पाटण, गुजरात। एक फरवरी को जब देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में देश का बजट पेश कर रही थीं, और उसके ठीक बाद मीडिया से लेकर सत्ता पक्ष और खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह द्वारा इसको साल 2047 के भारत की स्वर्णिम तस्वीर बताई जा रही थी। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह राज्य गुजरात से एक खबर आई।
गुजरात के पाटन जिले में घोड़ी पर चढ़कर बारात निकालने के कारण जातिवादी गुंडों ने दलित समाज के युवा पर तलवार से हमला कर दिया। विशाल चाबड़ा नामक युवा घोड़ी पर बारात लेकर निकला। इसी बीच बारात जब चंद्रुमना गांव पहुंची तो जातिवादी गुंडों ने बारात को घेर लिया। उन्होंने वही दकियानुसी तर्क दोहराया कि आखिर दलित समाज का दूल्हा घोड़ी पर बारात कैसे निकाल सकता है।
गुजरात और राजस्थान में जातिवादियों द्वारा अपना अहम और वर्चस्व दिखाने के लिए ऐसी घटना को अंजाम देना एक घटिया प्रथा सी बनती जा रही है।
फरवरी 2024 में गांधीनगर में चड़ासना गांव में दलित दूल्हे विकास चावड़ा के साथ घोड़ी से खींचकर मारपीट की गई थी।
तो वहीं 2020 में बनासकांठा में सेना के जवान की बारात पर सिर्फ इसलिए पथराव किया गया क्योंकि वह घोड़ी पर बैठा था। इसी तरह 18 जून 2018 को बीबीसी में प्रकाशित खबर के मुताबिक गुजरात के माणसा तहसील के पारसा गांव में बारात लेकर पहुंचे दलित युवक को जातिवादी गुंडों ने घोड़ी से नीचे उतार दिया।
आप खबर के नीचे आखिर में मीडिया में प्रकाशित उन खबरों में देख सकते हैं कि यह कोई अकेली घटनाएं नहीं है, बल्कि यह कथित अगड़ी जातियों के बीच बड़ी बीमारी बनती जा रही है। यह बीमारी गुजरात और राजस्थान के बाद हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भी पहुंच गई है। वहां से भी ऐसी कई खबरें सामने आ चुकी है।
सवाल है कि भारत की सरकार देश को तो साल 2047 के विकसित और शानदार भारत का सपना दिखा रही है, लेकिन क्या वह देश की आजादी के 100 साल बाद 2047 में जातिवादी भारत को भी देखना चाहेगी, अगर नहीं तो देश की 25 फीसदी से अधिक आबादी को जिस जातिवाद के सवाल से हर रोज जूझना पड़ता है, उस सवाल के हल पर बात क्यों नहीं करना चाहती। क्योंकि अगर जातिवाद पर गंभीर चर्चा शुरू नहीं हुई तो देश भले ही 2047 में आजादी के 100 साल का जश्न मना रहा होगा, देश के दलितों और आदिवासियों की एक बड़ी आबादी को अगर जातिवादी घटनाओं से छुटकारा नहीं मिलता, समानता नहीं मिलती तो उनके लिए यह जश्न अधूरा ही रहेगा। सवाल यह भी है कि आखिर एक वर्ग को इंसान से ज्यादा घोड़ी क्यों प्यारी है?


अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।

