एससी-एसटी एक्ट न हुआ सांप-सीढ़ी का खेल हो गया

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दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण) 01.09.2018 के अनुसार नैनीताल हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार द्वारा  एससी-एसटी एक्ट को इसके मूल रूप में लागू करने के विधेयक पारित करने की दशा में  इस एक्ट में पुन: संशोधन करने  को चुनौती देती एक याचिका पर हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं. अखबार में जनहित याचिका दायर करने वाले लोगों के नाम नहीं दिए गए हैं.
शुक्रवार को खंडपीठ में एक जनहित याचिका पर सुनवाई हुई. जिसमें केंद्र सरकार की ओर से 17 अगस्त को जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट के मामले में जांच के बाद उचित कानूनी कार्रवाई करने के आदेश पारित किए थे, मगर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से संसद में विधेयक पारित करवाया, एससी-एसटी ऐक्ट में संशोधन के बिल को राज्यसभा से मंजूरी मिलने के बाद, जिसे राष्ट्रपति द्वारा मंजूरी प्रदान कर दी गई.
इसके साथ ही अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस ऐक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधान पर लगाई गई रोक भी समाप्त हो गई है. लोकसभा से इस संशोधन बिल को मंगलवार को मंजूरी दी जा चुकी थी. बता दें कि शीर्ष अदालत ने इसी साल 19 मई को एससी-एसटी ऐक्ट के तहत शिकायत मिलने पर तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. बड़े पैमाने पर इस कानून के बेजा इस्तेमाल का हवाला देते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला सुनाया था.
याचिका में कहा गया है कि केंद्र का यह कदम संविधान के अनुच्छेद-14, 19 व 21 के तहत असंवैधानिक हैं. जिसकी पुनर्विचार याचिका अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, लिहाजा केंद्र ने जो संशोधन किया, वह असंवैधानिक है.  याचिका कर्त्तओं का तर्क ये हैं कि संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत नागरिकों को समानता का अधिकार, अनुच्छेद-19 में स्वतंत्रता का अधिकार व अनुच्छेद-21 व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार है. जिसकी पुनर्विचार याचिका अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, लिहाजा केंद्र ने जो संशोधन किया, वह असंवैधानिक है.  यहाँ सवाल ये उठता है कि नैनीताल हाई कोर्ट ने जिन् धाराओं को केन्द्र में रखकर जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है क्या वे धाराएं केवल और गैरदलितों के हितों की रक्षार्थ ही हैं, क्या एसटी/एसटी के हितों के लिए नहीं? यह भी कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई समीक्षा को सरकार द्वारा एक नया विधेयक/ अधिसूचना लाकर खारिज कर दिया और पुराने कानून को ही वैधता देकर नया कानून बना दिया  तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था स्वत: ही निरस्त हो जाती है. हाई कोर्ट के माननीय जजों को ये पता नहीं कि न्यायपालिका के पास कोई कानून बनाने का अधिकार नहीं होता. हां. उसे सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के आधार पर न्याय प्रक्रिया को अंजाम दिए जाने का ही अधिकार प्राप्त है. यह भी कि यदि न्यायपालिका किसी पारित कानून की समीक्षा करके सरकार को अपनी राय से अवगत करा सकती है किंतु यह जरूरी नहीं कि सरकार उस सुझाव को मानने के लिए बाध्य ही हो.
न्यायाधीश काटजू ने कहा कि संविधान के तहत अधिकारों का व्यापक विभाजन है और इसीलिए राज्य की एक इकाई को दूसरे के अधिकार क्षेत्र में दख़ल नहीं देना चाहिए. न्यायपालिका को विधायिका अथवा कार्यपालिका की जगह नहीं लेनी चाहिए. न्यायाधीश काटजू का विचार है कि अधिकारों के विभाजन का कड़ाई से पालन होना चाहिए. न्यायपालिका को विधायिका एवं कार्यपालिका के क्षेत्र में दख़ल नहीं देना चाहिए. वहीं जस्टिस गांगुली के मुताबिक़, अधिकारों का पूर्ण विभाजन न तो मुमकिन है और न ही व्यवहारिक. साथ ही संविधान निर्माता यह कभी नहीं चाहते थे कि अधिकारों के बंटवारे को लेकर तानाशाही रवैया अपनाया जाए.
संविधान सभा के विद्वान सदस्य ए कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा था कि वैयक्तिक स्वतंत्रता की हिफाजत एवं संविधान के सही क्रियान्वयन हेतु एक स्वतंत्र न्यायपालिका की आवश्यकता है, परंतु न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत को इस हद तक नहीं बढ़ाया जाए कि न्यायपालिका उच्च-विधायिका या उच्च-कार्यपालिका के रूप में कार्य करने लगे. स्पष्ट है कि नियंत्रण के प्रावधान के अभाव में इस तरह की आशंका का उसी वक्त अनुमान लगा लिया गया था पर कुछ सदस्य न्यायपालिका द्वारा दूसरे अंगों के अधिकारों के अतिक्रमण की कल्पना भी नहीं करते थे. संविधान सभा के सदस्य केएम मुंशी ने साफ तौर पर यह कहा था कि न्यायपालिका कभी संसद पर अपना प्रभुत्व नहीं थोपेगी. और संविधान की मूल भावना के अनुसार विधायिका और न्यायपालिका को एक दूसरे के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए एक दूसरे के अधिकारों के अतिक्रमण से बचना चाहिए.
इस हालत में नैनीताल हाईकोर्ट की दखलांदाजी को किस दृष्टिकोण से देखा जाय? प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से इस तमाशे में राजनीतिक ड्रामे की बू भी आती है. लगता है कि पहले तो सरकार ने अपने ही कुछ लोगों से सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका के जरिए एसटी/एसटी एक्ट को कमजोर बनवाया गया. और जब सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के विरोध में देशव्यापि आन्दोलन हुआ तो 09.08.2018 दलितों द्वारा आयोजित सामाजिक आन्दोलन को ठंडा करने लिए भाजपा ने भाजपा के दलित सांसदों को मैदान में उतार दिया. परिणाम ये हुआ कि एससी/एसटी एक्ट को इसके असली रूप को बनाए रखने व सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से संसद में विधेयक पारित करवाया, जिसे राष्ट्रपति द्वारा मंजूरी प्रदान कर दी गई. सरकार के इस कार्य का सरकार द्वारा दलित वोटों को अपने हक में करने के सर्वत्र व्यापक तौर पर प्रचार – प्रसार किया गया. विरोध लगभग थमा ही है कि फिर से सरकार के निर्णय के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट को कमजोर करने के लिए नैनीताल हाई कोर्ट में जनहित याचिका डलवा दी गई. क्या इसमें सरकार की सहमति नहीं हो सकती? यदि नहीं तो इस प्रकार की सरकार विरोधी जनहित याचिकाओं के डालने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? इस प्रकार तो सरकार और राष्ट्रपति की कोई गरिमा ही नहीं जाती…. यह अति गंभीर मामला है.  एससी-एसटी एक्ट न हुआ सांप-सीढ़ी का खेल हो गया.]
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