क्या मायावती जैसा दम दिखा पाएंगे सीएम योगी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एनकाउंटर के जरिए क्राइम कंट्रोल करने का दावा कर रही है. लेकिन इसी सरकार की एक दूसरी सच्चाई यह है कि रसूखदारों के द्वारा किए गए क्राइम पर उसका रवैया बिल्कुल उल्टा है. आलम यह है कि सरकार एक-एक कर पार्टी के नेता या फिर पार्टी से नजदीकी रखने वालों पर दर्ज मुकदमें वापस लेने में जुटी है.

वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद और रमाशंकर कठेरिया सहित इस लिस्ट में तमाम लोगों के नाम शामिल हैं. यूपी सरकार स्वामी चिन्मयानंद के खिलाफ सालों से चल रहा रेप का केस वापस लेने की तैयारी है. तो ऐसे ही अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष और आगरा से बीजेपी सांसद रामशंकर कठेरिया पर लगे 13 केस भी वापस लिए जा रहे हैं. ताजा बवाल भाजपा के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का है, जिन पर एक लड़की ने भाई के साथ मिलकर गैंगरेप का आरोप लगाया है. पीड़िता के पिता की जेल में मौत के बाद यह मामला तूल पकड़ गया है. बावजूद इसके इस मामले पर सीएम योगी की चुप्पी हैरान करने वाली है. सवाल उठ रहा है कि क्या सीएम योगी वैसा दम दिखा पाएंगे, जैसा बसपा प्रमुख मायावती ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उठाया था?

बता दें कि 2007 में बसपा की सरकार बने कुछ ही दिन गुजरे थे. बसपा के तत्कालीन सांसद उमाकांत यादव पर जमीन कब्जे का आरोप था. मायावती ने सांसद को अपने आवास पर बुलाकर उसे वहीं से पुलिस के हवाले कर दिया. सिर्फ उमाकांत यादव ही नहीं, मायावती ने अपने शासनकाल में बांदा जिले से बसपा के तत्कालीन विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी को बलात्कार के मामले में गिरफ्तार करवाकर जेल भेजा था.

द्विवेदी पर भी बीजेपी विधायक सेंगर की ही तरह बांदा की एक लड़की ने बलात्कार का आरोप लगाया था. इस मामले को बाद में सीबीआई को सौंप दिया गया था. ऐसे ही एक लड़की के अपहरण और हत्या के मामले में मायावती ने अपनी सरकार में मंत्री फैजाबाद से विधायक आनंद सेन यादव को कैबिनेट से बर्खास्त कर जेल भेज दिया. मायावती के ऐसे कदम से हर कोई हैरान रह गया था और उससे पुलिस और प्रशासन को भी सख्त संदेश गया था कि रसूखदारों के साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी भले ही वो सत्तारूढ़ पार्टी से ही क्यों न जुड़े हों. सवाल है कि क्या सीएम योगी ऐसी दिलेरी दिखा पाएंगे?

बंद समर्थकों ने ओबीसी मंत्री से की बदतमीजी

पटना। यूं तो आरक्षण विरोधियों द्वारा आयोजित बंद फेल साबित हुआ है लेकिन इसका असर बिहार में ज्यादा देखा गया. इस दौरान प्रदेश के कई स्थानों से प्रदर्शन की खबर है. बंद के दौरान आरक्षण विरोधियों ने ओबीसी मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा को भी नहीं बख्शा. बिहार के हाजीपुर में आरक्षण का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने केन्दीय मानव संसाधन राज्य मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा को साथ बद्सलूकी की. केन्द्रीय मंत्री चंपारण में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में होने वाले शताब्दी समारोह में हिस्सा लेने के लिए जा रहे थे तभी उनके साथ ये घटना हुई.

कुशवाहा बीजेपी की सहयोगी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष भी हैं. अभी बिहार पिछले दिनों हुई साप्रंदायिक हिंसा से उबरा भी नहीं था कि दलितों के भारत बंद के विरोध में बिहार की सड़कों पर आरक्षण विरोधियों ने एक और हिंसा भड़का दी. नवादा थाना क्षेत्र के चंदवा मोड़ के समीप आरक्षण के खिलाफ नारे लगा रहे युवाओं ने 84 आरा बक्सर मुख्य मार्ग को सुबह से ही जाम कर विरोध करना शुरू कर दिया. इस दौरान आक्रोशित युवा आरक्षण मुक्त भारत बनाने के लिए जमकर नारेबाजी कर रहे थे.

 

गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में फुले-आंबेडकर सप्ताह का आयोजन।

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फोटो: बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन, CUG के पदाधिकारीगण

गुजरात। किसी ने सहीं कहा था कि इक्कीसवीं सदी आंबेडकर युग होगा. और आज यह साबित हो चुका है. कल तक जिस बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर को अछूत के नाम से जाना जाता था आज वही भारतीय परिदृश्य में सबका लाडला बन गया है. हर सामाजिक और राजनैतिक क्षेत्रों में बाबा साहब को भारतीय राजनैतिक पार्टियाँ अपनाने में लगी है. साथ ही साथ बाबा साहेब अब विश्व पटल पर उभर चुके हैं. उनके नाम पर विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थान और विश्वविद्यालय जैसे संस्था खोले जा रहे हैं. अभी हाल ही में साउथर्न यूनिवर्सिटी सिड्नी, ब्रांडीस यूनिवर्सिटी मैसच्यूसेट्स, लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स ब्रिटेन, कोलंबिया यूनिवर्सिटी अमेरिका आदि विश्वविख्यात जगहों पर बाबा साहेब को ज्ञान के प्रतीक के रूप में स्थापित कर उन पर अध्धयन और अध्यापन शुरू किया जा चुका है. लेकिन भारत देश अभी तक अपने भारत भाग्यविधाता को पहचानने में असमर्थ रहा हैं. आये दिन उनके मूर्तियाँ और उनके प्रतीक चिन्हों को नष्ट किया जाना इस बात का द्योतक है कि भारत के लोग अब तक बाबा साहेब को उनके दलित-शोषित समाज के व्यक्ति के ही रूप में जानते और पहचानते हैं. यद्यपि बाबा साहेब को किसी विशेष क्षेत्र में सिमित करना मतलब आसमान में तारे गिनने के बराबर हैं. विश्वरत्न बाबा साहेब सभी क्षेत्रों के ज्ञाता रहे हैं.

भारतीय रिज़र्व बैंक से लेकर भारतीय समाज शास्त्र, मानवशास्त्री, महिलाओं के हितरक्षक, भारतीय संविधान निर्माता, पत्रकार, महान राजनैतिज्ञ, फिलोसोफेर आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ थें. उनके लेखन “एनीहिलेसन ऑफ़ कास्ट” आज भी 82 सालों बाद वर्तमान भारतीय समाज में कितना प्रासंगिक है यह देखा जा सकता है. जिस जात-पात प्रथा को वह तोड़ना चाहते थे और मानव-मानव में समानता लाना चाहते थे जिसे कुछ मनुवादी संस्था और संगठनों ने उनके विचरों को नष्ट करने की कोशिश की है तथा उनके सिद्धांत पर हावी हुए हैं. जिसके कारण जातीय हिंसा वर्तमान समाज का अभिन्न हिस्सा बन चुका. ज्ञात हो बाबा साहेब अनेक महापुरषों के विचारों को अपने में समेटे हुए थे जिसमें प्रमुख रूप से बुद्ध, कबीर, महात्मा ज्योतिबा फुले, शाहू जी महाराज, रैदास, गुरु घासीदास आदि थे, जिनके विचार भारतीय संविधान के प्रस्तावना में भी दिखते हैं, जो सम्पूर्ण मानव समाज के लिए कल्याणकारी है.

“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं.”

ऐसे में बाबा साहेब के मानवतावादी विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का काम तमाम विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे दलित शोषित पिछड़े वंचित समाज के शोधार्थी और विद्यार्थियों ने संभाल रखा है. ऐसे ही एक मशहुर शैक्षिणक संस्थान गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय गांधीनगर का मामला सामने आया है जहाँ पर बाबा साहेब के नाम पर काम कर रही संस्था “बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन” बाप्सा ने पुरे एक हफ्ते का कार्यक्रम तैयार किया है जिसे “फुले-आंबेडकर सप्ताह” के नाम से मनाया जा रहा है. ज्ञात हो इस वर्ष राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले का 11 अप्रैल को 191 वे और विश्वरत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर का 14 अप्रैल को 127 वाँ जन्मदिवस है.

कार्यक्रम 9 अप्रैल से वृहत स्तर पर विभिन्न चरणों में मनाया जा रहा है. कार्यक्रम की शुरुआत सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर खुली चर्चा से रखी गई है. 10 अप्रैल को प्रख्यात मानवाधिकारी, अधिवक्ता व नवसर्जन ट्रस्ट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर मंजुला प्रदीप प्रमुख वक्ता होंगी. वहीँ 11 अप्रैल को मुंबई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रमेश काम्बले होंगे. कार्यक्रम में 13 अप्रैल को बाबा साहेब और राष्ट्रपिता महात्मा ज्योतिबा फुले के सामाजिक न्याय सिद्धांत पर “नेशनल पीस ग्रुप” का गायन का कार्यक्रम रखा गया है. वहीँ 14 अप्रैल को फोटो प्रदर्शनी और दलित महापुरुषों पर पेंटिंग तथा “व्हिस्टल ब्लोअर थिएटर ग्रुप” के द्वारा “मैं घांस हूँ” नाम का अभिनय भी किया जाएगा. ज्ञात हो यह थिएटर कार्यक्रम दलित छात्र रोहित वेमुला के लेखन पर आधारित है जिनकी सन 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय में दबावपूर्ण संस्थानिक हत्या हुई थी.

