बच्चियां अब बच्ची नहीं रह गई

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प्रतीकात्मक चित्र

आज से बमुश्किल दस साल पहले तक जब लड़कियां दस-बारह साल की हो जाती थी तो उन्हें एक लड़की के तौर पर देखा जाता था. उनके कपड़े और हावभाव को समाज बतौर लड़की देखने लगता था. लेकिन इन कुछ सालों में सब कुछ बदल सा गया है. अब तो जन्म लेते ही लड़का और लड़की की पहचान अलग हो गई है. अब वो जन्मते ही लड़की है, तभी तो छह महीने तक की बच्चियों के साथ भी लोग हैवानियत करने से नहीं चूकते हैं. आज के वक्त में बच्चियां बच्चियां नहीं रह गई हैं, वो पैदा होते ही लड़की बन जा रही है.

21 जून 2018 के हिन्दुस्तान अखबार में चार साल की बच्ची से गैंगरेप की खबर प्रकाशित हुई थी जो मन को झकझोरने वाली थी. तो वहीं बिहार से एम्स में इलाज कराने के लिए पहुंची एक किशोर लड़की ने यह कह कर डॉक्टर को चौंका दिया कि उसका पिता पिछले कई सालों से उसके साथ रेप कर रहा था. रिश्तेदारों और पड़ोसियों द्वारा तो बच्चियों के यौन शोषण की खबरे आम है. हमें पहले बेटी बचाओ का नारा देकर उसे पूरा करना चाहिए, क्योंकि आज छोटी बच्चियां सबसे सॉफ्ट टारगेट हो गई है. वो प्रतिरोध नहीं कर सकती, आसानी से बहलाई फुसलाई जा सकती हैं. सो इन्हें अपना शिकार बनाना मानसिक रोगियों के लिए सबसे आसान हो जाता है.

रिपोर्ट और आंकड़ों की बात करें तो बच्चों के साथ रेप और यौन उत्पीड़न के मामले में साउथ अफ्रीका पूरे विश्व में नंबर वन पर आता है. 2009 में आई ट्रेड यूनियन सॉलिडेटरी हेल्पिंग हैण्ड के रिपोर्ट के मुताबिक साउथ अफ्रीका में हर तीसरे मिनट एक बच्चे के साथ रेप होता है. 2009 में ही इसी देश के मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने बताया कि हर चार में से एक व्यक्ति ने किसी का रेप करने की बात स्वीकार की है. यहां के मर्द इसे क्राइम नहीं मानते बल्कि कहते हैं कि लड़कियां रेप को इन्जॉय करती हैं. दैनिक टेलीग्राफ के अनुसार सन् 2000 में साउथ अफ्रीका में रेप और यौन उत्पीड़न के 67 हजार केस दर्ज हुए हैं. यहां के लोगों की मान्यता है कि किसी वर्जिन लड़की के साथ सेक्स करने से एड्स ठीक हो जाता है. उनकी यही सोच उन्हें कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार करने के लिए उकसाती है. ये दोनों तर्क कितने बेबुनियाद और कमअक्ल लोगो के हैं, आप समझ सकते हैं.

बच्चियों से बलात्कार के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है. एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स 2013 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बच्चों के साथ रेप और यौन उत्पीड़न के मामले महामारी के स्तर पर पहुंच गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 2001 से 2011 के बीच 48 हजार से ज्यादा बच्चों के रेप केस दर्ज हुए, जिसमें 2001 में 2113 केस थे तो 2011 में 7112 केस दर्ज हुए. सबसे दुख की बात यह है कि बच्चों के साथ सबसे ज्यादा यौन उत्पीड़न उनके पिता, भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी और टीचर ही करते हैं. भारत सरकार की 2007 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे भारत में 12 हजार 500 बच्चे जो कुल बच्चों की आबादी का 53 प्रतिशत है और जिसमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे, बराबरी में यौन उत्पीड़न के शिकार हुए.

इस सूची में जिम्बांबे तीसरे नंबर पर आता है. सन् 2011 में बच्चों के ऊपर हुए रेप की संख्या यहां 3172 थी. सन् 2009 में गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले चार सालों में 30 हजार लड़के तथा लड़कियों का इलाज किया गया जो यौन उत्पीड़न के शिकार थे. इन देशों के अलावा विकसित देशों की गिनती में आने वाले देश यूके और यूएस में भी बच्चों के साथ होने वाले रेप और यौन उत्पीड़न की संख्या कम नहीं है. ये देश बाल उत्पीड़न और रेप के मामले में विश्व में क्रमशः चौथे और पांचवे नंबर पर हैं. 2012-13 में 18,915 बाल यौन उत्पीड़न के केस सिर्फ इंग्लैंड में दर्ज हुए. ये नेशनल सोसायटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रूआलिटि टू चिल्ड्रेन (NSPCC) की रिपोर्ट कहती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक यूके में 20 में से एक बच्चा यौन उत्पीड़न का शिकार होता है और 90 फीसदी बच्चे अपने जानने वालों से उत्पीड़ित होते हैं. वहीं यूएस के स्वास्थ विभाग के 2010 के रिपोर्ट के मुताबिक 16 फीसदी किशोर जिनकी उम्र 14 से 17 साल की होती है, यौन उत्पीड़न के शिकार होते हैं.

आंकड़ें और रिपोर्ट तो फिर भी सारी सच्चाई बयान नहीं करते मगर ये रिपोर्ट हमें झकझोरने के लिए काफी है. जहां बच्चे अपने घरों में, पड़ोस में और स्कूल में ही सुरक्षित नहीं हैं तो फिर वो कहां सुरक्षित होंगे. जब बेटियां बाप से असुरक्षित हैं, बहनें भाई से असुरक्षित हैं, बच्चे अपने शिक्षक से असुरक्षित हैं तो फिर आखिर किस पर विश्वास किया जाए. ये कैसी दुनिया हो गई है, जहां हर तरफ असुरक्षा का माहौल है.

– लेखिका शिक्षिका हैं. स्त्री मुद्दों पर लिखती हैं. संपर्क- raipuja16@gmail.com

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