अम्बडेकर महासभा योगी को देगी ‘दलित मित्र अवार्ड’, एस.आर. दारापुरी ने कहा भाजपा के हाथों में खेल रहे हैं लालजी निर्मल

0

लखनऊ। पिछले दिनों हुए उपचुनाव में दलितों और पिछड़ों के लिए सांप-छुछूंदर जैसी भाषा का प्रयोग करने वाले और मुलाकात से पहले दलितों को साबुन भेजने वाले सीएम योगी आदित्यनाथ को लखनऊ स्थित अम्बेडकर महासभा ने ‘दलित मित्र अवार्ड’ देने का फैसला किया है. सूचना है कि लखनऊ में 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के मौके पर योगी को ‘दलित मित्र’ का सम्मान दिया जाएगा. अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल हैं.

इस सूचना के सामने आते ही अम्बेडकरवादियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दर्ज कराई है और निर्मल के फैसले का पुरजोर विरोध शुरू कर दिया है. 1998 में स्थापित महासभा के दो संस्थापक सदस्यों ने सीएम योगी आदित्यनाथ को दलित मित्र सम्मान दिए जाने के ऐलान का विरोध किया हैं. पूर्व आईजी एसआर दारापुरी सहित दो सदस्यों ने योगी को सम्मान दिए जाने का विरोध करने की धमकी दी है. उन्होंने अंबेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल पर बीजेपी के हाथों में खेलने का आरोप लगाया है.

योगी सरकार लगातार दलितों के निशाने पर है. 2 अप्रैल को दलित समाज द्वारा किए गए भारत बंद के बाद भी यूपी में तमाम दलित युवाओं की धड़-पकड़ जारी है, तो कईयों पर रासुका लगा दिया गया है. इसके पहले उत्तर प्रदेश में ही राज्यपाल राम नाईक की सलाह पर अंबेडकर के नाम में उनके पिता का नाम भी जोड़ दिया गया है. इसको लेकर भी दलित संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं.

आज की रात भी जेल में गुजारेंगे सलमान

0

जोधपुर। काले हिरण के शिकार मामले में सजा सुनाए जाने के बाद सलमान खान जोधपुर की जेल में है. गुरुवार की रात जेल में गुजारने के बाद सबको यकीन था कि सलमान को शुक्रवार को बेल मिल जाएगी और वो जेल से बाहर आ जाएंगे, लेकिन अब आज की रात भी सलमान को जेल में ही बितानी पड़ेगी. जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद कैदी नंबर 106 यानि सलमान खान को जोधपुर के कंकाणी में 1998 में दो काले हिरणों का शिकार करने के जुर्म में जोधपुर की CJM कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई है.

सलमान के वकील जेल में जाकर उन्हें जमानत ना मिलने की जानकारी देंगे. फैसला आने के बाद सलमान से जेल में मिलने के लिए उनकी दोनों बहनें जेल के लिए रवाना हो गईं. अब शनिवार को सुबह 10.30 सलमान की जमानत पर सेशन कोर्ट के जज फैसला सुनाएंगे. इससे पहले शुक्रवार की सुबह जज रवींद्र कुमार जोशी ने सलमान के वकील की सारी दलीलें सुनीं. करीब डेढ़ घंटे तक चली बहस के बाद सेशन कोर्ट के जज रवींद्र कुमार जोशी की अदालत ने सलमान की जमानत पर शनिवार को फैसला सुनाने की बात कही.

इधर इस मामले से जुड़े तमाम लोग सामने आने लगे हैं. सलमान के खिलाफ केस दर्ज कराने वाले फॉरेस्ट अफसर ललित बोरा ने नागपुर में मीडिया से कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा कि वह एक बॉलीवुड सितारे के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं.

देश को गृहयुद्ध में झोंक रही है भाजपा

0

अभी मैं आजतक न्यूज चैनल पर खबर देख रहा था तभी मैंने देखा कि मेरठ में 2 अप्रैल को आयोजित भारत बंद में शामिल लड़कों को पुलिस द्वारा पकड़कर किसी थाने में बंद किया जा रहा है. उस थाने का दृश्य देखकर मैं सिहर गया, उसमें थाने की गैलरी में कई पुलिसवाले लाइन में लाठी लेकर खड़े थे और जो भी थाने में लाया जा रहा था उसे बेरहमी से एक तरफ से पीटते हुए लाकअप में डाला जा रहा था. उसमें से ज्यादातर दलित बच्चे और कम उम्र के नौजवान थे जो इस मार की वजह से जमीन पर गिरकर बुरी तरह तड़प रहे थे. ठीक इसके बाद उ0 प्र0 पुलिस के एडीजी की बाइट आयी जिसमें में वह 2 अप्रैल के भारत बंद में नामजद हुए लोगों को किसी भी हालत में न बख्शने की धोषणा कर रहे थे. गौरतलब हो कि आंदोलनकारियों पर सरकार ने पहले से ही रासुका लगाने का आदेश दिया हुआ है. यह पूरी स्थिति देश को और विशेषकर उत्तर प्रदेश को गृहयुद्ध में ले जाने की भाजपा की एक गहरी साजिश का हिस्सा है.

दरअसल मोदी सरकार पिछले चार सालों के अपने शासनकाल में चौतरफा विफल और गैरजबाबदेह सरकार साबित हो चुकी है. चुनाव के दौरान की गयी घोषणाएं और वायदे महज जुमले बनकर रह गए हैं. न तो रोजगार सृजन हुआ और न ही विकास किया जा सका. पहले से ही तबाह हो रही खेती किसानी का हाल और खराब हो गया, छोटे-मझोले उद्योग बर्बाद हो गए, महंगाई लगातार बढ़ती गयी और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगी. इस दौरान देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को तहस नहस किया गया और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया गया. तमाम गैरजरूरी सवाल और अज्ञानी विद्धानों ने देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर गहरा नुकसान पहुंचाया. समाज के कमजोर तबकों विशषकार दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर सरकार और सत्ता के संरक्षण में हमले बढ़े है. कानून के राज की जगह तानाशाही चल रही है.

लोकतांत्रिक प्रतिवादों तक पर बर्बर हमले हो रहे और आंदोलन के नेताओं पर रासुका लगाकर जेल में बंद किया गया है. उ0 प्र0 में भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर की गिरफ्तारी और उनका दमन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. सरकार की इस नाकामियों के विरूद्ध जनता में गहरा आक्रोश है. इस आक्रोश की विभिन्न प्रकार से अभिव्यक्तियां हो रही हैं. महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में किसान आंदोलन के रूप में, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में विशेष आर्थिक पैकेज के रूप में, गुजरात में पाटीदार व दलित आंदोलन तथा देश में व्यापारियों, नौजवानों, कर्मचारियों, मजदूरों के आंदोलनों में यह दिखता है. 2 अप्रैल को एससी-एसटी एक्ट 1989 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमजोर करने के खिलाफ दलितों द्वारा किया गया भारत बंद भी इसी आक्रोश की अभिव्यक्ति थी. इस बंद में स्थापित पार्टियों और नेताओं के बिना ही बड़े पैमाने पर दलित नौजवानों और कर्मचारियों ने भागेदारी की और इसे सफल बनाया.

इस बंद में दलितों ने जो सवाल उठाए हैं वह महज दलितों के सवाल नहीं अपितु देश के हर इंसाफ पसंद नागरिक का सवाल है. सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि जांच के बाद ही एससी-एसटी एक्ट में एफआईआर दर्ज होगी और इससे वह इस एक्ट के दुरूपयोग को रोकना चाहता है, कहां तक जायज है? आप खुद सोचें यदि यह नियम मान लिया जाए तब तो आईपीसी और सीआरपीसी को लागू करना ही असम्भव हो जायेगा. सीआरपीसी साफ कहती है कि किसी अपराध के घटित होने की सूचना प्राप्त होने पर उसकी प्राथमिक सूचना रिपोर्ट लिखकर तत्काल विवेचना शुरू की जाए. प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज करने की अनिवार्यता के सम्बंध में खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही दर्जनों आदेश दिए हुए हैं. तब रिपोर्ट से पहले जांच करना और अनुमति प्राप्त करने की बात विधि के विरूद्ध है. यहीं नहीं व्यवस्था यह है कि मामले की विवेचना के बाद पुलिस चार्जशीट न्यायालय में दाखिल करती है और न्यायालय मामले को गुण दोष और साक्ष्यों के आधार पर निस्तारित करता है.