संतोष कुमार बंजारे

भारत की घृणा आधारित संस्कृति

एक अफ़गान मित्र जो कि वरिष्ठ एन्थ्रोपोलोजिस्ट (मानव-विज्ञानी/समाजशास्त्री) हैं और जो राजनीतिक शरणार्थी की तरह यूरोप में रह रही हैं शाम होते ही कसरत करने लगीं, दौड़ने लगीं, वे अकेली नहीं थीं उनके साथ स्थानीय यूरोपीय लड़कियां और दो अमेरिकी अधेड़ प्रोफेसर भी कसरत कर रहे थे. होटल से लगे मैदान में वे हँसते मुस्कुराते हुए वर्जिश कर रहे थे. ये सब अगले दिन से शुरू होने वाली कांफ्रेंस के लिए आये थे. मैं उनका मेहमान था. कुछ समय बाद भोजन पर बातचीत शुरू हुई. मैंने पूछा कि आप सब पहले से ही इतने स्वस्थ और संतुलित शरीर वाले हैं आज ही आप यात्रा करके पहुंचे हैं आज कसरत न करते तो क्या हो जाएगा?

स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में मानवशास्त्र और समाजशास्त्र कांफ्रेंस के दौरान इन मित्रों से मुलाक़ात हुई और कांफ्रेंस के दौरान कुछ एक गजब की बातचीत हुई, आज अपने भारतीय मित्रों के लिए यहाँ रख रहा हूँ.

मेरा प्रश्न सुनकर अफगान प्रोफेसर हंसने लगीं, मैंने मजाक में कहा कि अब आपको इस हंसी के बारे में और अपनी कसरत के औचित्य के बारे में कोई गंभीर एंथ्रोपोलोजिकल या समाजशास्त्रीय व्याख्या देनी ही पड़ेगी. सभी मित्र हंसने लगे सभी मित्र मजाक के मूड में थे, आगे इस मुद्दे पर वे अफ़ग़ान प्रोफेसर बोलने लगीं कि पहले मैं भी ऐसे ही सोचती थी कि एक दो दिन कसरत न की जाए तो क्या फर्क पड़ता है. लेकिन बाद में समझ में आया कि अच्छी आदतों का एक अपना प्रवाह होता है एक सातत्य होता है जो बनाकर रखना जरुरी होता है. न केवल अच्छी या बुरी बातों का व्यक्तिगत चुनाव से रिश्ता होता है बल्कि उनका आपके समाज संस्कृति और धर्म से भी सीधा रिश्ता होता है.

ये बात अफगानिस्तान में रहते हुए समझ नहीं आई थी. लेकिन जब अफगानिस्तान छोड़कर भागना पड़ा और यहाँ यूरोप में आकर बसी तब पता चला कि एशिया और यूरोप की संस्कृति और समाज में बुनियादी फर्क क्या है और इस फर्क का इंसानों के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य से क्या रिश्ता है.

आगे उन्होंने बताया कि असल में अफगानिस्तान पाकिस्तान भारत नेपाल जैसे मुल्कों में शरीर और मन के स्वास्थ्य का ख्याल रखने के लिए कोई इंसेंटिव और कोई व्यवस्था ही नहीं है. वहां सब कुछ मुर्दा और जड़ व्यवस्था में बंधा हुआ है. इसीलिये लोगों के शरीर और मन भी मुर्दा हो गये हैं. व्यक्तिगत जीवन में सृजन और प्रेम न होने के कारण ये मुल्क अपनी सेहत भी ठीक नहीं रख पाते. इसीलिये अफगानिस्तान भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में डाइबिटीज तेजी से बढ़ रही है. भारत तो पूरी दुनिया में डाइबिटीज के मामले में पहले नम्बर पर है.

पाकिस्तान अफगानिस्तान के नीम हकीमों के इश्तिहार देखिये वे दो ही चीजों को बीमारिया समझते हैं तीसरी कोई बीमारी नहीं उनकी नजर में. ये दो बीमारियाँ हैं – कब्ज और नपुंसकता. ये दोनों चीजें सीधे सीधे लाइफस्टाइल और समाज के मनोविज्ञान से जुडी हुई हैं. ये कब्ज और नपुंसकता न केवल इन समाजों के इंसानों के शरीर में है बल्कि इनकी संस्कृति में भी है. ये समाज न कुछ पैदा कर पा रहे हैं न पुरानी गंदगी को शरीर से बाहर निकाल पा रहे हैं. ये कहकर वे हंसने लगीं.

ये बात सुनकर मैं चौंका, मैंने उनसे पूछा कि थोड़ा विस्तार से बताइए.

वे आगे बताने लगीं कि वे पेशावर, कराची और दिल्ली में भी रह चुकी हैं, काबुल में पैदा हुई हैं. उन्होंने अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के समाज धर्म और संस्कृति को बहुत करीब से देखा है. भारत और पाकिस्तान में बचपन से ही लोगों को अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए कोई प्रेरणा या कारण नहीं दिया जाता.

इसकी सबसे बड़ी वजह है कि यहाँ प्रेम करने, दोस्ती, खेलकूद, और औरत मर्द के बीच रिश्ते बनाने की कोई आजादी नहीं है. कबीलों और अमीर गरीब के झगड़े इतने ज्यादा हैं कि आप अपने लिए दोस्त या लड़की या लड़का चुनकर उसे प्रभावित करके अपना दोस्त या जीवनसाथी बनाने की कल्पना ही नहीं कर सकते. आप अपने पडौसी, सहकर्मी, बॉस, या अधीनस्थ को उसकी कबीले वंश इलाके या जाति के गणित लगाये बिना बर्दाश्त ही नहीं कर सकते.

भारत पाकिस्तान या अफगानिस्तान जैसे समाजों में लड़का लड़की अपनी मर्जी से अपने साथी नहीं चुन सकते. लेकिन यूरोप में वे अपनी मर्जी से ही जीवन साथी और मित्र चुनते हैं. इसीलिये यूरोपियन लड़के लडकियां ही नहीं बल्कि अधेड़ और बूढ़े बूढियां भी अपने शरीर को पूरी तरह स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं. मन को प्रफुल्लित और स्वस्थ रखने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि बेहतर भाषा, बातचीत के ढंग, नये विषयों का ज्ञान, नए हुनर, नई कलाएं संगीत, नृत्य, काव्य इत्यादि सीखकर अपने मित्रों और गर्लफ्रेंड बॉय फ्रेंड आदि को प्रभावित कर सकें.

इस तरह न केवल वे व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक और मानसिक स्तर पर अनुशासित, स्वस्थ और सक्रिय रहते हैं बल्कि इसी कारण से वे सामूहिक रूप से एक स्वस्थ, वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज का निर्माण भी करते हैं. इसीलिये वे विज्ञान, कला, साहित्य, दर्शन, खेलकूद, साहस और शौर्य आदि में बेहतर प्रदर्शन करके दुनिया पे राज करते हैं.

आगे उन्होंने बताया कि पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत जैसे देशों में मामला एकदम उलटा है. यहाँ लड़की को उसका पति और लडके को उसकी पत्नी, उसके माँ बाप खोजकर देते हैं. उन्हें खुद अपने लिए जीवनसाथी की तलाश का कोई अधिकार नहीं है. इन बदनसीब मुल्कों में अगर कोई लडकी अपने लिए खुद कोई लडका चुन ले तो या तो परिवार और कबीले की नाक कट जाती है या जाति और कुल की नाक कट जाती है. ये लडके लडकियाँ अपनी योग्यता या अपनी खूबियों का प्रदर्शन करके अपने लिए बेहतर जीवनसाथी नहीं चुन सकते. इसीलिये उनके जीवन में अपने शरीर, मन, कैरियर को बेहतरीन हालत में बनाये रखने के लिए एक बहुत स्वाभाविक सी प्राकृतिक प्रेरणा ही जन्म नहीं ले पाती.

ऐसे में इन मुल्कों के लडके लड़कियों को अच्छी भाषा, बातचीत का ढंग, कला, नृत्य, काव्य, संगीत इत्यादि सीखने की प्रेरणा ही नहीं होती. अगर आप इन सब कलाओं से अपने संभावित जीवनसाथी को प्रभावित और आकर्षित ही न कर सकें तो आपके व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक जीवन से सभ्य होने की, संवेदनशील या सृजनात्मक होने की सारी प्रेरणा ही खत्म हो जायेगी.

पूरे जीव जगत और पेड़ पौधों को देखिये. वहां भी सारी सृजनात्मकता, कला, कौशल, शौर्य, क्षमता और सौन्दर्य का सीधा संबंध अपने लिए बेहतर जीवनसाथी के चुनाव से जुडा हुआ है. जिन समाजों ने इस सच्चाई का सम्मान किया है वे आगे बढ़े हैं और इस सच्चाई को नहीं समझ सके हैं वे बर्बाद हुए हैं.

