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सच्चिदानंद सिन्हा को जानिये, जिनके निधन को समाजवादी विचारधारा के एक युग का अंत कहा जा रहा है

उनकी पुस्तक 'द इंटरनल कॉलोनी' (1973) में उन्होंने बिहार को केंद्र की आंतरिक उपनिवेश के रूप में चित्रित किया, जो क्षेत्रीय असमानता पर पहली गंभीर चर्चाओं में से एक थी। कहते हैं कि यह किताब उस समय बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने भी गंभीरता से पढ़ी और अध्ययन के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया था।

वो साल था 1984 का। पंजाब आतंकवाद के कारण जल रहा था। वहां से रोज बेगुनाहों के कत्ल के समाचार आ रहे थे। पंजाब को लेकर सारा देश चिंतित था। तब पंजाब की स्थिति पर चर्चा करने के लिए समाजवादी आंदोलन से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं,अध्यापकों, छात्रों वगैरह की दो दिवसीय बैठक चली। उसमें सच्चिदानंद सिन्हा और किशन पटनायक जैसे विद्वानों ने भी अपने वक्तव्य दिए। तब सच्चिदानंद सिन्हा की सलाह पर सबने तय किया कि हम लोग दिल्ली से अमृतसर तक की एक शांति मार्च निकालेंगे। यह एक बड़ा फैसला इसलिए था क्योंकि पंजाब में खून-खराबा बढ़ता जा रहा था। इसके बाद शांति मार्च की तैयारी में भाई जसवीर,सुनील जी, चेंगल रेड्डी, लिंगराज और अरविंद मोहन जैसे साथी जुट गए। अब शांति मार्च की तारीख तो याद नहीं पर इसकी शुरुआत राजघाट से हुई। उसमें सच्चिदानंद सिन्हा आगे-आगे चल रहे थे सांप्रदायिक सौहार्द और देश की एकता के नारे लगाते हुए। सच्चिदानंद सिन्हा, जिन्हें हम सब लोग सच्चिदा बाबू कहते थे, का कल बिहार में उनके गांव में निधन हो गया।
सच्चिदा बाबू से पहला परिचय 1982 या 1983 में हुआ था। मुलाकात रफी मार्ग में यूएनआई बिल्डिंग के लॉन में हुई थी। उसके बाद उनसे घनिष्ठता बढ़ती गई। वहां पर उनके चाहने वाले और समाजवादी साथी मिला करते थे। हर बैठक में 20-22 साथी शामिल हो जाते थे।
सच्चिदानंद सिन्हा ने अपना पूरा जीवन समाजवादी विचारों, गांधीवादी मूल्यों और वैकल्पिक राजनीति को समर्पित कर दिया। वे सादगी की मिसाल थे। उन्होंने कभी सत्ता की लालसा नहीं की, न ही कोई बड़ा पद स्वीकार किया। उनका जीवन और लेखन समाजवाद की उस शुद्ध धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और किशन पट्टनायक जैसे विचारकों से प्रेरित थी, लेकिन हमेशा आलोचनात्मक दृष्टि रखती थी।सच्चिदानंद सिन्हा का लेखन उनकी सबसे बड़ी पूंजी था। उन्होंने लगभग दो दर्जन पुस्तकें लिखीं, जिनमें राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति, पर्यावरण, दर्शन और समाजशास्त्र जैसे विविध विषय शामिल हैं। राजकमल प्रकाशन ने उनके प्रमुख लेखन को आठ खंडों में ‘सच्चिदानंद सिन्हा रचनावली’ के रूप में प्रकाशित किया है, जो उनकी वैचारिक गहराई का प्रमाण है। इस काम को अरविंद मोहन जी ने किया। दोनों गोल मार्केट में कुछ समय तक साथ भी रहा करते थे। उनका लेखन जटिल विचारों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘केस एंड क्रिएशन’, ‘संस्कृति विमर्श’, ‘संस्कृति और समाजवाद’, ‘मानव सभ्यता और राष्ट्र-राज्य’, ‘एडवेंचर्स ऑफ लिबर्टी’ (आजादी के अपूर्व अनुभव), ‘जिंदगी: सभ्यता के हाशिये पर’, ‘कड़वी फसल’ और ‘मार्क्सवाद और गांधीवाद’ जैसी किताबें शामिल हैं।
उनकी पुस्तक ‘द इंटरनल कॉलोनी’ (1973) में उन्होंने बिहार को केंद्र की आंतरिक उपनिवेश के रूप में चित्रित किया, जो क्षेत्रीय असमानता पर पहली गंभीर चर्चाओं में से एक थी। कहते हैं कि यह किताब उस समय बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने भी गंभीरता से पढ़ी और अध्ययन के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया था।
सच्चिदानंद सिन्हा के साथ योगेन्द्र यादवसिन्हा जी का लेखन मुख्यधारा के समाजवाद से अलग था। वे लोहियावादी थे, लेकिन आज की सत्ता-केंद्रित समाजवादी राजनीति से दूर रहे। ‘सोशलिज्म एंड पावर’ (1974) में उन्होंने सत्ता और समाजवाद के अंतर्विरोध को उजागर किया। आपातकाल के दौरान ‘इमरजेंसी इन पर्सपेक्टिव’ (1977) और जनता पार्टी सरकार के बाद ‘द परमानेंट क्राइसिस’ (1978) जैसी किताबों में उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा और समाजवादी विकल्पों पर जोर दिया।
उनका लेखन केवल सैद्धांतिक नहीं था; यह जीवन से जुड़ा था। 1942 में वे नौवीं कक्षा के छात्र थे जब भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े। पढ़ाई छूट गई, लेकिन ज्ञान की प्यास नहीं। वे लोहिया के संपर्क में आए। दिल्ली में रहते हुए (1969-1987) उनका घर विचारकों का अड्डा था, लेकिन 1987 के बाद वे मुजफ्फरपुर लौट आए और गांव की सादगी में वैचारिक लेखन जारी रखा। फ्रेंच और जर्मन भाषाओं का ज्ञान उन्हें वैश्विक विचारों से जोड़ता था, लेकिन उनकी जड़ें बिहार की मिट्टी में थीं।
मुझे याद आ रहा है 1984 का वह काला दौर जब दिल्ली में सिखों का कत्लेआम हुआ था। सच्चिदानंद सिन्हा जी की सरपरस्ती में साथियों ने सिखों के पुनर्वास और दोषियों को सजा दिलाने के लिए एक रिपोर्ट भी तैयार की थी।
सच्चिदानंद सिन्हा का निधन एक युग का अंत है। वे उस पीढ़ी के अंतिम चिंतक थे जो समाजवाद को सत्ता का साधन नहीं, मानव मुक्ति का मार्ग मानते थे।