कोई अभियुक्त महज आरोप लगाने से दोष सिद्ध नहीं हो जाता. तब विधि द्वारा स्थापित इस व्यवस्था के विरूद्ध सुप्रीम कोर्ट का आया आदेश ब्रहमवाक्य नहीं है और उसका विरोध कानून के राज को स्थापित करने की लोकतांत्रिक मांग की अभिव्यक्ति है. विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान की रक्षा की इस मांग का समर्थन करना संविधान में विश्वास करने वाले हर नागरिक का दायित्व है. यही वजह है कि वामपंथी, जनवादी, जनपक्षधर सभी संगठनों और आंदोलनों ने इस बंद का समर्थन किया. लेकिन भाजपा और संघ जिनका देश के संविधान में शुरू से ही विश्वास नहीं रहा है और जो लगातार तानाशाही को स्थापित करने का प्रयास करते रहे हैं , ने इस अवसर पर देश में जातीय धु्रवीकरण पैदा करने और इसके जरिए अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने का गहरा घृणित खेल खेला. जहां-जहां उसकी सरकारें रहीं पुलिस और प्रशासन की मदद से दमन कराया गया, जुलूसों में संघ के लोगों ने घुस कर उपद्रव किए, सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया और हिंसा की. इस बात को खुद विभिन्न चैनलों ने अपनी रिपोर्टो में दिखाया है. इस हिंसा में मरने वाले दलित ही रहे हैं. अब इसी हिंसा का सहारा लेकर पुनः दमन किया जा रहा है. मेरठ में योगी सरकार की पुलिस द्वारा किए जा रहे दमन का यह हदृयविदारक दृश्य इसका एक उदाहरण है.

हम जन मंच की तरफ से प्रदेश की जनता से अपील करेंगे कि भाजपा और संघ की समाज को विभाजित करने की घृणित राजनीति को नकार दें और सरकार व प्रशासन द्वारा किए जा रहे दमन के प्रतिवाद में उतरे. संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए खड़े हों और आपसी एकता को बनाए रखें.

दिनकर कपूर जन मंच उ0 प्र0

2 अप्रैल भारत बंद: आक्रोशित दलित जनांदोलन

भारतीय जन आन्दोलनो के इतिहास मे 2 अप्रैल का भारत बंद दलितआक्रोशित जनांदोलन के रूप मे एक अनोखे तरीके से इतिहास मे दर्ज होकर रहेगा . जो बिना किसी दल विशेष नेता के आह्वान पर ना होकर स्व-स्फूर्त जन आन्दोलन मे तब्दील हो गया,जिसका मुख्य कारण वर्तमान भारतीय राजनीति,मीडिया व न्यायपालिका के साथ-साथ धर्माधिकारियो द्वारा दिये गये वक्तव्य मसलन दलितो,अछूतो का मंदिर प्रवेश निषेध बताकर बहुसंख्यक आबादी के दलित,पिछड़े,अल्पसंख्यक वर्ग की उपेक्षा एवं अवहेलना का परिणाम था . आऐ दिन इन वर्गो पर होने वाले कातिलाना हमले व अपने हक हकूक के लिऐ लड़ने वाले सामाजिक योद्धाओ को मिथ्या मुकद्दमे फंसा कर रासुका लगा कर जेल मे बंद कर, दलितो को अधिकार विहिन करने की न्यायपालिका की साजिश बहुजन समाज को लग रही थी ,जिसे पूर्णतया राजनीतिक सुरक्षा कवच मिला हुआ लगता है . इसी सोच विचार समझ के तहत खुद को असहाय व असुरक्षित होने के भाव मे उत्पीड़ितो का एक जुट होना व सड़को पर प्रतिरोध का स्वर उतरना लाजिम ही नही वरन एक बेबसी भी रही होगी.

खास वर्गो के लोगो को निशाना बनाकर उनकी सरे आम हत्याये करना,गौ हत्या व बिरयानी के नाम पर रोजी रोटी को हाथो से छीनना व नोटबंदी कर अंकिचन समाज व श्रमिक वर्ग की आर्थिक नाकेबंदी कर कमर तोड़ना ही मानो इस सरकार का एकमात्र ध्येय रह गया हो . आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पूंजीवादी शक्तियो के हित लाभ हेतु आम नागरिको को हित वंचित करके व जाति धर्म के नाम पर जनमानस को उलझाये रखना,विकास के नाम पर जूमलेबाजी कर भाषणो द्वारा संतोष की घुट्टी पिलाकर ही रखना, मानो सरकार का एक मात्र उद्देश्य बन कर रह गया हो . लोकतंत्र मे नारो से कब और कितनी देर तक लुभाया जा सकता था .

EVM द्वारा वोटो के लूटने से आम मतदाता अपने को ठगा सा महसूस कर रहा था . आरक्षण के विरूद्ध उठती आवाजे,दलित अधिकारो पर सरकारी अंकुश व अनुसूचित जाति एव जनजाति तथा पिछड़े आदिवासियो के जल,जंगल,जमीन को हड़प कर कंक्रीट के जंगलो मे तब्दील करना, उनके हितो पर दिन प्रतिदिन होते कुठाराघात,दलित महिलाओ के साथ सामूहिक बलात्कार कर नंगा घुमाना व उनके गुप्तांगो मे सरिया,डंडे लाठिया घुसेड़ निर्ममता से हत्याये कर जलाकर खाक कर देना व पत्थरो से मार-मार कर चेहरे मोहरे को चिथड़े- चिथड़े कर लहुलुहान कर देना,नाबालिगो को अकेले मे दबोच कर लाठी,डंडे,सरिया,बेल्टो से नंगा कर पीटना,पेड़ से बांध कर बेरहमी से दंडित करना व करवाना इत्यादि. किस बर्बर संस्कृति का परिचायक रहा है यह एक सोचनीय ही नही वरन् एक विचारणीय प्रश्न समाज के सम्मुख उठ खड़ा हुआ . लेखक चिंतको को लोकशाही के धराशायी होने की वाजिब दिखती चिंता सताने लगी . विरोध मे कुछ लिखा तो शब्द के साथ शरीर भी मरने लगे . सरेआम लेखको को जान से मारने की धमकिया मिली और उसकी परिणति उन पर जान लेवा हमला कर जान लेकर ही हुयी.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खुलेआम लोकतंत्र मे हमला हुआ . हमारी चुनी हुयी सरकारे इनके विरूद्ध मौन धारण करे रही और मिडिया झूठी खबरो को सच साबित करने पर ही अपनी इतिश्री समझने लगा . जिसके लिये एक तरफा ब्यान बाजी को देख आम जन हताश व निराश होता रहा . जैसे उसके अधिकार और विवेक पर निरंकुश शासन का हथौड़ा चल रहा हो . इस चुप्पी के लिये जगह-जगह से प्रतिरोध के स्वर उभरने लगे और 2 अप्रैल के दिन भारत बंद मे इसका नजारा देखने को मिला . पूरा भारत आग की लपटो मे आखिर क्यो झुलस पड़ा . संविधान व देश को सम्मान देने वाला देशप्रेमी दलित जनांदोलन एकाएक कैसे हिंसक हो उठा, इस पर सरकारी तंत्र को अवश्य विचार करना पड़ेगा आखिर, वो कौन से अवांछित असमाजिक, राजनितिक,अपराधी तत्व थे .

जिन्होंने शान्ति प्रिय जनांदोलन को आग के हवाले कर दिया . सदियो से संताप झेलता आया समाज आखिर एक ना एक दिन तो उठ खड़ा होना तो चाहेगा ही वो भी संवैधानिक दायरे मे . भारतीय संविधान सबको बराबरी व अवसर की समानता प्रदान करता है यही सब कुछ वर्चस्वशाली व सत्ता सम्पन्न होते सामन्ती समाज को रास नही आ रहा था . जो लोग सदियो से धार्मिक /सामाजिक /राजनीतिक व शैक्षणिक सांस्कृतिक शोषण के शिकार होते रहे और आज सिर उठाकर चलने लगे तो तथाकथित वर्ग को यह सब नागवार गुजरने लगा और प्रतिक्रिया स्वरूप दिन पर दिन हिंसक होने लगा और यही उत्पीड़न निर्बल वर्ग को गहरे तक उनकी अस्मिता को तार-तार करने लगा,अंतत् उनका विवेक कभी तो जागना ही था ? बस यही से, लोगो का अधिकारो के प्रति विवेक का जागना ही उन्हे खलने अखरने लगा .

विगत वर्षो मे हुयी दलित छात्रो की संस्थागत हत्याये व अल्पसंख्यक समुदाय विशेष के छात्रो का एकाएक संस्थानो से गायब हो जाना तथा पुलिस प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद कोई हल ना निकलना व कानूनी कार्रवाई के नाम पर कोरा आश्वासन मिलना यही सब कुछ आम भारतीय नागरिको को गहरे तक पीड़ा देता रहा और वह चुपचाप इस संत्रास को झेलता रहा . जगह-जगह अम्बेड़कर की मूर्तियो को तोड़ना किस विरोध का प्रतीक बन उठ खड़ा हुआ . आखिर वो कौन से आराजक तत्व है सरकारी तंत्र व पुलिस प्रशासन को इन पर विचार करना पड़ेगा नही तो समाज का ताना बिखरने मे देर नही लगेगी. जो देश की राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिये एक बड़ा खतरा बनेगा .पड़ोसी देश,आऐ दिन देश को आतंकित करने पर तुला हुआ है .

