Saturday, January 17, 2026
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आलोचक वीरेन्द्र यादव नहीं रहें, रामू सिद्धार्थ ने किया याद

वीरेंद्र यादव मुख्यत: कथा आलोचक रहें हैं। उनकी आलोचना के केंद्र में आधुनिक युग का महाकाव्य कहे जाने वाला उपन्यास रहा है। उनकी आलोचना के केंद्र में मुख्य रूप से तीन उपन्यास रहे हैं- ‘गोदान’, ‘मैला आंचल’ और ‘आधा गांव’। ये तीनों उपन्यास हिंदी पट्टी की केंद्रीय ला-इलाज बीमारी वर्ण-जाति और उस पर आधारित वर्गीय-सामाजिक रिश्ते और पोर-पोर में समाई साम्प्रदायिक दृष्टि का मुकम्मल आख्यान प्रस्तुत करते हैं।

कोई व्यक्ति आपका वैचारिक साथी भी हो, स्वजन जैसा आत्मीय भी हो और साथ ही अभिवावक जैसा स्नेह-प्यार-दुलार भी देता हो, ऐसे व्यक्ति का असमय चले जाना ऐसा कुछ खो देना होता है, जिसकी भरपाई कर पाना बहुत मुश्किल होता है। मेरे लिए वीरेंद्र यादव ऐसे ही थे। एक कॉमरेड की तरह तीखी वैचारिक बहसें होती थीं, गंभीर असहमतियां सामने आती थीं, पर कभी आत्मीयता कम नहीं हुई। 16 जनवरी को अचानक उनके चले जाने की खबर आ गई।
वह एक स्वजन की तरह थे, न्याय के लिए संघर्षरत वृहत्तर परिवार के हिस्से। इससे साथ ही वे मेरे लिए अभिवावक भी थे। मिलने पर,फोन और कभी-कभी मैसेज से वे अपना प्यार, स्नेह और दुलार देते रहते थे। कभी-कभी एक अभिवावक की तरह गुस्सा भी होते थे। अक्सर प्रोत्साहित करते रहते थे।
वीरेंद्र यादव को जिस पहली बात के लिए मैं याद करता हूं, वह यह कि वे कभी गोडसेवादियों-सावरकरवादियों से सटने, मेल-मिलाप कायम करने या उनका कृपापात्र होने की कोई कोशिश करते नहीं दिखे। जैसा कि नामवर सिंह ने जीवन के अपने अंतिम समय में राजनाथ सिंह या महेश शर्मा के हाथों पुरस्कार लेकर या अन्य रूपों में किया। नामवर सिंह की तरह ही पिछले दिनों और इन दिनों कई सारे प्रगतिशील, वामपंथी, उदारवादी लोग ऐसा करते हुए दिखे और दिख रहे हैं।
वीरेंद्र यादव इस देश के जन और देश के दुश्मन गोडसेवादियों-सावरकवादियों के खिलाफ निर्णायक तरीके से वैचारिक स्टैंड लेते रहे। अभी हाल में जब विभूति नारायण राय ने ‘माओवादियों’ के खात्में के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा करते दिखे, वीरेंद्र यादव ने मजबूती से उसके खिलाफ स्टैंड लिए। शायद उन लोगों जैसों के दबाव में ही प्रगतिशील लेखक संघ ने विभूति नारायण राय के बयान से अपने को अलग करते हुए एक प्रपत्र जारी किया और विभूति नारायण राय से अपनी असहमति जाहिर की।
इस देश में किसी व्यक्ति का सामाजिक लोकेशन (वर्ण-जाति) सबसे निर्णायक होता है। वर्चस्वशाली द्विज वर्ण-जातियों का कोई विचारक-चिंतक-लेखक चाहे किसी वैचारिकी का चोंगा ओढ़ ले, उसकी सामाजिक लोकेशन उसकी वैचारिकी का अक्सर ही ऐसी-तैसी कर देता है, अभी तक अक्सर ऐसा ही हुआ है। नहीं के बराबर अपवाद हैं। उसकी सामाजिक लोकेशन उसके औपचारिक वैचारिक स्वीकृति पर अक्सर पूरी तरह हावी हो जाता है।
हिंदू साहित्य के द्विज-सर्वण वैचारिकी, आलोचना और सौंदर्य दृष्टि को आधुनिक युग में चुनौती देने वाले लेखकों-आलोचकों-संपादकों में एक तरफ दलित समाज से आए ओमप्रकाश वाल्मीकि, कंवल भारती और तुलसी राम दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ पिछड़े वर्गों (शूद्र समाज) के बीच से आए राजेंद्र यादव, चौथीराम और वीरेंद्र यादव दिखाई देते हैं। हिंदी साहित्य की दुनिया में ये लोग उस सामाजिक लोकेशन से आए थे, जो शुक्ल, द्विवेदी, सिंहों और पांडेयों की सामाजिक लोकेशन से बिलकुल भिन्न थी।
ये लोग सामूहिक तौर पर हिंदी साहित्य की द्विज सौंदर्य दृष्टि, विश्व दृष्टि और आलोचना के मानदंडों को भले ही बदल न पाए हों, लेकिन इस तरह से प्रश्नांकित कर दिया है कि अब कोई निर्वावाद भाषा में यह नहीं कह सकता कि आर्चाय रामचंद्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा और मैनेजर पांडेय ने आलोचना के जो मानदंड प्रस्तुत किए और उसके आधार पर सृजनात्मक कृतियों और कृतिकारों की जो समालोचना-आलोचना प्रस्तुत की वह किसी वैज्ञानिक मुक्कमल सामाजिक दृष्टि, सार्वभौमिक न्यायबोध और प्रगतिशील उन्नत मूल्यों पर आधारित थी या वर्गीय दृष्टि की सच्ची अभिव्यक्ति थी।
