विभागवार आरक्षण : वर्ग संघर्ष के इतिहास में वंचितों वर्गों पर एक और प्रहार!

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7 जनवरी को मंत्रिमंडल में पारित प्रस्ताव को मोदी सरकार द्वारा संविधान की धज्जियां विखेरते हुए महज दो दिनों में लोकसभा एवं राज्यसभा में पास कराकर सवर्णों को आरक्षण दिलाने के बाद, जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी ,2019 को समग्र विश्विद्यालय को आरक्षण की इकाई मानने की जगह विभाग को इकाई मानने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर मुहर लगाई है, उससे हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से वंचित विश्व की विपुलतम आबादी हतप्रभ है. हतप्रभ हो भी क्यों नहीं, क्योंकि विभागवार आरक्षण लागू होने के बाद हजारों साल से शिक्षालयों से बहिष्कृत दलित, आदिवासी और पिछड़ों का उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षक बनना एक सपना बन जायेगा. विपरीत इसके भारत के उच्च शिक्षा केंद्रों के शिक्षक पदों पर सवर्णों का एकाधिकार और पुष्ट हो जायेगा. कारण ,13 पॉइंट रोस्टर प्रणाली में किसी खास विषय के लिए निकलने वाले प्रथम तीन पद सामान्य के लिए और चौथा पद ओबीसी के लिए होगा. इसके बाद का पांचवां और छठा पद भी सामान्य वर्ग के लिए रहेगा तथा सातवां पद अनुसूचित जाति एवं 14 वां पद अनुसूचित जनजाति के कोटे में जायेगा.

चूंकि एक विषय की सामान्यतया दो या तीन रिक्तियां ही निकली हैं, इस हिसाब से आरक्षित वर्गों(एसटी/एससी और ओबीसी) के लिए कॉलेज/विश्वविद्यालयों में शिक्षक बनना सचमुच एक सपना बन जायेगा.बहरहाल सिर्फ भारत के जन्मजात वंचित ही नहीं, दुनिया भर के विवेकवान लोग इस बात से हतप्रभ हैं कि जिस देश में भीषणतम असमानता से राष्ट्र की एकता और अखंडता पहले से ही खतरे के सम्मुखीन है, उस देश में सवर्ण आरक्षण के बमुश्किल दो सप्ताह बाद ही उच्च शिक्षा में सवर्णों के एकाधिकार को और मजबूत करने जैसा फैसला कैसे ले लिए गया! ऐसा फैसला लेते हुए क्यों यह भय नहीं हुआ कि इससे देश में विस्फोटक हालात पैदा हो सकते हैं.दरअसल ऐसा नहीं है कि इस देश का शासक वर्ग इन खतरों से अनजान है, किन्तु वह विस्फोटक स्थिति से भलीभांति अवगत होने के बावजूद ऐसे खतरे इसलिए उठा रहे है क्योंकि उसे पता है कि अपने वर्ग-शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने लायक, उसे इससे बेहतर अवसर मिल ही नहीं सकते. इसलिए वह अपने स्व-वर्गीय हित में अँधा होकर ऐसे-ऐसे फैसले ले रहा है, जिसकी अन्यत्र कल्पना ही नहीं की जा सकती. इसे समझने के लिए एक बार फिर महान समाज विज्ञानी कार्ल मार्क्स के नजरिये से मानव जाति के इतिहास का,जिसकी हम अनदेखी करने के अभ्यस्त रहे हैं, सिंहावलोकन कर लेना पड़ेगा.

मार्क्स ने कहा है ‘अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता. मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिसकी भारत में बुरी तरह अनदेखी होती रही है, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही. ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है. जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों(सामाजिक समूहों) के पेशे/कर्म तय रहे तथा इन पेशे/कर्मों की विचलनशीलता धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली,जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है. वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन.ऐसे में दावे के साथ कहा जा सकता है कि सदियों से भारत में वर्ग संघर्ष आरक्षण में क्रियाशील रहा है. हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज : दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर.