हिन्दु फासीवादी ताकते सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर आमजन को आतंकित करने पर तुली है . जातिगत सेना का वजूद बढने लगा प्रतिक्रिया स्वरूप दलित जातियो ने भी अपने जातिगत संगठन बनाने शुरू कर दिये जो आगे चलकर वर्ग संघर्ष की राह पकड़ने का पथ ही साबित होगा .जो देश के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक ही सिध्द होगा . क्या यह सब षड्यंत्र सरकारी संरक्षण का परिणाम नही है ? इन सवालो के जवाब तो ढूंढने ही होगे . वरना, देश व्यापी आक्रोश तो सरकार के विरूद्ध उभरने ही लगा है . देश के चिन्तनशील बुद्धिजीवियो /साहित्यकारो को इन विषयो पर सरकार से संवाद तो स्थापित करना ही होगा. जनता का जनता द्वारा जनता के लिये स्थापित लोकतंत्र कंही खतरे मे ना पड़ जाऐ . ये आशंका निर्मूल नही है . संसार का सबसे दीर्घजीवि चार खम्बो पर खड़ा लोकतंत्र इन फासीवादी ताकतो से परास्त ना हो जाऐ . सत्तासीन राजनैतिक दलो ने समय-समय पर अपने-अपने हित साधने के लिये संविधान मे संशोधन किये फिर अमानत मे ख्यानत क्यो ?

इससे साफ प्रतीत होता है कि – ” किसी भी देश का संविधान कितना भी सर्वश्रेष्ठ क्यो ना हो,जब तक उसके लागू करने वालो की नियत ठीक नही, तो वह निरर्थक ही साबित होगा . (डा.अम्बेडकर )

आज संविधान की गरिमा को जीवित बनाये रखने का दायित्व केन्द्र व राज्य सरकारो का ही नही अपितू भारतीय गणतंत्र के प्रत्येक नागरिक का है . देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका पर दिन प्रतिदिन हावी होती जा रही है जो जातिगत मानसिकता को सामने रख न्याय की विषैली घुट्टी पिला रही है . जिस पर भारत के चार न्यायधीशो ने लीक को तोड़कर देश के प्रति अपनी वाजिब गम्भीर चिंता जाहिर की . जिस पर राज्यसभा व लोक सभा ने कोई संग्यान क्यो नही लिया ? देश मे आऐ दिन हो रहे साम्प्रदायिक व जातिगत दंगे देश के आर्थिक विकास मे एक बड़ी बाधा बन कर आ रहे है . राजनीति जनसेवा के भाव से विमुख हो व्यवसायिकता की ओर मुखातिब हो चली है . पहले स्वय हित बाद मे राष्ट्र एवं नागरिक हित यही आज का भयावह राजनीतिक दौर है . जिसे जितनी जल्दी बदला जाऐ या फिर इस पर अंकुश लगाये बिन देश तरक्की की राह पर नही आ सकता . हर और विषमता आन खड़ी है . श्रमिक व किसान आत्महत्याऐ कर रहा है . सरकारी शिक्षक कर्मचारियो मे सरकार की नीतियो के विरूद्ध रोष बढ रहा है . जिसके फलस्वरूप जगह-जगह आन्दोलनो का चलन बढने लगा है . सरकार को विषमता की और ध्यान देने की त्वरित आवश्यकता है वरना तो ऐसे लग रहा कि देश का अवाम बारूद के ढेर पर बैठ कर उचित समय का इंतजार कर रहा है . अंतत् सरकार को एकल शिक्षा प्रणाली पर जोर,ठेकेदारो के चंगुल से श्रमिक को बाहर निकालना,किसानो की फसल का उचित मूल्य,दलित अधिकारो का संरक्षण, आरक्षण का लाभ समुचित अनुपात मे देने की गारंटी व दलितो के सम्मान की रक्षा करना,पुलिस प्रशासन के जातिगत ढांचे को तोड़ना होगा . जिससे पुलिसकर्मियो द्वारा एक तरफा लाठियां भांजने पर अंकुश लग सके,युवाओ के रोजगार की गारंटी लेनी होगी,प्राईवेट सेक्टर रोजगारो मे आरक्षण व्यवस्था लागू हो, चुनाव प्रक्रिया को EVM रहित कर बैलेट पत्र से घोषित करे व आर्थिक बर्बादी को रोकने के लिये पूरे देश मे एक या दो चरण मे चुनाव सम्पन्न कराये जाये . जनसेवक की मृत्यु के बाद चुनाव करवाना अपवाद स्वरूप है . राजनीति को अपराधियो से मुक्त करने की और सरकार को अविलंब ध्यान देने की आवश्यकता पर विचार करना पड़ेगा या फिर वर्तमान सरकार या आने वाली सरकारे जन आक्रोश का सामना करने को तत्पर रहे.

डा.कुसुम वियोगी (लेखक वरिष्ठ आम्बेडकरवादी कवि चिंतक साहित्यकार है)

भारत बंद के पीछे पूंजीभूत हुईं मोदी सरकार की सवर्णपरस्त नीतियां !

गत 3 अप्रैल को सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय यादव शक्ति पत्रिका के संपादक चन्द्रभूषण सिंह यादव ने 2 अप्रैल को हुए भारत बंद पर एक पोस्ट डाला, जिसे बहुत से लोगों की लाइक मिली. ‘भारत बंद पर और दलित चेतना’ शीर्षक डाले गए उस पोस्ट में उन्होंने लिखा था-‘मैं दलित चेतना और उनके संघर्ष को कोटिशः नमन करता हूँ क्योंकि वे ही कौमें जिंदा कही जाती हैं जिनका इतिहास संघर्ष का होता है,जो अन्याय के प्रतिकार हेतु स्वचेतना से उठ खड़े होते हैं. 2 अप्रैल 2018 का दिन दलित चेतना का,संघर्ष का,बलिदान का,त्याग का ऐतिहासिक दिन बन गया है क्योंकि बगैर किसी राजनैतिक संगठन या बड़े नेता के आह्वान के सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया पर दलित नौजवानों/बुद्धिजीवियों की अपील पर पूरे देश में दलित समाज का जो स्वस्फूर्त ऐतिहासिक आंदोलन उठ खड़ा हो गया,वह देश के तमाम बड़े आंदोलनों को पीछे छोड़ते हुए एक अद्वितीय और अनूठा आंदोलन हो गया है.

अब तक देश मे जितने बड़े अंदोलन हुए उन सबका नेतृत्व या तो किसी नेम-फेम वाले बड़े व्यक्ति/नेता ने किया या किसी बड़े राजनैतिक/सामाजिक संगठन द्वारा प्रायोजित हुवआ, जिसका भरपूर प्रचार -प्रसार विभिन्न माध्यमों से या मीडिया द्वारा किया गया . लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी ऐक्ट में किये गए अमेंडमेंट के बाद सोशल मीडिया पर एक न्यूज उछला कि 2 अप्रैल को दलित समाज द्वारा भारत बंद किया जाएगा. इस आह्वान का कर्ता-धर्ता कौन है,यह अपील किसकी है,ये सब कुछ बेमानी हो गया और सोशल मीडिया पर उछले इस अपील की परिणति यह हुई कि 2 अप्रैल को पूरा भारत बिना किसी सक्षम नेतृत्व के बुद्धिजीवियों/छात्रों/नैजवानों और प्रबुद्ध जनो के सड़क पर उतर जाने से बंद हो अस्त-व्यस्त हो गया.

इस आंदोलन का एक पहलू जहाँ यह रहा कि पूरे देश के दलित बुद्धजीवी एकजुट हो करो या मरो के नारे के साथ जय भीम का हुंकार भरते हुए देश भर में सड़कों पर आ गये तो कथित प्रभु वर्ग अपने अधिकारों को बचाने हेतु आंदोलित संविधान को मानते हुए शांतिपूर्ण सत्याग्रह कर रहे वंचित समाज के लोगो पर ईंट-पत्थर-गोली चलाते हुए इस आंदोलन को हिंसक बना दिया जिसमें 14 दलित साथी शहीद हो गए.

यह आंदोलन अपने आप मे बहुत ही महत्वपूर्ण आंदोलन हो गया है क्योंकि अपने संवैधानिक अधिकारों को महफ़ूज बनाये रखने के लिए शहादत देने का ऐसा इतिहास अब तक किसी कौम ने नही बनाया है.यह दलित समाज ही है जो अपने अधिकारों व सम्मान के लिए लड़ना व मरना जानता है.‘

वास्तव में दलितों का स्वतःस्फूर्त भारत बंद था ही इतना प्रभावशाली कि यादव शक्ति पत्रिका के संपादक की भांति तमाम समाज परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट उसकी सराहना करने में एक दूसरे से होड़ लगाये . उस दिन सचमुच देश थम गया था. यूपी-बिहार , राजस्थान-पंजाब-हरियाणा इत्यादि की भांति ही 2 अप्रैल का भारत बंद हर जगह सफल रहा. तमाम जगहों पर ट्रेनों के चक्के थम गए, सड़क यातायात रुक गया: दुकानें बंद हुईं एवं जीवन अस्त व्यस्त हो गया. इस दौरान यह कई जगहों पर हिंसात्मक रूप अख्तियार कर लिया. विरोध प्रदर्शन के दौरान बिहार में भारी बवाल हुआ. पटना समेत प्रमुख शहरों और जिला मुख्यालयों में हालात बेकाबू हो गए. स्कूल, कॉलेज, और बाजार बंद रहे .

