11 अगस्त को लुटियन दिल्ली की सड़कें जन प्रतिनिधियों (सांसदों) से पटी पड़ी थी। भारत के राजनीतिक इतिहास में यह संभवतः पहली बार हुआ जब 300 सांसद एक साथ सड़क पर उतरें। मुद्दा वोट चोरी का था। इस विरोध प्रदर्शन से एक घटना याद आ गई।
जब देश आज़ाद हुआ तो सभी को तुरंत मतदान का अधिकार देने पर पूर्ण सहमति नहीं थी। भारत में 1947 से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान मतदान का अधिकार सीमित और शर्तों के आधार पर था। तब केवल वे लोग वोट दे सकते थे जिनके पास संपत्ति, आय, शिक्षा या टैक्स भुगतान जैसी योग्यता होती थी। इस कारण आबादी का बड़ा हिस्सा, खासकर गरीब, महिलाएं, मजदूर, भूमिहीन किसान और निचले तबकों के लोग यानी पूरा वंचित समाज चुनाव प्रक्रिया से बाहर था।
जब संविधान सभा बनी, तब यह सवाल उठा कि आज़ादी के बाद भारत में मतदान का अधिकार किस तरह दिया जाए। उस समय कई नेता और कुछ अधिकारी मानते थे कि भारत की जनता इतनी “अशिक्षित” और “अनुभवहीन” है कि उसे तुरंत मताधिकार देना जोखिम भरा होगा। उनका तर्क था कि पहले शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई जाए, फिर धीरे-धीरे सभी को अधिकार दिया जाए। विरोध करने वालों में पूर्व रियासतों और जमींदार वर्ग के प्रतिनिधि, कई नौकरशाह और कुछ दक्षिणपंथी लोग शामिल थे।

लेकिन बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सहित कई अन्य प्रगतिशील नेताओं ने स्पष्ट रूपसे हर वर्ग के वयस्क व्यक्ति को मत का अधिकार देने की वकालत की। इसे लोकतंत्र के लिए बेहद अहम बताया गया। कहा गया कि भारत के हर धर्म, वर्ग और जाति के हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए।
बहस हुई और वयस्क मताधिकार लागू किया गया। तय हुआ कि 21 वर्ष से अधिक उम्र का हर नागरिक वोट दे सकेगा। बाद में यह उम्र सीमा 18 वर्ष कर दी गई। यह फैसला दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव बना और उस समय के लिहाज़ से बहुत क्रांतिकारी था।
आज ताकत उन्हीं के इर्ग-गिर्द घूम रही है। सत्ता को चलाने और उससे लाभ लेने वालों में वही वर्ग सबसे आगे है। इसलिए वह चाहता है कि सत्ता उसके हिसाब से बने और चले भी। सत्ता में वही लोग बैठें, जिन्हें वह चाहते हैं। फैसले वह लिए जाएं, जो उनके हित का पोषण करती हो।

जब इस पर चर्चा चल रही थी, तब डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि- “लोकतंत्र में वोट का अधिकार सबसे बड़ा हथियार है। इसे किसी भी वयस्क से छीनना, उसे दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम कुछ वर्गों को मताधिकार से वंचित रखेंगे तो यह स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा के साथ धोखा होगा।”
सोचिए, आज क्या हो रहा है, कौन कर रहा है, और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है।
अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।