वर्ग संघर्ष का नया दौर शुरू होते ही आधुनिक भारतीय राजनीति में चाणक्य के नाम से मशहूर नरसिंह राव ने 24 जुलाई ,1991 को गृहित किया ट्रिकल डाउन थ्योरी पर केन्द्रित नवउदारवादी अर्थनीति. राव का मानना था, इससे विकास झरने की भांति ऊपर से नीचे आयेगा, जो शासको की कुत्सित नीति के चलते मुमकिन ही नहीं हो पाया. बहरहाल नवउदारवादी अर्थनीति को अपनाने के पीछे राव के दो हिडेन अजेंडा थे: पहला, आरक्षण को कागजों की शोभा बनाना और दूसरा परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त सुविधाभोगी वर्ग के आर्थिक और शैक्षिणक वर्चस्व को और मजबूत करना . चूंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही सवर्णवादी पार्टियां हैं और दोनों का ही वर्गीय हित एक है, इसलिए अपने वर्गीय हित में दोनों ही दलों के प्रधानमंत्रियों ने राव के बनाये ट्रैक का अनुसरण करने में होड़ लगाया, जिसमे सबको पीछे छोड़ गए वह मोदी, जिन्होंने महज दो दिनों में सवर्ण अरक्षण बिल पास कराने का चमत्कार घटित कर दिया. राव की नीतियों के कारण आज की तारीख में हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग का अर्थ-सत्ता, राज-सत्ता और धर्म-सत्ता की भांति ज्ञान-सत्ता पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा हो चुका है. बहरहाल मॉडर्न चाणक्य ने वर्ग शत्रु के सफाए के लिए निजीकरण ,उदारीकरण, भूमंडलीकारण, विनिवेशीकरण का जो जाल बिछाया, उससे शिक्षा का क्षेत्र भी अछूता न रहा. उन्होंने सुपरिकल्पित रुप से निजीकरण को जो बढ़ावा दिया उससे देखते ही देखते कार्पोरेट घरानों और सवर्ण नेताओं को महंगे-महंगे स्कूल/कॉलेजों की श्रृंखला खड़ा करने का अवसर मिल गया. इनमें शिक्षा अत्यंत महंगी होने के कारण बहुजन यहाँ स्वतः बहिष्कृत होते गए. गुणवत्ती-शिक्षा पर सवर्णों का एकाधिकार कायम करने के लिए एक ओर जहां राव ने निजी स्कूल/कॉलेजों को बढ़ावा दिया, वहीं जिन सरकारी स्कूलों में बहुजनों को शिक्षा सुलभ होती थी, उन्हें बदहाल बनाने की परिकल्पना की .इसके तहत उन्होंने 15 अगस्त,1995 को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में मुफ्त भोजन मुहैया कराने का जो निर्णय लिया, वह बहुत मारक साबित हुआ.बहरहाल गुणवत्ती शिक्षा पर सुविधाभोगी वर्ग का एकाधिकार कायम कराने का जो रास्ता राव ने तैयार किया, उसमें उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने कोई छेड़छाड़ नहीं की: यदि कुछ किया तो यही किया कि जिस गुणवत्ती शिक्षा से आज के प्रतिस्पर्धी युग में अवसरों का सद्व्यवहार किया जा सकता है, उससे बहुजन और दूर छिटकते गए. अब जहां तक शिक्षा का सवाल है, अन्यान्य क्षेत्रों की भांति इस क्षेत्र में भी सवर्णों का वर्चस्व स्थापित करने में प्रधानमंत्री मोदी अपने पूर्ववर्तियों को बौना दिए.

