आज का राष्ट्रवाद : एक राजनीतिक प्रपंच

Details Published on 24/01/2017 12:13:27 Written by तेजपाल सिंह ''तेज''


समय के परिवर्तन के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है. यहाँ तक कि शब्द भी और शब्दों के अर्थ भी. इसे यूँ समझ सकते हैं कि बहुत पुराने समय में ‘वेदना’ शब्द को दो तरह से जाना जाता था, यथा... सुखद वेदना और दुखद वेदना. लेकिन वर्तमान में ‘वेदना’ शब्द को केवल और केवल एक ही अर्थ में जाना जाने लगा है...वह है ‘पीड़ा’. इसी संदर्भ में यदि ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को समझना है तो हमें विगत से होकर गुजरने की जरूरत है. वीकिपीडिया के अनुसार 19वीं शताब्दी में राज्य और समाज के आपसी सम्बन्ध पर वाद-विवाद शुरू हुआ बताया जाता है तथा 20वीं शताब्दी में द्वितिय विश्वयुद्ध के बाद सामाजिक विज्ञानों में विभिन्नीकरण और विशिष्टीकरण की उदित प्रवृत्ति तथा राजनीति विज्ञान... Read More

गुजरात के चुनाव एवं आदिवासी समस्याएं

Details Published on 03/01/2017 14:40:31 Written by रामसिंह राठवा


गुजरात में विधानसभा चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल सक्रिय हो गये हैं. ये चुनाव जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए एक चुनौती बनते जा रहे हैं वहीं दूसरों दलों को भाजपा को हराने की सकारात्मक संभावनाएं दिखाई दे रही है. पिछले तीन चुनावों से शानदार जीत का सेहरा बांधने वाली भाजपा के लिए आखिर ये चुनाव चुनौती क्यों बन रहे हैं? एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर तलाशना जरूरी है. इस बार गुजरात के इन चुनावों में आदिवासी लोगों की महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका हो सकती है. मैं पिछले चार चुनावों से गुजरात के बड़ौदा एवं छोटा उदयपुर से जुड़े आदिवासी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता रहा हूं. आगामी चुनाव की पृष्ठभूमि में मैं आदिवासी समस्याओं... Read More

बराक की विदाई... अब कब पैदा होगा अमेरिका में ओबामा!

Details Published on 31/12/2016 15:38:54 Written by Prof. Vivek Kumar


जनवरी 2017 में अमेरिका के प्रथम एफ्रो-अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल खतम हो जाएगा और श्वेत डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल आरंभ. 2008 में जब पहली बार बराक ओबामा विश्व के सबसे विकसित प्रजातंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तो वह अमेरिका के लिए ही नहीं विश्व के लिए सुखद पल था क्योंकि वे पहले एफ्रो-अमेरिकन थे जो व्हाइट हाउस में प्रवास करने जा रहे थे. जिस अमेरिका में एफ्रो-अमेरिकियों, जिन्हें पहले निग्रो कहा जाता था, को दास प्रथा झेलनी पड़ी. फिर रंगभेद का जहर पीना पड़ा. ना ना प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ी. जहां ब्लैक पैंथर्स आंदोलन चला और जहां मार्टिन लूथर किंग जूनियर की आंदोलन के दौरान हत्या हुई. उसी... Read More

शिक्षा और ज्ञान से डरता है धार्मिक भारत

Details Published on 29/12/2016 11:17:19 Written by Sanjay Jothe


भारत के ग्रामीण या शहरी बच्चों से बात करके देखिये, वे बहुत कुछ जानना चाहते हैं. जैसी जिज्ञासा यूरोप के सभ्य समाज के बच्चे करते हैं वैसी ही जिज्ञासा भारत के बच्चे भी करते हैं. जीवन, मन, शरीर, प्रकृति, मशीनें, समाज व्यवस्था और संबंधों पर उनकी जिज्ञासाएं इतनी रंग बिरंगी होती हैं कि उनको उत्तर देना कठिन हो जाता है. उनकी जिज्ञासाओं का उत्तर देने के लिए अक्सर जिन लोगों को समाज द्वारा “अधिकृत” किया गया है उन्होंने इन जिज्ञासाओं की बहुत बारीकी से ह्त्या की है. उनकी जिज्ञासाओं को उत्तर देकर नयी जिज्ञासाओं और नये प्रश्नों की तरफ बढ़ाने का अर्थ होता है पुराने सामाजिक ताने बाने और धर्म से आगे बढना. लेकिन अगर आपका समाज किसी आखिरी... Read More

