1857 क्रांति के सूत्रधार थे मातादीन वाल्मीकि

1857 की क्रांति को घोषित तौर पर पहला स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध माना जाता है. भारतीय इतिहासकारों द्वारा इस पूरी क्रांति का श्रेय मंगल पांडे को दे दिया जाता है, लेकिन असल में इस क्रांति के सूत्रधार मातादीन भंगी थे. माना जाता है कि मातादीन भंगी मूलतः मेरठ के रहने वाले थे. लेकिन रोजी-रोटी के लिए इनके पूर्वजों ने यूपी के कई शहरों की खाक छानी और एक समय बंगाल में जाकर बस गए. उस समय की सामाजिक परिस्थितियों के कारण वे पढ़-लिख नहीं पाए थे, क्योंकि हिन्दू धर्म व्यवस्था एक भंगी को पढ़ने का अधिकार नहीं देती थी. हालांकि मातादीन के पुरखे शुरू से ही अंग्रेजों के संपर्क में आने से सरकारी नौकरी में रहे थे. अतः शीघ्र ही मातीदीन को भी बैरकपुर फैक्ट्री में खलासी की नौकरी मिल गई. यहां अंग्रेज सेना के सिपाहियों के लिए कारतूस बनाए जाते थे. अंग्रेजी फौज के निकट रहने के कारण मातादीन के जीवन पर उसका खासा असर पड़ा था. अनुशासन, संयम, स्वाभिमान, स्पष्टवादिता आदि गुण उन्होंने सैनिकों की संगत से ही पाए थे.

मातादीन को पहलवानी का भी शौक था. वह इस मल्लयुद्ध कला में दक्षता हासिल करना चाहते थे, लेकिन अछूत होने के कारण किसी भी हिन्दू उस्ताद ने उन्हें अपना शागिर्द नहीं बनाया. वह हर हिन्दू उस्ताद के अखाड़े में मल्लयुद्ध की कला सीखने के लिए जाते लेकिन वहां से उन्हें निराश लौटना पड़ता था. वहां उनसे वही सलूक किया जाता जो एक वक्त में द्रोणाचार्य के आश्रम में आदिवासी वीर तीरंदाज एकलव्य के साथ हुआ था. लेकिन कहते हैं कि जहां चाह होती है वहां राह भी निकल ही आती है. आखिरकार मातादीन की मल्लयुद्ध सीखने की इच्छा पूरी हुई और एक मुसलमान खलीफा इस्लाउद्दीन जो पल्टन नंबर 70 में बैंड बजाते थे, मातादीन को मल्लयुद्ध सिखाने के लिए राजी हो गए. अपनी लगन की बदौलत मातादीन ने उस्ताद इस्लाउद्दीन से मल्लयुद्ध के सभी गुर सीख लिए थे. अब वह एक कुशल मल्लयुद्ध योद्धा बन चुके थे. इस कला की वजह से ही अब लोग उन्हें पहचानने लगे थे.

इसी मल्लयुद्ध कला की बदौलत ही मातादीन की दोस्ती मंगल पाण्डे से हुई थी. मंगल पाण्डे स्वयं भी मल्लयुद्ध के शौकीन थे. एक कुश्ती प्रतियोगिता में मंगल पाण्डे मातादीन का सुदृढ़ शरीर और कुश्ती का बेहतरीन प्रदर्शन देख कर गदगद हो गए. इस्लाउद्दीन के अखाड़े और मातादीन के नाम की वजह से मंगल पाण्डे ने उसकी छवि एक मुस्लिम पहलवान की बना ली थी. मातादीन को यह भनक लग चुकी थी कि मंगल पांडे उन्हें मुसलमान समझ रहा है, सो सीधी बात कहने के आदि मातादीन ने मंगल पाण्डे को अपनी जाति भी बता दी. इसके बाद मातादीन के प्रति मंगल पांडे का व्यवहार बदल गया था.

एक दिन गर्मी से तर-बतर, थके-मांदे, प्यासे मातादीन ने मंगल पाण्डे से पानी का लोटा मांगा. मंगल पाण्डे ने इसे एक अछूत का दुस्साहस समझते हुए कहा, ‘अरे भंगी, मेरा लोटा छूकर अपवित्र करेगा क्या?’ प्रतिउत्तर में मातादीन ने मंगल पांडे को ललकार दिया और कहा कि पंडत, तुम्हारी पंडिताई उस समय कहा चली जाती है जब तुम और तुम्हारे जैसे चुटियाधारी गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से काटकर बंदूकों में भरते हो.’ मातादीन की ये बातें मंगल पाण्डे तक ही सीमित नहीं रही बल्कि एक बटालियन से दूसरी बटालियन, एक छावनी से दूसरी छावनी तक फैलती चली गई. इन्हीं शब्दों ने सेना में विद्रोह की स्थिति बना दी. 1 मार्च, 1857 को मंगल पाण्डे परेड मैदान में लाईन से निकल बाहर आया और एक अधिकारी को गाली मार दी. इसके बाद विद्रोह बढ़ता चला गया. मंगल पाण्डे को फांसी पर लटका दिया गया. जो गिरफ्तार हुए उनमें मातादीन प्रमुख थे. मातादीन को भी अंग्रेज ऑफिसर ने फांसी पर लटका दिया.

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