जन्मदिन विशेषः बहनजी का धम्म कारवां

Details Published on 15/01/2017 10:25:44 Written by Lal Ji Medhankar


भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण उपरान्त लगभग 218 वर्षों के बाद विश्व के तमाम देशों को अपने धम्म-विजय अभियान द्वारा विजित करने वाले महान सम्राट अशोक ने इसी भारत-भूमि पर राज्य करना प्रारम्भ किया. न्यग्रोध नामक सात वर्षीय श्रामणेर के ‘अप्पमाद’ (अप्रमाद) से संबंधित धर्मोपदेश को सुनकर सम्राट अशोक के मन में बुद्ध, धम्म व संघ के प्रति श्रद्धा व भक्ति उत्पन्न हुई. जब सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म में आस्था उत्पन्न हुई तो सम्राट ने युद्ध-विजय को त्यागकर अहिंसा व धम्म-विजय का अभियान शुरू किया. सम्पूर्ण जम्बुद्वीप में बहुजनों के सुख व हित के लिए बहुत सा धम्म-कार्य करने के तद्नन्तर अपने आचार्य मोग्गलिपुत्ततिस्स से पूछा,‘‘भगवान... Read More

नोटबंदी से आम जनता त्रस्त

Details Published on 19/12/2016 12:57:46 Written by डॉ. अलख निरंजन


जनसंख्या की दृष्टि से विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र की राजधानी दिल्ली के आसमानों में मानव जीवन के लिए हानिकारक कणों की धुंध जमी हुई थी. पर्यावरण विशेषज्ञ और सरकारी प्राधिकरण के अधिकारी जनता को घर से न निकलने की सलाह दे रहे थे. बच्चे घर से बाहर न निकलें इसलिए स्कूल बन्द कर दिये गये थे, लोगों को मास्क पहनकर बाहर निकलने की हिदायत दी जा रही थी, इसी  बीच लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री के 08 नवम्बर 2016 रात्रि 08 बजे के एक ऐलान ने न केवल दिल्ली की जनता को बल्कि पूरे देश की जनता को अचानक घर से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया. यह ऐलान था 500 और 1000 रुपये मूल्य के नोटों के चलन पर पूर्णतः रोक लगाना. यह ऐलान काला... Read More

परिनिर्वाण दिवस विशेषः बहुजन पुर्नजागरण के सूत्रधार बने थे फुले

Details Published on 28/11/2016 12:33:02 Written by अनूप पटेल


महात्मा ज्योतिबा फुले भारत के इतिहास में एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने भारतीय के शूदों और स्त्रियों की स्वतंत्रता और समानता की पुरजोर वकालत की थी. फुले ने अपना सार्वजनिक जीवन 1848 में शुरु किया और 28 नवंबर 1890 को अपने जीवन के आखिरी दिन तक वह बहुजन (दलित-पिछड़े-स्त्रियां) समाज के कल्याण में लगे रहे. फुले आधुनिक भारत के निर्माताओं में से एक थे. फुले की कथनी-करनी में कोई फर्क नहीं था. फुले अपने समय की राष्ट्रव्यापी समस्याओं से भिड़े. उन्होंने धर्म, जाति तथा जेंडर के सवाल पर, कर्मकाण्ड, किसानों की समस्या और ब्रिटिश शासन आदि पर चिंतन किया. वे एक दार्शनिक, नेता और महान संगठनकर्ता थे. यही वजह थी कि उन्होंने अपने जीवन में शिक्षा और दलित... Read More

‘बहनजी’ की हुंकार, बसपा तैयार

Details Published on 30/09/2016 18:48:25 Written by Prof. Vivek Kumar


आगरा स्थित जिस ऐतिहासिक कोठी मीना बाजार मैदान में तकरीबन 50 वर्ष पूर्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने ऐतिहासिक भाषण में लोगों को अपनी आत्मनिर्भर राजनीति की ओर चेतना से आगे बढ़ने का संदेश दिया था. उसी ऐतिहासिक मैदान से 21 अगस्त को बसपा प्रमुख एवं राज्यसभा की सदस्य तथा चार बार की उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने यूपी चुनाव के लिए हुंकार भर दी है. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए दलितों, पिछड़ों एवं मुस्लिम अल्पसंख्यकों तथा अपर कास्ट के निर्बल वर्गों का आवाहन करते हुए उन्होंने यह समझाया कि कौन सा दल उनके हक एवं हुकूक के लिए सबसे अधिक प्रतिबद्ध है. बसपा सुप्रीमों ने सिंहनी की तरह दहारते... Read More

