Sunday, January 25, 2026
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‘अंबेडकर मिशन पत्रिका’ के संपादक बुद्ध शरण हंस का परिनिर्वाण, देश भर के अंबेडकरवादियों ने किया याद

जिस दौर में दलितों का मनुवादियों से नजर मिलाना मुश्किल था, उस दौर में उन्होंने मनुवाद से आंख मिलाते हुए मनुस्मृति का दहन कर विरोध जताया था। जिस दौर में बिहार में किसी आम आदमी का बौद्ध धम्म से दूर-दूर तक नाता नहीं था, उस वक्त उन्होंने बौद्ध धम्म अपनाया। जिस दौर में बिहार के लोग अंबेडकरवाद से बहुत दूर थे, उन्हें जागरूक करने के लिए उन्होंने 'अंबेडकर मिशन पत्रिका' प्रकाशित किया और अपने आखिरी सांस तक चलाया।

 देश के प्रख्यात बहुजन लेखक सामाजिक क्रांति के अग्रदूत एवं पूर्व आईएएस अधिकारी मान्यवर बुद्ध शरण हंस अब हमारे बीच नहीं रहे। बृहस्पतिवार को सायं 4:30 बजे, पटना एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। बुद्ध शरण हंस का जन्म 8 अप्रैल 1942 को बिहार के गया जिले के वजीरगंज अंचल के तिलोरा गांव में हुआ था। बुद्ध शरण हंस हिन्दी साहित्य के उन दुर्लभ लेखकों में हैं जिनके जीवन और साहित्य दोनों में कोई अंतर नजर नहीं आता। उन्होंने कहानी, कविता, जीवनी आत्मकथा संपादन और प्रकाशन की दुनिया में फुले और आंबेडकरवाद की वैचारिकी को लेकर जो काम किया है वह आमतौर पर साहित्य में बहुत कम देखने को मिलता है।

उनके अबतक चार कथा संग्रह, आत्मकथाओं के पांच संग्रह, एक कविता संग्रह, और धार्मिक यथास्थितिवाद पर चोट करती दर्जनों पुस्तिकाएं छप चुकी हैं। वे अरसे से ‘आंबेडकर मिशन’ पत्रिका का प्रकाशन करते रहे हैं और इसी नाम से प्रकाशन भी चलाते रहे हैं। वे सन् 1969 से 2000 तक बिहार प्रशासनिक सेवा में रहे। भारतीय दलित अकादमी, दिल्ली द्वारा आंबेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार और बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2002 में भीमराव आंबेडकर पुरस्कार से भी उन्हें सम्मानित
किया गया है।

बुद्ध शरण हंस का जन्म एक महागरीब परिवार में हुआ। बड़े भाई भागीरथ पासवान पढ़े-लिखे थे। उन्होंने बुद्ध शरण हंस का नाम दलित प्रसाद रख दिया था। इस नाम के पीछे बड़े भाई की यह सोच थी कि चूंकि हम विपन्न परिवार में जन्मे थे, इसलिए यह नाम इस परिवेश को स्पष्ट करता था। जब बुद्ध शरण हंस का दाखिला आठवीं कक्षा में होने को था तो हेडमास्टर ने उनका नाम पूछा तो बद्ध शरण हंस ने अपना नाम दिलीप कुमार राय बताया तो हेडमास्टर साहब ने पूछा कि घर का नाम क्या है? तब बुद्ध शरण हंस ने दलित प्रसाद बतलाया तो हेडमास्टर साहब ने कहा कि एक नेता है भोला पासवान। आज से तुम्हारा नाम दलित पासवान हो गया। और यही नाम आगे की शैक्षिक डिग्रियों में भी चलता रहा।

उनके परिनिर्वाण के बाद देश भर के बुद्धिजीवियों ने उन्हें याद किया है। वरिष्ठ साहित्यार जयप्रकाश कर्दम ने लिखा है-

बुद्ध शरण हंस नहीं रहे। अत्यंत दुःखद सूचना है। मान्यवर बुद्धशरण हंस जी से कई दसकों का लंबा संबंध रहा। दलित साहिय के एक आयोजन में पटना में ही 1995 में उनसे पहली बार मुलाक़ात हुई जो बाद में प्रगाढ़ हुई। अनेक स्थानों पर अनेक आयोजनों में हम निरंतर मिलते रहे और एक-दूसरे के साथ अपने विचार साझा करते रहे। बौद्ध धर्म और संस्कृति के विद्वान होने के साथ-साथ वह बौद्ध धर्म के प्रचारक भी थे। उनका जीवन बौद्ध धर्म को समर्पित था। बौद्ध धर्म के प्रचार के उद्देश्य से उन्होंने छोटी छोटी बहुत सी पुस्तकें लिखीं और घर-घर पहुँचाने का काम किया।