अब एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़की के बारे में सोचिये. उसे उसके माँ बाप उसका पति खोजकर देंगे. वो लडकी खुद अपनी मर्जी से अपना साथी नहीं चुन सकती. ऐसे में वो अपने आसपास के हजारों लड़कों में से अपनी पसंद के लडके को प्रभावित या आकर्षित करने के लिए न गीत संगीत या नृत्य सीखना चाहेगी, न कविता या शायरी सीखेगी न अच्छा भोजन बनाना सीखना चाहेगी न ज्ञान विज्ञान सीखेगी, वो सिर्फ और सिर्फ अपने चेहरे को खुबसुरत बनाने पर ध्यान देगी.

वो लडकी उतना ही सीखेगी या करेगी जितना कि उसके माँ बाप द्वारा खोजे गये नये परिवार और पति को खुश करने के लिए न्यूनतम रूप से आवश्यक होगा. यही चीज सेक्स और रोमांस के संबंध में उसकी क्षमता या पसंद को भी नियंत्रित करेगी वो कभी भी सेक्स या और्गाज्म का पूरा सुख नहीं लेना चाहेगी, क्योंकि ऐसा करते ही वो अपने पति की नजर में “गंदी औरत” बन जाएगी.

इसी तरह एक पाकिस्तानी या भारतीय लड़का भी अपने संभावित जीवन साथी को चुन नहीं सकता इसलिए वो अपने शरीर को स्वस्थ रखने, मन को सृजनात्मक बनाने, नयी कला, गीत संगीत, काव्य, हुनर आदि सीखने के लिए प्रेरित ही नहीं होता.

अन्य मित्र भी इन बातों का समर्थन कर रहे थे. वे भी समाजशास्त्र और मनोविज्ञान के प्रोफेसर और रिसर्चर थे. किसी एक ने भी इन बातों का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने अलग अलग अनुभवों से इन बातों का समर्थन ही किया.

इन बातों के प्रकाश में भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के समाज संस्कृति और धर्म को ठीक से देखिये.

इन मुल्कों में शादियाँ, रिश्तेदारी और संबंध प्रेम के आधार पर नहीं बल्कि घृणा के आधार पर होते हैं. शादी ब्याह में अधिक जोर इस बात पर होता है कि किन जातियों कबीलों या समुदायों को “नहीं” लाना है. किन लोगों जातियों या समुदायों को “लाना” है इस पर जोर लगभग नहीं ही होता है. वहीं यूरोप अमेरिका में अपने जीवन या परिवार में किसे “लाना” है इस बात पर सर्वाधिक जोर होता है. एक बार वे अपनी उम्र, विचार, और समान क्षमता के लोग पसंद कर लेते हैं और हर हालत में उनकी अमीरी गरीबी या कबीले वंश आदि को नकारते हुए उन्हें अपने जीवन या परिवार या समूह में शामिल कर लेते हैं.

इस तरह यूरोप के प्रेम आधारित समाज में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर मेलजोल और सभ्यता का विकास तेजी से होता है और भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान के घृणा आधारित समाज में सब तरह की सृजनात्मक प्रेरणाओं पर धर्म संस्कृति और भेदभाव का एक बड़ा भारी ताला लगा रहता है.

भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों में “किन लोगों” को “शामिल नहीं करना है”, किन लोगों को “जीने नहीं देना है” किन लोगों को “पढने लिखने नहीं देना है” या “रोजगार नहीं करने देना है” – इसकी बहुत साफ़ साफ़ प्रस्तावनाएँ लिखी गईं हैं. ये प्रस्तावनाएँ ही इन मुल्कों का धर्म और संस्कृति है. मनुस्मृति में तो साफ़ लिखा ही है कि किन वर्णों जातियों को शिक्षा और सम्पत्ति का अधिकार नहीं है. इसीलिये भारत पाकिस्तान जैसे समाज कभी भी प्रेम, बंधुत्व, मित्रता, सहकार, समता, सृजन, आदि के आधार पर न तो व्यक्तिगत जीवन जी पाते हैं न सामाजिक या सामूहिक जीवन का निर्माण ही कर पाते हैं.

भारत की घृणा आधारित संस्कृति और यूरोप की प्रेम आधारित संस्कृति का विभाजन इसमें देखिए, आप देख सकेंगे कि आज का पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत ऐसा क्यों बन गया है. इन मुल्कों की राजनीति, अर्थव्यवस्था, खेलकूद में प्रदर्शन, ज्ञान विज्ञान में फिसड्डीपन, गरीबी और जहालत इत्यादि को देखिये और आज के यूरोप की बुलंदियों को देखिये. अगर आप वर्तमान यूरोप की संस्कृति और समाज की तुलना भारती पाकिस्तानी समाज से नहीं कर पा रहे हैं तो आप भारत को समर्थ बनाने के संभावित मार्ग की कल्पना भी नहीं कर पायेंगे.

 संजय जोठे

भाजपा का आंबेडकर प्रेम कितना सच!

कुछ दिन पूर्व आंबेडकरवादियों के भारी विरोध के बावजूद बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम में ‘राम जी’ जोड़ कर आंबेडकर प्रेम का जबरदस्त मुजाहिरा करने वाली भाजपा दलितों के ऐतिहासिक भारत बंद के बाद एक बार फिर आंबेडकर प्रेम की प्रतियोगिता में बाकी दलों को बहुत पीछे छोड़ती नजर आ रही है. इसकी शुरुआत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है. एक ऐसे समय में जबकि भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंदी कांग्रेस सहित बाकी विपक्ष एससी/एसटी एक्ट पर भारतीय जनता पार्टी को घेरने में जोर-शोर से जुट गया है, मोदी ने दिल्ली में 4 अप्रैल को दलितों के मुद्दे पर राजनीति कर रहे दलों को ललकारते हुए कहा कि किसी अन्य सरकार ने बाबा साहेब का उस तरह सम्मान नहीं किया , जैसा उन्होंने किया है.

भीमराव आंबेडकर की विरासत के राजनीतिकरण के लिए राजनीतिक दलों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार की तरह दलित चिंतन पर किसी भी सरकार ने काम नहीं किया है. बाबा साहेब की याद में अनेक परियोजनाओं को पूरा करके हमारी सरकार ने उन्हें उचित स्थान दिलाया है. 26ए अलीपुर रोड हाउस जहां आंबेडकर का निधन हुआ था, उसे 13 अप्रैल को उनके जन्म दिन की पूर्व संध्या पर देश को समर्पित किया जायेगा.

उन्होंने कहा कि हर किसी ने राजनीतिक लाभ के लिए आंबेडकर के नाम को अपने साथ जोड़ा. लेकिन उनकी सरकार ने आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र को पूरा किया , हालांकि इस विचार की कल्पना तब की गयी थी, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. पिछली यूपीए सरकार ने इस परियोजना को सालों तक खींचा , लेकिन पूरा नहीं किया. जिस दिन प्रधानमंत्री दिल्ली से विपक्ष के आंबेडकर प्रेम को चुनौती दे रहे थे, उसी दिन ओड़िसा के कालाहांडी में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गर्जना करते हुए कहा कि आरक्षण नीति को कोई भी बदलने की हिम्मत नहीं कर सकता जैसा कि संविधान में आंबेडकर ने तय किया है.

केंद्र सरकार शिक्षा और नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के समुदायों के आरक्षण की नीति को न तो रद्द करेगी और न ही किसी को ऐसा करने देगी. इस बीच दलितों के भारत बंद से उपजे नए हालात में आंबेडकर के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए पीएम मोदी की ओर से भाजपा सांसदों को निर्देश जारी किया गया है कि वे फुले-आंबेडकर जयंती मनाने के साथ उन गांवों में प्रवास करेंगे जहां दलितों की आबादी 50 % से ज्यादा है. प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष के बयानों से क्या ऐसा नहीं लगता कि भाजपा ने आंबेडकर और दलित प्रेम के प्रदर्शन के मामले में शेष दलों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. लेकिन क्या ऐसा पहली बार हो रहा है! नहीं . यदि 2014 में मोदी सरकार के केंद्र में आने के बाद के इतिहास का सिंहावलोकन करें तो पाएंगे कि थोड़े-थोड़े अन्तराल पर ऐसा लगातार हो रहा है.

लोग भूले नहीं होंगे कि मोदी राज में ही डॉ.अंबेडकर को भाजपा के मातृ संगठन ‘संघ’ की ओर से भारतीय पुनरुत्थान के पांचवें चरण के अगुआ के रूप में आदरांजलि दी गयी . मोदी राज में ही मुंबई के दादर स्थित इंदु मिल को आंबेडकर स्मारक बनाने की दलितों की वर्षों पुरानी मांग को स्वीकृति मिली.बात यहीं तक सिमित नहीं रही, इंदु मिल में बाबा साहेब का स्मारक बनाने के लिए 425 करोड़ का फंड भी मोदी राज में मुहैया कराया गया. लन्दन के जिस तीन मजिला मकान में बाबा साहेब अंबेडकर ने दो साल रहकर पढाई की थी, उसे चार मिलयन पाउंड खरीदने का बड़ा काम मोदी राज में ही हुआ. इनके अतिरिक्त भी बाबा साहेब की 125 वीं जयंती वर्ष में भाजपा की ओर से ढेरों ऐसे काम किये गए जिसके समक्ष अंबेडकर-प्रेम की प्रतियोगिता में उतरे बाकी दल बौने बन गए.

