श्रीधरनजी और उनकी पूरी टीम को बधाई. उन्होंने कहा कि लोगों को इसमें सफर करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा, बुधवार से ही लोगों को इसका लाभ मिलेगा.

योगी ने कहा कि हमारी सरकार प्रदेश के कई शहरों में मेट्रो चलवाने की योजना पर काम कर रही है. अब अलग-अलग मेट्रो कॉर्पोरेशन के तहत काम ना होकर बल्कि राज्य में एक ही यूपी मेट्रो कॉर्पोरेशन की शुरुआत करेंगे. मैं चाहूंगा कि श्रीधरनजी उस कॉर्पोरेशन के प्रधान सलाहकार बनें.

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस मेट्रो रेल को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट में रखते थे. यही वजह है कि मेट्रो के शिलान्यास से लेकर मेट्रो के बनने तक के हर सफर में वह साथ रहे, लेकिन चुनाव हार गए तो इसका उद्घाटन नहीं कर सके.

गौरी लंकेश जैसे लोगों के लिए कौन उठाएगा आवाज

“तुम उनसे असहमत हो और उनकी आलोचना करने का ‘दुस्साहस’ भी करते हो तो पहले वे तुम पर तमाम तोहमत लगायेंगे. इसके बाद भी तुम ख़ामोश नहीं हुए तो वे तुम्हें कोर्ट-कचहरी में उलझायेंगे और इसके बाद भी तुम नहीं झुके तो वे वही करेंगे, जो उन्होंने प्रो. कलबुरगी, दाभोलकर, पनसारे और गौरी लंकेश को रास्ते से हटाने के लिए किया.”

फेसबुक पर यह टिप्पणी वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने लिखी है. जाहिर है पत्रकार और देश का सजग नागरिक होने के कारण इस घटना ने उन्हें व्यथित किया है.

पांच सितंबर को बेंगलुरु में चर्चित और धाकड़ पत्रकार गौरी लंकेश को उनके घर के दरवाजे पर गोली मारकर हत्या कर दी गई. गौरी सांप्रदायिकता और फासीवाद की विचारधारा के खिलाफ लिखने-बोलने वाली एक प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और सजग पत्रकार थीं. वह “लंकेश पत्रिके” नाम से साप्ताहिक पत्र निकालती थीं. इस पत्रिका की नींव गौरी के पिता ने रखी थी और उनके गुजरने के बाद इसे गौरी संभाल रही थीं.

इस हत्या ने पत्रकारिता जगत में खलबली मचा दी है. तमाम बड़े पत्रकारों ने इसकी निंदा की है.

बरखा दत्त ने लिखा है- भारत में हम राम रहीम जैसे फ्राड लोगों को प्रणाम करते हैं और पनसारे, दाभोलकर, कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे तर्क और सवाल करने वाले लोगों को मार देते हैं.

तो राजदीप सरदेसाई ने हत्यारों को कायर और डरपोक कहा है. मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने सवाल उठाया है कि “दाभोलकर, पनसारे, कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश जैसे एक तरह के लोग मारे जा रहे हैं. किस तरह के लोग इन्हें मार रहे हैं?” हद तो यह है कि कुछ लोगों ने लंकेश की हत्या को जायज ठहराया है. इसमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिसे देश के प्रधानमंत्री तक फॉलो करते हैं. जरा इनके भीतर भरे जहर को यहां पढ़िए.

ऐसे लोगों की खबर वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने ली है. पहले ऐसी घटनाओं पर जहर उगलने वालों को आगाह करने के बाद विनोद दुआ ने लिखा है कि “ बिना आपका बायो देखे, मैं समझ गया था कि आपको हमारे प्रधानमंत्री जरूर फॉलो करते होंगे.”

इस घटना पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के ही उपर लिखे कमेंट का आधा हिस्सा भारत के लोगों से सवाल कर रहा है. उर्मिलेश लिखते हैं, एक समय जर्मनी, इटली सहित दुनिया के अनेक मुल्कों में यह आफत आई. पर लोगों ने उसके खिलाफ लड़ाई लड़ी. और अंततः जीती. भारत को भी लड़ना होगा. और कोई विकल्प नहीं!