वह अस्वस्थ थे। ठीक से चल-फिर नहीं सकते थे, लेकिन अम्बेडकर मिशन को आगे बढ़ाने का उनका उत्साह कम नहीं हुआ था। उनका नवीनतम अभियान झोला पुस्तकालय था, जिसके अंतर्गत अपनी लिखित किताबों का एक बंडल एक हज़ार रुपए लेकर लोगों को देते थे। दो माह पूर्व ही नवंबर में पटना जाना हुआ तो मित्र मुसाफ़िर बैठा और अरविंद पासवान जी के सहयोग से मराठी साहित्यकार मित्र शरण कुमार लिंबाले और कामरेड एन.के.नंदा के साथ बुद्धशरण हंस जी से मिलने उनके घर गया था। अनके झोला अभियान को अपना समर्थन देने के लिए मैंने भी पुस्तकों के दो बंडल ख़रीदने के लिए उनको दो हज़ार रुपए दिए। उनकी पुस्तकों के वह दोनों बंडल मैंने कुछ अन्य पुस्तकों के साथ दो पुस्तकालयों को भेंट किए हैं। बुद्धशरण हंस अंबेडकरवादी आंदोलन की पहचान थे तथा बिहार में अंबेडकरवादी आन्दोलन का चेहरा थे। अनेक लोगों को उन्होंने अंबेडकरवाद एवं बौद्ध धर्म के प्रति जागरूक किया और अम्बेडकर मिशन से जोड़ा. बुद्धशरण हंस जी को सादर नमन.

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सिद्धार्थ रामू ने लिखा-
यह सच है कि ब्राह्मणवाद के चाख-चौबंद किले में कैद दलितों की मुक्ति का द्वार आधुनिक युग में फुले दंपत्ति ने खोला था। उस द्वार को शाहू महाराज ने और चौड़ा किया। बाबा साहेब ने उस एक विशाल हाइवे में बदल दिया। पर जिन लाखों लोगों ने फुले-शाहू जी और बाबा साहेब के दलित मुक्ति के सपने को जन-जन का सपना बनाया और उसे जमीन पर उतारने के लिए अपने को पूरी तरह समर्पित कर दिया। उसमें एक बड़ा व्यक्तित्व बुद्ध शरण हंस भी थे।
बुद्ध शरण हंस जैसे लाखों मिशनरी लोगों ने यदि बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने के लिए अपनी जिंदगी न लगाई होती तो हम आज हम जहां खड़े हैं, हमारे पास प्रतिवाद, प्रतिरोध और संघर्ष की जो शक्ति और आवाज है, वह नहीं होती।

बुद्ध शरण ने बाबा साहेब के आह्वान को स्वीकार करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। आईएएस बने। पर उन्होंने कभी इसका गुमान नहीं पाला कि वे आईएएस हैं। उनके लिए यह पद बाबा साहेब के मिशन को पूरा करने का एक साधन था। व्यक्तिगत अहंकार और पद-प्रतिष्ठा का विषय नहीं। उन्होंने इस उपलब्धि को कभी अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना।
वे हमेशा बात-चीत में कहते थे कि यदि फुले-शाहू जी और बाबा साहेब ने संघर्ष न किया होता तो हम आज भी अपने बाप-दादों ( पुरखों की तरह) हलवाही कर रहे होते या सफाई कर्मी होते।

उनके दिल-दिमाग में स्पष्ट था कि उन्हें जो कुछ पद-प्रतिष्ठा और धन के रूप में मिला है, बाबा साहेब और अन्य नायकों के नेतृत्व में चले सामूहिक संघर्षों की देन है। यह मेरी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। इसके चलते उन्होंने अपनी योग्यता, क्षमता और प्रतिभा और कमाई को दलित-बहुजनों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया।
जो कोई भी उनसे मिला होगा,उसे इसका अहसास होगा कि उनसे मिलकर लगता ही नहीं था कि यह व्यक्ति इतना बड़ा भारत सरकार का अधिकारी है या रहा है।