इनमें एक बेहद महत्त्वपूर्ण काम था 26 नवम्बर को ‘संविधान दिवस’ घोषित करना एवं इसमें निहित बातों से जन-जन तक पहुचने की अपील . इसके लिए उन्होंने 2015में संसद के शीतकालीन सत्र के शुरुआती दो दिन संविधान पर चर्चा के बहाने बाबा साहेब को श्रद्धांजलि देते हुए जो उदगार व्यक्त किया था , उससे लगा था कि आजाद भारत में आंबेडकर लोगों की पीड़ा समझने और उनकी मुक्ति का उपाय करने वाला कोई प्रधानमंत्री पहली बार सामने आया है . तब मोदी ने कहा था – ‘अगर बाबा साहेब आंबेडकर ने इस आरक्षण की व्यवस्था को बल नहीं दिया होता , तो कोई बताये कि मेरे दलित , पीड़ित, शोषित समाज की हालत क्या होती? परमात्मा ने उसे वह सब दिया है, जो मुझे और आपको दिया है, लेकिन उसे अवसर नहीं मिला और उसके कारण उसकी दुर्दशा है. उन्हें अवसर देना हमारा दायित्व बनता है.’ मोदी के उस कथन के बाद लोगों ने मान लिया था कि आंबेडकर के लोगों के जीवन में अभूतपूर्व खुशहाली आ जाएगी . लेकिन क्या वैसा हुआ? सच तो यह है कि मोदी राज में अभूतपूर्व खुशहाली की जगह दलित अभूतपूर्व बदहाली की ओर ही अग्रसर हुए.

संविधान दिवस की घोषणा के अवसर पर मोदी के उस सब्जबाग़ दिखाऊ भाषण के बाद बड़ी तेजी से बाबा साहेब के करोड़ों अनुयायियों को देशभर में अन्याय, अत्याचार व शोषण का शिकार बनाने तथा उनके अधिकारों को एक-एक करके छिनने का अभूतपूर्व सिलसिला शुरू हुआ . चैम्पियन सवर्णवादी संघ प्रशिक्षित मोदी ने मंडलवादी आरक्षण का बदला लेने के लिए न सिर्फ दलितों , बल्कि सम्पूर्ण आरक्षित वर्गों का जीवन बदहाल बनाने में सारी हदें पार कर लिया. ऐसा लगता है कि मोदी ने ठान लिया है कि देश की सारी धन-संपदा सवर्णों के हाथों में सौंप देनी है. इस योजना के तहत ही उन्होंने एयर इंडिया, रेल, हास्पिटल इत्यादि सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में सौपने का युद्ध स्तर पर अभियान छेड़ा.

यह जानते हुए कि जरुरत से ज्यादा ऍफ़डीआई देश को विदेशियों का गुलाम बना सकती है, मोदी ने सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 % एफडीआई लागू करने का फैसला किया. और यह सब किया आरक्षित वर्गों का सफाया करने के लिए. मोदी ने आरक्षित वर्गों के सफाए की योजना के तहत जो आर्थिक नीतियां अपनाई ,उसका परिणाम जनवरी 2018 में आई ऑक्सफाम की रिपोर्ट में दिख गया. इस रिपोर्ट ने बतलाया कि 2016 से 2017 के बीच टॉप की 1% आबादी की दौलत में प्रायः 15% इजाफा हो गया है. दुनिया के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग की धन-संपदा में एक साल में 15% का इजाफा होगा. यदि 1% टॉप की आबादी से आगे बढ़कर टॉप की 10% आबादी की धन-दौलत का जायजा लिया जाय तो पता चलेगा कि देश की 90 % से ज्यादा धन-संपदा इसके हाथ में चली गयी है.

वैसे तो इस स्थिति के लिए 24 जुलाई ,1991 के बाद सत्ता में आई सभी सरकारें ही जिम्मेवार हैं, किन्तु विशेषरूप जिम्मेवार मोदी सरकार ही है. इसकी नीतियों के कारण ही भारत में उस आर्थिक और सामाजिक विषमता का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है, जिसके खात्मे लिए खुद डॉ. आंबेडकर ने बार-बार आग्रह जताया था. किन्तु मोदी राज में न सिर्फ संविधान निर्माता के आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे की चाह का मखौल उड़ाया गया है , बल्कि आंबेडकर के लोगों को आर्थिक रूप से पूरी तरह खोखला करने के साथ और दो ऐसे काम किये गए हैं, जो भाजपा के आंबेडकर प्रेम पर बड़ा सवालिया चिन्ह लगाते हैं.

इनमें पहला है आंबेडकर के लोगों को उच्च शिक्षा से दूर धकलने की साजिश. गांधीजी कहा करते थे शूद्रों को उतनी ही शिक्षा देनी चाहिए जिससे वे अपने शुद्र्त्व यानी तीसरे – चौथे दर्जे का काम कुशलता से कर सकें. वैसे तो 24 जुलाई ,1991 के बाद से सभी सरकारों ने इस दिशा में साजिश की है. किन्तु मोदी राज में यह काम बड़ी बेरहमी से हो रहा है. इस सरकार का लक्षण बतला रहा है कि दलित – बहुजन उच्च शिक्षा का मुंह न देख सकें, इस दिशा में जितना जल्दी हो सके,मोदी सरकार पुख्ता कर गुजरना चाहती है. देश की टॉप की ६२ यूनिवर्सिटीयों को स्वायतता प्रदान करना एवं शिक्षकों की भर्ती में यूनिवर्सिटीयों को यूनिट न मानकर विभागवार रिक्तियां निकालना , मोदी सरकार के दो ऐसे खास काम हैं, जिससे भविष्य में दलितों को प्रोफ़ेसर के रूप में देखना एक सपना बनकर रह जायेगा. उच्च शिक्षा से दूर धकेलने के साथ मोदी राज में आंबेडकर के लोगों की सुरक्षा के लिए जो एससी/एसटी सुरक्षा अधिनियम बना था, उसे भी सुप्रीम कोर्ट की मिलीभगत से निष्प्रभावी बना दिया गया है . ऐसा लगता है रामवादी मोदी आंबेडकर के लोगों के प्रति ,मुख में राम, बगल में छुरी वाली कहावत को सत्य प्रमाणित करने पर तुले हैं.ऐसे में उनके आंबेडकर प्रेम को विशुद्ध दिखावा से भिन्न कुछ कहा ही नहीं जा सकता.

मोहम्मद पैगंबर की वंशज हैं ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ- रिपोर्ट

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मोरक्को के अखबार की एक रिपोर्ट में चौंकाने वाला दावा किया गया है. अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह दावा किया गया है कि ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद पैगंबर की वंशज हैं. इतिहासकारों ने यह दावा ब्रिटेन के शाही परिवार के वंशावली की 43 पीढ़ियों को खंगालने के बाद किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटेन की महारानी वाकई पैगंबर की 43वीं वंशज हैं.

इतिहासकारों के मुताबिक एलिजाबेथ द्वितीय की ब्‍लडलाइन 14वीं सदी के अर्ल ऑफ कैंब्रिज से है और यह मध्‍यकालीन मुस्लिम स्‍पेन से लेकर पैगंबर की बेटी फातिमा तक जाती है. फातिमा हजरत मोहम्मद की बेटी थीं और उनके वंशज स्पेन के राजा थे, जिनसे महारानी का संबंध बताया जा रहा है. इसी वजह से, महारानी को मोहम्मद का वंशज कहा जा रहा है. आपको बता दें कि इस्लाम का आरम्भ स्पेन में 711 ईसवी में अरब के बनी उमैय्या के शासनकाल में हुआ था.

इससे पहले साल 1986 में शाही वंश पर अध्ययन करने वाली संस्था बर्क्स पीरगे के पब्लिशिंग डायरेक्टर हैरल्ड बी ब्रूक्स बेकर ने भी यह दावा किया था. बर्क्स पीरगे ने अपने दावे में कहा था कि महारानी मुस्लिम राजकुमारी जाइदा के परिवार से हैं. यह दावा किया गया कि अलमोराविद्स ने जब अब्बासी सल्तनत पर हमला किया तो जाइदा अपनी जान बचाने के लिए स्पेन के राजा किंग अल्फोंसो छठे के दरबार में पहुंच गई थी. वहां उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया और किंग से शादी करके अपना नाम इसाबेला रख लिया. किंग से उनको एक लड़का पैदा हुआ जिनका नाम सांचा था. थर्ड अर्ल ऑफ कैंब्रिज रिचर्ड ऑफ कौन्सबर्ग सांचा के वंशज थे जो इंग्लैंड के किंग एडवर्ड तृतीय के पोते थे.

इनपुट नवभारत टाइम्स से भी

बिहार में भाजपा के खिलाफ बिछ रही है बिसात!

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह 2019 के चुनाव को जीतना आसान समझ रहे थे, वह उतना आसान होता नहीं दिख रहा है. देश में 120 सीटे ऐसी हैं जहां भाजपा के खिलाफ बिसात बिछने लगी है. इसमें बिहार की 40 और उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटे हैं. यूपी में जहां मायावती और अखिलेश यादव ने साथ आने की घोषणा कर दी है तो वहीं बिहार में नीतीश कुमार, एक जमाने में उनके सहयोगी उपेन्द्र कुशवाहा और लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान की तिकड़ी के बीच खुसफुसाहट तेज हो गई है.