सवाल उठता है कि भारत में पनसारे, कलबुर्गी, दाभोलकर गौरी लंकेश और इन जैसे आवाज उठाने वाले तमाम लोगों के लिए देश कब आवाज उठाएगा.

गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय हिन्दी में by रवीश कुमार

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गौरी लंकेश नाम है पत्रिका का. 16 पन्नों की यह पत्रिका हर हफ्ते निकलती है. 15 रुपये कीमत होती है. 13 सितंबर का अंक गौरी लंकेश के लिए आख़िरी साबित हुआ. हमने अपने मित्र की मदद से उनके आख़िरी संपादकीय का हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि आपको पता चल सके कि कन्नडा में लिखने वाली इस पत्रकार की लिखावट कैसी थी, उसकी धार कैसी थी. हर अंक में गौरी ‘कंडा हागे’ नाम से कालम लिखती थीं. कंडा हागे का मतलब होता है जैसा मैने देखा. उनका संपादकीय पत्रिका के तीसरे पन्ने पर छपता था. इस बार का संपादकीय फेक न्यूज़ पर था और उसका टाइटल था- फेक न्यूज़ के ज़माने में.

इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है. झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं. झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी. अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी. उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया. फैलाने वाले संघ के लोग थे. ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं. पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं. संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया. ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है. ये सब झूठ है.

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर. यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है. इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है. 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई. कर्नाटक में तालिबान सरकार. इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई. संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए. जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया. सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया. अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया.

पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल होने लगी. इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा. इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए. इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई. यह तस्वीर फोटोशाप थी. असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया. शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी.

एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था. अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है. पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं.

उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ. ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था. ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है. पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया. ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे). ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं. उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी. अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं. तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है.

आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है. मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है. उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं. उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है. वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया. उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं. बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं. संघ का ही काम करते हैं. जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया. जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए. इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे.

आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं. ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं. प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं. होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है. साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं. मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है. इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं. इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं. इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना.

कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई. उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया. कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है. बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है. संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना. जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था. लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है.

हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए. एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी. दूसरे फोटो में एक महिला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है. बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया. पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे. दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी. सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं. उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे. फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है. अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है. प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी. पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है. पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है.

इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है. यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई. बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था. मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे. लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया. ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया.

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की. लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं. मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली. भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी. इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है. उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली.

छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया. अपनी सरकार की कामयाबी बताई. उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले. बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है.

ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं. कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है. उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी. दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की. किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया. इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया. जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलीट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी. सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया.

जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया. पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी. थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है. नकली है. मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी. यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया. इस गलती के पीछे सांप्रदायिक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी. फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था. फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम . मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो.

रवीश कुमार के ब्लॉग ‘कस्बा’ से साभार

ब्राह्मणवाद-जातिवाद का मुखरता से विरोध करती थी लंकेश

आज ही सुबह ही कंवल भारती जी की एक फेसबुक पोस्ट से चिंतित हो उठा था. आरएसएस के कुछ लोग उनके घर आए थे और उन्हें लगा था कि क्या मौत ने उनका घर देख लिया है?

शाम में गौरी लंकेश की हत्या की सूचना आयी. मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से परिचित नहीं था, लेकिन लिखने-पढ़ने की दुनिया मे हम एक-दूसरे को प्रायः बिना मिले भी जानते हैं.

