वंचित बहुजन नौकरियों,खासकर निजीक्षेत्र में आरक्षण की सीमाबद्धता को समझें!

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सवर्ण आरक्षण से पनपा : संख्यानुपात में आरक्षण का जज्बा !  गत 7 जनवरी को जब यह तय हो गया कि मोदी सरकार गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में न सिर्फ लाएगी, बल्कि उसे पारित भी करा लेगी, तब बहुजन बुद्धिजीवियों में भारी निराशा की लहर दौड़ गयी. कारण जिन सवर्णों का राज-सत्ता, ज्ञान-सत्ता और धर्म-सत्ता के साथ ही अर्थ-सत्ता पर भी 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा हो, उस सवर्ण वर्ग के आठ लाख आय वालों को गरीब मानते हुए आरक्षण सुलभ कराना संविधान और सामाजिक न्याय की अवधारणा का खुला मजाक था. किन्तु आरक्षण के मामले में मोदी सरकार द्वारा उलटी गंगा बहाने के प्रयास में भी बहुजन बुद्धिजीवियों को कुछेक सकारात्मक बात नजर आई. इनमें कईयों को इस बात को लेकर ख़ुशी हुई कि इससे आरक्षण का विरोध बंद हो जायेगा तथा ये दूसरों को ‘सरकारी दामाद’ या ‘कोटे वाला/वाली’ कहना बंद कर देंगे. लेकिन इस बात को लेकर ख़ुशी मनाने वालों की सख्या ज्यादे थी कि इससे आरक्षण की 50 प्रतिशत वाली सीमा टूट जाएगी तथा इसका दायरा 100 प्रतिशत तक फ़ैल जायेगा एवं संख्यानुपात में आरक्षण का मुद्दा चल निकलेगा. बहुजन बुद्धिजीवियों का यह अनुमान सही निकला और 7 जनवरी को सोशल मीडिया पर उभरा धीरे-धीरे उभरा ‘जिसका जितनी संख्या भारी –उसकी उतनी भागीदारी’ का नारा 9 जनवरी की रात सवर्ण आरक्षण बिल पास होते ही सैलाब में बदल गया. यूँ तो सवर्ण आरक्षण के विरुद्ध जिसकी जितनी संख्या भारी के रूप में अपनी भावना का प्रकटीकरण करने के लिए तो सबसे पहले सामने आये बहुजन बुद्धिजीवी, किन्तु थोड़े ही अन्तराल में पक्ष-विपक्ष के बहुजन नेता भी होड़ में उतर आये. राजद के तेजस्वी यादव ने उसी दिन आरक्षण का दायरा बढ़ाने के लिए ट्विट कर कहा कि दलित-पिछड़ों को को 90 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए.सत्ता पक्ष की अनुप्रिया पटेल ने 8 जनवरी को घोषणा किया कि जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए. अनुप्रिया पटेल की तरह सपा के तेज तर्रार नेता धर्मेन्द्र यादव ने जाति जनगणना की मांग उठाते हुए सुझाव दिया कि,’आरक्षण व्यवस्था सौ फीसदी होनी चाहिए, जो सभी जातियों के बीच उनके अनुपात में बाँट दिया जाय. इससे आरक्षण को लेकर उठने वाला विवाद ही ख़त्म हो जायेगा.’उन्हीं की तरह ही राजद के जय प्रकाश यादव ने कहा कि, ‘अब दलित –पिछड़ों को 85 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए. अब वे 50 प्रतिशत से संतुष्ट नहीं रहने वाले हैं.’ आरक्षण बढाने की इसी होड़ में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा किया कि,’हम सत्ता में आये तो हिन्दू समाज के एससी,एसटी,ओबीसी को 85 प्रतिशत आरक्षण देंगे.’ बहरहाल चुनाव को ध्यान में रखकर आनन-फानन में 9 जनवरी को संसद में पारित सवर्ण आरक्षण पर जब राष्ट्रपति ने 12 जनवरी को अपने हस्ताक्षर की मोहर लगा दिया, तब ऐसा लगा सामाजिक न्यायवादी दल तमाम क्षेत्रों में संख्यानुपात में आरक्षण के लिए सड़कों पर उतर पड़ेंगे. लेकिन वैसा नहीं हुआ. पर, 22 जनवरी को जब सुप्रीम कोर्ट ने विभागवार आरक्षण का रास्ता साफ़ कर दिया, तब जाकर सख्यानुपात में आरक्षण का मामला गरमाया.लेकिन कितना!