इस बीच अम्बेडकर दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में नीतीश, रामविलास पासवान और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा के एक मंच पर दिखने की खबरें बिहार की राजनीति में तेजी से गूंज रही है. यह सारी संभावनाएं यूं ही नहीं है, बल्कि यह तीनों नेताओं के लिए जरूरी भी है. असल में लोकसभा में भाजपा खुद अपने बूते बहुमत में है. ऐसे में वह सहयोगी दलों को बहुत ज्यादा भाव नहीं दे रही है. भाजपा की उपेक्षा के शिकार रामविलास पासवान से लेकर नीतीश और कुशवाहा महसूस कर रहे हैं. तो यूपी में ओमप्रकाश राजभर और महाराष्ट्र में शिवसेना भी इस बारे में अपनी नाराजगी जता चुकी है. ऐसी स्थिति में एनडीए में शामिल सहयोगी दल अब भाजपा को कमजोर करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

देश की राजनीति के केंद्र लुटियन जोन की चर्चाओं की माने तो बिहार के ये तीनों नेता अगला लोकसभा चुनाव और फिर बिहार का आगामी विधानसभा साथ मिलकर लड़ सकते हैं. ये उनकी जरूरत भी है. नीतीश कुमार को जहां सत्ता में रहने की आदत लग चुकी है तो वहीं रामविलास पासवान अपने बेटे चिराग पासवान को राजनीति में ठीक से स्थापित नहीं कर पाए हैं. उपेन्द्र कुशवाहा की स्थिति भी ढुलमुल बनी हुई है. इन्हें यह भी अहसास है कि बिहार में आगामी चुनाव राजद बनाम भाजपा हो सकती है. ऐसे में अगर भाजपा की सीटें ज्यादा रहीं तो वो गठबंधन सरकार में अपना मुख्यमंत्री चाहेगी. नीतीश को मुख्यमंत्री प्रत्याशी बनाने के लिए पासवान औऱ कुशवाहा आराम से राजी हो सकते हैं. तो वहीं अगर ये साथ नहीं आएं तो इनकी स्थिति काफी कमजोर हो सकती है.

यह बात भी एकदम साफ है कि नीतीश कुमार बिहार में अपने दम पर सरकार नहीं चला सकते हैं. ऐसे में नीतीश पासवान और कुशवाहा के साथ मिलकर एक अलग समीकरण बना सकते हैं. बिहार में गैर-यादव ओबीसी और महादलितों को मिलाकर 38 प्रतिशत का वोटबैंक बनता है. यह आंकड़ा भी इस तीकड़ी साथ आने की संभावना को बल देता है. फिलहाल तीनों नेता ऐसी किसी चर्चा से इंकार कर रहे हैं लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता. लेकिन अगर ऐसा हो गया तो 2019 में भाजपा भले ही केंद्र में आ जाए, उसके लिए अपने अकेले बूते सरकार बनाना मुश्किल होगा. और फिलहाल हर क्षेत्रिय दल यही चाहता है.

आईएएस टॉपर रही टीना डाबी ने रचाई शादी

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जम्मू (ब्यूरो)। 2015 में देश की सर्वोच्च प्रतियोगी परीक्षा सिविल सेवा की परीक्षा में टॉप कर सनसनी बन कर उभरी टीना डाबी ने शादी कर ली है. टॉपर टीना डाबी ने अपने बाद दूसरे स्थान पर रहे अतहर आमिर-उल-शफी खान से शादी की है. जम्मू- कश्मीर में पहलगाम की वादियों में दोनों की प्रेम कहानी को शादी के बंधन में बदल दिया गया. शादी 7 अप्रैल को हुई.

 पिछले कुछ वर्ष से कश्मीर के हालात खराब होने की छवि बनाई जा रही है. इस छवि को दूर करने के लिए दिल्ली की रहने वाली टीना डाबी और कश्मीर के रहने वाले अतहर आमिर–उल-शफी खान ने पहलगाम को शादी के लिए चुना. शादी के बाद दोनों अनंतनाग स्थित अतहर आमिर के पैतृक गांव देवेपोरा मटन में चले गए, जहां उन्होंने रिश्तेदारों व अन्य गणमान्य लोगों के लिए पार्टी आयोजित की.

ऐसे प्यार चढ़ा था परवान

2015 में आइएएस की परीक्षा में सफल होने के बाद जब दोनों नार्थ ब्लॉक में पर्सनल और ट्रेनिंग विभाग के सम्मान समारोह में मिले थे तो आमिर पहली नजर में ही टीना को दिल दे चुके थे. टीना ने कहा था कि हम लोग सुबह कार्यक्रम में मिले थे और शाम को आमिर उनसे मिलने पहुंच गया था. वह पहली नजर में प्यार था. टीना ने कहा था कि आमिर बहुत ही अच्छे इंसान हैं.2016 में टीना ने सोशल साइट पर आमिर के साथ शादी करने की बात कही थी.

दलित सांसदों की नाराजगी से पीएम मोदी से लेकर अमित शाह तक परेशान

नई दिल्ली। देश में दलितो को लेकर राजनीति तेज हो गई है. 2 अप्रैल को दलित आंदोलन के बाद भाजपा के दलित सांसदों की बेचैनी भी खुलकर सामने आने लगी है. एक के बाद एक चार दलित सांसद पार्टी में भेदभाव को लेकर मीडिया के सामने आ गए हैं. आलम यह है कि इनकी नाराजगी पीएम मोदी से लेकर अमित शाह तक के लिए चिंता का विषय बन गई है.

पिछले दिनों सावित्रीबाई फुले, छोटे लाल, इटावा के सांसद अशोक कुमार, नागिना के यशवंत सिंह जैसे सांसदों ने दलितों के मसले पर राज्य और केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठाकर मोदी और अमित शाह को परेशान कर दिया है. खबर है कि सांसदों की नाराजगी का डैमेज कंट्रोल करने के लिए मोदी ने बीते शनिवार को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिल्ली बुलाया. एक घंटे तक चली इस बैठक के दौरान मोदी ने न केवल योगी से चर्चा की बल्कि इस मसले पर विस्तृत रिपोर्ट भी यूपी बीजेपी से मांगी है.

असल में गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में हार से पहले से ही परेशान भाजपा के लिए पार्टी के एक के बाद एक चार बीजेपी दलित सांसदों की नाराजगी पीएम मोदी के लिए भी सिरदर्द बन गई है. सभी सांसदों के यूपी से होने के कारण मोदी और अमित शाह ज्यादा परेशान हैं. वो इस मामले को तूल नहीं देना चाहते हैं.

दलितों को लेकर राजनीति तेज, राहुल और कांग्रेस का देश भर में उपवास

नई दिल्ली। एससी-एसटी एक्ट में संसोधन के खिलाफ सड़कों पर उतरे दलितों की ताकत और एकजुटता को देखते हुए अब तमाम राजनैतिक दल सहमें हुए हैं. दलितों की जागरूकता को देखते हुए अब राजनैतिक दलों को यकीन हो गया है कि वो अब दलितों को बहला नहीं पाएंगे. इसलिए दलितों और आदिवासियों को जोड़ने के लिए राजनैतिक दल पसीना बहाने लगे हैं. कांग्रेस पार्टी आज नौ अप्रैल को देश भर में उपवास और धरना कर रही है. दिल्ली में राहुल गांधी खुद राजघाट जाकर उपवास में शामिल होने पहुंचे.

राहुल गांधी के साथ दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तमाम दिग्गज नेता मौजूद थे. कांग्रेस कार्यकर्ता बीजेपी सरकार के खिलाफ और देश में सांप्रदायिक सौहार्द तथा शांति को बढ़ावा देने के लिए सभी राज्य और जिला मुख्यालयों में एकदिवसीय अनशन कर रहे हैं. कांग्रेस पार्टी सीबीएसई पेपर लीक, पीएनबी घोटाले, कावेरी मुद्दे, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जे देने और दलितों के खिलाफ हो रहे हमले जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर संसद में चर्चा कराने में केंद्र सरकार की नाकामी के खिलाफ धरना दे रही है.

असल में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की प्रदेश इकाइयों के प्रमुखों को समाज के सभी वर्गों में सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रव्यापी उपवास रखने के निर्देश दिया था. दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के उपवास से भाजपा परेशान है. एक ओर जहां एक के बाद एक दलित सांसद भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं तो दलित समाज के अन्य लोग भी भाजपा के खिलाफ ज्यादा खड़े हैं. बौखलाई भाजपा के नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा कि यह दलित हितों के लिए उपवास नहीं है, यह दलित हितों का उपहास है.

पिछले 10 साल में दलितों पर अत्याचार 51 फीसदी बढ़ा

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नई दिल्ली। समाज आगे बढ़ रहा है, देश आगे बढ़ रहा है, लोगों में शिक्षा बढ़ रही है लेकिन इन तमाम अच्छी बातों के बीच एक बात चौंकाने वाली है. दलित उत्पीड़न को लेकर जारी सरकारी संस्था नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट (2016) में इसी समाज का एक दूसरा चेहरा भी सामने आया है. यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले दस सालों में दलितों पर अत्याचार तेजी से बढ़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक दलितों पर होने वाले उत्पीड़न में पिछले दस सालों में 51 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है.

देश में दलितों की कुल आबादी 20.14 करोड़ है जो देश की कुल जनसंख्या का 16.6 प्रतिशत है. दलित समाज अपने अधिकारों को लेकर लगातार सजग हुआ है. उसकी जागरूकता के कारण अब वह अत्याचारों का विरोध करने लगा है. हालिया आकड़े के आधार पर हम कह सकते हैं कि इसी विरोध के कारण अब शोषित तबका उस पर अब औऱ जुल्म करने लगा है.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट में जो बदलाव हुए हैं उसको लेकर देश भर में प्रदर्शन हो रहा है. इसमें शीर्ष अदालत का यह कहना था कि इस एक्ट का गलत इस्तेमाल कर लोगों को फंसाया जाता है. सवर्ण समाज ने भी इस पर काफी हल्ला मचाया था. लेकिन नए आंकड़े बताते हैं कि झूठे मामले के 21 फीसदी केसों की संख्या घटकर अब 15 फीसदी हो गई है.