अभी कल ही ईमेल से योगेश मास्टर से बात हुई थी. गत मार्च में आरएसएस के लोगों ने योगेश के चेहरे पर कालिख मल दी थी. जिस कार्यक्रम के दौरान यह घटना हुई, वह साप्ताहिक ‘लंकेश पत्रिके’ का था. आयोजक गौरी लंकेश थीं. उस दिन लंकेश ने अन्य लेखकों के साथ मिलकर योगेश के पक्ष में मार्च निकाला और आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग की थीं. मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या का भी तुरंत बयान आया कि आरोपी बख्शे नहीं जाएंगे, लेकिन जैसा कि लेखकों के मामले में होता है, कोई करवाई नहीं हुई. लंकेश खुद भी कई बार कह चुकीं थीं ‘वे’ उन्हें चुप करवा देना चाहते हैं.

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योगेश मास्टर कर्नाटक के चर्चित लेखक हैं. 2013 में उनके उपन्यास ‘ढूंढी’ को लेकर श्रीराम सेना के नेता प्रमोद मुतालिक और उसके सहयोगियों ने हंगामा मचा दिया था. उस मुकदमे में योगेश को गिरफ्तार कर लिया गया था. मुतालिक ने उन पर हिन्दू देवता गणेश का अपमान करने का आरोप लगाया था. पिछले तीन सालों से वे महिषासुर पर एक उपन्यास लिख रहे हैं, जो अब लगभग पूरा हो चुका है.

गौरी प्रसिद्ध लोहियावादी कवि, लेखक, पत्रकार पी.लंकेश की पुत्री थीं. पी. लंकेश को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था. उन्होंने ही ‘लंकेश पत्रिके’ की स्थापना की थी. कन्नड़ का यह टैबलायड ब्राह्मणवाद-जातिवाद विरोधी विचारों का सबसे मुखर मंच रहा है. पिता के मृत्योपरांत गौरी लंकेश इसका संपादन-प्रकाशन करतीं थीं. पिता की वैचारिक विरासत के अतिरिक्त लिंगायत समुदाय की ब्राह्मणवाद विरोधी समृद्ध सांस्कृतिक-सामाजिक विरासत भी उन्हें मिली थी. उनके नाम के साथ लगा ‘लंकेश’ भी ध्यातव्य है.

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पिछले साल उन्होंने बैंगलोर मिरर में ‘रिकलेमिंग महिषासुर’ शीर्षक से एक जोरदार रिपोर्ट लिखी थी. वे कर्नाटक के अतिरिक्त उत्तर भारत मे चल रहे बहुजनों के सांस्कृतिक आंदोलनों की समर्थक थीं.

क्या यह महज संयोग है कि 2015 में मारे गए एम. एम. कलबुर्गी भी लिंगायत परिवार से आते थे और जितने मुखर विरोधी ब्राह्मणवाद और मूर्तिपूजा के थे, उतने ही वंचित तबकों में सांस्कृतिक जागरण लाने वाले आंदोलनों के समर्थक भी.

पिछले साल मैसूर के मित्र दलित आलोचक प्रोफेसर महेश चंद्र गुरु पर भी मुकदमा हुआ, जान से मारने की धमकियां दी गयीं और गिरफ्तार भी किया गया. उनपर आरोप था कि उन्होंने एक भाषण में राम का अपमान किया. प्रोफेसर गुरु कर्नाटक में महिषासुर आंदोलन करते रहे हैं और पिछले तीन-चार सालों से मैसूर में अन्य लेखक साथियों के साथ महिषा-दशहरा मानते हैं. पता नहीं, मौत ने हममें से किस-किस का घर देख लिया है! बहरहाल, वह कितनों को मारेगी?

यह लेख प्रमोद रंजन ने लिखा है.

