नई दिल्ली। उन्नाव रेप केस में सजायाफ्ता पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कुलदीप सेंगर को राहत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोप गंभीर हैं। इस अपराधी को किसी भी मामले में जमानत नहीं मिलनी चाहिए।
सीजेआई ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि हमें पता है कि लोग राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। व्यवस्था को डराने-धमकाने की कोशिश ना करें। बेंच ने सेंगर के वकील को नोटिस जारी कर दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई अब चार हफ्ते बाद होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने कहा, “हम इस तथ्य से अवगत हैं कि जब किसी ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट ने किसी दोषी या विचाराधीन अभियुक्त को ज़मानत पर रिहा किया हो, तो आम तौर पर इस अदालत को उस व्यक्ति को सुने बिना ऐसे आदेश पर रोक नहीं लगानी चाहिए.”
“लेकिन इस मामले में हालात अलग हैं, क्योंकि प्रतिवादी अभियुक्त को धारा 304-II के तहत भी सजा सुनाई गई है, जो महिला के पिता की गै़र-इरादतन हत्या से जुड़ा मामला है, और वह इस केस में हिरासत में है.”
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीड़िता और उसका परिवार फिलहाल राहत में है। पिछले दो दिनों से पीड़िता ने अपने परिवार और वकील के साथ दिल्ली में इस मामले में मोर्चा खोल रखा था। इससे पहले सीबीआई की ओर से तुषार मेहता ने कहा कि-
यह केस धारा 376 और पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया. ये मामला बहुत भयानक है. तुषार मेहता ने इस बात को लेकर भी चिंता जताई कि यह आगे चलकर और मामलों में भी नजीर बनेगा.
बता दें कि कुलदीप सेंगर के खिलाफ जिस लड़की ने रेप का मामला दर्ज कराया था, उस पीड़िता की उम्र घटना के वक्त 16 साल से भी कम थी। ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को निर्विवाद रूप से आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया था। इसमें न्यूनतम 10 वर्ष और अधिकतम सजा आजीवन कारावास है। साल 2019 में सेंगर को उम्र कैद की सजा सुनाई दी।
मामले में नया मोड़ तब आ गया जब 23 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा निलंबित करते हुए उन्हें ज़मानत दे दी थी। कुलदीप सेंगर की सजा निलंबित होने से बवाल मच गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा रुख से यह साफ है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में किसी भी तरह की नरमी के पक्ष में नहीं है। लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट के सजा निलंबित करने के फैसले पर बहस अब भी जारी है।
क्योंकि यह मामला सिर्फ कुलदीप सेंगर की सजा तक सीमित नहीं है। यह सवाल भी है कि:
क्या बलात्कार और पॉक्सो जैसे मामलों में दोषी प्रभाव और हैसियत के दम पर राहत पा सकते हैं?
क्या पीड़िता की सुरक्षा और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को नजरअंदाज किया जा सकता है?

राज कुमार साल 2020 से मीडिया में सक्रिय हैं। दलित दस्तक में उप संपादक पद पर हैं। देश और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों पर नजर रखते हैं।