ऐसा दलितों में बढ़ती जागरूकता औऱ शिक्षा के कारण हुआ है. असल में कुछ वक्त पहले तक सामान्य वर्ग का एक व्यक्ति सामान्य वर्ग के दूसरे व्यक्ति से अपनी दुश्मनी निकालने के लिए अपने अधीन काम करने वाले अनुसूचित जाति के लोगों से झूठे मामले दर्ज करवा देता था. अपनी रोजी-रोटी जैसे जरूरी जरूरतों के लिए सामान्य वर्ग पर निर्भर रहने के कारण अनुसूचित जाति का व्यक्ति दबाव में मामले दर्ज करवा देता था. लेकिन अब इस वर्ग में शिक्षा का प्रसार होने और सामान्य वर्ग पर निर्भरता कम होने से झूठे मामलों में कमी आई है. लेकिन दलितों पर बढ़ रहे हमलों के कारण चिंता बढ़ गई है.

सहारनपुर के दलितों ने बाबासाहेब के लिए खरीदा अखबार का पहला पन्ना

सहारनपुर। अपने अखबार ‘केसरी’ में बाबासाहेब के अखबार ‘मूकनायक’ का पेड विज्ञापन तक छापने से मना कर देने वाले बाल गंगाधर तिलक ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि एक दिन ऐसा आएगा जब बाबासाहेब के अनुयायी उनके लिए अखबार का पूरा पन्ना खरीद लेंगे. लेकिन सालों बाद यह मुमकिन हो गया है, जब किसी सरकार ने नहीं बल्कि बाबासाहेब को अपना आदर्श मानने वाले लोगों ने ऐसा कर दिखाया है. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में दलित समाज के लोगों ने एक दैनिक अखबार का पहला पन्ना खरीद लिया है.

14 अप्रैल को बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर की 127वीं जयंती है. इसी के मद्देनजर बाबासाहेब को श्रद्धांजली देने के लिए सराहनपुर के अम्बेडकरवादियों ने यह फैसला किया. सराहनपुर में अम्बेडकरवादियों की संस्था ‘जागृति फाउंडेशन’ की ओर से यह विज्ञापन बुक किया गया है. संस्था से जुड़े लोगों के मुताबिक बाबासाहेब को श्रद्धांजली देने वाला यह विज्ञापन 14 अप्रैल को अमर-उजाला में प्रकाशित होगा. असल में पिछले दिनों में दलित आंदोलन लगातार मजबूत हुआ है. ऐसे में बाबासाहेब के विचार दिनों-दिन लोगों तक पहुंच रहे हैं. अम्बेडकरवादी आंदोलन का वैचारिक पक्ष भी लगातार मजबूत हुआ है. तो देश भर में अम्बेडकरवादियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है.

इस विज्ञापन को इसी रूप में देखा जा सकता है. जागृति फाउंडेशन की ओर से बाबासाहेब की जयंती पर 15 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया है, जिसमें शहर भर के आम्बेडकरवादी हिस्सा लेंगे. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और वक्ता देश के प्रख्यात समाजशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार हैं.

जिग्नेश मेवाणी ने ऐसा क्या कहा कि भाजपा अध्यक्ष ने दर्ज करवाया केस

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बंगलुरू। निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने एक बार फिर पीएम मोदी को लेकर बयान दिया है. मेवाणी का यह बयान भाजपा के जिलाध्यक्ष को इतनी नागवार गुजरी कि उसने मेवाणी पर केस दर्ज कर दिया.

चित्रदुर्ग में जिग्नेश मेवाणी ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कर्नाटक के युवा प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों को बाधित करें. जिग्नेश मेवाणी ने युवाओं से अपील की है कि कर्नाटक के युवाओं का इस चुनाव में सबसे बड़ा योगदान यही होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेंगलुरु में प्रस्तावित रैलियों में कुर्सियां हवा में उछालें और मोदी की रैली को बाधित करें और उनके फंक्शन को डिस्टर्ब करें. जिग्नेश ने कहा कि दो करोड़ लोगों को नौकरी देने वाले वादे की बात मोदी से कहना अगर वह कुछ न बोलें तो उनसे कहो कि हिमालय चले जाएं. मेवाणी के इस बयान को लेकर कर्नाटक में चित्रदुर्गा जिले के भाजपा जिलाध्यक्ष ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराया है.

 

राहुल गांधी इस तरह देंगे कर्नाटक में अमित शाह को मात

नई दिल्ली। गुजरात चुनाव के पहले जो कांग्रेसी और विपक्षी नेता राहुल गांधी को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं थे, अब उनका नजरिया बदल गया है. कांग्रेसी जहां राहुल गांधी की तारीफ करते दिख रहे हैं तो वहीं विपक्षी भाजपा नेता राहुल गांधी के तेवर देखकर चिंता में हैं.

कर्नाटक में चुनाव प्रचार अभियान में जुटे कांग्रेस के कुछ नेता करीब 6 महीने पहले राहुल गांधी को लेकर मज़ाक किया करते थे. उनका कहना था कि वे विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी से बेहतर कैंपेनिंग कर सकते हैं. आज वे ही नेता खुले तौर पर राहुल गांधी की तारीफ करते दिख जा रहे हैं. चुनाव को लेकर उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष की कैंपेनिंग और रणनीति पार्टी के लिए फायदेमंद दिख रही है. राहुल पार्टी कैडर में जोश और उम्मीद जगा रहे हैं.

कांग्रेसी नेताओं के मुताबिक गुजरात चुनाव के बाद राहुल गांधी बदले-बदले से नज़र आ रहे हैं. गुजरात चुनाव में भले ही बीजेपी को जीत मिली हो, लेकिन उसे कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिली थी. चुनावी रण में कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे थे. कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इस चुनाव के बाद से राहुल गांधी और ज्यादा उत्साह से भर गए. वे कांग्रेस के लिए अब पहले से ज्यादा मेहनत कर रहे हैं. राहुल गांधी की चुनावी रणनीति ने अमित शाह को भी मुश्किल में डाल दिया है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो राहुल गांधी कर्नाटक में कांग्रेस की वैतरणी पार लगा सकते हैं.

मनमोहन सिंह पर बनीं फिल्म का फर्स्ट लुक जारी

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जीवन पर बन रही फ़िल्म ‘द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ का पहला दृश्य सामने आ गया है. इस फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार अनुपम खेर निभा रहे हैं, जबकि सोनिया गांधी का किरदार जर्मनी की सुजैन बर्नर्ट निभा रही हैं. अक्षय खन्ना फ़िल्म में संजय बारू की भूमिका में हैं. इस फिल्म की हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों ही स्क्रिप्ट तैयार हैं. यह फ़िल्म संजय बारू की किताब ‘द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ पर आधारित है.

इस फ़िल्म का निर्देशन विजय रत्नीकर गुट्टे कर रहे हैं और हंसल मेहता फ़िल्म के क्रिएटिव प्रोड्यूसर हैं. फिल्म में सोनिया गांधी की भूमिका निभाने वाली सुज़ैन इससे पहले वह 7RCR नाम की एक टीवी सिरीज़ में भी सोनिया गांधी का किरदार निभा चुकी हैं. उन्हें हिन्दी, बंगाली और मराठी भाषा भी आती है.

 

2 अप्रैल भारत बंद – एक मूल्यांकन

2 अप्रैल को हुआ “भारत बंद”जिसमे दलित-आदिवासी एकता मजबूत नजर आयी. बहुमत आदिवासी और दलित जातियां इस बन्द में शामिल रही. इसके साथ ही देश के प्रगतिशील, बुद्विजीवी, लेखक, रंगकर्मी, कम्युनिस्ट पार्टियां बन्द के समर्थन में मजबूती से शामिल हुए. आदिवासी जिनका इतिहास ही सदियों से लड़ने का रहा है. जिनकी संस्कृति ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की, लड़ने की रही है. जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिए जिन्होंने अपने सर कटवाए है तो दुश्मन के सर भी काटे है. आदिवासियों ने जंगल में जहाँ गोरे अंग्रेजो को नही घुसने दिया तो वही आजादी के बाद उन्होंने भारत के काले अंग्रेजो को भी नही घुसने दिया है. वो आज भी लड़ रहे है मजबूती से गोरे और काले अंग्रेजो की सयुंक्त लुटेरी सत्ता से, उन्होंने भारत बंद में मजबूती से विरोध दर्ज करवाया. उनके बन्द में सत्ता के उत्पीड़न के खिलाफ विरोध का स्वर मजबूत दिखाई दिया.

लेकिन क्या दलित सच में एकता की तरफ बढ़ रहे है. दावा तो ये भी किया जा रहा है कि दलित-मुस्लिम-पिछड़ा इकठ्ठे हो रहे है अपनी एकता बना रहे है. क्या इसमे सच्चाई है?