गौरी लंकेश को एक कवि की श्रद्धांजलि

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बैंगलूरु की निडर पत्रकार गौरी लंकेश की ह्त्या कर दी गयी है. उन्हें अपने ही घर के बाहर गोलियों से भून दिया गया. उन्हें हिंदुत्ववादी संगठनों की ओर से ह्त्या की धमकियां पहले से ही मिल रही थीं. इस निर्मम ह्त्या की भर्त्सना कीजिये. एक श्रद्धांजलि  ‘वे डर रहे हैं’ वे डर रहे हैं अन्दर ही अन्दर अपने ही मन में डरते हुए कुछ भी नहीं है उनके पास छद्म आक्रामकता के अलावा. विचार नहीं हैं उनके पास विचार से मुकाबले के लिए न ही शब्द हैं विचार के वाहक शब्द. उनके पास नहीं हैं विवेकपूर्ण संकेत जिन्हें फेंक सकें हवा में या उकेर सकें किसी कागज पर, किसी दीवार पर, या किसी शिला पर. रंग भी नहीं हैं उनके पास जिन्हें भरकर सजा सकें अपने आसपास की धरती को. अपनी पसन्द के किसी एक ही रंग से नहीं मुखरित हो सकती इन्द्रधनुषी आभा अत: प्रयत्नरत हैं रंगों को मिटाने रंग हीन करने ,या स्याही पोतने में चमकते आकर्षक रंगों पर जो उनकी सोच के रंग से नहीं हो पाते हैं मेल. अपनी डरी हुई कोशिशों की असफलता से पस्त होकर वे मिटाने लग जाते हैं विचारकों, शब्दकारों, चित्रकारों ,या उत्कीर्ण करने वाले वास्तुकारों को ‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी’ की तर्ज पर. अपनी पुरातनता के दम्भ के बोझ से दबे आत्ममुग्धता में कैद उनके मस्तिष्क भयाक्रान्त हैं अस्तित्व के संकट से. नहीं सीखना चाहते इतिहास बोध से विचार नहीं मरता ,न ही विचार का वाहक शब्द और न ही शब्द के संकेत की मौन भाषा इनकी अनुगूंज सुनाई पडती रहती है युगान्तर तक. नहीं मिट सकती बामियान में बुद्ध-प्रतिमा को खंडित कर देने से बुद्ध-वाणी की अनुगूंज. नहीं मिट सकती किसी शार्लि एब्दो पर घातक प्रहारों से या किसी पाश को पानसरे को, दाभोलकर, कलबुर्गी या गौरी लंकेश को मिटाने से. जैसे नहीं मिटी एकलव्य का अंगूठा लेने ,या शम्बूक-वध के बावजूद न्याय के लिए संघर्ष की आवाज. – जगदीश पंकज

भाजपा के खिलाफ लिखने-बोलने वाली पत्रकार की गोली मारकर हत्या

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बेंगलुरु। वरिष्ठ कन्नड़ पत्रकार और समाजसेविका गौरी लंकेश की मंगलवार(5 सितंबर) रात यहां उनके निवास पर तीन अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार कर हत्या कर दी. गौरी नक्सलियों को सुधारने का प्रयास और उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये विख्यात थी.

माना जा रहा है कि हमलावर गौरी की प्रतीक्षा कर रहे थे. वह गांधी नगर स्थित अपने कार्यालय से लौटने के बाद राजराजेश्वरी नगर स्थित अपने घर पहुंची और दरवाजा खोल रही थी, तभी हमलावरों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई.

रिपोर्टों के अनुसार गौरी के शरीर पर तीन गोलियां लगी जबकि चार गोलियों के निशान दीवार पर हैं. घटना के बाद पुलिस आयुक्त समेत आला पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे और वहां का मुआयना किया. मृतका का शव पोस्ट मार्टम के लिये भेज दिया गया है.

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मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने गौरी की आकस्मिक मौत पर दुख व्यक्त किया और उनके नक्सलियों को सुधारने के लिये किये गये योगदान को याद किया.

अपने अखबार में भाजपा के नेताओं के खिलाफ खबर प्रकाशित करने के बाद भाजपा सांसद प्रह्लाद जोशी ने लंकेश के खिलाफ मानहानि का केस दायर कर रखा था. पत्रकार की मौत पर मीडिया जगत के लोगों ने दुख और आश्चर्य व्यक्त किया है. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर सेलेब्रिटी भी जमकर इसकी खिलाफत में उतर आए हैं.

