
– रवि संबरवाल
ठीक चार साल पहले आज के दिन ही देश भर के दलितों और आदिवासियों ने भारत बंद किया था। यह एक नायाब एकजुटता थी, जिसमें सभी बहुजनों ने स्वत: स्फूर्त तरीके से भाग लिया था। यह ऐतिहासिक एकजुटता के पीछे उनका आक्रोश था, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में संशोधन किये जाने के बाद उत्पन्न हुआ था। इस संशोधन से देशभर के दलित और आदिवासी आ्रकोशत हो गए थे और सड़कों पर ‘ हम अंबेडकरवादी हैं संघर्षों के आदि हैं’ नारे के साथ उतर पड़े थे। इस संघर्ष का सकारात्मक परिणाम परिणाम भी सामने आया सरकार को संशोधन विधेयक के जरिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को खत्म किया गया।
बताते चलें कि एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा पारित किया गया था। एससी/एसटी एक्ट की धारा- 3(2)(v) के तहत जब कोई व्यक्ति किसी एससी या एसटी समुदाय के सदस्य के खिलाफ अपराध करता है तो उस अपराधी को आईपीसी के तहत 10 साल या उससे अधिक की जेल की सजा के साथ दंडित किया जाता है। साथ् ही, यह भी प्रावधान है कि ऐसे मामलों में जुर्माने के साथ सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। इस प्रकार एक मजबूत कानून बनाया गया था ताकि देश के दलित और आदिवासियों पर अत्याचार करनेवालों को सजा मिल सके।
हालांकि इसके पहले 1955 में ‘प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट’ में कुछ इसी तरह के प्रावधान किए गए थे। लेकिन इसमें दलित और आदिवासी का उल्लेख स्पष्ट रूप से नहीं था। इसके कारण दलितों और आदिवासियों की रक्षा नहीं हाे सकती थी।
लेकिन 1989 में जो कानून बनाया गया, उसमें सख्त प्रावधान किये गये। इसके तहत दर्ज मामलों में सीधे कार्रवाई किये जाने की बात थी। परंतु, सुप्रीम कोर्ट ने इसमें नया प्रावधान यह किया था कि एससी-एसटी के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी या कोई और शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा और ना ही तुरंत गिरफ्तारी होगी। डीएसपी रैंक के अधिकारी पहले मामले की जांच करंगे, इसमें ये देखा जाएगा कि कोई मामला बनता है या फिर झूठा आरोप है। मामला सही पाए जाने पर ही मुकदमा दर्ज होगा और आरोपी की गिरफ्तारी होगी।
खैर, एससी–एसटी एक्ट को कमजोर किये जाने के प्रयासों को वापस लेना पड़ा। यह दलित-बहुजन संघर्ष के कारण ही संभव हुआ। यह विशुद्ध रूप से गैर राजनीतिक आंदोलन था और लोगों ने खुद इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। इस तरह इस आंदोलन ने साबित कर दिया था कि इस देश के दलित-बहुजन अत्याचार सहने को तैयार नहीं हैं।

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