साल 2021 की बात है। मॉरिशस से एक व्यक्ति अपनी जड़ों की तलाश में भारत आया। यह तलाश उसे पूर्वांचल लेकर आया। यह उसके लिए हैरान करने वाला था। तब जाकर एक रिसर्च की शुरूआत हुई। इस रिसर्च में जो सामने आया, उसने पूर्वांचल के दलितों का मॉरिशस को बनाने में योगदान की कहानी को परत-दर-परत सामने लाना शुरू कर दिया।
इस रिसर्च को करने वाले बीएचयू के डीएन साइंटिस्ट प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने चार सालों के रिसर्च में अहम जानकारियां जुटाई है। रिसर्च के मुताबिक मॉरिशस में रहने वाले भारतीयों की कुल जनसंख्या के डीएनए का करीब 55% यूपी के पूर्वांचल और बिहार के भोजपुरी बोलने वाले दलित समाज से मिलता हैं। इसमें पूर्वांचल के साथ खासकर बक्सर, आरा, भभुआ, छपरा और सासाराम के दलित समाज के लोगों के डीएनए से मैच हुआ है। वर्तमान में मॉरिशस की आबादी 12 लाख है। यानी आज जिस मॉरिशस की खूबसूरती की दुनिया भर में चर्चा है, उसे बनाने में सबसे ज्यादा योगदान दलितों का है।
मॉरीशस की खोज सन् 1502 में हुई। 1670 में यहां अफ्रीकी बसाए गए। 1810 में अंग्रेजों ने मॉरिशस पर कब्जा कर लिया। पहली बार यहां दलितों के जाने की भी अपनी कहानी है।
दलित पहली बार मॉरीशस कब गए?
- 1834 में ब्रिटिश हुकूमत ने गुलामी समाप्त की, लेकिन उन्हें गन्ने की खेती के लिए मजदूर चाहिए थे।
- इसके बाद भारत से गिरमिटिया मज़दूरों को ले जाया गया। ब्रिटिश एजेंट इन मजदूरों को “गिरमिट” (agreement) के नाम पर 5 साल के अनुबंध से ले जाते थे।
- पहला जहाज़ एटलस 2 नवंबर 1834 को कलकत्ता से मॉरीशस पहुँचा।
- इसमें मुख्यतः बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और बंगाल के लोग थे। जिसमें बड़ी आबादी दलित, पिछड़े और वंचित जातियों की थी। इन क्षेत्रों से गए दलित समुदायों में मुख्यतः चमार, धोबी, डोम, पासी, मुसहर, कहार, नाई आदि जातियाँ शामिल थीं।
मॉरीशस बनाने में दलितों की भूमिका
- गन्ने की खेती और चीनी उद्योग मॉरीशस की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसे खड़ा करने का काम अधिकतर भारतीय मजदूरों ने किया, जिनमें बड़ी संख्या दलितों की थी।
- खेत, कारखाने, सड़कें, रेलवे और बंदरगाह—इन सभी बुनियादी ढाँचों के निर्माण में दलित प्रवासी सबसे आगे रहें। हालांकि उन्हें सबसे कठिन और अपमानजनक काम सौंपा जाता था, लेकिन यही श्रम मॉरीशस की आर्थिक नींव बना।
- मॉरीशस जाने वालों में दलित महिलाएं भी थे, जिन्होने खेतों में पुरुषों के बराबर काम किया, और घरेलू नौकरानी के रूप में भी शोषण झेला।
महान नॉवेलिस्ट विलियम ने लिखा हैं कि “यूपी और बिहार के भोजपुरी बोलने वाले ये सबसे कमजोर तबके के लोग जब जंजीरों में बंध कर गन्ने और कपास की खेती करते थे। यह काम असहनीय दर्द देने वाला था। लेकिन उन्होंने उस दर्द को सहा और मॉरीशस में खुद को जमा लिया।
रिपोर्ट बताती है कि मॉरीशस में मौजूद आबादी में जो भारतीय हैं, उसमें 55 प्रतिशत लोगों का डीएनए भोजपुरी भाषी दलित समाज से मिलता है। 35 फीसदी डीएनए द्रविड़ समाज से आने वाले लोगों का था जबकि 4 प्रतिशत डीएनए ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज से मिलता है।
खास बात यह भी है कि यह समाज मॉरीशस में होने के बावजूद आज भी अपनी बोली और अपनी संस्कृति को नहीं भूला। भोजपुरी और छठ आज भी यहां के लोगों की रगो में बसता है। यानी जिस दलित समाज को भारतीय धर्मग्रंथ और समाज आज भी सबसे ज्यादा नाकाबिल और छोटा समझता है, उसने मॉरीशस जैसा एक देश बना डाला।

अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।