विभागवार आरक्षण :मानव जाति के इतिहास के सबसे बेरहम फैसलों में से एक!

13 पॉइंट रोस्टर के द्वारा लागू होने वाला था विभागवार आरक्षण मानव जाति के इतिहास के सबसे बेरहम फैसलों में से एक था, जो चरम सवर्णवादी सरकार की मंशा को ध्यान में रखते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने दिया था. यह चरम अमानवीय इसलिए था क्योंकि इसके जरिये भारत के उस जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग को अवसरों पर पहला हक़ सुनिश्चित करवाने का बलिष्ठ्तम प्रयास हुआ था, जिसका हजारों साल पूर्व की भांति आज भी राज-सत्ता,धर्म-सत्ता और अर्थ-सत्ता के साथ ज्ञान – सत्ता पर 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा है. इसके जरिये एससी/एसटी,ओबीसी से युक्त उन जन्मजात वंचित वर्गों को अवसरों से दूर धकेलने का अभूतपुर्व प्रयास हुआ था, जो आरक्षण के सहारे अभी-अभी राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने की प्रक्रिया में शामिल हुए थे. चूँकि भारत का इतिहास आरक्षण पर संघर्ष का इतिहास है, इसलिए सवर्ण आरक्षण के अल्प अंतराल के बाद ही शासक वर्ग द्वारा जिस तरह विभागवार आरक्षण के जरिये बहुजनों के आरक्षण की ताबूत में अंतिम कीलें ठोंकने का कुत्सित प्रयास हुआ, उसके बाद चप्पे-चप्पे पर आरक्षण की मांग उठाते हुए आरक्षण पर संघर्ष को शिखर पर पहुंचा देना चाहिए था, जो नहीं हुआ.

कितना सीमित है:आर-पार की लड़ाई का मुद्दा !

इसमें कोई शक नहीं कि विभागवार आरक्षण के बाद बहुजन छात्र और गुरुजन जिस तरह सडकों पर उतरे ,उससे हताश-निराश बहुजनों में उम्मीद का संचार हुआ, किन्तु इनकी मांगो से भारी निराशा हुई. ये विभागवार आरक्षण के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के लिए सडकों पर उतरे थे, किन्तु जो मांग उठाया, वह काफी हद तक कारुणिक रही.यूँ तो 23 जनवरी से ही विभागवार आरक्षण के खिलाफ उनका छिट-फुट विरोध शुरू हो गया था, किन्तु 31 जनवरी,2019 से ही यह प्रभावी रूप में सामने आया. 31 जनवरी के बाद से ही वे विभागवार आरक्षण के खिलाफ आंदोलित हैं. इस सिलसिले वे पांच मार्च को भारत बंद के जरिये अपने आन्दोलन को शिखर पर पहुंचाने जा रहे हैं. बहरहाल 31 जनवरी से लेकर पांच मार्च तक यदि उनकी मांगो पर गौर किया जाय तो बिलकुल ही नहीं लगेगा ये आर-पार की लड़ाई में जुटे हैं: नजर आयेगा बहुत ही सीमित मुद्दों को लेकर लड़ रहे हैं. यदि इनकी लड़ाई के कॉमन एजंडे पर ध्यान दिया जाय तो दिखेगा कि प्रायः सभी के एजंडे में 13 पॉइंट रोस्टर की जगह 200 पॉइंट रोस्टर लागू करना , जाति आधार जनगणना कराना, निजीक्षेत्र और न्यायपालिका में एससी/एसटी/ओबीसी को मिले: मोटामोटी यही मांगे शामिल हैं.इस मामले में ‘आरक्षण बढ़ाने’ की लड़ाई लड़ रहे तेजस्वी यादव,जो बहुजनों की नयी आशा और आकांक्षा के रूप में उभर रहे हैं, का राजद भी अपवाद नहीं है. यदि इन मांगो को यदि कोई आरक्षण बढाने की लड़ाई के लिहाज से ध्यान से देखे तो दिखेगा कि बहुजन छात्र और गुरुजन सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर निजी क्षेत्र और न्यायपालिका तक आरक्षण के विस्तार में ही समाज की मुक्ति तथा सवर्ण और विभागवार आरक्षण का प्रतिकार देख रहे हैं.अगर ऐसा है तो मानना पड़ेगा वंचित वर्ग आरक्षण की लड़ाई में अभी भी प्रायः दो दशक पीछे चल रहा है: उसने भोपाल घोषणापत्र से कोई खास सबक नहीं लिया.