ऐसा इसलिए कि मोदी जिस संघ से प्रशिक्षित होकर सर्वोच्च पद पर पहुंचे हैं, उस संघ और उसके राजनीतिक संगठन को हिन्दू धर्म और उन धर्मशास्त्रों में अपार आस्था रही जो, चीख-चीख कर कहते हैं कि शुद्रातिशूद्रों का जन्म सिर्फ तीन उच्च वर्णीय तबकों(सवर्णों) की निःशुल्क-सेवा के लिए हुआ है. शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक-शैक्षिक) का भोग इनके लिए अधर्म है. अतः कभी जिन हिन्दू धर्म-शास्त्रों को मानवता-विरोधी मानते हुए डॉ. आंबेडकर ने डायनामाईट से उड़ाने का निदेश दिया था, उन धर्मशास्त्रों में अपार आस्था के कारण संघी मोदी के लिए आरक्षण का लाभ उठाने साक्षात् शत्रु थे. अतः आंबेडकरी रिजर्वेशन के सौजन्य से जिन जातियों के लोग आईएएस, आईपीएस,डॉक्टर,इंजीनियर, प्रोफ़ेसर बनकर हिन्दू धर्मशास्त्र-ईश्वर को भ्रान्त बना रहे थे, उन शत्रुओं को नेस्तनाबूद करने के लिए आंबेडकरी आरक्षण को व्यर्थ करने में अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में अतिरिक्त तत्परता दिखलाया, जिससे शिक्षा जगत का आरक्षण भी नहीं सलामत रह पाया. मोदी-राज में ही उच्च शिक्षा में सवर्णों का वर्चस्व दृढतर करने के लिए संस्कृत, ज्योतिष, पौरोहित्य, योग इत्यादि जैसी प्रगतिविरोधी विद्यायों को थोपने का सबलतम प्रयास हुआ. इन्ही के राज में शैक्षणिक परिसरों में भेदभाव को इतना शिखर पर पहुँचाया गया कि बहुजन समाज के भूरि –भूरि रोहित वेमुला आत्म-हत्या करने से लेकर यूनिवर्सिटीयों से भागने के लिए विवश हुए. इन्ही के राज में वंचित वर्गों के विद्यार्थियों को राजीव गांधी फेलोशिप से महरूम करने का कुत्सित प्रयास किया गया. अपने वर्ग शत्रुओं को उच्च शिक्षा से दूर धकेलने के लिए मोदी ने पांच दर्जन से अधिक शीर्ष विश्वविद्यालयों को स्वायतत्ता प्रदान किया.

अब उसी कड़ी में मोदी राज में विभागवार आरक्षण का निर्णय लेकर भारत के वर्ग संघर्ष के इतिहास में बहुजनों पर आजाद भारत का सबसे बड़ा प्रहार कर दिया गया है. इस प्रहार से बहुजन छात्र और गुरुजन उद्भ्रांत होकर इसे व्यर्थ करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने का मन बनाते दिख रहे हैं. वे कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं, वे जगह – जगह सभा-सेमीनार आयोजित कर इसका प्रतिवाद कर रहे हैं. 13 पॉइंट रोस्टर के खात्मे व आरक्षण की पूर्व स्थिति बहाल करने के लिए जिला मुख्यालयों से लेकर प्रदेश और देश की राजधानीं में व्यापक पैमाने पर धरना प्रदर्शन की बड़ी तयारी में जुट गए हैं. उनकी तैयारी को को देखते हुए 2016 का सर्द मौसम याद आ रहा है,जब हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रतिभाशाली छात्र रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या के विरोध में उठी तरंगे विश्व विद्यालयों के कैम्पस और महानगरों को पार कर देश के छोटे-छोटे कस्बों तक फ़ैल गयी थीं. विभागवार आरक्षण के खिलाफ बहुजन छात्र और गुरुजनों में इतना तीव्र आक्रोश है, कि उनके दबाव में आकर सामाजिक न्यायवादी विभिन्न दलों के नेता भी उनके साथ कंधे-कंधा मिलाकर सडकों पर उतरने के लिए बाध्य हो गए हैं.

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