बुद्ध शरण हंस एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह मिशन के साथी थे। मैं बड़ा हूं, तू छोटा है। मैं अफसर हूं, तो चपरासी। यह कभी उनके व्यवहार में नहीं दिखता था। उनका झोला पुस्तकालय, उनकी छोटी-छोटी पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं और उनकी किताबें किसी विद्वान की विद्ववतापूर्ण उपदेश नहीं थीं। बल्कि इस चिंता से प्रेरित थीं कि कैसे सहज-सरल और सामान्य तरीके से बाबा साहेब और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाए जाए। कैसे ब्राह्मणवाद से पूर्ण मुक्ति का रास्ता प्रशस्त किया जाए।
ब्राह्मणवाद के चंगुल से दलित-बहुजन मुक्ति के संघर्ष में लगे हममें से बहुत सारे लोग यह शायद भूल रहे हैं कि लाखों बुद्ध शरण हंस इस देश में दलित-बहुजनों के मुक्ति के संघर्ष की नींव में खपे, तब जाकर हम आज इस स्थिति में हैं कि ब्राह्मणवाद को हर स्तर पर चुनौती दे सकते हैं। बुद्ध शरण हंस मेरे लिए मेरे परदादा की तरह थे, सिर्फ़ वैचारिक और संवेदनात्मक स्तर पर ही नहीं, व्यक्तिगत स्तर पर भी। परदादा की तरह का स्नेह, उसी तरह का ख्याल, उसी तरह की प्रेरणा देने वाले।
पटना जाने पर करीब तीन-चार बार ही उनसे मिल पाया। पर उनका फोन अक्सर आ जाता था,इस विषय पर भी लिखो, उस विषय पर लिखो। तुम अच्छा लिखे हो। निजी बात यह कि वे उन लोगों में से थे, जो घर में रोटी बन रही है या नहीं। जेब में दो रूपया है या नहीं। कोई दिक्कत तो नहीं है, बताओ? बच्ची कैसी है?
पुरखे बुद्ध शरण हंस को सादर नमन के साथ अंतिम अलविदा।

भागलपुर यूनिवर्सिटी में इतिहास विभाग के प्रोफेसर रहे बिलक्षण बौद्ध ने लिखा-
बिहार में बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर और बौद्ध धम्म को बहुजन समाज में निर्भीक योद्धा बन कर जीवन भर फैलाने वाले , बहुजन समाज की मजबूत आवाज एवं सामाजिक क्रांति के लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी मान्यवर बुद्धशरण हंस जी अब हमारे बीच नहीं रहे । आज सायं 4:30 बजे, पटना एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। यह बहुजन आंदोलन के लिए अपूरणीय क्षति है। बहुजन समाज की ओर से उनके प्रति विनम्र श्रद्धांजलि और नमन
पटना और आस-पास के सभी साथियों से विनम्र अनुरोध है कि उनके निवास स्थान विष्णुपुरी, चितकोहरा, पटना पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें।

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने लिखा- 

जिस दौर में सामंतवाद अपने चरम पर था, उस दौर में उनका नाम दलित पासवान रखा गया। जिस दौर में दलितों का मनुवादियों से नजर मिलाना मुश्किल था, उस दौर में उन्होंने मनुवाद से आंख मिलाते हुए मनुस्मृति का दहन कर विरोध जताया था। जिस दौर में बिहार में किसी आम आदमी का बौद्ध धम्म से दूर-दूर तक नाता नहीं था, उस वक्त उन्होंने बौद्ध धम्म अपनाया। जिस दौर में बिहार के लोग अंबेडकरवाद से बहुत दूर थे, उन्हें जागरूक करने के लिए उन्होंने ‘अंबेडकर मिशन पत्रिका’ प्रकाशित किया और अपने आखिरी सांस तक चलाया। लोगों को पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्होंने सावित्री बाई फुले झोला पुस्तकालय शुरू किया। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक टुकड़े-टुकड़े आईना एक ऐसा दस्तावेज है, जिसे जो पढ़ ले ब्राह्मणवाद के ढकोसले से दूर हो जाएगा। विचारधारा के प्रति उनका समर्पण इतना था कि भले ही कोई उनका कितना भी करीबी रहा हो और अगर कोई आयोजन बौद्ध रीति से न हो तो वह उससे दूरी बना लेते थे।
बुद्ध शरण हंस सर के ऐसे ही कितने परिचय हैं। उन्होंने अकेले बूते वो किया, जो बड़े-बड़े संगठन नहीं कर पाते। 22 जनवरी को पटना एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनसे जो मिला, उनका होकर रह गया। उन हजारों लोगों की भीड़ में एक मैं भी हूं। दिल्ली में जब ‘दलित दस्तक’ ने ‘मूकनायक के 100 साल’ पूरे होने पर भव्य आयोजन किया था, हमने उन्हें आग्रह सहित आमंत्रित किया था। तब उन्हें ‘डॉ. आंबेडकर पत्रकारिता सम्मान’ से सम्मानित किया गया था। आप याद आएंगे सर। जय भीम-नमो बुद्धाय।

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