Friday, January 16, 2026
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दलित छात्रा के साथ रैगिंग और जातीय उत्पीड़न पर उठे गंभीर सवाल

जब रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के 10 साल होने को है, उसके ठीक पहले पल्लवी का मामला दलित समाज के भीतर गुस्सा पैदा करने वाला है। पीड़ित छात्रा के पिता का आरोप है कि “मेरे बच्चे को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह SC थी। उसकी जाति को लेकर उसे बार-बार अपमानित किया गया। वह अंदर से टूट चुकी थी।”

धर्मशाला। एक बार फिर देश का उच्च शिक्षा तंत्र जातिगत भेदभाव और संवेदनहीनता के आरोपों के घेरे में है। धर्मशाला डिग्री कॉलेज की 19 साल की छात्रा पल्लवी की तीन महीने इलाज के बाद मौत के मामले ने तूल पकड़ लिया है। पल्लवी के परिवार का आरोप है कि कॉलेज में उसकी SC पहचान को लेकर लगातार ताने दिए जाते थे, जिससे वह मानसिक रूप से बेहद परेशान रहने लगी थी।

जब रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के 10 साल होने को है, उसके ठीक पहले पल्लवी का मामला दलित समाज के भीतर गुस्सा पैदा करने वाला है। यह गुस्सा और दर्द कोई नया नहीं है। इससे पहले भी रोहित वेमुला, पायल तड़वी जैसे नाम देश के सामने आ चुके हैं, लेकिन हर बार व्यवस्था कुछ दिनों की चर्चा के बाद खामोश हो जाती है। इस मामले में भी लीपा पोती की जा रही है। जहां पल्लवी के पिता विक्रम का आरोप है कि “मेरे बच्चे को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह SC थी। उसकी जाति को लेकर उसे बार-बार अपमानित किया गया। वह अंदर से टूट चुकी थी।”

18 सितंबर को कॉलेज की कुछ छात्राओं ने उसके साथ मारपीट की और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां दीं। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि कॉलेज के एक प्रोफेसर अशोक कुमार ने छात्रा का यौन उत्पीड़न किया, जिसके बाद पल्लवी गहरे सदमे और अवसाद में चली गई। परिजनों का दावा है कि लगातार बिगड़ती मानसिक स्थिति के कारण उसका इलाज अलग-अलग अस्पतालों में कराया गया, लेकिन 26 दिसंबर को लुधियाना के डीएमसी अस्पताल में अस्पताल में उसकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, पल्लवी के साथ रैगिंग की घटना 18 सितंबर को हुई थी। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75, 115(2), 3(5) और हिमाचल प्रदेश शैक्षणिक संस्थान (रैगिंग निषेध) अधिनियम, 2009 की धारा 3 के तहत केस दर्ज किया गया है।

तो वहीं इस मामले में कॉलेज प्रशासन पल्ला झाड़ रहा है। कॉलेज के प्राचार्य का जो बयान सामने आया है, उसमें उसका कहना है कि- “पल्लवी हमारे कॉलेज की छात्रा नहीं थी, क्योंकि उसने केवल प्रथम वर्ष की फीस जमा की थी और दूसरे वर्ष की तकनीकी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाई।”

इस बयान को परिवार और सामाजिक कार्यकर्ता जिम्मेदारी से बचने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं। सवाल यह है कि अगर पल्लवी कैंपस से जुड़ी थी, पढ़ाई कर रही थी और वहां मौजूद थी, तो क्या प्रशासन की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
बहुजन समाज ने इस मामले में इंसाफ की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया है। वह न्याय मिलने तक पीछे हटने को तैयार नहीं है।
इस बीच शिक्षा संस्थानों में आत्महत्या और उत्पीड़न के मामले में संसदीय प्रश्नों और UGC को दी गई रिपोर्टों के अनुसार 2014–2023 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों में दलित, आदिवासी और OBC छात्रों की 100 से ज्यादा आत्महत्याएँ रिपोर्ट हुईं। इनमें से बड़ी संख्या में मामलों में, जातिगत अपमान, प्रशासनिक उत्पीड़न, स्कॉलरशिप/फेलोशिप रोकना, गाइड/प्रोफेसर द्वारा भेदभाव सामने आया है। चर्चित मामलों में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला, मुंबई की पायल तड़वी के अलावा तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश, यूपी के मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के दर्जनों मामले दर्ज हैं।

आंकड़ों के मुताबिक UGC को हर साल औसतन 600–700 शिकायतें मिलती हैं, जिनमें, SC/ST छात्रों के साथ भेदभाव, रैगिंग, जातिगत अपमान, एडमिशन/इवैल्यूएशन में पक्षपात जैसे मामले शामिल हैं। यह सिर्फ दर्ज मामले हैं, माना जाता है कि संख्या इससे काफी ज्यादा है।

राष्ट्रीय रैगिंग विरोधी हेल्पलाइन के डेटा के अनुसार, रैगिंग की शिकायतों में 20–25% मामलों में जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ी टिप्पणियाँ शामिल पाई गईं। यह तथ्य कई बार सामने आया है कि दलित/आदिवासी छात्र रैगिंग में असमान रूप से अधिक शिकार होते हैं। हालांकि इस मामले में पल्लवी के परिजनों की शिकायत पर पुलिस ने एक प्रोफेसर और तीन छात्राओं के खिलाफ रैगिंग और यौन उत्पीड़न समेत गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज किया जा चुका है। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि विश्वविद्यालयों दलित छात्राओं के लिए असुरक्षित बनी हुई है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या शिक्षा संस्थान आत्ममंथन करेंगे या फिर यह मामला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा।

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