मध्यप्रदेश की 80 सीटों का फैसला करेंगे दलित-आदिवासी दल

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नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के चुनाव में सारी बहस कांग्रेस और भाजपा के बीच टिक गई है. इस बीच बसपा किसको समर्थन देगी यह भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. इसकी वजह भी है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 44.88 फीसदी और कांग्रेस को 36.38 फीसदी वोट मिले थे. वहीं, बहुजन समाज पार्टी के पास 6.29 फीसदी वोट थे. इस लिहाज से ये प्रदेश की राजनीति में ये तीनों दल काफी महत्वपूर्ण हैं.

लेकिन इन तीनों दलों से इतर कुछ और राजनीतिक दल भी मध्यप्रदेश की राजनीति में काफी मायने रखते हैं. और प्रदेश में सत्ता किसके पास जाएगी, इसमें इन दलों की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. इन दलों में सबसे पहले गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का नाम आता है. पिछले विधानसभा चुनाव में उसके पास एक फीसदी वोट था. यूं तो ऊपर से देखने पर यह वोट प्रतिशत बहुत कम नजर आता है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को गौर से देखें, तो बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और दूसरे छोटे दलों ने 80 से अधिक सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. विधानसभा चुनावों में इतने वोट काफी मायने रखते हैं.

अगर मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनावी नक्शे पर बीएसपी को गौर से देखें तो यह उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में खासा असर रखती है. इसमें मुरैना, भिंड, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, अशोक नगर, सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, सीधी और सिंगरौली जैसे 14 जिलों में बीएसपी का खासा असर है. यानी एक तिहाई मध्यप्रदेश में बीएसपी की पकड़ है. 2013 विधानसभा चुनाव में 62 विधानसभा सीटें ऐसी रहीं, जहां बीएसपी के प्रत्याशी ने 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. तो 62 में से 17 सीटें ऐसी हैं जहां बीएसपी को 30,000 से ज्यादा वोट मिले हैं.

जहां तक गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का सवाल है तो आदिवासी बहुल सीटों पर उसने अपनी ताकत दिखाई है. पिछले विधानसभा चुनाव में जीजीपी ने ब्योहारी, जयसिंहनगर, जैतपुर, पुष्पराजगढ़, शाहपुरा, डिंडोरी, बिछिया, निवास, केवलारी और लखनादौन सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. अशोक भारती की जन सम्मान पार्टी भी अपनी दावेदारी जता रही है.

इसके अलावा जय आदिवासी युवा शक्ति यानि जेएवाईएस भी आगामी विधानसभा चुनाव में ताल ठोकने को तैयार है. एम्स की नौकरी छोड़कर इस संगठन की कमान संभालने वाले 35 साल के डॉ. हीरा अलावा का संगठन आदिवासियों के लिए प्रदेश में आरक्षित सभी 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने या फिर दूसरों को समर्थन देने को तैयार है. संगठन की नजर उन 50 सीटों पर भी है, जहां आदिवासी समाज का 20 फीसदी से ज्यादा वोट है.

इस संगठन के दावे को इसलिए हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि पिछले साल अक्टूबर में हुए छात्र संघ के चुनावों में धार जिले के छात्र परिषद में उसके नौ अध्यक्ष और 162 सदस्य जीतकर आए थे. इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह संगठन राज्य सरकार के तमाम कार्यक्रमों में ‘वनवासी’ शब्द को ‘आदिवासी’ शब्द में बदलवाने में कामयाब रहा था. मध्य प्रदेश की राजनीति में ये छोटे दल चुनाव बाद बड़े खिलाड़ी बनकर उभर सकते हैं.

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