डॉ. आंबेडकर की ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के बाद बहुजनों को मुक्ति की सर्वोत्तम रचना: चंद्रभान प्रसाद का ‘भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र’ !

स्मरण रहे नवउदारवादी अर्थनीति के जरिये निजीकरण, उदारीकरण क गंगा बहाने वाले नरसिंह राव के बाद सत्ता में आकार जब स्वदेशी के परम हिमायती राष्ट्रवादी अटल बिहारी वाजपेयी विनिवेशीकरण के जरिये लाभजनक सरकारी उपक्रमों तक को औने-पौने दामों में निजीक्षेत्र के स्वामियों को बेचने लगे, तब आरक्षण के खात्मे से त्रस्त आरक्षित वर्गों के तमाम संगठन निजीक्षेत्र में आरक्षण की मांग उठाने लगे. ऐसा इसलिए कि सरकारी नकारियों को ही अपनी उन्नति-प्रगति का एकमात्र माध्यम मानने वाले इन वर्गों, खासकर दलित बुद्धिजीवी – एक्टिविस्टों को लगा कि निजीकरण के जरिये सारी नैकरिया निजीक्षेत्र में शिफ्ट हो जाएँगी. ऐसा मानकर ही जब आरक्षित वर्गों के तमाम संगठन गली-कूचों में निजीक्षेत्र में आरक्षण की मांग बुलंद करने लगे, उन्ही दिनों सुप्रसिद्ध दलित चिन्तक चंद्रभान प्रसाद के नेतृत्व में 12-13 जनवरी,2002 को ऐतिहासिक भोपाल कांफ्रेंस हुआ. यह स्वाधीन भारत के इतिहास का संभवतः सबसे महत्वपूर्ण दलित सम्मलेन था, जिसमें भूमंडलीकरण के दौर की चुनौतियों से निपटने के लिए देश के २५० सौ अधिक मनीषी एकत्र हुए थे . इस अवसर पर चंद्रभान प्रसाद द्वारा लिखित ऐतिहासिक भोपाल दस्तावेज और भोपाल घोषणापत्र जारी हुआ. इस लेखक के मुताबिक जन्मजात वंचितों की मुक्ति के लिहाज से डॉ. आंबेडकर की ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ के बाद ‘भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र’ जैसी कोई और रचना शायद अबतक नहीं आई है . इसी सम्मेलन में अमेरिका के सर्वव्यापी आरक्षण ‘डाइवर्सिटी’ के तर्ज पर भारत में आरक्षण का दायरा बढ़ाने की ठोस परिकल्पना सामने आई.हालाँकि चंद्रभान प्रसाद ने वह परिकल्पना सिर्फ एससी-एसटी के लिए प्रस्तुत की थी जिसे परवर्तीकाल में ‘बहुजन डाइवर्सिटी मिशन’ के जरिये ओबीसी और वंचितों से धर्मान्तरित अल्पसंख्यकों तक प्रसारित होने का अवसर मिला. बहरहाल चंद्रभान प्रसाद ने भोपाल दस्तावेज में दलितों(एससी-एसटी) के अतीत और वर्तमान की आर्थिक ,सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक अवस्था का निर्भूल विश्लेषण करते हुए २१वीं सदी में भूमंडलीकरण के सैलाब में दलितों को तिनको की भांति बहने से बचाने के लिए 21 सूत्रीय निर्भूल एजेंडा प्रस्तुत किया था, जो इस देश में वंचितों की मुक्ति में आकाश दीप का काम करता रहेगा. इस क्रम में उन्होंने नौकरियों,खासकर निजीक्षेत्र में आरक्षण से दलितों को मोहमुक्त करने का जैसा प्रयास किया था,वह बेमिसाल है. आज निजी क्षेत्र के आरक्षण के लिए अतिरक्त उत्साह का प्रदर्शन कर रहे बहुजन छात्र और गुरुजनों को चंद्रभान प्रसाद के उस प्रयास पर संजीदगी से विचार करने की जरुरत है.

