खुलासा (पार्ट-3): अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति दोनों का मिलाकर 1 लाख 53 हजार 847.94 करोड़ की कटौती

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इस प्रकार सिर्फ 2017-2018 के बजट में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बजट में कुल कटौती क्रमशः 1 लाख 04 हजार 490.45 रूपया और 49 हजार 357.49 करोड़ रुपये को जोड़ दिया जाए तो दोनों समुदायों के हिस्से की इस वर्ष की कुल कटौती 1 लाख 53 हजार 847.94 करोड़ की होती है.

इस प्रकार केंद्र सरकार ने केवल इस बार के बजट (2017-18) में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के समुदायों के कल्याण के लिए आवंटित होने वाली धनराशि में से 1 लाख 53 हजार 847.94 करोड़ रुपए की कटौती कर दी और उस पर भी 35 प्रतिशत वृद्धि का दावा कर रही है. वृद्धि के इस दावे की हकीकत क्या है, इसकी चर्चा थोड़ा आगे करेंगे.

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अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए आवंटित धनराशि में केवल इसी वर्ष ही इतने बड़े पैमाने पर कटौती नहीं की गई, पिछले वर्ष भी इस सरकार ने बड़े पैमाने पर कटौतियाँ की थीं.

पिछले वर्ष (2016-17) के बजट में नियमतः आंवटित होने वाली धनराशि में 52 हजार 479.03 करोड़ रुपये की अनुसूचित जातियों के मद में कटौती की गई थी.

 पिछले वर्ष का कुल बजट 19 लाख 78 हजार 60 करोड़ का था, जिसमें योजनागत व्यय 5 लाख 50 हजार 010.10 करोड़ का था. अनुसूचित जाति उपयोजना की स्वीकृति नीति के हिसाब से, इस योजनागत व्यय का अनुसूचित जातियों की जनसंख्या के अनुपात में 16.6 प्रतिशत आवंटित होना चाहिए था, जो कुल बजट का 4.62 प्रतिशत होता. यदि योजनागत बजट का 16.6 प्रतिशत आवंटित होता, तो यह धनराशि 91 हजार 301.66 करोड़ होती. इस धनराशि, जिस पर अनुसूचित जातियों का हक था, में भारी कटौती करके सिर्फ 38 हजार 832.63 करोड़ आवंटित किया गया अर्थात् 52 हजार 479.03 करोड़ की कटौती कर दी गई.

 इसी प्रकार अनुसूचित जनजातियों के लिए स्वीकृत अनुसूचित जनजाति उपयोजना के तहत कम से कम 47 हजार 300 करोड़ का आवंटन होना चाहिए था, जबकि सिर्फ 24 हजार 005 करोड़ रुपए का आवंटन हुआ.

 इस प्रकार अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के मद में 2016-17 के बजट में भी 23 हजार 295. 86 करोड़ रुपये की कटौती की गई थी.

यदि केवल 2016-17 और 2017-18 के बजट में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के वाजिब हकों में की गई कुल कटौती को जोड़ दिया जाए तो यह (153847.94 + 75774.86) 2 लाख 29 हजार 622.86 करोड़ रुपया होता है. यह इतनी धनराशि है कि यदि इसे अनुसूचित जाति और जनजाति के प्रत्येक बालिग-नाबालिग सदस्यों के बीच बांटा जाए तो प्रत्येक को कम से कम लगभग 10 हजार रुपये मिलेंगे.

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यही इस बात के रहस्य को भी समझ लेना चाहिए कि इतने बड़े पैमाने पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के कल्याण के लिए धनराशि के आवंटन में कटौती के बावजूद भी आंकडों की वह कौन सी बाजीगरी थी कि वित्त मंत्री ने यह घोषणा किया कि इस वर्ष के बजट में अनुसूचित जातियों के कल्याण के मद में 35 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, और सारी मीडिया इसका गुणनान करने लगी. सच्चाई यह है कि सरकार ने 2014-15 के बजट में अनुसूचित जातियों के लिए 50 हजार 548 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, जिसे घटाकर 2016-17 के बजट में 38 हजार 832.63 करोड़ रुपया कर दिया. जिसे 2017-18 के बजट में 52 हजार 392.55 करोड़ कर दिया गया. खुद इसी सरकार द्वारा पिछले बजट मदों में की गई कटौती को सुधारने को ही वृद्धि करार दे दिया गया. लेकिन कुल बजट के प्रतिशत में देखें तो 2014-15 की तुलना में 0.31 प्रतिशत कम ही है, क्योंकि 2014-15 में कुल बजट केवल 17 लाख 94 हजार 891.96 करोड़ रुपये का ही था, जबकि इस वर्ष का कुल बजट 21 लाख 46 हजार 734.78 करोड़ रुपया है.

आइए मोदी सरकार के इस दावे की भी थोड़ी जांच कर ली जाए क्या उसने सचमुच में अपने पिछले बजट (2016-17) में अनुसूचित जातियों के लिए आंवटित धनराशि (38,833 करोड़ रूपये) इस बार के बजट (2017-18) में वृद्धि (52,393 करोड़ रूपए) का जो दावा कर रही है, वह दावा कितना खोखला है और तथ्यों की बाजीगरी का क्या खेल खेला गया है. यह एक स्थापित सिद्धांत रहा है कि उन्हीं आंवटनों को अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आवंटन मान जायेगा, जो विशेष तौर पर अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए लक्षित होगा, सामान्य योजनाओं और गैर-लक्षित योजनाओं को इसमें शामिल नहीं किया जायेगा. मोदी चालाकी यह रही कि इसी मद में विशेष तौर पर इन समुदायों के लिए लक्षित और सामान्य और गैर लक्षित योजनाओं को इसमें शामिल कर दिया. इसका परिणाम हुआ कि यह धनराशि बढ़ी हुई दिखी, जबकि वास्तविकता यह है कि अनुसूचित जातियों के लिए विशेष तौर पर केवल 25,708 करोड़ रूपया और अनुसूचित जनजातियों के लिए 15,643 करोड़ रूपया आवंटित किया गया, जबकि अनुसूचित जनजातियों के मद में 31,920 करोड़ रूपया दिखाया गया था.

आगे के खुलासे में पढ़ेंगे- अनुसूचित जातियों-जनजातियों के कल्याण के विभिन्न मदों में कटौती

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