पिछले महीने बिहार विधान सभा के चुनाव पूरे हुये और नीतीश कुमार ने बीस सालों में दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाया। चूंकि ये बिहार के चुनाव थे जहाँ भात-रोटी पर बाते कम होती है और चुनावी चटनी-अचार पर चटख़ारे ज़्यादा लिये जाते है तो देश भर के सियासी उस्तादों की नज़र इन चुनावो पर थीं।
चुनाव के नतीजे
नवंबर 14 को चुनाव के नतीजे आये और क्या ही नतीजे आये! लहंगे तक को रिमोट से उठा देने का दावा करने वाले बिहारी हो या चाणक्य के तथाकथित गुजराती कक्का अमित शाह हो, सब अपने-अपने पसंदानुसार आँखे फटने और बाँछे खिलने के बीच के प्रतिक्रिया स्पेक्ट्रम पर जहाँ-तहाँ बेलौस लोट गये। यहाँ तक कि मनुस्ट्रीम मीडिया में एग्जिट पोल का धंधा करने वाले लोग भी, जो आनुवंशिक कारणों से संघ-भाजपा के लिए जाति-जनित वैदिक प्रेम के बीमार होते हैं, अपने महबूब की आगामी फ़तह की भविष्यवाणी में उन्नीस रह गये। ये तो कहा कि मोदी-शाह मुशायरा लूट लेंगे, पर जाते-जाते शामियाना-दरी-गद्दे वगैरह भी उठा ले जायेंगे, ये नहीं कह पाये।
अल्पसंख्यक जातियों का चुनाव में धमाकेदार प्रदर्शन
इस चुनाव की एक और ख़ास बात ये रही कि अल्पसंख्यक सवर्ण जातियों ने अपनी आबादी से कई गुना ज़्यादा सीटें जीतने में 1990 से पहले वाले वक़्त की याद दिला दी। वही वक़्त, जब वोट-चुनाव-सरकार के खेल-तमाशे इन अल्पसंख्यक जातियों की बपौती हुआ करती थी। इन चुनावों में राजपूत, बामन और बाभन (कुल जनसंख्या- 9.97%) जातियों से आने वाले उम्मीदवारों ने 72 सीटों पर जीत हासिल की जो कुल सीटों का 30% है, और इस तरह अपनी जनसंख्या से तीन गुना अधिक सीटें जीतीं। क्या बिहार की राजनीति अल्पसंख्यक सवर्णो के स्वर्ण युग की ओर लौट रही है और वंचित तबकों की सामाजिक न्याय की मुहीम पूरी तरह बिखर चुकी है, ये राज़ फ़िलहाल भविष्य के गर्भ में छुपे हैं।
चौंकाने वाले नतीजों के संभावित कारण
“हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कॅरेक्टर ढीला” नीति
2022 में नरेंद्र मोदी ने विपक्ष की राज्य सरकारो की जनकल्याण योजनाओ को ‘रेवड़ी’ और ‘विकास’ के लिये घातक बताया। दो ही साल बाद 2024 लोक सभा चुनावों में सारे देश में संघ-भाजपा को झटका लगने के साथ-साथ बनारसीयों ने पर्सनली मोदी जी को ज़ोर का झटका धीरे से दिया और 2019 के साढ़े चार लाख से ज़्यादा के जीत के अंतर को 2024 में सिर्फ़ डेढ़ लाख पर ले आये। घबराकर, मोदी जी ने अपनी आदतानुसार पलटी मारी और महाराष्ट्र से हरियाणा होते हुये दिल्ली तक चुनावी रेवड़ियों की बौछार कर दी। बिहार में भी चुनाव की तारीख़े घोषित होने से ठीक पहले नीतीश कुमार ने अपने आराध्य नरेन्द्र मोदी की “हम करें तो रासलीला, तुम करो तो कॅरेक्टर ढीला” नीति का पालन करते हुये रेवड़ियों की पूरी टोकरी ही उझल दी।
बुज़ुर्गों और दिव्यांगों के लिए पेंशन ₹400 से बढ़ा कर ₹1,100, 125 यूनिट तक बिजली मुफ़्त, और सबसे धमाकेदार, चुनाव की तारीखों के ऐलान से ठीक पहले देहाती आजीविका मिशन “जीविका” के समूहों से जुड़ीं लगभग डेढ़ करोड़ औरतों के खातों में एक मुश्त ₹10,000 के भुगतान का ऐलान किया। इसके अलावा आंगनवाड़ी सहायिका, आशा कर्मियों, विकास मित्रों और टोला सेवको के लिए बढ़ी हुई योजना-भत्ता वगैरह का दाना भी डाला गया।