पंजाब सरकार के शांतिपूर्ण बंद की अपील को ताक पर रखते हुए प्रदर्शनकारियों ने हिंसा की. इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही. अमृतसर, जालंधर सहित चार जिलों में ट्रेनों को रोका गया. शिक्षण संस्थान , सरकारी व प्राइवेट बसें पूरी तरह बंद रहीं, मोबाइल इंटरनेट सेवा व एसएमएस सेवा भी बंद रही . हरियाणा के पंचकुला,अम्बाला , कैथल, हिसार, रोहतक, यमुनानगर, फरीदाबाद, गुरग्राम व चंडीगढ़ में दलितों ने विरोध मार्च निकाले. सड़क व रेल यातायात बाधित किया. समूचे राजस्थान में जगह-जगह तोड़ –फोड़, आगजनी की घटनाएं सामने आयीं. एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बंद बेहद सफल रहा. किन्तु कुछ जिलों में हिंसात्मक रूप ले लिया .

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चार जिलों मेरठ, आगरा, हापुड़, और मुजफ्फरनगर में तो हालात इतने बेकाबू हो गए कि दोपहर बाद चार कंपनी आरएऍफ़ और भेजनी पड़ी. इस दौरान मेरठ में दो और मुजफ्फरनगर में एक की मौत हो गयी. किन्तु मौतों के लिहाज से ज्यादे चर्चा में रहा , मध्य प्रदेश . यहाँ भारत बंद के दौरान ग्वालियर में दो, भिंड में तीन , मुरैना व डबरा में एक-एक जानें गईं. शाम होते-होते अधिकांश चैनेल ही इस सफलतम बंद के पीछे क्रियाशील कारणों की खोज करने के बजाय बंद के दौरान हुई घटनाओं को प्रमुखता देकर इसकी अहमियत कम करने की कोशिश किये.

बहरहाल बंद के दौरान जो हिंसक घटनायें हुईं , उसके लिए देश के सबसे सज्जन युवा नेता अखिलेश यादव सहित ढ़ेरों लोगों ने ही भाजपा को जिम्मेवार ठहराया है, जिससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता. दरअसल कानून के अनुपालन में अगली क़तार में रहने वाले दलितों ने स्वतःस्फूर्त से जब भारत बंद अंजाम दे डाला, यह बात विशेषाधिकारयुक्त तबकों की चैम्पियन भाजपा को भौचक्क कर दी. भाजपाई सोच भी नहीं सकते थे कि बंद का ऐसा रूप वे देख्नेंगे.किन्तु सोशल मीडिया के सौजन्य से शुरू से ही ज्यों -ज्यों इसके सफल होने की खबर आने लगीं , संघ परिवार बेचैन होने लगा. और अंत में इस यादगार और शानदार बंद की गरिमा को म्लान करने के लिए उसे उसमें हिंसा की छौंक लगानी पड़ गयी. पर,यह, बंद इतिहास के पन्नों में जगह बना चुका है.

इस बंद की अहमियत पर फेसबुक पर रमेश मांझी की ओर से एक बेहद महत्वपूर्ण पोस्ट पढने को मिला. मांझी जी ने अपने पोस्ट की शुरुआत में ही लिखा है-’ 2 अप्रैल, 2018 का भारत बंद एक नया इतिहास बन चुका है. इसे आने वाले समय में स्कूलों में पढ़ाया जायेगा, जानिए क्यों ? भारत में समय-समय पर अनेकों बार भारत बंद होते रहे हैं,लेकिन 2 अप्रैल ,2018 भारत का एक नया इतिहास बन चुका है. इस भारत बंद की निम्नलिखित विशेषताएं हैं.’ आगे इस बंद की 27 वीं व आखरी विशेषता बताते हुए उन्होंने लिखा है-‘दो अप्रैल भारत बंद क्रांति का इतिहास आने वाले भविष्य में स्कूलों एवं कॉलेजों में पढाया जायेगा एवं इस पर टीवी सीरियल एवं फिल्में भी बनेंगी . इसलिए इससे सम्बंधित फोटो , वीडियो , सीडी, डी वी डी इत्यादी साक्ष्य के रूप में पेश करने के लिए सुरक्षित रखें.‘

इसमें कोई शक नहीं कि यह बंद निर्विवाद रूप से ऐतिहासिक रहा और इसने बदले हुए दलित साईक का साक्ष्य पेश कर दिया है. इस ऐतिहासिक बंद पर मीडिया द्वारा हिंसात्मक घटनाओं को ज्यादा जोर दिए जाने से इसकी सफलता के पीछे क्रियाशील कारणों की सही पड़ताल नहीं हो पाई है.पर, इसमें कोई शक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट को निष्प्रभावी किये जाना एकमेव कारण नहीं रहा. इसके लिए पूरी तरह जिम्मेवार मोदी राज की सवर्णपरस्त रही .इसका सबसे पहला प्रकटीकरण मोदी राज में 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के प्रतिभाशाली छात्र रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद हुआ. किन्तु रोहित की हत्या के बाद उठे जनविक्षोभ से मोदी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया. वह बेख़ौफ़ होकर ऐसी नीतियाँ बनाती रही, जिससे शक्ति के सारे स्रोत(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक और धार्मिक इत्यदि) पूरी तरह जन्मजात विशेषाधिकारयुक्त अल्पजन तबकों के हाथ में चली जाय. इसके तहत उन सरकारी उपक्रमों को बड़ी तेजी से निजी हाथों में देने का प्रयास किया गया, जहाँ दलित-आदिवासियों-पिछड़ों को आरक्षण मिलता है. इन्हें आरक्षण से वंचित करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों, हास्पिटलों इत्यादि को निजी हाथों में सौपने का उपक्रम चलाया गया. मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों का भयावह परिणाम 2018के जनवरी के शेष में तब सामने आया जब ऑक्सफैम की रिपोर्ट सामने आई . रिपोर्ट से पता चला कि 2016 और 2017 के बीच 1% टॉप की आबादी की दौलत में 15% इजाफा हुआ,जिससे उनके हाथ में आज 73 % दौलत पर कब्ज़ा हो गया है. कुल मिलाकर ऑक्सफैम की रिपोर्ट सामने आने बाद स्पष्ट हो गया कि 10 % विशेषाधिकारयुक्त तबकों के हाथ में 90 % धन-संपदा चली है.

इससे बहुजनों के आक्रोश में लम्बवत विकास हो गया. इसी बीच यूजीसी ने स्वायत्तता के जरिये प्रतिष्ठित यूनीवर्सिटीयों को निजी हाथ में देने एवं दलित-आदिवासी-पिछड़े समुदायों के युवाओं को प्रोफ़ेसर बनने से रोकने लिए जो फैसले लिए उसने आरक्षित वर्गों के क्रोधाग्नि में घी डालने का काम किया. अभी बहुजन समाज के लोग मोदी सरकार की सवर्णपरस्त नीतियों के खिलाफ कमर कसने का मन बना ही रहे थे कि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया. और इस फैसले के खिलाफ किसी कोने से जब भारत बंद की आवाज उठी, बिना किसी नेतृत्त्व और तैयारी के पूरा दलित समुदाय स्वतः स्फूर्त रूप से सडकों पर उतर आया और उनका भारत बंद इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. बहरहाल भारत का विशेषाधिकारयुक्त तबका दलित साईक में आये बदलाव को सहजता से नहीं लेने जा रहा है. इसलिए उसने पिछड़े भाइयों को सामने रख कर एक नए भारत-बंद के जरिये बहुजन एकता में पलीता लगाने तथा दलितों में बढे मनोबल तोड़ने के लिए 10 अप्रैल को एक नए भारत बंद की घोषणा कर दिया है. अब लाख टके का सवाल है,’क्या आरक्षित वर्गों के जागरूक लोग विशेषाधिकार युक्त तबकों के नए भारत बंद के पीछे छिपे मंसूबों को व्यर्थ कर पायेंगे ?

90 जगहों पर बाबासाहेब की जयंती मनाएगा यह राजनैतिक दल

0

लखनऊ। दो अप्रैल को दलित समाज द्वारा बुलाए गए बंद के बाद अब सबकी नजर अम्बेडकर जयंती पर है. इस दौरान समाजवादी पार्टी भी बसपा से अपने संबंधों को महत्वपूर्ण बनाने के लिए बाबासाहेब की जयंती की जोर-शोर से तैयारी कर रही है. खबर है कि बाबासाहेब की 127वीं जयंती पर 14 अप्रैल को समाजवादी पार्टी पूरे उत्तर प्रदेश में 90 जगहों पर एकसाथ श्रद्धांजलि कार्यक्रम मनाने का फैसला किया है.

