बोधगया। बिरसा फुले आंबेडकर समता फाउंडेशन (BPASF) के तत्वावधान में देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), जामिया मिल्लिया इस्लामिया, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार (CUSB), दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), पंजाब तथा मगध विश्वविद्यालय से आए विद्वान, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ता बोधगया में एक ऐतिहासिक तीन दिवसीय सम्मेलन के लिए एकत्र हुए हैं। यह सम्मेलन 7 फरवरी से 9 फरवरी तक अंतरराष्ट्रीय ध्यान केंद्र, बोधगया में आयोजित किया जा रहा है। यह कार्यक्रम आलोचनात्मक अकादमिक विमर्श और सामाजिक आंदोलनों को एक साझा मंच पर लाकर समानता, न्याय और दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन में उच्च शिक्षा की भूमिका पर गंभीर मंथन का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
इस सम्मेलन में देश के प्रमुख और प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की सक्रिय भागीदारी रही। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. हरिश वानखेड़े, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सुकुमार तथा पंजाब से प्रो. जसवंत राय जैसे प्रमुख वक्ताओं ने अपने व्याख्यानों और सत्रों के माध्यम से समकालीन उच्च शिक्षा, जाति, सामाजिक न्याय और बहुजन विमर्श पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया। इन प्रमुख वक्ताओं के विचारों ने सम्मेलन के बौद्धिक एजेंडे को दिशा दी और सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न को अकादमिक केंद्र में स्थापित किया।
इन प्रमुख वक्ताओं के साथ-साथ देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से आए अन्य प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं और स्वतंत्र विद्वानों ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया। इन विद्वानों ने जाति, शिक्षा, प्रतिनिधित्व, ज्ञान-न्याय, बहुजन अध्ययन, लोकतंत्र और सामाजिक असमानताओं जैसे विषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए, जिससे यह सम्मेलन बहुस्तरीय और बहुविषयक अकादमिक संवाद का सशक्त मंच बना।
इस सम्मेलन का केंद्रीय उद्देश्य सामाजिक चेतना का निर्माण करना और फुले-आंबेडकरवादी आंदोलन को सशक्त करना है, जिसमें शिक्षा और अकादमिक जगत को सामाजिक परिवर्तन के प्रभावशाली औज़ार के रूप में विशेष महत्व दिया गया है। आयोजकों के अनुसार यह केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह गहराई से जमी असमानताओं और बहुजन समुदाय के विरुद्ध जारी बहिष्करण की संरचनाओं को चुनौती देने वाला एक सचेत राजनीतिक, सामाजिक और बौद्धिक हस्तक्षेप है।
बाद के सत्रों में बहुजन समुदाय के लिए उच्च शिक्षा तक पहुँच, प्रतिनिधित्व, संरचनात्मक भेदभाव, प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों की चुनौतियाँ, आर्थिक असुरक्षा, जाति-आधारित भेदभाव और विश्वविद्यालयों में व्याप्त संस्थागत बहिष्करण जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिरोध, सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण स्थल भी हैं।
महत्वपूर्ण रूप से, यह सम्मेलन अपने दृष्टिकोण को “सामाजिक न्याय से सामाजिक परिवर्तन” की दिशा में आगे बढ़ने के रूप में प्रस्तुत करता है। प्रतिभागियों ने कहा कि वर्तमान संदर्भ में शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि बहुजन समुदाय के लिए स्थायी समानता, गरिमा और बंधुत्व के निर्माण का सामूहिक उपकरण माना जाना चाहिए।
उद्घाटन सत्र और समापन सत्रों में वक्ताओं ने गौतम बुद्ध, संत रविदास, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, बिरसा मुंडा, डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम की वैचारिक परंपरा से प्रेरणा लेते हुए मानव गरिमा, सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक परिवर्तन के लिए इस विरासत की समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
बिरसा फुले आंबेडकर समता फाउंडेशन (BPASF) ने शोध, अकादमिक विमर्श और सामाजिक आंदोलनों को जोड़ने वाले मंचों के निर्माण के प्रति अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दोहराया है और भविष्य में इस प्रकार के और व्यापक राष्ट्रीय स्तर के अकादमिक-सामाजिक हस्तक्षेप जारी रखने की घोषणा की है।
इस ऐतिहासिक सम्मेलन के आयोजन की ज़िम्मेदारी शोधार्थियों और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की एक सक्रिय टीम ने संभाली है। आयोजन टीम में अखिलेश कुमार, प्रकाश प्रियदर्शी, रूपक, संदीप, दयाशील और मनीष शामिल हैं। आयोजक टीम ने सीमित संसाधनों के बावजूद इस राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन को सफलतापूर्वक आयोजित कर अकादमिक और सामाजिक आंदोलनों के बीच एक सशक्त सेतु निर्मित किया है।
रिपोर्ट- अखिलेश कुमार, शोध छात्र, जामिया मिल्लिया इस्लामिया
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