क्या 25 साल पुराना करिश्मा दोहरा पाएगा सपा-बसपा गठबंधन

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साल 1993 में देश भर में और खासकर उत्तर प्रदेश में जोर-शोर से जयश्री राम का एक नारा गूंज रहा था। ये वो दौर था जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद भाजपा ने देश भर के हिन्दुओं को धर्म के नाम पर अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश शुरू कर दी थी। धर्म का सहारा लेकर भाजपा अपने राजनीतिक इतिहास के चरम की ओर बढ़ रही थी। लेकिन तमाम धार्मिक उथल-पुथल के बाद भी उत्तर प्रदेश का बहुजन समाज इस नारे के भंवर में नहीं फंसा। उस दौर में बहुजन समाज पार्टी के अध्यक्ष मान्यवर कांशीराम और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव प्रदेश में दो प्रमुख ध्रुव बने हुए थे। भाजपा को रोकने के लिए 1993 में दोनों नेता एक साथ आ गए और बहुजनों ने नारा दिया… मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।

12 जनवरी को लखनऊ में जब अखिलेश यादव और मायावती एक साथ प्रेस कांफ्रेंस करने पहुंचे तो कइयों के जहन में वो दौर एक बार फिर ताजा हो गया। दोनों दलों ने 2019 लोकसभा का चुनाव साथ मिलकर लड़ने का फैसला किया है। दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश की 38-38 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। इस फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के सपा और बसपा के मतदाताओं में काफी जोश है। इस गठबंधन के बाद एक बड़ी चर्चा यह है कि क्या सपा और बसपा एक बार फिर भाजपा को सत्ता में आने से रोक पाएंगी?

इसको समझने के लिए 25 साल पहले के उस दौर में जाना होगा। 1992 में अयोध्याक में विवादास्पंद ढांचा गिराये जाने के बाद तत्कापलीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने इस्तीफा दे दिया और उत्त्र प्रदेश चुनाव के मुहाने पर खड़ा हो गया। भाजपा को पूरा भरोसा था कि राम लहर उसे आसानी से दोबारा सत्ता में पहुंचा देगी। तब दोनों पार्टियों ने पहली बार चुनावी गठबंधन किया और बीजेपी के सामने मैदान में उतरीं।

1993 में उत्त र प्रदेश की 422 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे। इनमें बसपा और सपा ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। बसपा ने 164 प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 67 प्रत्याशी जीते थे। सपा ने इन चुनावों में अपने 256 प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से उसके 109 प्रत्याशी जीते थे। बहुजन समाज के बीच हुए इस गठबंधन के आगे भाजपा टिक नहीं सकी और 1991 में 221 सीटें जीतने वाली भाजपा 1993 में 177 सीटों पर सीमट गई। तब सपा-बसपा ने मिलकर सरकार बना ली और मुलायम सिंह दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए।

भाजपा तब भी चरम पर थी और आज भी चरम पर है। सवाल है कि जैसे तब सपा और बसपा ने भाजपा को रोक दिया था, क्या एक बार फिर 2019 में इतिहास खुद को दोहराएगा। इस सवाल का जवाब चुनाव परिणामों के बाद मिल सकेगा लेकिन वर्तमान की हकीकत यह है कि गठबंधन के ऐलान से देश भर के बहुजन समाज में काफी उत्साह है तो भाजपा सकते में है।

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