''''चुप रहता है पर चौंकाता है मायावती का वोटर''''

Details Published on 22/02/2017 12:54:37 Written by वात्सल्य राय


बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने शनिवार को पार्टी उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी की और दावा किया कि वो प्रदेश में ''''अकेले दम पर सरकार'''' बनाएंगी. विरोधियों ने उनके दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने में देर नहीं की लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को उनके बयानों में ''''गंभीरता'''' नज़र आती है। अख़बार जदीद ख़बर के संपादक मासूम मुरादाबादी कहते हैं, "मायावती की पार्टी चुनाव के लिए तैयार है। बाक़ी दलों में टिकट बंटवारों का मुहुर्त नहीं आया है समाजवादी पार्टी में सिर फुटव्वल हो रहा है। इसका समाजवादी पार्टी को नुक़सान पहुंचने का अंदेशा है।" हालांकि, भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और बाकी नेता लगातार कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश... Read More

श्मशान और मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

Details Published on 21/02/2017 16:42:38 Written by Sanjay Jothe


अक्सर ही ग्रामीण विकास के मुद्दों पर काम करते हुए गाँवों में लोगों से बात करता हूँ या ग्रामीणों के साथ कोई प्रोजेक्ट की प्लानिंग करता हूँ तो दो बातें हमेशा चौंकाती हैं। पहली बात ये कि ग्रामीण सवर्ण लोग मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, तालाब, स्कूल आदि बनवाने की बजाय मंदिर, श्मशान, कथा, यज्ञ हवन भंडारे आदि में ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। दुसरी बात ये कि जहाँ भी सार्वजनिक या सामाजिक संसाधन निर्मित करने की बात आती है वहां स्वर्ण हिन्दू एकदम से धर्मप्राण होकर विकास के खिलाफ हो जाते हैं और भूमिहीन दलित आदिवासी ओबीसी गरीब समुदाय चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते।सीधे तौर पर आप देख सकते हैं कि ग्रामीण भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू... Read More

स्वच्छता अभियान के बजाय शिक्षा पर जोर होना चाहिये

Details Published on 20/02/2017 16:13:33 Written by Dalit Dastak


जब से केन्द्र में नई सरकार बनी है, चारों तरफ स्वच्छता की ही चर्चा है। यहाँ तक कि नये नोटों पर भी स्वच्छ भारत और एक कदम स्वच्छता की ओर लिखा हुआ मिल जायेगा। शहरों और गाँवों को भी स्वच्छता की रैंकिंग दी जा रही है। लेकिन सूक्ष्मता से अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि यह उसी तरह है जिस तरह जड़ों को छोड़कर पत्तों और टहनियों को पानी देना। इसमें कोई दोराय नहीं है कि मनुष्य को स्वच्छ रहना चाहिये, साफ-सफाई रखना चाहिये, गन्दगी नहीं फैलाना चाहिये और पर्यावरण प्रदूशित होने से बचाना चाहिये। ये सब बहुत अच्छी बातें हैं और इनसे किसी का कोई विरोध नहीं होना चाहिये, मेरा भी कोई विरोध नहीं है। परन्तु राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस... Read More

नोटबंदी से बदहाल किसान को बजट से आश

Details Published on 30/01/2017 14:37:03 Written by संजय रोकड़े


भारत एक कृषि प्रधान देश है. इसके चलते यहां की अर्थव्यवस्था का आधार भी खेती-किसानी है. आज भी गांव व शहर की आबादी को मिला कर अस्सी फीसदी तक लोग खेती-किसानी के काम में जुटे है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार जो भी काम करेगी या निर्णय लेगी इतनी बड़ी आबादी को ध्यान में रख कर ही लेगी, लेकिन मोदी सरकार ने नोटबंदी के समय इस पूरी आबादी को नजर अंदाज कर दिया. हालात ये बने कि देश का तमाम किसान दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो गया. नोटबंदी को लेकर जैसे-जैसे वक्त बीतता जा रहा है, वैसे-वैसे इसकी सच्चाई सामने आती जा रही है. नोटबंदी के चलते आम नागरिकों ने जो नरक भोगा है उसका जिक्र करना तो यहां लाजिमी नहीं लगता है लेकिन किसानों... Read More

आज का राष्ट्रवाद : एक राजनीतिक प्रपंच

Details Published on 24/01/2017 12:13:27 Written by तेजपाल सिंह ''तेज''


समय के परिवर्तन के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है. यहाँ तक कि शब्द भी और शब्दों के अर्थ भी. इसे यूँ समझ सकते हैं कि बहुत पुराने समय में ‘वेदना’ शब्द को दो तरह से जाना जाता था, यथा... सुखद वेदना और दुखद वेदना. लेकिन वर्तमान में ‘वेदना’ शब्द को केवल और केवल एक ही अर्थ में जाना जाने लगा है...वह है ‘पीड़ा’. इसी संदर्भ में यदि ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को समझना है तो हमें विगत से होकर गुजरने की जरूरत है. वीकिपीडिया के अनुसार 19वीं शताब्दी में राज्य और समाज के आपसी सम्बन्ध पर वाद-विवाद शुरू हुआ बताया जाता है तथा 20वीं शताब्दी में द्वितिय विश्वयुद्ध के बाद सामाजिक विज्ञानों में विभिन्नीकरण और विशिष्टीकरण की उदित प्रवृत्ति तथा राजनीति विज्ञान... Read More

गुजरात के चुनाव एवं आदिवासी समस्याएं

Details Published on 03/01/2017 14:40:31 Written by रामसिंह राठवा


गुजरात में विधानसभा चुनाव को लेकर विभिन्न राजनीतिक दल सक्रिय हो गये हैं. ये चुनाव जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए एक चुनौती बनते जा रहे हैं वहीं दूसरों दलों को भाजपा को हराने की सकारात्मक संभावनाएं दिखाई दे रही है. पिछले तीन चुनावों से शानदार जीत का सेहरा बांधने वाली भाजपा के लिए आखिर ये चुनाव चुनौती क्यों बन रहे हैं? एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर तलाशना जरूरी है. इस बार गुजरात के इन चुनावों में आदिवासी लोगों की महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका हो सकती है. मैं पिछले चार चुनावों से गुजरात के बड़ौदा एवं छोटा उदयपुर से जुड़े आदिवासी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता रहा हूं. आगामी चुनाव की पृष्ठभूमि में मैं आदिवासी समस्याओं... Read More

बराक की विदाई... अब कब पैदा होगा अमेरिका में ओबामा!

Details Published on 31/12/2016 15:38:54 Written by Prof. Vivek Kumar


जनवरी 2017 में अमेरिका के प्रथम एफ्रो-अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल खतम हो जाएगा और श्वेत डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल आरंभ. 2008 में जब पहली बार बराक ओबामा विश्व के सबसे विकसित प्रजातंत्र संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तो वह अमेरिका के लिए ही नहीं विश्व के लिए सुखद पल था क्योंकि वे पहले एफ्रो-अमेरिकन थे जो व्हाइट हाउस में प्रवास करने जा रहे थे. जिस अमेरिका में एफ्रो-अमेरिकियों, जिन्हें पहले निग्रो कहा जाता था, को दास प्रथा झेलनी पड़ी. फिर रंगभेद का जहर पीना पड़ा. ना ना प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ी. जहां ब्लैक पैंथर्स आंदोलन चला और जहां मार्टिन लूथर किंग जूनियर की आंदोलन के दौरान हत्या हुई. उसी... Read More

Page 1 of 19

  • Share this:
  • Google+
  • LinkedIn
  • Youtube

Journey of Dalit Dastak

Opinion

View More Article