स्मृति ईरानी के आदर्श गांव में दलितों के लिए अलग पानी और श्मशान|

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब सभी सांसदों से एक-एक गांव गोद लेने की अपील की थी, तब भाजपा नेताओं में जैसे इसकी होड़ लग गई थी. पीएम मोदी के गुड बुक में शामिल होने के लिए तमाम सांसदों ने ऐसा किया भी. स्मृति ईरानी भी उनमें से एक थीं. मोदी की करीबी माने जाने वाली गुजरात से राज्यसभा सांसद एवं केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने गुजरात के आनंद जिले के मघरोल गांव को चुना. ईरानी ने सन् 2015 में इस गांव को गोद लिया था, लेकिन इसके दो साल बाद भी यहां की हालत सुधरी नहीं है. यहां जोर-शोर से कार्यक्रमों की घोषणा तो हुई लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा.

इस क्षेत्र के विकास के लिए सांसद निधी से 7 करोड़ रुपये दिए गए. ये पैसे यहां पानी को शुद्ध करने, स्किल डेवलपमेंट और रोजगार पैदा करने के लिए खर्च होना था, लेकिन ऐसा हो न सका. इसी तरह स्मृति ईरानी के गोद लिए इस गांव में दलितों के साथ भेदभाव भी चरम पर है. इस गांव के दलितों के लिए अलग पानी है. इसी तरह इस गांव के दलित गांव के श्मशान में अपने परिजनों का अंतिम संस्कार नहीं कर सकतें. उन्हें इसके लिए गांव से अलग एक दूसरे स्थान पर जाना पड़ता है.

इस गांव के विकास के लिए जारी 7 करोड़ रुपये से 41 योजनाओं पर काम होना था. इसके तहत पानी की सुविधा का विकास करना,स्कूल, स्किल डेवलपमेंट सेंटर, अंतिम संस्कार के लिए ग्राउंड, सड़क और पंचायत की बिल्डिंग बननी थी. लेकिन ये सारी घोषणाएं पूरी नहीं हो सकी. तुर्रा यह कि सरकारी नियमों की अनदेखी करते हुए बिना काम के पूरा हुए ही सारा भुगतान कर दिया गया. औऱ आनन फानन में मई 2017 में ही स्मृति ईरानी ने मघरोल को आदर्श गांव घोषित कर दिया. हैरत की बात तो यह है कि बिना पहले की योजनाओं के पूरा हुए 15 करोड़ रुपये की लागत से वाई-फाई कनेक्टिविटी औऱ स्किल डेवलपमेंट सेंटर की योजनाओं की आधारशिला रख दी, लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से कोई भी काम नहीं कर रहा है.

पिछले साल जुलाई में कांग्रेस के विधायक अमित चावड़ा ने गुजरात हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इसे सांसद निधी का दुरुपयोग का मामला बताया था, जिसके बाद मामले ने तूल भी पकड़ा था. फिलहाल सच्चाई यह है कि गुजरात के आनंद जिले का यह मघरोल गांव आज भी स्मृति ईरानी के विकास के वादों के पूरा होने का इंतजार कर रहा है. औऱ जो थोड़ा बहुत विकास पहुंचा भी है, वह दलितों से कोसो दूर एक खास समाज के लोगों की जागीर बना हुआ है.

 

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