जंतर-मंतर पहुंचे देश भर के शिक्षकों ने उठाई मांग

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नई दिल्ली। शिक्षक दिवस के मौके पर देश भर के युनिवर्सिटी और कॉलेज एसोसिएशन के शिक्षकों ने जंतर मंतर पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया. ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ युनिवर्सिटी एंड कॉलेज टीचर्स आर्गानाइजेसंस (AIFUCTO) ने जेल भरो आंदोलन किया. इस दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे शिक्षकों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. इस दौरान शिक्षकों ने 7वां वेतन आयोग लागू करने की मांग की.

इस दौरान शिक्षकों ने शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा के लिए सरकार को ठहराया जिम्मेदार. उन्होंने शिक्षा के निजीकरण की साजिश के लिए भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया. शिक्षकों का कहना था कि सरकार शिक्षा का निजीकरण करने की ओर है, जबकि उसे प्रारंभिक शिक्षा में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की जरूरत है. कुछ शिक्षकों ने आरोप लगाया कि सरकार लगातार शिक्षा का बजट कम कर रही है और सरकार के पास शिक्षा व्यवस्था सुधारने का एजेंडा नहीं है.

इस बीच डी. राजा के साथ शिक्षक संघ के लोग शिक्षा मंत्री से मिले और अपनी मांगों को सरकार के सामने रखा.

अब राधे मां की बारी, हाईकोर्ट ने दिया कार्रवाई करने का आदेश

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चंडीगढ़। बलात्कारी बाबा राम रहीम के जेल जाने के बाद अब राधे मां की बारी है. पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने मंगलवार को खुद देवी बताने वाली राधे मां के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है. कोर्ट ने पंजाब के फगवाड़ा निवासी सुनील मित्तल की याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब पुलिस को राधे मां के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया.

दरअसल, फगवाड़ा निवासी सुरेंद्र मित्तल ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर स्वंयभू देवी अवतार राधे मां के खिलाफ मामला दर्ज कराने की अपील की थी. जिस पर सुनवाई करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कपूरथला पुलिस को फटकार लगाई है. हाईकोर्ट ने पुलिस से पूछा है कि अब तक इस मामले में FIR क्यूं नहीं दर्ज की गई. सुरेंद्र मित्तल ने कुछ महीने पहले राधे मां के खिलाफ पंजाब पुलिस को शिकायत दी थी कि राधे मां उसको रात-बेरात फोन करके परेशान करती है और डरा-धमकाकर उसे अपने खिलाफ बोलने से रोकने की कोशिश कर रही है.

पंजाब पुलिस को अब इस मामले में हाईकोर्ट के सामने 13 नवंबर से पहले जवाब देना है. पुलिस को यह भी बताना है कि इस मामले में आपराधिक मामला बनता है या नहीं. अगर आपराधिक मामला बनता है तो अब तक इस मामले में FIR दर्ज क्यों नहीं की गई.

क्या है पूरा मामला खुद को देवी कहने वाली राधे मां ने तकरीबन 15 साल पहले पंजाब के फगवाड़ा में एक जागरण किया था. इस दौरान राधे मां का विरोध शुरू हो गया. ये प्रदर्शन तीन घंटे बाद तब खत्म हुआ था, जब राधे मां ने माफी मांग ली. इस विरोध की अगुवाई सुरिंदर मित्तल ने ही की थी. सुरिंदर मित्तल का आरोप है कि उनके फोन पर राधे मां लगातार उन्हें परेशान करने वाले वॉट्सऐप मेसेज और कॉल्स करती रही हैं. शिकायत में राधे मां समेत 5 लोगों पर आरोप हैं. फगवाड़ा पुलिस इस मामले में सुरिंदर मित्तल के बयान दर्ज करा चुकी है. सुरिंदर फोन की रिकॉर्डिंग भी पंजाब पुलिस को दे चुके हैं.