विवेक शुक्ला के फेसबुक वॉल से


योगेन्द्र यादव ने लिखा- सच्चिदाजी नहीं रहे। 19 नवंबर 2025 को वो हमें छोड़ गए और उनके जाने के साथ ही भारतीय समाजवादी विचार परम्परा के एक युग का अवसान हो गया। मुझ जैसे ना जाने कितने युवाओं का वैचारिक प्रशिक्षण सच्चिदानंद सिन्हा को पढ़कर और सुनकर हुआ था। हिंदी और अंग्रेज़ी में दर्जनों किताबें, सैकड़ों लेख- अधिकांश बिहार के एक गाँव में बैठकर लिखे गए। अर्थव्यवस्था से लेकर कला तक, गांधी से मार्क्स और नक्सलवाद तक- हमारे युग का कोई कोना सच्चिदाजी की कलम से ना छूटा। उम्मीद है अकादमिक जगत आने वाले समय में उनके आंतरिक उपनिवेशवाद के सिद्धांत, जाति व्यवस्था की नई व्याख्या, पूंजीवाद के पतझड़ के विश्लेषण और अन्य स्थापनाओं पर गौर करेगा।
अलविदा सच्चिदाजी! मेरा सौभाग्य था कि आपका सानिध्य और आशीर्वाद मिला। सुखद संयोग था कि पिछले महीने मुजफ्फरपुर में आपसे मुलाक़ात हो पायी। आपकी नई नवेली दाढ़ी के पीछे चिर परिचित निश्छल मुस्कान और खिली हँसी संजो कर रखूँगा।

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