उज्ज्वला योजना : मुफ्त नहीं, लोन के बदले दिए थे कनेक्शन

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प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना भारत सरकार की महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक है. योजना को पूर्ण रूप से ग्रामीणमहिलाओं को ध्यान में रख कर बनाया गया है. सरकार के हिसाब से ये एक समाज कल्याण योजना है. योजना को हरी झंडी प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी ने 1 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बालियाँ जिले में दी. सस्ता राशन के साथ ही हर राशनकार्ड धारक को उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन भी मिलेगा. अभी तक केवल अंत्योदय कार्डधारक ही उज्ज्वला के लिए पात्र थे. खाना पकाने के स्वच्छ ईंधन (एलपीजी सिलेंडर) को हर घर तक पहुंचाने के लिए सरकार ने ये बड़ा निर्णय लिया है. उज्ज्वला योजना की शुरुआत में (मई 2016) सामाजिक आर्थिक व जातिगत (एसईसीसी) जनगणना की सूची में दर्ज लोगों को मुफ्त कनेक्शन देकर हुई थी. उल्लेखनीय है कि इस योजना में सरकार ने बदलाव कर अंत्योदय, एससी-एसटी, प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के लाभार्थियों समेत कई अन्य श्रेणी में उज्ज्वला का लाभ दिया. एचपीसीएल के डीजीएम (एलपीजी) प्रणव कुमार सिन्हा के अनुसार सरकार ने पात्र गृहस्थी राशनकार्ड धारकों को भी उज्ज्वला के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन दिए जाने का निर्णय लिया है.
किंतु दैनिक भास्कर (16.01.2019) के अनुसार कहानी कुछ और ही है.  हकीकत ये है कि पात्र लोगों को गैस कनेक्शन मुफ्त नहीं बल्कि  लोन के बदले दिए गए थे. गैस कनेक्शन के एवज में चूल्हे और भरी हुई टंकी के पैसे सब्सिडी के रूप में नहीं, बल्कि ऋण के रूप में दिए गए. इसके एवज में शर्त यह थी कि जब तक ऋण वसूल नहीं हो जाता, तब तक बिना सब्सिडी वाले महंगे सिलेंडर ही खरीदने होंगे. एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते गैस चूल्हे की कीमत मिलाकर ऋण के रूप में दी गई यह राशि दो हजार तक पहुंचने लगी थी. अब सवाल उठता है, क्या इस प्रकार की तथाकथित जनहित की योजना जनविरोधी नहीं? जाहिर है बिना सब्सिडी वाले करीब 1000 रुपए के सिलेंडर एकमुश्त रकम देकर खरीदना ग्रामीणों के लिए संभव नहीं है. नतीजा फिर से धुएं के बीच में खाना पक रहा है. सब्सिडी नहीं मिलने, लकड़ी-कंडे की उपलब्धता के चलते उज्ज्वला योजना की अहमियत पर अनेक सवाल उठ रहे हैं. अधिकारियों ने माना कि सिलेंडर महंगा ही नहीं अपितु  गांवों में आसानी से मिल भी नहीं पाता,  इसलिए भी गरीब उपभोक्ता सिलेंडर खरीद पाने में अपने को असहाय महसूस कर रहे हैं. हकीकत ये है कि मध्य प्रदेश के चोरल के 28 गांवों में दिए 1800 कनेक्शन, 10 से 15 फीसदी लोगों को छोड़कर दूसरी बार गैस रिफिल कराने नहीं पहुंचे. गैस महंगी होने से 15% लोगों ने ही दोबारा टंकी ली है, शेष  85% फिर से चूल्हा फूंक रहे हैं. भास्कर ने पड़ताल की तो खुलासा हुआ कि बमुश्किल 10 से 15% लोग ही दोबारा गैस सिलेंडर भरवाने पहुंच रहे हैं. आदिवासी इलाकों में हालात तो और भी खराब हैं. उन्हें सिलेंडर के लिए दूरदराज के शहर जाना पड़ता है जो काफी मंहगा पड़ता है.
खबर है कि इंदौर जिले में भी 58 हजार से ज्यादा कनेक्शन दिए गए हैं, लेकिन ज्यादातर लोग दोबारा टंकी/सिलेंडर भरवाने नहीं पहुंचे. ज्यादातर गरीब परिवार फिर से लकड़ी और कंडे के धुएं वाले चूल्हे पर ही खाना बनाने को मजबूर हैं. यह भी बताया गया कि हजार रुपए तक पहुंच गए महंगे बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर रिफिल कराना इन गरीब, आदिवासी/दलित परिवारों के बस की बात नहीं है. जिन्हें सब्सिडी की पात्रता है, वह उपभोक्ता भी कतराने लगे हैं. पहले उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाली कीमत ही अदा करनी पड़ती थी और सब्सिडी की राशि सीधे कंपनियों के खाते में चली जाती थी. अब उपभोक्ताओं को टंकी की पूरी राशि एकमुश्त देनी होती है. सब्सिडी खाते में आती है. ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर बैंकिंग सुविधाओं के चलते भी ग्रामीणों को सब्सिडी का यह तरीका रास नहीं आ रहा.