कंवल भारती के घर में जबरन घुसे RSS के लोग

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आज कुछ अप्रत्याशित हुआ. मैं अपने घर में केवल रिश्तेदारों, अभिन्न मित्रों, प्रेस वालों और उनको जिन्हें मैं आसपड़ोस में होने के कारण जानता हूँ, आने देता हूँ. जो लेखक मित्र फोन पर समय लेकर आते हैं, वे भी मेरे अतिथि बनते हैं. पर आज शाम मैं हैरान रह गया. मैं अपने रूटीन से जब शाम को फ्रेश होकर स्ट्डी रूम में आया, तो कमरा खुला पाया, और तीन अनजाने लोगों को बैठा पाया. देख कर दिमाग भन्ना गया.

उन्हें बहू ने कमरा खोलकर बैठा दिया था. उसने सोचा मिलने आए हैं तो बैठा दूं. उसने सावधानी नहीं बरती. खैर बातचीत हुई. बोले हम इसी कॉलोनी में रहते हैं. मैंने कहा मैंने इससे पहले आपको कभी नहीं देखा. बताइए कैसे आना हुआ? बोले, आरएसएस की ओर से एक कार्यक्रम हो रहा है, हमने आपका नाम भेज दिया है.

अब मैं पूरा माजरा समझ गया था. मैंने कहा, आप गलत जगह आये हैं. आपने मुझसे पूछे वगैर मेरा नाम क्यों भेजा ? फिर मैंने उन्हें आराम से बताया कि मैं आरएसएस को एक ख़तरनाक संगठन मानता हूं. और मैं इससे नहीं जुड़ सकता. उनके एक दो सवाल आये, जिनका मैंने जवाब दिया. फिर मैंने उन्हें बताया कि आप नौजवान इसमें क्यों फंसे हुए हैं. यह आपको मुस्लिम विरोधी बनाने के सिवा कुछ नहीं सिखाएगा.

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वह दंगों में आपका इस्तेमाल करेगा और आपको अपराधी बनाएगा. होगा यह कि आप जेल में होंगे और आपके घर वाले कष्ट उठाएंगे. तब आरएसएस आपका कोई साथ नहीं देगा. ऐसे तमाम उदाहरण हैं. हिन्दू कौन हैं इस पर भी चर्चा हुई. मैंने कहा, हिन्दू होना एक अलग बात है और हिन्दूवादी होना दूसरी बात है. आप हिन्दूवादी होकर ही खतरनाक हो जाते हैं.

खैर मेरी बात से वे कितने सहमत हुए, यह तो नहीं पता. पर वे चले गए और मेरे सामने ढेर सारे प्रश्नचिन्ह छोड़ गए. मैं आरएसएस के विरोध में फेसबुक पर किश्तें लिख रहा हूं. क्या वे झूठ बोल रहे थे? क्या उन्हें आरएसएस ने भेजा था? क्या मेरी मौत ने मेरा घर देख लिया? कुछ इसी तरह के सवालों से परेशान हूं.

कंवल भारती के फेसबुक वॉल से

आदित्य पंचोली ने कंगना को कहा पागल और झूठी

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नई दिल्ली। कंगना रनौत के हाल ही में ‘आप की अदालत’ शो में दिए बोल्ड बयानों को लेकर बवाल मचना शुरु हो गया है. फिल्म ‘सिमरन’ के प्रमोशन के लिए शो में गई कंगना ने अपने जीवन से जुड़े कई मामलों पर अपनी बात रखी.

कंगना ने ऋतिक रोशन, करण जौहर, आदित्य पंचोली और अध्ययन सुमन के बारे में खुलकर बात की. कंगना की इस बेबाकी को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही है. कुछ लोग जहां कंगना का समर्थन कर रहे हैं वहीं कुछ लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं.