सपा की सभी जिला इकाई और नगर अध्यक्षों को इस संबंध में जरूरी दिशा-निर्देश भेजे जा चुके हैं. उस दिन बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाओं पर फूल-माला चढ़ाने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं को भी संबोधित करने का कार्यक्रम है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद लखनऊ के हैरतगंज में मौजूद रहेंगे, जहां वह बाबासाहेब की प्रतिमा पर फूल-माला चढ़ाने के बाद पार्टी मुख्यालय में सभा को संबोधित करेंगे. इस मौके पर डॉ. अंबेडकर के जीवन, दर्शन और सिद्धांतों से जुड़ी फिल्म का प्रदर्शन भी किया जाएगा. इसके अलावा उनके जीवन को रेखांकित करते हुए गीत भी सुनवाए जाएंगे.

दो अप्रैल के बंद के बाद राजस्थान में दलितों से मारपीट, आई कार्ड देखकर पीटा

जयपुर। एससी-एसटी एक्ट में संसोधन के खिलाफ बुलाए गए भारत बंद के बाद कई जगह से दलितों के साथ मारपीट की खबर आ रही है. राजस्थान में सवर्णों पर इस समुदाय से मारपीट करने का आरोप है. दलित समाज के स्थानीय लोगों ने यह आरोप लगाया है.

 जनसत्ता में प्रकाशित खबर के मुताबिक आरोप है कि हिंडौन सिटी की जाटव बस्ती में भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के पास भारी तादाद में सवर्ण इकट्ठा हुए और आई कार्ड से पहचान कर मारपीट की. पीड़ित अश्विनी जाटव ने बताया, “मारपीट करने से पहले उन्होंने हमारा आई कार्ड चेक किया. सभी ऊंची जाति के थे और उन्होंने महिलाओं को भी नहीं बख्शा.” पीड़ित लोगों का कहना है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो वो इस्लाम धर्म अपना लेंगे.

भाजपा के दलित सांसद की पीएम से शिकायत, योगी डांटकर भगा देते हैं

लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के भीतर उसके ही दलित सांसदों की कोई इज्जत नहीं है. इसको लेकर बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ दलित सांसदों की नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है. ताजा मामला रॉबर्ट्सगंज से बीजेपी सांसद छोटेलाल खरवार का है. खरवार ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर सीएम योगी आदित्यनाथ की शिकायत की है. खरवार की चिट्ठी में यूपी प्रशासन द्वारा उनके घर पर जबरन कब्जे और उसे जंगल की मान्यता देने की शिकायत की गई है.

मोदी को लिखे पत्र में बीजेपी सांसद ने कहा है कि जिले के आला अधिकारी उनका उत्पीड़न कर रहे हैं. मामले में बीजेपी सांसद ने दो बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की, लेकिन सीएम ने उन्हें डांटकर भगा दिया. सांसद ने पीएम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र पांडेय और संगठन मंत्री सुनील बंसल की शिकायत की है. पत्र में सांसद ने पीएम से न्याय की गुहार लगाई है. खरवार भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने कहा कि मेरे साथ ऐसा सुलूक हो सकता है, तो किसी के साथ भी ऐसा हो सकता है.

बैंक में स्पेशलिस्ट ऑफिसर पदों पर निकलीं 145 वैकेंसी, इंटरव्यू से सेलेक्शन

नई दिल्ली। इंडियन बैंक ने स्पेशलिस्ट ऑफिसर पदों पर 145 भर्तियां निकाली हैं. यह भर्तियां स्पेशलिस्ट ऑफिसर के स्केल I, II, III, IV और V के पदों पर होंगी. आवेदन करने की अंतिम तिथि 2 मई 2018 है. ऑनलाइन आवेदन 10 अप्रैल 2018 से किया जा सकता है. ये भर्तियां सूचना प्रौद्योगिकी, सूचना प्रणाली सुरक्षा कक्ष, ट्रेजरी, रिस्क मैनेजमेंट, सुरक्षा, क्रेडिट, योजना और विकास और परिसर और खर्च संबंधी विभागों के लिए होनी हैं.

आयु सीमा

स्केल I ऑफिसर्स के लिए आयु सीमा 20 से 30 साल, स्केल II ऑफिसर्स के लिए 23 से 35 साल, स्केल III ऑफिसर्स के लिए 25 से 38 साल, स्केल IV ऑफिसर्स के लिए 27 से 40 साल और स्केल V ऑफिसर्स के लिए 30 से 45 साल निर्धारित की गई है.

आवेदन राशि

आवेदन करने के लिए SC/ST/PWD उम्मीदवारों को 100 रुपये और अन्य सभी श्रेणी के उम्मीदवारों 600 रुपये का आवेदन शुल्क भरना होगा.

कैसे होगी भर्ती

शॉर्टलिस्ट उम्मीदवारों का इंटरव्यू लिया जाएगा. यदि आवेदन अधिक मिले तो एक प्रीलिमिनेरी स्क्रीनिंग टेस्ट हो सकता है. इस टेस्ट में प्रोफेशनल नॉलेज के 60 अंकों के 60 प्रश्न होंगे.

आवेदन शुल्क

एससी, एसटी और पीडब्लूडी वर्गों के उम्मीदवारों को 100 रुपये का आवेदन शुल्क जमा करना होगा. बाकी सभी वर्गों के उम्मीदवारों को 600 रुपये आवेदन शुल्क देना होगा.

ऑस्ट्रेलिया में कॉमनवेल्थ शुरू, पीवी सिंधू ने की भारतीय दल की अगवानी

0

नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में कॉमनवेल्थ गेम्स की ओपनिंग सेरेमनी शुरू हो गई है. इस दौरान भारतीय दल देसी परिधान में उतरा. पीवी सिंधू ने हाथ में तिरंगा थाम कर भारतीय दल की अगवानी की. खेलों की इस बड़ी प्रतियोगिता में 71 कॉमनवेल्थ देश हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें 19 खेलों के तहत 275 स्पर्धाओं का आयोजन किया जाएगा. 4 अप्रैल से शुरू होकर ये गेम्स 15 अप्रैल तक चलेंगे.

भारतीय खिलाड़ी 10 खेल में अपना भाग्य अजमाएंगे. इन खेलों की बड़ी शक्ति बन चुके भारत के सामने इस बार दो टारगेट बिलकुल साफ हैं. पहला मेडल टेबल में फिर से टॉप-4 में एंट्री करना और दूसरा अपने ओवरऑल मेडल काउंट को 500 के पार ले जाना. भारत ने 217 खिलाड़ियों का दल भेजा है.

मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो ये अभी तक का सबसे महंगा कॉमनवेल्थ गेम्स होगा. पूरे इवेंट पर करीब 2 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (करीब 100 बिलियन रुपये) खर्चा होगा. ये पहला मौका होगा जब महिलाओं और पुरुषों के बराबर इवेंट्स होंगे.

न्यूनतम बैलेंस पर एसबीआई ने जारी किया नया फरमान, एक अप्रैल से लागू

नई दिल्ली। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यानि एसबीआई ने खाते में मिनिमम बैलेंस को लेकर नया रेट लागू करने का ऐलान किया है. ये नए रेट एक अप्रैल 2018 से लागू हो चुके हैं. नए लो बैलेंस चार्ज रेट के मुताबिक एसबीआई ने लो बैलेंस चार्ज में 75 फीसदी तक की कटौती की बात कही है.

यानी बचत खातों का न्यूनतम बैलेंस एक सीमा से कम होने पर जो लो बैलेंस चार्ज वसूला जाता था वह अब 75 फीसदी तक कम देना पड़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार, देश के सबसे बड़े बैंक ने लो बैलेंस चार्ज काटने में कमी तो की है लेकिन इसकी स्थिति शहर और ब्रांच के बदलने के साथ ही बदलेगी.

क्या थी न्यूनतम बैलेंस की सीमा ?

– मेट्रो और बड़े शहरों में न्यूनतम बैलेंस की सीमा -3000 रुपए

– छोटे शहरों में न्यूनतम बैलेंस की सीमा – 2000 रुपए

– ग्रामीण इलाके में न्यूनतम बैलेंस की सीमा- 1000 रुपए

एक अप्रैल 2018 से पहले लगने वाला लो बैलेंस चार्ज-

-बैलेंस 50 फीसदी कम होने पर चार्ज- 30 रुपए और जीएसटी

-75 फीसदी तक कम होने पर चार्ज -40 रुपए और जीएसटी

-75 फीसदी से ज्यादा कम होने पर चार्ज -50 रुपए और जीएसटी

एक अप्रैल 2018 के बाद लगने वाला लो बैलेंस चार्ज-

– बैलेंस 50 फीसदी कम होने पर चार्ज- 10 रुपए और जीएसटी

– 75 फीसदी तक कम होने पर चार्ज -12 रुपए और जीएसटी

– 75 फीसदी से ज्यादा कम होने पर चार्ज -15 रुपए और जीएसटी

कर्नाटक में मजबूत हुआ जेडीएस-बसपा गठबंधन

बंगलुरू। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को झटका लगा है तो वहीं जेडीएस और बसपा गठबंधन मजबूत हुआ है. 4 अप्रैल को अचानक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के चुनावी क्षेत्र चामुंडेश्वरी से 25 कांग्रेस नेता जेडी(एस) में शामिल हो गए. इसके बाद कर्नाटक का चुनावी माहौल अचानक गरमा गया है.