2 अप्रैल के भारी जन आक्रोश को देखते हुए दावे तो ब्राह्मणवाद को हराने के किये जा रहे है. बोला जा रहा है ब्राह्मणवाद हार रहा है, अब कुछ दिन का मोहताज है ब्राह्मणवाद. बहुत जल्दी ही दलित-पिछड़ो का राज होगा. सपने बहुत लिए जा रहे है वैसे सपने लेने का सबको अधिकार भी है लेकिन जब सपना टूटता है तो इंसान टूट जाता है भविष्य में खड़ा होना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता है.

पूंजीपतियों द्वारा खड़े किए गए अन्ना और केजरीवाल के आंदोलनों से भी देश के लाखों लोगो ने परिवर्तन के सपने देखे थे. लेकिन जब सपना टूटा तो सपना देखने वाले भी टूट गए आज उनकी हालत बहुत बुरी है वो न इधर के रहे और न उधर के रहे.

इसलिए सपना जरूर देखो लेकिन पहले ठोस मैदान जरूर तैयार करो.

किसी भी आंदोलन का ईमानदारी से मूल्यांकन किये बिना आगे बढ़ना “अंधेरे में लठ मारना है”

सबसे पहले तो ब्राह्मणवाद क्या है इसको जानने की जरूरत है. ब्राह्मणवाद के नाम पर जो रोजाना ब्राह्मणों को गाली दे कर सन्तुष्टि की जा रही है. क्या इससे ब्राह्मणवाद हार जाएगा?

ब्राह्मणवाद

लुटेरी क़ौम द्वारा श्रम की लूट को धर्म का चोला पहनाकर लूट को जायज ठहराने और लुटेरो को सर्वश्रेठ साबित करने वाला विचार ब्राह्मणवादी विचार है. ब्राह्मणवाद जिसका प्रतिनिधित्व कभी सवर्ण जातियां करती थी. लेकिन वर्तमान में आज ब्राह्मणवाद सभी जातियों में है. जो भी जाति या व्यक्ति लुटेरी मण्डली में शामिल हो जाता है या होने का इच्छुक होता है वो ब्राह्मणवाद की चपेट में है. आज प्रत्येक जाति दूसरी जाति से खुद को स्वर्ण समझती है. एक झूठे औऱ काल्पनिक मिथकों व इतिहास के सहारे श्रेष्ठ बनने की कोशिश प्रत्येक जाति द्वारा की जा रही है.

बहुमत की मजदूर और किसान जातियाँ जो वर्तमान में दलित व पिछड़ो में विभाजित है. सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन में जिनकी एकता बहुत जरूरी है. ये जातियाँ आपस में ब्राह्मणवाद का बहुत गहरे से शिकार है. आज भी ब्राह्मण ही ब्राह्मणवाद की अगुवाई कर रहा है. लेकिन इसके पीछे सभी जातियाँ खड़ी है.

दलित जातियाँ भी आपसमें छुआछूत उतना ही करती है जितना उनसे सवर्ण जातियाँ करती है.

सबसे पहले दलित जातियों की बात करे तो अपर दलित जातियाँ चमार, धानक, नायक जाति दलितों में स्वर्ण भूमिका में है. जितनी नफरत सवर्ण, दलितों से करते है उतनी ही नफरत अपर दलित जातियां के लोग अति दलित में शामिल जाति सेंसी, बावरी, वाल्मीक, पासी, भंगी इनके साथ करते है. जातियों में भी अंदर ये जात और गोत्रो में बंटे हुए है.

किसी भी गांव में इनके मकान इकठ्ठे नही है. जात के अनुसार अलग-अलग बस्तियां है. दलित तो जात के अंदर भी जात में बंटे हुए है. जिस समय गांव में पानी का साधन कुँए होते थे तो दलितों ने भी जाति अनुसार कुँए अलग-अलग बनाये हुए थे. चौपाल अलग-अलग, गांव में श्मशान भूमि जहाँ सवर्णो ने अलग बनाई हुई है ऐसे ही दलितों ने भी श्मशान भूमि के अंदर अलग-अलग जगह बनाई हुई है.

स्वर्ण जातियों में जो रीति-रिवाज, सामाजिक जकड़न और समाज का ढांचा है, वैसा ही ढांचा पिछड़ो व दलितों में है.

आप बराबर सवर्णो का ढांचा अपनाए हुए है. बराबर उन्ही नियम कानून कायदों में रहना पसंद करते है. लेकिन ब्राह्मणवाद को गालिया देते है उसको खत्म करना चाहते है. आपके जो दलित नेता है जो सुबह से शाम तक ब्राह्मणवाद के नाम पर सिर्फ ब्राह्मणों को गाली देकर वोट बटोरना चाहते है. लेकिन इस सामाजिक ढांचे को तोड़ना नही चाहते है. ये दलित नेता आपको गुलाम बनाये रखना चाहते है. ये दलित नेता वोटो की फसल के लिए दलित जातियों की एकता बने कभी नही चाहते है.

क्या 2 अप्रैल के भारत बंद में कोई दलित नेता आपको भारत बंद में शामिल होता दिखा? जबकि 60 से 70 सांसद और सैंकड़ो विधायक दलित है.

पिछड़ो के हालात –

जिसको इस आंदोलन से ये लगता है किइस आंदोलन में ओबीसी साथ आये है वो भी मूर्खता कर रहे है. OBC आरक्षण के लिए OBC है नही तो मानसिकता से सवर्ण है.

ऐसे ही मुस्लिम-सिख-ईसाई भी भारतीय संधर्भ में जातियों में बंटे हुए है. उनमें भी जातीय भेदभाव है. पिछड़ी जातियों में 2 तरह की जातियाँ है. छोटा किसान और भूमिहीन पिछड़े भूमिहीनों के सामाजिक हालात दलितों से थोड़े से बेहतर है लेकिन जातीय उत्पीड़न के वो भी शिकार है. OBC किसान जो बहुमत संख्या में ज्यादा है वो दलितों का जमकर उत्पीड़न करता है. सवर्णो के इशारे पर वो गांव में दलितों का सामूहिक सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्कार, राजनीतिक बहिष्कार करता रहा है. सवर्ण जाति खासकर ब्राह्मण इन पिछड़ी जाति के किसानों को आगे करके दलितों का जमकर उत्पीड़न करता है.

कुछ मामलों में स्वर्ण इन पिछड़ो का भी जातीय शोषण करते है. जहाँ सवर्ण जातीय बहुमत में है वहां वो OBC किसानों को अपना हुक्का भी नही पीने देंगे.

आरक्षण के सवाल पर सवर्ण इनकी खिलाफत करते है.

OBC जातियाँ खासकर किसानी से जुड़ी जातियाँ 2 अप्रैल के भारत बंद के खिलाफ थी और ये ही जातियाँ 10 अप्रैल के लुटेरी जातियों द्वारा बुलाये गए भारत बंद के समर्थन में खड़े है. क्योंकि SC/ST एक्ट उन जाहिलो को नकेल डालने का काम करता है जो इंसान को इंसान न मानकर उनसे जानवरो से भी बुरा व्यवहार करते है.

इसलिए ये जाहिल चाहते है कि उनको और आजादी मिल जाये मेहनतकश जातियों को लूटने की, लूट के खिलाफ आवाज उठाए तो जातीय आधार पर उनका दमन करने की, वो कोई भी कानूनी पाबन्दी नही चाहते है. वो मानवता को कुचलने का जो नंगा नाच धर्म की आड़ में हजारो सालो से करते आ रहे है उस नंगे नाच पर भारत के सविधान ने जो रोक लगाई थी उस रोक से आजादी चाहते है. इसलिए 10 अप्रैल कोउन्होंने भारत बंद बुलाया है. इस भारत बंद में obc किसान जातियाँ बढ़-चढ़ कर भाग लेंगी. भाग नही लेगी तो विरोध कभी नही करेगी इस भारत बंद का.

रोटी-बेटी का रिश्ता

सभी दलित जातियों की सवर्णो के सामने सामाजिक हालात बराबर है. इसलिए दलितों को दलित जातियों में सामाजिक बराबरी की तरफ बढ़ना चाहिए. दलित एकता अगर बनानी है तो सबसे पहले दलित जातियों को आपस मे रोटी-बेटी का रिश्ता कायम करना जरूरी है. रोटी-बेटी के रिश्ते का अभी तक दलित-पिछड़े-सवर्ण भी विरोध कर रहे है. जाति और शादी का भारतीय संधर्भ में मेल है. अगर सभी जातियों में रोटी-बेटी का रिश्ता बनता है तो जातिय बन्धन कमजोर जरूर होंगे. मान लो किसी गाँव मे दलितों का सामाजिक बहिष्कार किया हुआ है. आज कोई सवर्ण दलितों के पक्ष में नही बोलता सिर्फ प्रगतिशील लोगो को छोड़ कर लेकिन अगर उन दलितों में स्वर्ण जाति के बेटी या बेटा की शादी की हुई हैया दलितों में ही आपस में शादियां होती है तो क्या वो सवर्ण जात वाले या दलित अपने रिस्तेदारो के पक्ष में नही आ खड़े होंगे?

भूमि बंटवारा

बहुमत दलित व अति पिछड़ी जातियां भूमि हीन है इसलिए सबको भूमि बंटवारे की सांझी लड़ाई लड़नी चाहिए. जहाँ दलितों के पास बहुमत में खेती के लिए भूमि है वहाँ जातीय उत्पीड़न बहुत कम है.  दलित संगठित-असंगठित क्षेत्र में मजदूर है, वो खेत मजदूर है उनको श्रम की हो रही लूट के खिलाफ औऱ श्रम कानून लागू करवाने के लिए सांझी लड़ाई लड़नी चाहिए.

