
मामला अंधविश्वास से जुड़ा है या फिर इसके पीछे कोई आस्था है? आखिर लोग पैरों में काला धागा क्यों बांधते हैं? क्या काला धागा दलितों की पहचान के लिए है जैसे द्विज अपनी पहचान बताने के लिए जनेऊ पहनते हैं या फिर अपने हाथ में लाल रंग का धागा बंधवाते हैं? आखिर क्या है इसके पीछे की कहानी? यही मकसद रहा दलित लेखक संघ की अध्यक्ष अनिता भारती का जब दो दिन पहले उन्होंने अपने फेसबुक पर यह सवाल पूछा कि “आजकल हर कोई अपने पैर में काला धागा बांध कर रखता है। कोई इसका कारण बता सकता है?”
जाहिर तौर पर यह एक बुनियादी सवाल है। लेकिन लोगों ने अनिता भारती के सवाल का अजीबोगरीब जवाब दिये हैं। कुछ ने तो इसे पैर में दर्द का इलाज बताया है तो किसी ने किसी की काली नजर से बचने का नुस्खा। हालांकि अनेक ऐसे भी हैं जो इसे सीधे तौर पर खारिज करते हैं और अंधविश्वास करार देते हैं। मसलन, डॉ. शशिधर मेहता इसे टोटका करार देते हैं। वहीं संतोष पटेल की नजर में यह अंधविश्वास है। वहीं सूरज बड़तिया नामक एक शख्स ने मजाकिया लहजे में कहा है – “काला धागा बांधने से अच्छे सपने आते हैं और विदेश जाने की हिम्मत आती है। मैं तो पूरे शरीर में बांधता हूँ”
यह तो अनिता भारती के उपरोक्त सवाल के जवाबों की शुरूआत मात्र है। राजेंद्र कुमार नामक एक व्यक्ति ने कहा है – “ये तो अछूतो की पहचान थी। अब फटे कपड़े काला धागा दिमाग कम की पहचान है।” वहीं जोगपाल सिंह नामक एक व्यक्ति ने थोड़ा विस्तार से लिखा है– “जब देश में मनु स्मृति लागू था तो तब शूद्र जातियों को ब्राह्मणो का आदेश था कि वे लोग पैर में काले धागे में घुंघरू डालकर ही पहनकर अपने घरों से बाहर निकलेंगे, क्योकि जब शूद्र निकलते थे तो उनके पैर में बंधे घुंघरू की आवाज सुनकर ब्राह्मण लोग अपने घरों में चले जाते थे। क्योंकि शूद्रों को उच्च जाति के लोगो के सामने निकलने की अनुमति उस काल में नही थी। आज भी शूद्र लोग मानसिक रूप से गुलाम है जो उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।”
बहरहाल, यह यह एक महत्वपूर्ण सवाल है कि काला धागा बांधने का मतलब क्या है? सबसे महत्वपूर्ण यह कि इसे अब फैशन कहा जाने लगा है और अंधविश्वास तो खैर वजह है ही।

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