इस दलबदल के बाद एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि वो सिद्धारमैया को हराएंगे. कर्नाटक चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने देवेगौड़ा की पार्टी से गठबंधन किया है. दोनों पार्टियां मिलकर चुनाव लड़ेंगी. बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती और जेडीएस के अध्यक्ष मिलकर एक चुनावी सभा को भी संबोधित कर चुके हैं. वहीं दूसरी तरफ यह भी खबर है कि दो जेडी (एस), एक कांग्रेस और एक निर्दलीय नेता जल्द ही बीजेपी ज्वाइन कर सकते हैं.

दलितों के बंद में नीली पट्टी बांध करणी सेना के युवक ने की घुसपैठ!

0

नई दिल्ली। एससी/एसटी एक्ट के खिलाफ दलित समाज के भारत बंद आंदोलन को लेकर तमाम तरह की निगेटिव खबरें दिखाई जा रही है. तमाम चैनल और समाचार पत्र दलित संगठनों और दलित समाज के लोगों को खलनायक बनाने में जुटे हुए हैं. इस बंद को हिंसक कह कर प्रचारित किया जा रहा है. लेकिन इस बीच कई ऐसे वीडियो और फोटो सामने आए हैं, जिसमें साफ दिख रहा है कि दूसरे लोगों ने दलितों की भीड़ पर गोलियां चलाई. तो एक ऐसी फोटो भी सामने आई है, जिसमें साफ दिख रहा है कि पिछले दिनों करणी सेना के आंदोलन में शामिल युवक माथे पर नीली पट्टी बांध कर दलित आंदोलन में भी शामिल है.

एक सोशल मीडिया यूजर ने इस शख्स की फोटो ट्विट की है. यूजर ने फोटो शेयर करते हुए लिखा कि ये शख्स करणी सेना प्रदर्शन के दौरान राजपूत था और भीम आंदोलन में किसी और रूप में बदल गया. करणी सेना प्रोटेस्ट में इस शख्स के माथे पर तिलक और हाथ में तलवार है जबकि इसी शख्स ने भीम आंदोलन में माथे पर नीला पट्टा बांधा हुआ है.

तो वहीं अलवर का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें एक शख्स दलितों की भीड़ पर अपने छत से ताबड़-तोड़ गोली चला रहा है (दलित दस्तक के पास वीडियो है). इसमें कई लोग गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हुए. स्थानीय लोग इस शख्स की पहचान 60 फुट रोड निवासी दीपक (गोलु पहलवान) के रूप में कर रहे हैं. उनका कहना है कि यह सब पुलिस की मूजौदगी में हुआ है. उनका यह भी आरोप है कि पुलिस ने गोली चलाने वाले शख्स पर कार्यवाही ना करते हुए शांति से रैली निकाल रहे दलितों पर लाठीचार्ज किया.

एससी-एसटी एक्ट को लेकर अब भी इन इलाकों में है तनाव

नई दिल्ली। SC/ST एक्ट में बदलाव के बाद 2 अप्रैल को दलित समुदाय द्वारा किए गए भारत बंद का असर अब भी देश के कई हिस्सों में देखा जा रहा है. राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके में भी तनाव है. राजस्थान में धारा 144 और कर्फ्यू बुधवार को भी लगा रहा.

उत्तर प्रदेश के हापुड़ और मेरठ में तनाव बना हुआ है. दो अप्रैल को हापुड़ के कई इलाकों में हिंसा की हुई थी. स्थानीय लोगों ने इसके लिए दूसरे वर्ग के लोगों पर आरोप लगाया था. तो वहीं स्थानीय लोगों का यह भी आरोप था कि कई गोदाम मालिकों ने खुद अपने गोदामों में आग लगा लिया और इसके लिए आंदोलनकारियों को जिम्मेवार ठहराया. इसको देखते हुए हापुड़ में 3 अप्रैल को प्राथमिक और जूनियर हाई स्कूल बंद रहें. हालांकि अब हिंसा की कोई खबर नहीं है लेकिन आज भी यहां तनाव बना हुआ है.

मेरठ में बसपा विधायक योगेश वर्मा की गिरफ्तारी के कारण बसपा कार्यकर्ताओं और योगेश वर्मा के समर्थकों में गुस्सा है. उनका कहना है कि बसपा विधायक को साजिशन फंसाया गया है.

बुधवार को मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले के महाराजपुर थाने इलाके में कर्फ्यू में थोड़ी ढील दी गई है. इसके अलावा वहां पर इंटरनेट सर्विस भी दोबारा चालू कर दी गई है. प्रदेश के भिंड और मुरैना में अभी भी कर्फ्यू लगा हुआ है, वहीं इंटरनेट अभी भी बंद है. तो वहीं सागर और बालाघाट जैसे इलाकों में अभी भी धारा 144 लागू है. आपको बता दें कि भिंड में 70 ज्ञात और 3400 अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है.

ग्वालियर में कर्फ्यू ग्रस्त थाना क्षेत्र के सभी हथियारों के लाइसेंस निरस्त कर दिए हैं. इनकी संख्या करीब 6 हज़ार है. हालांकि, इंटरनेट सेवा बहाल करने के घोषणा की गई है. जिले में अब तक 65 लोगों की गिरफ्तारी हुई है. इसके अलावा अलग-अलग थानों में अब तक कुल 29 FIR दर्ज हुईं हैं.

राजस्थान के आधे दर्जन जिलों में अभी तक धारा 144 लगी हुई है. साथ ही इन जिलों में इंटरनेट की सुविधा भी बंद है. जिन इलाकों में तनाव बरकरार है, वहां पर पैरामिलिट्री फोर्स को तैनात किया गया है. वहीं अलवर में सीआरपीएफ की कंपनियों को तैनात किया गया है. मंगलवार की घटना के बाद हिंडौन में बीएसएफ ने फ्लैग मार्च किया था.

राजस्थान के करौली जिले के हिंडौन कस्बे में 5,000 लोगों की उग्र भीड़ द्वारा वर्तमान भाजपा विधायक और एक पूर्व विधायक के घरों में आग लगाने और अन्य स्थानों पर आगजनी एवं पत्थरबाजी की घटना के बाद कर्फ्यू लगा दिया गया था. हिंडौन में अभी भी कर्फ्यू जारी है. इलाके में बस, स्कूल और इंटरनेट की सुविधा बंद है. इसके अलावा लगातार पुलिस इलाके में गश्त कर रही है.

गौरतलब है कि SC/ST एक्ट में हुए बदलावों के खिलाफ केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक लगाने से इनकार दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भारत बंद के दौरान हुई हिंसा पर कहा, ‘अदालत के बाहर क्या हो रहा है इससे कोर्ट का कोई लेना देना नहीं है.’

कर्नाटक चुनावः मठों की राजनीति में राहुल से पिछड़े अमित शाह

बंगलुरू। कर्नाटक चुनाव में जहां सत्ता की चाबी जनता के हाथ में है तो वहीं सत्ता तक पहुंचने का रास्ता जनता के अलावा तमाम मठों से भी होकर गुजरता है. प्रदेश के तमाम लोग अपना फैसला उस मठ के आदेश के बाद लेते हैं, जिसके वो फॉलोअर होते हैं. यही वजह है कि राजनीतिक दल तमाम मठों में माथा टेक रहे हैं. लेकिन इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से आगे निकल गए हैं.

बीते मंगलवार को राहुल गांधी और अमित शाह जनसभाओं के अलावा मठों में पहुंचे. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह हवेरी जिले के कनक गुरुपीठ गए. हालांकि, यहां उन्हें गुरुपीठ के मुख्य स्वामी श्री श्री निरंजनानंद पुरी से आशीर्वाद नहीं मिल पाया. दरअसल, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मुख्य स्वामी यहां मौजूद ही नहीं थे. लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को मुख्य पुजारी से मिलने का मौका मिल गया. राहुल गांधी ने ट्विटर पर इस मुलाकात की फोटो भी शेयर की है. मठ के सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी का कार्यक्रम बहुत पहले से निर्धारित था, यही वजह रही कि अमित शाह के पहुंचने पर मुख्य स्वामी उपलब्ध नहीं हो पाए.

कनक गुरुपीठ पिछड़े समुदाय का सबसे असरदार मठ माना जाता है. यही वजह है कि यहां के मुख्य स्वामी से मुलाकात होने और न होने के भी बड़े राजनीतिक मायने हैं. गौरतलब है कि राज्य के सभी 30 जिलों में मठों का जाल फैला हुआ है. जातीय समीकरण के लिहाज से मठों का अपना प्रभुत्व और दबदबा है, जो राजनैतिक दलों को उनकी ओर आकर्षित करता है. राज्य में 12 मई को 224 सीटों पर मतदान होना है. जबकि वोटों की गिनती 15 मई को होगी.