गुजरात से बदलाव की बयार…

Details Published on 13/08/2016 19:23:19 Written by Hitesh Chavda


गुजरात के उना में मर चुकी गाय की खाल उतारने को लेकर दलित जाति के युवकों की पिटाई पर पूरा गुजरात उबल गया है. राज्य में घटी दलित उत्पीड़न की इस विभत्स घटना पर देश भर के दलितों में रोष है. इसने गुजरात में कोढ़ की तरह रिस रहे जातिवाद के सच को भी सामने ला दिया है. असल में गुजरात की सड़कों पर उतरे दलितों का यह गुस्सा एक दिन का गुस्सा नहीं है, बल्कि सालों से दलितों पर हो रहे अत्याचार की इंतहा हो जाने पर प्रदेश का सारा दलित समाज एक साथ सामने आ गया है. गुजरात में दलितों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के 116 गांवों में रहने वाले दलित समाज के लोग पुलिस प्रोटेक्शन में हैं. वजह, इन गांवों के दलितों को वहां के जातिवादी... Read More

सबकी लड़ाई बसपा सेः यूपी चुनाव को लेकर प्रो. विवेक कुमार का विश्लेषण

Details Published on 13/07/2016 16:34:03 Written by Prof. Vivek Kumar


विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर बसपा उत्तर प्रदेश में सभी राजनैतिक दलों से क्यों आगे है? यह बढ़त नकारात्मक नहीं है. अर्थात यह बढ़त केवल इस कारण नहीं है कि सपा सरकार में गुण्डा राज है और कानून एवं अभिशासन की हालत पतली है. मथुरा काण्ड ने इसको और भी हवा दी है. जिस सरकार के राज में डी.एस.पी. एवं एस.पी. मार दिये जाय, पुलिस थानों पर हमले हों और साम्प्रदायिक दंगों का खतरा हमेशा बना रहे, वहां उस सरकार पर कौन भरोसा करेगा. इससे भी सबसे ऊपर जहां, जिस राज्य के मुख्यमंत्री को उसी पार्टी के वरिष्ठ नेता कुछ न समझे, आई.ए.एस एवं आई.पी.एस आंख दिखाये ऐसे मुख्यमंत्री के राज में कानून-व्यवस्था कैसे दुरुस्त रहेगी. इन सबका फायदा तो बसपा को अवश्य मिलेगा... Read More

ओबीसी आरक्षण और शिक्षा क्षेत्र में भागीदारी का सवाल

Details Published on 13/07/2016 19:39:21 Written by Nikhil Anand


2014 में केन्द्र में बीजेपी की सरकार आने के बाद भारत में सवर्णवादी ताकतें एकबार फिर पुरजोर तरीके से मुखर व आक्रमक हैं. जाहिर है कि समाज के दलित- आदिवासी- पिछड़ा- पसमांदा जमात के खिलाफ तमाम तरह के हथकंडे रचे जा रहे हैं ताकि इनके प्रतिनिधित्व एवं भागीदारी के सवाल को कुंद व खारिज किया जा सके. बहुजन समाज के सवाल को जिस प्रतीकात्मक तरीके से बीजेपी ने हल करने की कोशिश की है, वह उनके शातिराना छद्म को उजागर करता है. रोहित वेमुला के ‘आत्महत्या’ से उभरे बहुजन जनाक्रोश को दबाने के लिये जेएनयू को केन्द्र बनाकर एक सवर्ण कन्हैया को जबरन मुद्दा बना दिया गया जो वामपंथी ब्राह्मणों और दक्षिणपंथी ब्राह्मणों की एक दूसरे के खिलाफ प्रत्यक्ष-... Read More

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