कंगना के इंटरव्यू के बाद अब अभिनेता आदित्य पंचोली ने अपना पक्ष रखा है. कंगना पर पलटवार करते हुए आदित्य पंचोली ने बॉलीवुडलाइफ को एक इंटरव्यू दिया है. जिसमें उन्होंने कहा है, ‘वह लड़की पागल है. क्या कर सकते हैं, क्या आपने उसका इंटरव्यू देखा? इंटरव्यू देखकर आपको ऐसा नहीं लगता कि कोई पागल बात कर रहा है? कौन ऐसे बात करता है? हम इंडस्‍ट्री में इतने सालों से हैं किसी ने भी किसी के बारे में कभी इस तरह से बात नहीं की. मैं क्या कह सकता हूं? वो पागल लड़की है. अगर आप कीचड़ में पत्थर मारोगे तो आपके ही कपड़े गंदे होंगे.’

कंगना को आड़े हाथ लेते हुए आदित्य ने कहा कि कंगना झूठ बोल रही हैं और मैं उनके खिलाफ लीगल एक्शन लेने जा रहा हूं. मुझे दूसरों के बारे में नहीं पता पर जो भी मेरे बारे में उन्होंने बात कही है वो पूरी तरह से झूठ है. मेरा परिवार उनकी बातों से आहत है, मैं और मेरी पत्नी कंगना के खिलाफ लीगल एक्शन लेने जा रहे है.

कंगना के बयानों को लेकर बॉलीवुड ने दूरी बना रखी है. अभिनेता ऋतिक रोशन की पत्नी सुजैन खान ने उनका सपोर्ट किया है. बता दें कि सुजैन ने सोशल मीडिया पर अपनी और ऋतिक की एक फोटो शेयर करते हुए एक संदेश के साथ ऋतिक को सपोर्ट किया है

पटना में पुलिस और पब्लिक में टकराव, फूंकी गाड़ियां

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पटना। बिहार की राजधानी पटना के राजीव नगर के घुड़दौड़ रोड पर अतिक्रमण हटाने गई टीम पर उग्र लोगों ने पथराव कर दिया. यहां अवैध निर्माण हटाने पहुंची पुलिस पर लोगों ने हमला कर दिया जिसमें थानाध्यक्ष समेत 8 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. जिसके बाद भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हवा में गोलियां चलानी पड़ी.

पुलिस राजधानी के दीघा-राजीव नगर इलाके के कृष्णा नगर में इलाके में कोर्ट के आदेश पर अवैध मकानों को तोड़ने पहुंची थी. इससे नाराज लोगों ने पुलिस पर हमला कर दिया और जमकर पथराव किया, जिसमें कई पुलिस वाले घायल हो गए हैं. लोगों ने कई गाड़िया भी जला दी. कई मीडियाकर्मियों को भी चोटें आई हैं.

लोगों का कहना है कि हमने यहां की जमीन खरीदा और अब इसपर घर बनाया है और अब घर को तोड़ने आज अचानक पुलिस पहुंच गई, अब हम कहां जाएंगे? लोगों का कहना है कि हम इस जमीन को नहीं छोड़ सकते, हमने कीमत चुकाई है. ऐसे में पुलिस की ऐसी कार्रवाई क्या उचित है. लोगों का कहना है कि कोर्ट का कोई आदेश नहीं है, पुलिस बेवजह हमलोगों को परेशान कर रही है.

ये है पूरा मामला 1974 में बिहार सरकार ने 1024 एकड़ जमीन किसानों से लेकर हाउसिंग बोर्ड को देने का फैसला किया था. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जो जमीन सरकार ने हाउसिंग बोर्ड दी उसके बदले उन्हें मुआवजा नहीं मिला.

मुआवजा न मिलने की सूरत में किसानों ने जमीन खाली नहीं कि और मकान बनाते चले गए. कई किसानों ने तो बिना कागजात के ही जमीन बेच दी. अब जिन लोगों ने किसानों से जमीन खरीदकर घर बनाया है, उनका कहना है कि जीवन भर की पूंजी लगाकर जमीन खरीदा और घर बनवाया. अब घर टूट जाएगा तो कहां जाएंगे.