आरक्षण की सीमायें !

चंद्रभान प्रसाद ने आरक्षण की सीमाबद्धता पर आलोकपात करते हुए भोपाल दस्तावेज में लिखा था – ‘लगभग सभी दलित आन्दोलनों में आरक्षण का मुद्दा बारं-बार आता है और इसे प्रगति के निर्णायक साधन के रूप में देखा जाता है. शासकीय नौकरियों और विधानसभाओं में आरक्षण और छात्रवृत्तियों के रूप में शिक्षा में कुछ मदद के अलावा,अनुसूचित जाति, जनजाति ने राज्य या समाज से कुछ उल्लेखनीय नहीं लिया. गरीबी हटाने, बकरी व सुअर पालने, रोड किनारे दूकान खोलने के लिए लघु ऋणों के जरिये समुदाय को अधिकारसंपन्न बनाने की योजनाओं से अनुसूचित जाति/जनजाति को कुछ ठोस हासिल नहीं हुआ. इस प्रकार प्रगति के एक साधन के बतौर आरक्षण पर विश्वास अनुसूचित जाति/जनजाति की चेतना को गढ़ता रहा. पर, यह कठोर सचाई है कि बहुत से सरकारी विभागों में अनुसूचित जाति/ जनजाति का कोटा खाली रहता है. हमें अनुसूचित जाति/जनजाति की प्रगति और शोषण-मुक्ति में शासकीय नौकरियों में आरक्षण की सीमित भूमिका को भी समझना होगा. जब तक हम यह नहीं समझते, आंदोलनों को एच्छिक उद्देश्यों की ओर परिवर्तित करना मुश्किल होगा.

मान लीजिये एक समय सीमा के मध्य सरकार पूरी तरह से निर्धारित आरक्षण का कोटा भर देती है तो कितने अनुसूचित जाति /जनजाति के सदस्यों को रोजगार मिलेगा ? केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन 2000-2001 के अनुसार राज्य (केंद्र सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों,राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों) के तहत 1.94 करोड़ नौकरिया हैं. इसका अर्थ है यदि अनुसूचित जाति/जनजाति को उनका वर्तमान कोटा 22.50 प्रतिशत पूरा दे दिया जाय तो 45 लाख से ज्यादा लोग रोजगार नहीं नहीं पा सकते. यदि 45 लाख को पांच से गुणा किया जाय ( मान लें कि सरकारी नौकरी करने वाले एक कर्मचारी से पांच लोगों का परिवार पलता है) तो लक्ष्य 2.25 करोड़ की जनसँख्या से ज्यादे नहीं पहुंच सकता. चूंकि 1991 की जनगणना के मुताबिक 84.63 करोड़ लोगों में से दलितों की आबादी 20.59 करोड़ है, जिनमें 13.82 करोड़ अनुसूचित जाति एवं 6.67 करोड़ आदिवासी हैं, तब सवाल पैदा होता है शेष 18 करोड़ एससी-एसटी आबादी का क्या होगा?

कितना कारगर निजी क्षेत्र में आरक्षण!