केंद्रीय चुनाव आयोग का धृतराष्ट्र-शकुनि डबल रोल
पिछले कुछ सालों में हुये चुनावों में चुनाव आयोग की कारगुज़ारियों की वजह से उसकी साख पर जो बट्टा लगा है, बिहार चुनाव में आयोग ने उसे दुरुस्त करने का ना ही कोई प्रयास किया बल्कि इस दुर्गति को ही मानक बना दिया। चाहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मुद्दे पर विपक्ष के शक़-सवालों की अनदेखी हो या आदर्श आचार संहिता लागू होने के ठीक पहले की गई रेवड़ी घोषणाओं को धृतराष्ट्र-रूपी चुप्पा मंज़ूरी देना हो, या चुनाव के दिन के ठीक पहले लाभार्थियों के खाते में पैसे भेजे जाने हो, आयोग ने सत्ता गठबंधन की तरफदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके आगे आयोग ने शकुनि रूप में आते हुये जीविका दीदियों को महिला वोटरों को बूथ तक लाने की जिम्मेवारी दी। कई इलाक़ों में इन जीविका दीदियों पर महिला वोटरों को बहलाने -फुसलाने और यहाँ तक कि सत्ता पक्ष के लिये वोट ना करने पर ₹10,000 की वापसी पर धमकाने का आरोप भी लगा। मामूल के मुताबिक चुनाव आयोग ने इन शिकायतों पर भी कोई कारवाई नहीं की। इसके अलावा सत्ता पक्ष द्वारा बेहिसाब चुनावी खर्चे पर लगाम लगाने की या राज्य के बाहर से आने वाले संघ-भाजपा के ढिंढोरचीयों पर रोक लगाने या उनकी हरकतों की निगरानी की कोई कोशिश नहीं की गई। सोशल मीडिया पर सैंकड़ों स्थापित और हज़ारों नव-पल्लवित “इन्फ्लुएंसर्स” द्वारा सत्ता पक्ष के लिये माहौल बनाने के लिए रील्स और शॉर्ट्स के खर्चे और भुगतान का भी कोई हिसाब-किताब नहीं रखा गया।
“सामाजिक न्याय” बनाम “सामाजिक तिकड़म”
बिहार की धरती पर सामाजिक न्याय के आंदोलनों का इतिहास दो हज़ार सालों से भी पुराना है, और उतना ही पुराना है शोषक जातियों द्वारा उसका विरोध- कभी बल से तो कभी छल से और अब बीसवीं-इक्कीसवीं सदी में शासकीय शक्ति और चुनावी जोड़-तोड़ से। चाहे कांग्रेस जैसे बामन-बनिया दल हों या संघ-भाजपा जैसे बनिया-बामन गिरोह, अथाह काला धन, सजातीय मीडिया-नौकरशाही और अन्य राजकीय-अराजकीय संस्थानों पर भुजंगपाश के बल पर ये पिछले 78-79 सालों से सामाजिक न्याय की हर मुहीम को कुंद करते आये हैं। मंडल आंदोलन से उभरी सामाजिक चेतना को पंगु करने के लिये शोषक तबकों ने बहुजन समुदाय से आने वाले कुछ महत्वाकांक्षी सयाने गधों को अपने पाले में किया और अब उसी सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत सबसे वंचित और हाशिये पर खड़ी जातियों को थोड़ी बहुत सशक्त हुई पिछड़ी जातियों के खिलाफ़ लामबंद कर रहे हैं। हालाँकि बहुजनवाद और सामाजिक न्याय के नाम पर ताल ठोकने वालीं पार्टियां भी इस मामले में बेऐब नहीं रहीं हैं। सामाजिक न्याय का मतलब सिर्फ़ कुछेक जातियों का सशक्तिकरण नहीं बल्कि समाज के आख़री तबके तक उस चेतना और ताक़त को पहुँचाना है। यदि बहुजन समाज से आने वाली कोई जाति या कुछेक जातियां सामाजिक न्याय के नाम पर बामन-बनिया वर्चस्व की जगह अपनी जाति-विशेष वर्चस्व को स्थापित करने की तिकड़म करेंगी तो तिकड़मों के उस्ताद सवर्णो से हमेशा मात खायेंगी।
