जुलाई की बात है, देश के कुछ युवा वर्ग सिनेमा घरों मे रोते बिलखते, खुद का शर्ट फाड़ते दिखे। ये महज़ एक फिल्म का जादू था जिसका नाम सैंयारा है, कह सकते हैं, हमें कुछ ठीक-ठीक क्रांति जैसा देखने को मिला। ऐसा इसीलिए कहा जा सकता है कि कई जगहों पे बेहोशी की भी खबर आई। युवाओं के मानसिक दबाव को इस फिल्म ने और बढ़ा दिया, शर्ट के पैसे गए सो अलग और सेहत बिगड़ी उसके लिए दवाइयों के भी पैसे लगे होंगे।
उसी के कुछ समय पहले अप्रैल में एक और फिल्म परदे पर आई थी। ‘फुले’, महात्मा ज्योतिबा राव फुले और माता सावित्री बाई फुले के पूरी ज़िंदगी और उनके सामाजिक परिवर्तन के काम को परदे पर लाया गया, पर इस फिल्म का विरोध लगभग पूरे देश में हुआ। विरोध इसीलिए शुरू हुए क्योंकि एक समाज अपने काले इतिहास को काला नहीं मानती। मसलन इन विरोधों को सरकार की ओर से खारिज भी नहीं किया गया। रिलीज डेट आगे बढ़ा दी गई और सेंसर बोर्ड ने सीन्स कटवाए। दिल्ली में जब हवा के लिए प्रोटेस्ट करने पर पुलिस छात्रों को जमीन पे रगड़ रही है, उसी दिल्ली के लुटियन ज़ोन में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर ब्राह्मण महासभा का बैनर, फुले फिल्म के विरोध मे पोस्टर टंगता है। जब फिल्में धर्म से जुड़ी हो तो उन सिनेमाओं को सरकार टैक्स फ्री करती है। वहीं दूसरी तरफ फुले जैसी फिल्मों के ऊपर तलवार लटकती है, उसके थिएटर रिलीज को इतना सीमित कर दिया जाता है कि वह आम जनता तक पहुंच भी नहीं पाती। तो क्या यह माना जाए कि एक वर्ग विशेष ही यह फैसला लेगा कि उसके मुताबिक क्या सही है, कौन क्या देखेगा? जो वो तय करेंगे वही जनता देखेगी, पूरा सामाजिक ढांचा कुछ चुनिंदा हाथों में बरकरार है।
इन दोनों फिल्मों का ज़िक्र इसीलिए जरूरी है ताकि हम जान सके जनता को क्या पसंद है, दूसरा ये की अगर कोई सिनेमा रेशनेलिटी और इतिहास को साथ लेकर सामने लाना चाहे तो वो मुश्किल है, क्योंकि कुछ लोग ही तय करेंगे कौन क्या देखेगा, सच, झूठ या कट्टरता।
2020 के मई महीने में पैन्डेमिक के वक्त एक तस्वीर खूब तेजी से वायरल हुई थी, तस्वीर में एक आदमी दूसरे आदमी के गोद में बदहवास लेटा है, यह तस्वीर ऐसा फैला की अमेरिका में न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बशरत पीर इस स्टोरी को कवर करने आये और फिर इस पर न्यूयॉर्क टाइम्स में “A Friendship, a pandemic and a death besides the highway” के टाइटल से ओपीनियन प्रकाशित हुआ। हम ये बिल्कुल नहीं कह रहे की कोविड ने सबको बराबर का झटका नहीं दिया। क्या अमीर, क्या गरीब, क्या दलित, क्या पिछड़ा लॉकडाउन में सब बंद थे। इस महामारी से सबको बराबर का झटका मिला। पर यह भी समझना होगा कि सभी सूरत या हैदराबाद मीलों में कमाने नहीं जाते। जो जाते हैं उनमें से ज़्यादातर पिछड़े, दलित, गरीब होते हैं। अगर कोविड से बचना है तो अकेले रहना होगा उसके लिए घर चाहिए, पर उनके पास हज़ारों किलोमिटर दूर एक बस्ती में छोटा सा खपड़ैल का मकान है, इससे ये समझ आता है कि कोविड की मार दरकिनार कर दिए समाज के लिए एक चोट बनकर उभरा जिसने अचानक से उन्हें घाव दिया।