इसका एक प्रमुख कारण शुरुआती 6-7 सिलेंडरों पर सब्सिडी नहीं मिलना भी है. दरअसल, पूरी तरह मुफ्त लगने वाली इस योजना में सिर्फ खाली टंकी की कीमत शामिल नहीं है. गरीब परिवारों को यह कनेक्शन 16 सौ से लेकर 2000 तक के ऋण पर दिए गए हैं. इस ऋण की भरपाई कनेक्शन धारकों को बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर खरीद कर चुकानी पड़ती है. योजना के आंकड़ों में सबसे ज्यादा गिरावट तब आई, जब बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमत हजार रुपए को पार कर गई. इन सब का नतीजा यह रहा कि गैस चूल्हे और टंकियां या तो धूल चाट रही हैं या फिर ताक पर रखी जा चुकी हैं, यानी उनका उपयोग बंद कर दिया है.
भास्कर की पड़ताल कहती है कि चारों तरफ जंगलों से घिरा इंदौर ज़िले के राजपुरा गांव की रहने वाली काली बाई को 2016 में उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन दिया गया था. काली बाई को गैस चूल्हा चालू करना नहीं आता. गैस चूल्हे की गुणवत्ता भी खराब होने से वह हादसे का शिकार होते-होते बची. इसके बाद से काली बाई ने गैस कनेक्शन से तौबा कर लिया और सिलेंडर को घर की छत पर चढ़ा दिया. अब काली बाई लकड़ी जलाकर चूल्हे पर खाना पकाती हैं. उनका कहना है कि वैसे भी गैस इतनी महंगी है कि उनके लिए खरीद पाना मुमकीन नहीं है. उमठ गांव की मंजू बाई भी उन लोगों में शामिल हैं, जिन्हें 2016 में योजना की शुरुआत में कनेक्शन दिया गया. मजदूरी कर पेट पालने वाले इस परिवार के लिए यह कभी संभव नहीं हो सका कि गैस टंकी दोबारा रीफिल करा लें. जब कराने की सोची भी तो उस समय बिना सब्सिडी वाला एक सिलेंडर हजार रुपए के आसपास पहुंच गया, लिहाजा सिलेंडर न खरीद पाना ही एक मात्र विकल्प रह गया और सिलेंडर दोबारा भरवाने से पीछे हट गए. गैस एजेंसी भी बहुत दूर है. कंडे-लकड़ी की उपलब्धता होने से मंजू बाई के लिए यह योजना किसी काम की नहीं है. मंजू अब भी जंगल से लकड़ी जलाकर चूल्हा फूंक रही हैं.
अब सरकार की योजना है कि यदि पैसा नहीं है तो गैस कनेक्शन धारक  पांच किलो का सिलेंडर लें. इस प्रकार उज्ज्वला गैस कनेक्शन के बाद सिलेंडर को पुन: भराने में आ रही दुश्वारियां दूर हो जाएंगी. कम व छोटी पूंजी वाले ऐसे उज्ज्वला उपभोक्ताओं के घर सिलेंडर की आपूर्ति जारी रहे,  इसके लिए सरकार ने उन्हें पांच किलो के सिलेंडर का विकल्प दिया है. यानी अब उज्ज्वला गैस उपभोक्ता 14.2 किलो के बड़े गैस सिलेंडर की जगह पांच किलो के छोटे गैस सिलेंडर ले सकते हैं. पांच किलो के घरेलू गैस सिलेंडर पर निर्धारित सब्सिडी भी उज्ज्वला उपभोक्ताओं के बैंक खातों में जाएगी. इस प्रकार की जनहित योजनाओं को क्या कहा जाए? जिन योजनाओं का क्रियांवयन ही न हो पाए, ऐसी योजनाओं को सरकार की नाकाम योजना क्यों न कहा जाए? यदि गरीबों और मजलूमों की आर्थिक हालत को नजर अन्दाज करके कोई ऐसी योजना बनाई जाती है जिसका बोझ उठाने में उपभोक्ता अपने आप को असहाय महसूस करता है तो ऐसी योजनाओं का बनाना, सरकार की अदूरदर्शिता को ही दर्शाता है… और कुछ नहीं. इस प्रकार की योजनाएं गरीबों के साथ एक घिनौना मजाक ही तो है.

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