राज्य के तहत नौकरियों की अपर्याप्तता से वाफिफ कई शिक्षित अनुसूचित जाति/ के लोग निजी क्षेत्र में आरक्षण का अधिकार बढाने की बात कर रहे हैं. यह सराहनीय है क्योंकि यह अनुसूचित जाति/ जनजाति के अग्रसर होने के लिए दूसरा कदम है. लेकिन हमें इस क्षेत्र की सीमाओं को भी समझना होगा. केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन के अनुसार संगठित निजी क्षेत्र में कुल रोजगार केवल 86.96 लाख है. इस प्रकार यदि अनुसूचित जाति/ जनजाति निजी क्षेत्र में आरक्षण का अधिकार प्राप्त भी कर ले और निजी क्षेत्र इमानदारी से 22.50 प्रतिशत कोटा लागू कर दे तो 19.57 लाख लोगों को ही नौकरिया मिल पाएंगी. यदि 19.57 लाख को पाँच से गुणा किया जाय तो 97.85 लाख अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों को लाभ मिल पायेगा. इस प्रकार यदि सरकारी क्षेत्र की नौकरियों से लाभान्वित होने वाले 2.25 करोड़ और निजी क्षेत्र से लाभान्वित होने वाले 97.85 लाख की कुल आबादी को जोड़ लिया जाय तो भी 17 करोड़ अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोग शेष रह जायेंगे. यह आरक्षण और आरक्षण के आंदोलनों की सीमाओं को दर्शाता है.’

ऐसे में जिस आरक्षण के लाभ के दायरे से अनुसूचित जाति/ जनजाति की प्रायः 90 प्रतिशत आबादी बाहर है, वह आरक्षण दलितों को वर्तमान आर्थिक स्थिति से ऊपर उठाने में सहायक नहीं हो सकता, इसलिए भोपाल घोषणापत्र में आरक्षण से परे रणनीति पर विचार करने का आह्वान करते हुए कहा गया था -’ हमें ऐसी रणनीति बनाने के बारे में सोचना होगा जो इस समुदाय के प्रत्येक सदस्य के लिए लागू हो और जिसके द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में अनुसूचित जाति/ जनजाति की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित हो सके.’

विश्व परिदृश्य

भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में दलितों की भागीदारी सुनिश्चित करवाने की रणनीति बनाने के क्रम में चंद्रभान प्रसाद ने अमेरिकी और दक्षिण अफ्रीकी मॉडल को अपनाने का सुझाव हुए लिखा है-‘दुनिया के कई देशों में भारत में विद्यमान स्थिति जैसी समानांतर स्थितियां हैं. इन समान स्थितियों, परिस्थितियों के सामाजिक-ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक पहलुओं की जांच –पड़ताल करना प्रत्येक समझदार व्यक्ति के लिए जरुरी है. उन प्रयासों का भी मूल्यांकन करना जरुरी है जो समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए जरुरी है. हम दो उप-महाद्वीपों के अनुभवों का परिक्षण करेंगे. देश हैं संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका. दोनों देश भेदभाव,नस्लवाद,रंगभेद,हिंसक भूतकाल असमानता और शांतिपूर्ण विरोधों के कोलाहल भरे इतिहास से गुजरे हैं. भारत की विशिष्ट जाति-व्यवस्था के बावजूद यहां की असमानताओं के कारण ये देश भारत के लिए सम्भावनायें पैदा करते हैं. अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और भारत बहु-संस्कृति, बहु-जातिय, बहु-भाषाई और बहुलतावादी समाज हैं. अमेरिका भारत के साथ प्रजातांत्रिक आकार और इतिहास में मुकाबला करता है, जबकि दक्षिण अफ्रीका खूनी रंगभेद के युग के बाद एक संवेदनशील प्रजातंत्र के रूप में पल्लवित हो रहा है.’’

स्मरण रहे चंद्रभान प्रसाद ने उपरोक्त बातें 2002 तक उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर कही थी. तब उन्होंने उन्होंने भारतीय अर्थ व्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में एससी/एसटी की भागीदारी सुनिश्चित करवाने के लिए अमेरिका की डाइवर्सिटी पॉलिसी और दक्षिण अफ्रीका रोजगार समानता अधिनियम के जरिये एक नया क्रन्तिकारी मार्ग सुझाया जिसके जरिये हमने जाना कि अमेरिका ने भारत के दलित -आदिवासियों की भांति अपने देश के कालों, रेड इंडियंस,हिस्पैनिक्स इत्यादि को संपदा-संसाधनों भागीदार बनाने के लिए अम्बेडकरी आरक्षण की जो आइडिया को उधार लिया,उस आरक्षण को सिर्फ नौकरियों तक सीमित न रखकर सप्लाई, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों तक प्रसारित कर दिया,जिसके फलस्वरूप अमेरिकी दलितों में भूरि-भूरि उद्योगपतियों, ठेकेदारों, पत्रकारों, फिल्म स्टारों इत्यादि का उदय हुआ. चंद्रभान प्रसाद द्वारा सुलभ कराइ गयी जानकारी से ही भारत में सर्वप्यापी आरक्षण के विचार का बीजारोपड़ हुआ. परवर्तीकाल में भोपाल दस्तावेज और घोषणापत्र से ही प्रेरणा लेकर बहुजन डाइवर्सिटी मिशन से जुड़े लेखकों ने शक्ति के स्रोतों(आर्थिक, राजनैतिक , शैक्षिक ,धार्मिक ) में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन का अभियान छेड़ा.