विपक्ष की एक-आयामी रणनीति
जहाँ एक ओर संघ-भाजपा और उनके लगुये-भगुये चुनाव लूटने के लिए जातिवाद-साम्प्रदायिकता-काला धन की तिकड़ी के साथ चुनाव आयोग के नाजायज़ सहयोग का चक्रव्यूह रच रहे थे, वहीं विपक्ष एक सुर में शिक्षा-नौकरी की रागिनी गा रहा था। बीच-बीच में कुछ चुनावी पर्यटक वोट-चोरी वगैरह के स्वच्छन्द छंद भी गा रहे थे।
रोज़ी-रोटी-स्वास्थ-शिक्षा के मुद्दे सबसे ज़रूरी तो हैं पर दशकों के बामनवाद-बनियावाद जॉइन्ट ऑपरेशन के अंतर्गत मठ-मन्दिर-बाबा-मीडिया का ‘चेतना विनाश के हथियार’ {Weapons of Consciousness Destruction (WCDs)} के रूप में प्रयोग ने सामाजिक चेतना को कमज़ोर करने और जनता का ध्यान इहलोक के बजाय परलोक पर रखने में काफी क़ामयाबी हासिल की है। अगर ऐसा ना होता तो स्वास्थ-शिक्षा-पोषण जैसे अहम मामलों में फिसड्डी राज्य गुजरात में पिछले अट्ठाइस-उनत्तीस सालों से संघ-भाजपा निर्बाध सत्ता की मलाई ना चाट रही होती।
ऐसे झंझावात में बुनियादी मसलों के साथ-साथ सामाजिक चेतना के स्तर पर एक सैद्धांतिक मुहीम की ग़ैर-मौजूदगी ने विपक्ष के अभियान को एक-आयामी और बेअसर बनाया। ऐसे एक-आयामी नज़रिया रखने वाले राजनीतिक दल या गठबंधन खुद ही अपने अवसान की राह बना रहे होते हैं क्योंकि आख़िरकार राजनीति एक रेवड़ी प्रतियोगिता नहीं विचारों का संघर्ष है। चूँकि संघ-भाजपा और मनुस्ट्रीम मीडिया के बीच का सगोत्रगामी प्रेम अब बेहयाई की हद से भी आगे जा चुका है तो इस प्रेम को संघ-भाजपा की जीत के कारणों में जोड़ना वक़्त और टाइपिंग ज़ाया करना होगा।
नतीजों का निचोड़
इन चुनावों के नतीजों से चाहे जो भी निचोड़ निकाला जाये, ये तो बिल्कुल ही नहीं समझा जाना चाहिये कि बिहार की ज़मीन-समाज-सियासत में कोई बुनियादी बदलाव आया है। ना ही संघ-भाजपा और उनके लगुये-भगुये किसी महान चुनावी रणनीति से जीते हैं, क्योंकि ये कहना वैसा ही होगा जैसे कोई फुटबॉल टीम 22 खिलाडियों, रेफ़री और दोनों लाइन मैन को संग लिये खेल रही हो और वो 11 खिलाडियों वाली एक टीम को हरा दे और आप कहें की 22 खिलाड़ियों वाली टीम अपने रणनीति और कौशल से जीती है। संघ-भाजपा का अथाह काला धन, शासन-प्रशासन के बेजा इस्तेमाल और चुनाव आयोग के खुले पक्षपात के बाद भी अगर 37-38 फीसदी वोटरों ने महागठबंधन में अपना भरोसा जताया है तो ये बहुत बड़ी बात है। आगे की राह बहुजन विचारधारा के लिए दुरूह तो है पर जैसा की दिनकर जी ने लिखा है:
सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सुरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
काँटों में राह बनाते हैं। ….
बुद्ध से लेकर संत रविदास, बाबा कबीर, गुरु नानक, ज्योतिबा फुले, बाबासाहेब अंबेडकर, आसिम बिहारी, जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर जैसे अनेको पुरखों ने जो राह दिखाई है वो आसान तो कतई नहीं है लेकिन बेगमपुरा की ओर सिर्फ़ वही एक रास्ता जाता है।

पटना में जन्मे और पले-गढ़े आरिफ़ हुसैन लोकनीति शोध के रोज़गार से जुड़े हैं और जातिवाद और नस्लवाद विरोधी जनआंदोलनों से सरोकार रखते हैं। ईमेल: idea.files@gmail.com, Facebook: arif.hussain.144