पढ़िए, SC-ST एक्ट पर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा

0

नई दिल्ली। SC/ST एक्ट में गिरफ्तारी से पहले जांच अनिवार्य करने के मामले में केंद्र की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हम एक्ट के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन बेगुनाह को सजा न मिले, यह देखा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा, आइए इस पर डालते हैं एक नजर-

  • सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि हम फिलहाल तुरंत गिरफ्तारी पर रोक के निर्देश पर रोक नहीं लगाएंगे. SC/ST एक्ट में केस दर्ज दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच जरूरी है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीडित को मुआवजे का भुगतान तुरंत किया जा सकता है चाहे शिकायत आने के बाद FIR दर्ज ना हुई हो. कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि FIR, IPC के अन्य प्रावधानों पर दर्ज हो सकती है.
  • कोर्ट यह चाहती है कि किसी निर्दोष को सजा न मिले. क्योंकि यह इकलौता ऐसा कानून है कि जिसमें किसी व्यक्ति को कोई कानूनी मदद नहीं मिलती है. अगर एक बार मामला दर्ज हुआ तो व्यक्ति गिरफ़्तार हो जाता है, क्योंकि इस मामले में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है.

जस्टिस आदर्श कुमार गोयल ने कहा कि अन्य अपराध में आरोपों को वैरीफाई किया जा सकता है लेकिन इस कानून में आरोपों को वैरीफाई करना मुश्किल है इसलिए इस तरह की गाइडलाइन जारी की गई. सरकारीकर्मियों का पक्ष लेते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर सरकारी कर्मी पर कोई आरोप लगाए तो वो कैसे काम करेगा. हमने एक्ट को नहीं बल्कि सीआरपीसी की व्याख्या की है.

इस मामले के कारण देश भर में हो रहे प्रदर्शन पर कोर्ट का कहना था कि हम सिर्फ कानूनी बात करेंगे, बाहर क्या हो रहा है हमें नहीं पता. हमने शिकायत की वैरिफिकेशन के लिए सात दिनों का वक्त रखा है.

पुलिस ने आरएसएस नेता को गरियाया तो याद आई गरिमा

आरएसएस के नेता और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर राकेश सिन्हा पुलिस के व्यवहार से काफी आहत हैं. उन्होंने अपने आहत मन की बात ट्विटर पर लिखा है. असल में उनकी भावना इसलिए आहत हुई है क्योंकि पुलिस ने उन्हें दलित एक्टिविस्ट समझ कर जबरन गाड़ी में बैठा लिया और अभ्रद भाषा (इसे गरियाना ही कहते हैं) का इस्तेमाल किया.

घटना दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान नोएडा की है. राकेश सिन्हा घटना के समय नोएडा के फिल्म सिटी एरिया में एक न्यूज चैनल पर पैनल डिस्कशन के लिए गए थे. वह वहां से लौट रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें दलित प्रदर्शनकारी समझकर गिरफ्तार कर लिया. सिन्हा के ट्विट के मुताबिक “अनिल कुमार शाही के नेतृत्व में ज़बरन पुलिस उन्हें गाड़ी में बैठाकर ले गयी. उनका व्यवहार अशोभनिया था. धमकी भरा था. भीड़ जुटने पर 500 मीटर दूर जाकर छोड़ा. बाद में सफ़ाई दी. मुझे दलित एक्टिविस्ट समझ बैठे.”

आरएसएस नेता का कहना है कि पुलिस को किसी के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने से पहले कम से कम उस शख्स की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए. यहीं उन्होंने पुलिस की भी बात बताई है. जब राकेश सिन्हा ने अपना परिचय दिया तो पुलिस ने उन्हें बताया कि उन्हें लगा कि राकेश सिन्हा दलित प्रदर्शनकारी हैं इसीलिए गलती से उन्होंने मुझे गिरफ्तार कर लिया.

यहां सवाल यह है कि पुलिस ने संघ के नेता को दलित प्रदर्शनकारी समझ कर जबरन गाड़ी में बैठा लिया. उन्हें गालियां दी. बाद में यह जानकर कि वह दलित प्रदर्शनकारी नहीं बल्कि समान्य वर्ग से ताल्लुक रखने वाले संघ के नेता हैं तो पुलिस ने उन्हें तुरंत छोड़ दिया. तो क्या दलित प्रदर्शनकारियों की कोई गरिमा नहीं होती और पुलिस जैसे चाहे उनके साथ अभद्रता कर सकती हैं?? 2 अप्रैल को प्रदर्शन में शामिल सभी लोग कोई आम नागरिक या राजनैतिक प्रदर्शनकारी नहीं थे, बल्कि उसमें कई लोग सरकारी कर्मचारी और अधिकारी थे, पत्रकार, डॉक्टर और वकील थे. क्या उनकी कोई गरिमा नहीं थी? क्या प्रदर्शनकारियों के कोई नागरिक और मौलिक अधिकार नहीं थे?

अपनी मांगों के पक्ष में शांतूपूर्ण प्रदर्शन करना तो किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है, चाहे वो संघ का नेता हो या फिर दलित प्रदर्शनकारी. लेकिन शायद भारत की सच्चाई यही है कि यहां किसी व्यक्ति के साथ व्यवहार उसके मौलिक अधिकार को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता है, बल्कि उसकी जाति, धर्म और उसका पद देखकर किया जाता है. आरएसएस नेता को इसके खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिए. भाजपा शासित राज्यों में लगातार दलितों के नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है. दलितों पर एक के बाद एक अत्याचार हो रहे हैं. संघ के इन नेता महोदय को अपने संगठन के मंच से इस बात पर भी आवाज उठानी चाहिए.

दलित दूल्हे की बारात निकालने की मांग को हाई कोर्ट ने किया खारिज

1

लखनऊ। यूपी में दलित समाज का एक युवक अपनी दुल्हन के घर तक बारात लेकर जाना चाहता है, लेकिन शायद यूपी की योगी सरकार उसे ऐसा नहीं करने देना चाहती. हाथरस के बसई बाबा गांव के संजय कुमार की माने तो ऐसा ही लगता है.

असल में संजय की शादी ठाकुर बहुल गांव में तय हुई है. संजय अपनी दुल्हन के घर तक गाजे-बाजे के साथ बारात लेकर जाना चाहते हैं. लेकिन दिक्कत यह है कि उस गांव में जातिवादियों का इतना वर्चस्व है कि उस गांव में किसी जाटव को ठाकुरों के घर के सामने से अपनी बारात ले जाने की अनुमति नहीं है.

संजय कुमार ने हाईकोर्ट में अपील कर ठाकुर बहुल गांव में रहने वाली दुल्हन के घर तक बारात निकालने की इजाजत मांगी थी, लेकिन यूपी सरकार की रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी है. दरअसल कोर्ट द्वारा मामले में अपील के बाद पिछले सप्ताह DM और SP ने दुल्हन के गांव निजामाबाद (कासगंज जिला) का दौरा किया. इसके बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट में रास्ते में नाले, कूड़े और चौड़ाई का हवाला देकर बारात निकालने की इजाजत देने से इनकार कर दिया. अधिकारियों ने बारात निकालने की इजाजत न देने के पीछे यह भी बहाना दिया कि अब तक उस रास्ते से कभी जाटवों की बारात नहीं निकली.

जबकि दूल्हा और उसके परिवार वालों का आरोप है कि ठाकुर समुदाय नहीं चाहता कि उनके घर के सामने से कोई दलित बारात निकाले. संजय कुमार कहते हैं, ‘संविधान कहता है कि हम सब बराबर हैं, और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि हम सब हिंदू हैं. वे एक हिंदूवादी पार्टी के मुखिया हैं. फिर हमें ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ रहा है.’ ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल के सदस्य कुमार पूछते हैं, ‘क्या मैं हिंदू नहीं हूं? एक संविधान से चलने वाले देश में लोगों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते.’