सिर्फ कैशलेस ही नहीं ''कास्ट लेस'' इंडिया भी जरूरी

Details Published on 27/12/2016 12:47:42 Written by IP Human


आज जब देश में चारों तरफ नोटबंदी ही चर्चा का विषय बना है तो इस पर एक फिल्म के गाने के कुछ बोल फिट प्रतीत होते हैं “सोने चांदी के महलों में दर्द ज्यादा है चैन थोडा़ है. इस जमाने में पैसे वालों ने प्यार छीना है, दिल को तोड़ा है.”एक जमाना था जब रोटी कपडा़ और मकान ही लोगों की आवश्यकता हुआ करती थी. इस पर कई फिल्में भी बनीं. आज बदलते युग में दाल और आटा जितना जरूरी है उतना डाटा भी जरूरी बन चुका है. कन्दराओं और गुफाओं से निकला मानव आज चांद और मंगल ग्रह में आशियाना तलासने लगा है. गुफाओं से लेकर मंगल की यात्रा कई हजार सालों के सफर के बाद तय हो पाया है. महीनों में मिलने वाले संदेश आज पल भर में पहुंच जाते हैं. हफ्तों-महीनों का सफर चंद घंटों... Read More

दलित-पिछड़ा एकता में बाधक है सामंतवादी सोच

Details Published on 26/12/2016 14:19:46 Written by PN Ram


इसमें कोई शक नहीं कि दलितों और पिछड़ों में दूरियां बढ़ी हैं. हालांकि अतिपिछड़ा वर्ग दलितों के थोड़ा करीब दिखता है. लेकिन यह भी सोचना होगा कि जिस गंभीरता से इस विषय पर दलित बुद्धिजीवी सोचते हैं उतनी गंभीरता से पिछड़ों में चर्चा नहीं होती. आज भी पिछड़े अपने को सवर्णों के ज्यादा करीब दिखाने की कोशिश करते हैं. दलित तो शुरू से पिछड़ों को साथ लेकर चलने के हिमायती रहे हैं. चाहे बाबासाहेब का सामाजिक आंदोलन हो, चाहे बिहार में सामाजिक अधिकार की लड़ाई हो या कांशीराम साहब का उत्तर प्रदेश  में 85-15 का नारा हो. सर्वदा दलितों ने पिछड़ों को साथ लेकर चलने की कोशिश की.1927 में साइमन कमीशन के भारत आगमन के बाद जो परिस्थितियां उत्पन्न हुई उसमें... Read More

मोटिवेशन कैरियर और बुद्ध की अनत्ता

Details Published on 26/12/2016 10:59:17 Written by Sanjay Jothe


गौर कीजिए इन शब्दों पर. अक्सर ही हम सोचते हैं कि बुद्ध सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण जैसी बातों के लिए ही हैं. लेकिन ये बिलकुल गलत बात है. बुद्ध के लिए परलोक या परीलोक का कोई अर्थ नहीं है. वे खालिस इस लोक और इस जीवन के लिए हैं.एक ख़ास मुद्दे के संदर्भ में इसे देखेंगे तो आसानी से समझ में आयेगा. क्या मोटिवेशन और जीवन में सुधार को अनत्ता से जोड़कर देखा जा सकता है? क्या वेदांत और ब्राह्मणी आत्मा के सिद्धांत और मोटिवेशन या व्यक्तित्व विकास या जीवन के सुधार में आपस में कोई संबन्ध है?इसका उत्तर है कि वेदांती आत्मा के सिद्धांत से मोटिवेशन या व्यक्तित्व विकास का सीधा संबन्ध नहीं है. बुद्ध की अनत्ता या अनात्मा से न सिर्फ मोटिवेशन... Read More

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