वीरेंद्र यादव से मेरे पहला वैचारिक परिचय तद्भव में गोदान में लिखे उनके एक विस्तृत आलेख के माध्यम से हुआ। उस लेख ने प्रेमचंद और गोदान को देखने की एक ऐसी दृष्टि दी, जो उसके पहले की आलोचना में नहीं दिखाई देती थी। चाहे वह रामविलास शर्मा (प्रेमचंद और उनका युग) या नामवर सिंह की प्रेमचंद और गोदान को देखने, समझने और विश्लेषित करने की दृष्टि ही क्यों न हो?
वीरेंद्र यादव मुख्यत: कथा आलोचक रहें हैं। उनकी आलोचना के केंद्र में आधुनिक युग का महाकाव्य कहे जाने वाला उपन्यास रहा है। उनकी आलोचना के केंद्र में मुख्य रूप से तीन उपन्यास रहे हैं- ‘गोदान’, ‘मैला आंचल’ और ‘आधा गांव’। ये तीनों उपन्यास हिंदी पट्टी की केंद्रीय ला-इलाज बीमारी वर्ण-जाति और उस पर आधारित वर्गीय-सामाजिक रिश्ते और पोर-पोर में समाई साम्प्रदायिक दृष्टि का मुकम्मल आख्यान प्रस्तुत करते हैं। इस निष्कर्ष पर ले जाते हैं कि बहुसंख्य मेहनतकश भारतीय जन (दलित, पिछड़े, आदिवासी, मुसलमान, महिलाएं) में वह ताकत है, जीवन-मूल्य और न्याय दृष्टि है, जो इस देश को एक न्यायपरक, समतामूलक और शोषण-उत्पीड़नहीन समाज बना सकती है।
वीरेंद्र यादव ने इन तीनों उपन्यासों की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की है। वे इन उपन्यासों के माध्यम से अपने समय के ज्वलंत समस्याओं के बुनियादी कारणों और उनके समाधान भी अक्सर प्रस्तुत करते रहते थे।
वीरेंद्र यादव एक तरफ द्विज दृष्टि परस्त वामपंथ से टकराते रहे तो दूसरी जीन-जान से कोशिश करते रहे कि किसी तरह की जातिवादी दृष्टि के शिकार न बने या उन पर कोई जातिवादी होने का ठप्पा न लगा दे। इसके चलते कई बार वे जरूरी मुद्दों पर बहुजन-दलितों का पक्ष लेने से बचते दिखे या वामपंथियों के द्विजत्व के खिलाफ चुप्पी साधे रहे। पिछले कई वर्षों से उनका जद्दोदहद इसके बीच संतुलन कायम करने की रही है। वे द्विज विश्व दृष्टि की शिकार वामपंथी साहित्य जगत से आए थे। उनका प्रारंभिक साहित्यक और आलोचकीय मानस वामपंथी साहित्यिक दुनिया में निर्मित हुआ था, जहां द्विज-दृष्टि हावी रही है। वे बहुजन-दलित वैचारिकी के बुनियादी आधारों फुले दंपत्ति, शाहू जी, पेरियार, आंबेडकर, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, पेरियार ललई सिंह, चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु से उनका मुकम्मल रिश्ता नहीं बन पाया। फिर भी पर वे अपने सामाजिक लोकेशन चलते और बहुजन-दलित आंदोलन की वैचारिकी से धीरे-धीरे जुड़ते जाने की वजह से हिंदी साहित्य के वर्चस्ववादी विश्वदृष्टि रूबरू होते गए और उसकी सीमाओं को समझने लगे थे। उनकी आलोचना में यह दिखाई पड़ता है।
सच तो यह है कि वीरेंद्र यादव प्रेमचंद के अध्येता के रूप में प्रेमचंद के तीसरे चरण के लेखन ( प्रतिनिधि कृति गोदान) की इस बुनियादी समझ से मुतमईन होते लग रहे थे कि भारत में किसी व्यक्ति को देखों तो उसकी सामाजिक (वर्ण-जाति) और आर्थिक लोकेशन को एक साथ देखो। भारत में वर्ग, वर्गीय रिश्ते, उस पर आर्थिक रिश्ते, समाजिक संबंध और व्यक्ति की चरित्र बिना सामाजिक-आर्थिक लोकेशन को एक साथ देखे समझा नहीं जा सकता है।
राजेंद्र यादव, ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसीराम, चौथीराम के बाद अचानक वीरेंद्र यादव का चले जाना साहित्य और आलोचना की दुनिया में सिर्फ मुहावरे के अर्थ में नहीं, सच्चे अर्थों में एक शून्य पैदा किया है। वे कई सारी ऐसी संभावनाओं को अपने साथ लेकर चले गए, जिसकी हिंदी समाज को बहुत जरूरत है। वे आलोचना को एक सच्ची वर्गी दृष्टि (सामाजिक-आर्थिक दोनों आधारों पर निर्मित) की ओर ले जा सकते थे। इस ओर वे बढ़ते हुए दिख रहे थे। इसके लिए जरूरी अध्ययन और सशक्त आलोचकीय भाषा भी उनके पास थी। वे एक गहन अध्येता थे। अपनी बात को सटीक और सशक्ते रूप में कहने में सक्षम थे।
वीरेंद्र यादव को अंतिम सलाम! अलविदा!

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