बीते सितंबर मे नीरज घेवान द्वारा निर्देशित फिल्म होम बॉउन्ड रिलीज हुई, जो इसी सच्ची घटना पर आधारित है। सामाजिक उत्पीड़न को दर्शाती यह फिल्म छात्र, मजदूर, महिला, दलित और मुस्लिम के ज़िंदगी के सच को यथास्थिति पेश करती है। फिल्म की कामयाबी के मायने अगर बॉक्स ऑफिस है, तो इसने उतनी कमाई नहीं की। पर बात करें तो यह फिल्म भारत की ओर से ऑस्कर के लिए चुनी गई है। कॉन्स फिल्म फेस्टिवल के प्रीमियर पर इसे 9 मिनट का स्टैन्डींग ओवैशन मिला। नेटफलिक्स पर रिलीज हुई इस फिल्म में जाह्नवी कपूर, ईशान खट्टर और विशाल जेठवा हैं। दो दोस्तों की कहानी है जो आज का सच दिखाती है। खोखले छत से गिरता पानी और उसी घर में बाबासाहब की तस्वीर, पर्स में बाबसाहब की तस्वीर, सूरत जाते मीलों में मजदूर और कोरोना। ये कहानी देश के लाखों गाँव घरों की है।
5 बरस पहले जब लॉकडाउन लगा था, हवा साफ हो गई थी। सुनी सड़कों पर अगर कोई था तो सिर्फ मजदूर। रोजगार एवं श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार कोविड के वक्त 1.06 करोड़ पलायन कामगार अपने गृह राज्य वापस लौटे। साधन नहीं थे, तो कई पैदल निकल चल दिए। जागरूकता के अभाव में बहुतों को नहीं पता चला की भला कोरोना है क्या?
नीरज धेवान की यह फिल्म इसीलिए भी जरूरी है कि लाखों बच्चे सिर्फ एक सरकारी नौकरी के लिए जीवन लगा देते हैं। रेल्वे ग्रुप डी, कांस्टेबल, आरआरबी एनटीपीसी आदि जैसे ग्रुप सी और ग्रुप डी टियर की नौकरियां उन्हें जिंदगी बदलने का एकमात्र जरिया लगती हैं। पर परीक्षा बीत जाता है और बचता है तो सिर्फ इंतज़ार या फिर पेपर लीक हो जाता है। नौकरी की इस जंग में एक ऐसा भी वक्त आता है जब नौकरी के सपने छोड़ और परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ में दबा युवा को मजदूर बनना पड़ता है।
कैसे एक परिवार में लड़कियां पढ़ना चाहती हैं पर पढ़ने का हक सिर्फ लड़कों को मिलता है। कैसे नाम के साथ ‘कुमार’ लगाना एक शर्म का भाव देता है। क्योंकि तुम्हारी जाति लोगों को पता चल जाएगी और कैसे किसी के मुसलमान होने के कारण उसपर पाकिस्तान परस्त होने का ठप्पा लग दिया जाता है। ये सारे स्टिग्मा इंसान के साथ चिपके रहते हैं; जो ताउम्र नहीं जाते।
प्रेम भी है, प्रेम में पढ़ना, प्रेम के लिए पढ़ना, और बड़ा बनने का ख्वाब। पर बड़ा बनना सबके हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। किसी को अपनी खपरैल के छत से अपने शरीर पर सिपाही का कपड़ा दिखता है तो किसी को अपने रेल्वे क्वार्टर से आईएएस बनने का ख्वाब। पर ख्वाब तो ख्वाब होते हैं, उनमें नाप तोल कैसा। पर प्रेम तो माँ का भी है जो दलित स्त्री है और बच्चों को सरकारी स्कूल में मीड डे का खाना खिलाती है, पर भला ऐसा हो सकता है कि किसी दलित के हाथ का कोई छुआ भी खा ले। उदाहरण के तौर पर कुछ महीनों पहले कर्नाटक में एक दलित महिला के हेड कुक बनने पर वहाँ के अधिकतर बच्चों ने टीसी ले लिया था।
यह दो दोस्तों की कहानी है जिन्हें बिरयानी बहुत पसंद है। बेरोज़गारी, स्त्री, मजदूरी, घर की पहली ईंट, छुआछूत, रेल की भीड़, धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव, गरीबी ये सब सिनेमा में है। आपको अपनी नजर से देखना चाहिए, हो सकता है आपको लगे की, आप पूरे बखत बैठे-बैठे खुद को और साफ कर रहे हैं और जब फिल्म खत्म हो, तब आपको आपके किताब का पन्ना और मुलायम लगने लगे।

पत्रकारिता और लेखन में रुचि रखने वाले सिद्धार्थ गौतम वर्तमान में दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से समाजशास्त्र में एम.ए कर रहे हैं।