रंग ला रहा है विद्या गौतम का देश की हर ईंट में भागीदारी का आन्दोलन!

आज नौकरियों की सीमाबद्धता को देखते हुए ‘देश की हर ईंट में भागीदारी’ के स्लोगन के साथ अखिल भारतीय आंबेडकर महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष विद्या गौतम एससी,एसटी,ओबीसी के लिए संख्यानुपात में सर्वव्यापी आरक्षण की लड़ाई में चला रही हैं. इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 2018 के अगस्त में सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण,सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोगों व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार मंत्रीमंडलों, संविदा पर भर्तियों इत्यादि में एससी,एसटी और ओबीसी के संख्यानुपात में आरक्षण के लिए 46 दिनों का आमरण अनशन किया,जिसमें उनके समर्थन में कई राज्यों के 4 हजार से अधिक लोग भूख हड़ताल पर बैठे. नौकरियों की सीमाओं से भलीभांति अवगत विद्या गौतम का देश की हर ईंट में भागीदारी के पीछे तर्क है ,’हमें न जमीन, ना व्यापार, ना उद्योग,किसी भी साधन-संसाधन में हिस्सेदारी नहीं मिली: साधन के नाम पर केवल आरक्षण के तहत सरकारी नौकरी में हिस्सेदारी प्राप्त हुई. जिनको नौकरी मिली ,उनका जीवन स्तर सुधरा: जिनको नौकरी नहीं मिली उनके जीवन से बदहाली नहीं जा सकी.जब तक किसी बेटे को बाप के सपदा-संसाधन में हिस्सा नहीं मिल जाता,तब तक वो बेटा बराबर का भाई नहीं हो सकता. उसी प्रकार जिस कौम को राष्ट्र के सम्पदा-संसाधनों में हिस्सा नहीं मिल जाता ,वह कौम राष्ट्र की मुख्यधारा से नहीं जुड़ सकती. ऐसी कौम मजबूर ही बनी रहेगी. इसीलिए ‘ भीख नहीं भागीदारी ,देश की हर ईंट में चाहिए हिस्सेदारी!’

आज विद्या गौतम से प्रेरणा लेकर माता सावित्री बाई फुले महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्देश सिंह जैसे अन्य कई संगठनों के लोग शक्ति के समस्त स्रोतों में एससी-एसटी-ओबीसी के संख्यानुपात में आरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसे में आज जबकि सवर्ण और विभागवार आरक्षण से आक्रोशित होकर बहुजन छात्र और गुरुजन तथा सामाजिक न्यायवादी दलों के नेता वंचित समुदायों की गुलामी से मुक्ति के लिए संख्यानुपात में आरक्षण बढाने की लड़ाई में उतरने का मन बना रहे हैं, बेहतर है वे नौकरियों में आरक्षण की सीमाबद्धता की उपलब्धि करते हुए विद्या गौतम की भांति सप्लाई, डीलरशिप, निर्माण,सफाई, मरम्मत, वितरण व आवंटन; सभी प्रकार की नियुक्तियों, मनोनयन, सभी आयोगों व निगमों के पदाधिकारियों, राज्य व केंद्र सरकार मंत्रीमंडलों, संविदा पर भारतियों इत्यादि में एससी,एसटी और ओबीसी को संख्यानुपात में आरक्षण दिलवाने के लिए कमर कसें.

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