सवर्णों की मानसिकता ही नहीं बदली तो क्या बदला

गावों से शहरों में आकर बसे दलित वर्ग के लोग इस भ्रम में जी रहे हैं कि वक्त के साथ-साथ जाति-प्रथा कमजोर पड़ती जा रही है. यह भ्रम यूं ही नहीं पनप रहा है. इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण इन लोगों को दिखता है, वह है… आफिस में काम करने वाले सभी वर्गों के लोगों का एक साथ बैठकर खाना खाना… साथ-साथ काम करना… साथ-साथ बिना किसी अलगाव के बातचीत करना. किंतु मैंने कभी भी इस भ्रम प्रकार को नहीं पाला. कारण कि यह ऊपरी तौर एक प्रकार की बाध्यता का परिणाम है. जातपाँत ज्यों के त्यों ही नहीं अपितु और अधिक पुख्ता हुई है.
दलित और गैरदलितों के बीच ही नहीं अपितु दलित वर्ग के लोग अपनी-अपनी जाति के ढोल पीटने में लग गए हैं. इसके परिणाम स्वरूप जातीय संस्थओं की बाढ़ सी आ गई है. दलितों को यह नही भूलना चाहिए कि ये जो थोड़ा-बहुत परिवर्तन देखने को मिल रहा है, यह केवल शिक्षा-दीक्षा के प्रसार-प्रचार और भौगोलिक मान्यताओं में परिवर्तन होने के चलते दिख रहा है… अन्यथा नहीं. गहरे से देखा जाए तो गैर दलितों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है जिसके प्रमाण व्यापक रूप से विद्यमान हैं. शहरी दलित यदि गावों की ओर मुंह उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि दलितों के साथ गैरदलितों के व्यवहार में कुछ भी तो अंतर नहीं आया है, केवल और केवल ऊपरी तौर पर कुछ नरमी देखने को मिलती है. मानसिकता कतई नहीं बदली है. अलग-अलग राज्यों से जब-तब दलित उत्पीड़न की घटनाएं सामने आती रहती हैं.
पिछले दिनों राजस्थान विधानसभा में खुद सरकार की तरफ से यह जानकारी उपलब्ध कराई गई कि तीन साल में दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने से रोकने की 38 घटनाएं लिखा-पढ़ी में सामने आई हैं. करीब दो साल पहले मध्य प्रदेश में एक दलित दूल्हे का हेल्मेट लगाए फोटो चर्चा में आया था. उसकी वजह भी घोड़ी पर चढ़कर बारात आना था. विरोध कर रही भीड़ ने पहले उसकी घोड़ी छीन ली, फिर पथराव शुरू कर दिया. दूल्हे को घायल होने से बचाने के लिए पुलिस को उसके लिए हेल्मेट का बंदोबस्त करना पड़ा. इन्हीं घटनाओं से एक सवाल उपजता है कि दलित शादी करें, इस पर किसी को कोई ऐतराज नहीं होता है लेकिन दूल्हा घोड़ी पर बैठकर नहीं आ सकता, इस सोच की कुछ और वजह नहीं अपितु गैरदलितों की नाक का सवाल है.
 मोदी जी के गुजरात में आज भी बहुत से गाँव ऐसे हैं जहाँ दलित वर्ग के लोग आज भी कुए से अपने आप पानी नहीं निकाल पाते हैं. दुखद ये भी है कि कुए से पहले गैरदलित अपने लिए पानी निकालते हैं और उसके बाद दलित वर्ग के लोगों को खुद पानी निकालकर देते हैं. इस काम में घंटा लगे या दो घंटा दलितों को पानी लेने के लिए इंतजार करना पड़ता है….. क्या शहरी दलितों को ग्रामीण दलितों की पीड़ा का कुछ भान होता है? नहीं….मुझे तो ऐसा नहीं लगता. कोई शक नहीं कि आजाद भारत में संविधान की रोशनी में समतामूलक समाज की बात होती आई है लेकिन कुछ प्रतीक ऐसे हैं जो खास वर्ग की पहचान से अभी तक जुड़े हुए हैं. खास वर्ग उन प्रतीकों को साझा करने को तैयार नहीं है. उसको लगता है कि साझा करने से उसकी ‘श्रेष्ठता’ जाती रहेगी.
ताजा खबर ये है कि कासगंज (इलाहाबाद) के निजामपुर गाँव में आज तक दलित दुल्हे की घोड़ी  पर चढ़कर  कोई बारात नहीं निकली है. ताजा मामला ये है कि दलित वर्ग के दुल्हे संजय कुमार घोड़ी पर सवार होकर अपनी बारात निकालना चाहते है. इसके लिए उन्होंने जिला स्तर के बड़े अधिकारियों से गुहार लगाई किंतु सब बेकार. आखिरकार संजय ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. संजय का आरोप है कि निजामपुर के सवर्ण उनके घोड़ी पर बैठकर बारात निकालने का विरोध कर रहे हैं. कानून व्यवस्था का हवाला देकर स्थानीय प्रशासन ने घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने की इजाजत देने से इंकार कर दिया था. कोर्ट से भी संजय को निराशा ही हाथ लगी. कोर्ट ने इस बिना पर संजय की याचिका खारिज कर दी कि यदि याची को किसी प्रकार की परेशानी है तो वह पुलिस के माध्यम से मुकदमा दर्ज करा सकता है. अगर दुल्हे य दुलहन पक्ष के लोगों से कोई जोर-जबरदस्ती करें तो वह पुलिस में इसकी शिकायत कर सकते हैं. कोर्ट के इस निर्णय पर हैरत की बात ये है कि पुलिस अधिकारी तो पहले ही संजय की चाहत को यह कहकर खारिज कर चुकी है कि यदि संजय घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालता है तो ऐसा करने निजामपुर का माहौल बिग़ड़ सकता है. संजय ने अपने इस मामले को मुख्यमंत्री तक को भेजा है किंतु मुख्यमंत्री जी मौन साधे हुए हैं. वैसे वो दलित समर्थक होने का दावा करते हुए नहीं थकते हैं. इतना ही नहीं, दुल्हन के परिवार से कहा गया है कि बारात के लिए उसी रास्ते का इस्तेमाल किया जाए जिससे गांव के सभी दलितों की बारात जाती है
इस फैसले का शीतल का परिवार विरोध कर रहा है. उनका कहना है कि यह हमारे सम्मान की बात है. हम काफी जोर-शोर के साथ दूल्हे का स्वागत करना चाहते हैं और घोड़े वाली बारात चाहते हैं. गांव की सड़कें जितनी ठाकुरों की हैं उतनी ही हमारी भी हैं. इसकी वजह से जाटव (शीतल और संजय इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं) और ठाकुरों के बीच तनाव का माहौल है.
गांव की प्रधान ठाकुर कांति देवी का कहना है, “हमें कोई दिक्कत नहीं है. लड़की की शादी हो, ठाकुर लोगों को कोई एलर्जी नहीं है. हम बारात का तहेदिल से स्वागत करेंगे. शीतल हमारी भी बेटी है किंतु दिक्कत यह है कि कोई जबर्दस्ती हमारे रास्ते पर आएगा और परंपरा को तोड़ेगा तो वो हमें मंजूर नहीं है.”
यूपी कैडर के रिटायर्ड आईपीएस एसआर दारापुरी इन हालात के लिए दो चीजें जिम्मेदार मानते हैं. एक, समाज के अंदर सामंतवादी सोच जिंदा है जो बदलाव स्वीकार करने को तैयार नहीं. उसे लगता है कि जैसे पुरखों के जमाने से होता आ रहा है, वैसे आगे भी पुश्त दर पुश्त चलता रहे. अगर दलित भी बराबर में आ खड़े हुए तो उन्हें अतिरिक्त सम्मान मिलना खत्म हो जाएगा. दूसरी चीज, सरकारी तंत्र भी सवर्णवादी मानसिकता से उबर नहीं पा रहा है. उसे लगता है कि सवर्णों की हर बात जायज है. यूपी का ही उदाहरण लें तो वहां के कलेक्टर का यह कहना है कि ‘उस जिले में पहले कभी दलित की घुड़चढ़ी नहीं हुई’, बहुत ही हास्यास्पद है. यह सलाह कि ‘अगर घुड़चढ़ी जरूरी है तो चुपके से कर ली जाए’ यह और भी हास्यास्पद है.
हाल ही में गुजरात के भावनगर जिले में कुछ गैरदलित लोगों ने घोड़ा रखने और घुड़सवारी करने पर एक दलित की हत्या कर दी. प्रदीप राठौर (21) ने दो माह पहले एक घोड़ा खरीदा था और तब से उसके गांववाले उसे धमका रहे थे. उसकी गुरुवार देर रात हत्या कर दी गई. प्रदीप के पिता कालुभाई राठौर ने कहा कि प्रदीप धमकी मिलने के बाद घोड़े को बेचना चाहता था, लेकिन उन्होंने उसे ऐसा न करने के लिए समझाया. कालुभाई ने पुलिस को बताया कि प्रदीप गुरुवार को खेत में यह कहकर गया था कि वह वापस आकर साथ में खाना खाएगा. जब वह देर तक नहीं आया, हमें चिंता हुई और उसे खोजने लगे. हमने उसे खेत की ओर जाने वाली सड़क के पास मृत पाया. कुछ ही दूरी पर घोड़ा भी मरा हुआ पाया गया. गांव की आबादी लगभग 3000 है और इसमें से दलितों की आबादी लगभग 10 प्रतिशत है. प्रदीप के शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भावनगर सिविल अस्पताल ले जाया गया है, लेकिन उसके परिजनों ने कहा है कि वे लोग वास्तविक दोषियों की गिरफ्तारी तक शव स्वीकार नहीं करेंगे.
ऐसी घटनाएं गैरदलितों की मानसिकता की पोल खोलने के लिए काफी हैं. अत: मेरा सबसे ये निवेदन है कि किसी प्रकार के परिवर्तन का भ्रम न पालकर समूचे समाज के भले के लिए बिना किसी वैमनस्य के जीजान से काम करें. ऐसे प्रकरण ऐसा सन्देश भी देते है कि शासन-प्रशासन के भरोसे सामाजिक एकता की कामना करना एक दिवास्वप्न जैसा ही है.
-तेजपाल सिंह ‘तेज’-