दलितों को शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजगारके लिए सामूहिक आंदोनल खड़े करने चाहिए.

दलितों को आदिवासियों, अल्पसंख्यको, महिलाओं के मुद्दों परचल रहे संघर्षो में भागीदारी करनी चाहिए.

जब आप इन मुद्दों परलड़ेंगे तो आपकी इस लड़ाई का हिस्सा पिछड़े, सवर्ण जो मजदूर-किसान है वो भी आपके पीछे आएंगे क्योकि उनके आर्थिक मुद्दे भी ये ही है. जब वो आपके साथ आएंगे तो ये जातीय बेड़िया कमजोर होगी. अगर ईमानदारी से लड़े तो जीत आपकी तय है. ब्राह्मणवाद का खात्मा, लूट तंत्र का खात्मा है.

उदय चे

अम्बेडकर जयंती पर देहरादून में एक हफ्ते का भीम महोत्सव शुरू

देहरादून। पिछले तकरीबन तीन-चार सालों से बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और भगवान बुद्ध की विचारधारा के लिए काम करने वाली संस्था दून बुद्धिस्ट सोसायटी इस साल देहरादून में बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रही है. देहरादून के परेड ग्राऊंड में 7 से 15 अप्रैल तक इस बार दून बुद्धिष्ट सोसायटी के नेतृत्व में भीम महोत्सव का आयोजन किया जाएगा. भारत रत्न डा. भीम राव अम्बेदकर के 127वें जन्मोत्सव कार्यक्रम को समर्पित ‘सांझी विरासत का भव्य सांस्कृतिक एवं बौद्धिक मेला’ भी आयोजित किया जाएगा. इस बार मेले को भव्य रूप दिया गया है. परेड ग्राऊंड में होने वाले मेले के दौरान रोज शाम को 5 बजे से रात 9 बजे तक प्रदेशभर के प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा गीत, संगीत, कवि सम्मेलन, नाट्य मंचन, लोकनृत्य, समसामयिक विषयों पर बौद्धिक चर्चा, उद्यमिता मार्गदर्शन की कार्यशाला आदि के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. मुख्य कार्यक्रम महामना ज्योतिबा फूले की जयंती 11 अप्रैल से लेकर बाबा साहेब की जयंती 14 अप्रैल तक आयोजित किए जाएंगे. इस दौरान नाट्य कार्यक्रम के अलावा देश के जाने-माने अम्बेडकरवादी कलाकारों का जमावड़ा लगेगा. इसके अतिरिक्त मेले में देशभर के राज्यों से लघु उद्यमी, शिल्पकार और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा उत्पादों को बेचने और प्रमोट करने के लिए स्टाल भी लगाए जाएंगे.

अम्बेडकरवादी युवा से डरे मप्र के सीएम, दौरे से पहले पुलिस ने किया गिरफ्तार

पन्ना। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दौरे से पहले एक अम्बेडकरवादी दलित एक्टिविस्ट के साथ पुलिसिया ज्यादती की खबर है. अनुसूचित जाति-जनजाति पिछड़ा वर्ग युवा संगठन के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र सिंह जाटव के मुताबिक 4 अप्रैल को बिना किसी कारण के भारी मात्रा में पुलिस बल उनके घर में पहुंच गई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार कर पुलिस उन्हें पन्ना में अनुसूचित जाति थाने में ले गई और सुबह से शाम तक बिठाने के बाद शाम को 159 के तहत मामला दर्ज कर छोड़ दिया. पुलिस ने इस गिरफ्तारी की वजह बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश के CM शिवराज सिंह चौहान के 4 अप्रैल को पन्ना दौरे के कारण जितेन्द्र जाटव को गिरफ्तार किया गया. बकौल जितेन्द्र पुलिस वालों ने उनसे कहा कि उन्हें शक है कि वो दलित-पिछड़े समाज से जुड़ी मांग उठा सकते हैं. हालांकि इससे पहले जितेन्द्र की गिरफ्तारी के विरोध में भारी संख्या में अम्बेडरवादी युवा अनुसूचित जाति थाने में पहुंच गए और इस घटना की निंदा की. विरोध दर्ज करते हुए 5 अप्रैल को दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के लोगों ने जिला कलेक्टर में पहुंचकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और पन्ना पुलिस अधीक्षक रियाज इकबाल को पद से हटाने की मांग की. विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना था कि बिना किसी कारणवश उनके साथी को गिरफ्तार कर उन पर असंवैधानिक तरीके से मामला दर्ज करना कहीं ना कहीं उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. प्रदर्शनकारियों ने जितेन्द्र जाटव पर दर्ज मामला वापस लेने की मांग की. गौरतलब है कि जितेन्द्र दलित एक्टिविस्ट हैं और दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के सवाल पर लगातार संघर्ष करते रहते हैं.

जयपुर में अम्बेडकर जयंती पर होगी समानता के लिए दौड़, क्रिकेटर इरफान पठान भी होंगे शामिल

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जयपुर में एकता नवनिर्माण ट्रस्ट द्वारा 14 अप्रैल को इस दौड़ का आयोजन किया जा रहा है

नई दिल्ली। अम्बेडकर माह शुरू हो चुका है. इस दौरान दुनिया भर में तमाम संगठन संविधान के अनुरूप समानता की बात करते हुए तमाम कार्यक्रम आयोजित करते हैं. इसी श्रृंखला में जयपुर में एक बड़ा और महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया है. एकता नवनिर्माण ट्रस्ट द्वारा जयपुर में रन फॉर इक्वालिटी कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है. समानता के लिए होने वाली यह दौड़ अम्बेडकर सर्किल पर होगा.

देखिए इरफान खान ने वीडियो जारी कर क्या अपील की 

समानता के लिए होने वाली इस दौड़ को जाने-माने दिग्गजों ने अपना समर्थन दिया है, इसमें मशहूर क्रिकेटर इरफान पठान, दिग्गज अभिनेता गोविंदा और जॉनी लीवर जैसी हस्तियां शामिल हैं. इन सभी दिग्गजों ने इस दौड़ के समर्थन में अपील भी जारी की है. इस दौड़ में मशहूर क्रिकेटर इरफान पठान भी लोगों के साथ दौड़ेंगे.

कार्यक्रम के लिए गोविंदा की अपील देखिए

रन फॉर इक्वालिटी को लेकर एकता नवनिर्माण ट्रस्ट से जुड़े तमाम कार्यकर्ता भी जुटे हुए हैं. सोशल मीडिया, रेडियो और तमाम माध्यमों से इस दौड़ में ज्यादा से ज्यादा लोगों से शामिल होने की अपील की जा रही है. इस दौड़ में शामिल होने के लिए इच्छुक लोग इस नंबर (9001716311, 9660037537) पर संपर्क कर सकते हैं. संबंधित कार्यक्रम के फेसबुक पेज को देख कर आप औऱ जानकारियां हासिल कर सकते हैं. “दलित दस्तक” भी जयपुर और इसके आस-पास मौजूद सभी पाठकों से समानता की इस दौड़ में शामिल होने की अपील करता है.

बंद के बाद मेरठ में दलित युवक की हत्या, मारने वालों ने कहा- ‘तू बड़ा नेता बनता है’

नई दिल्ली। दलित समाज के लोगों द्वारा दो अप्रैल को भारत बंद के बाद मेरठ और हापुड़ में स्थिति सुधर नहीं रही है. बंद के बाद मेरठ में सोशल मीडिया पर दलित गुंडों के नाम से एक लिस्ट वायरल हुई, जिसमें 83 दलितों के नाम थे. इसमें सबसे ऊपर जिस 28 साल के युवा गोपी पेरिया का नाम था, तीन दिन बाद उसकी हत्या हो गई है. उसे पांच गोलियां मारी गई. युवक के पिता बसपा नेता ताराचंद हैं.

पिता ताराचंद की शिकायत पर पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. आरोपियों में शोभापुर निवासी मनोज गुज्जर, आशीष गुज्जर, कपिल राणा और गिरधारी का नाम शामिल है. सभी पर भारतीय दंड संहिता(आईपीसी) की धारा 302, 504, 506 और एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया है. पुलिस को दी तहरीर में मृतक के पिता ताराचंद ने कहा कि घटनास्थल पर मनोज, आशीष और कपिल अपने दो अन्य साथियों सुनील तथा अनिल के साथ मौजूद थे. मनोज ने सबसे पहले गोपी के सीने में गोली मारी, फिर कपिल और आशीष ने गोली मारी. एक गोली सीने में दो, तीन गोलियां पीछे और पांचवीं गोली उसके हाथ में लगी. ताराचंद के मुताबिक मरने से छह घंटे पहले बेटे गोपी ने कहा था कि आरोपियों ने गोली मारने से पहले जातिसूचक शब्दों से नवाजा फिर कहा-तू बड़ा नेता बनता है.

मृतक गोपी के भाई प्रशांत ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हुई लिस्ट में अपना नाम देखकर सभी दलित युवा भाग गए थे, मगर गोपी नहीं भागा और वो गांव में ही रहा. प्रशांत ने कहा कि इस लिस्ट में मेरा नाम पांचवे स्थान पर था. पहले हमने सोचा कि यह पुलिस की लिस्ट है मगर पता करने पर पुलिस ने इन्कार कर दिया. संबंधित लिस्ट में मेरा पाचवां स्थान था. गौरतलब है कि दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान दलित बाहुल्य शोभापुर गांव के पास हिंसा भड़क उठी थी, इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया.