सबरीमाला और महिलाएं

मेरे कई पाठक/पाठिकाओं ने मुझे मैसेज करके कहा की मुझे सबरीमाला विवाद पर लिखना चाहियें. पर मैं सोचता हूँ मेरे लिखने या न लिखने से क्या होगा? वैसे हुआ तो कुछ सबसे बड़ी अदालत के लिखने के बाद भी नहीं. खैर लिखने या कहने से होता भी क्या हैं..?

कहने को तो वो कहते थे की हम सब एक हैं. वो कहते थे लड़के-लड़कियों को बराबर पढ़ाओ.
वो कहते थे मंदिर में भगवान रहते थे और वो ये भी कहते थे कि भगवन की नज़र में सब एक हैं.जो बस आपको आपके कर्मों से तोलते हैं.

फिर अचानक वो कहने लगे लड़कियाँ बचाओं, उन्हें गर्भ में मत मारों, लड़कियाँ पढ़ाओं, फ्री में पढाओ, एक ही बेटी है तो बाल्टी भर योजनाओं का लाभ उठाओ. फिर उन्होंने तैंतीस परसेंट आरक्षण तक दे दिया. फिर एक दिन उसके साथ बुरा हुआ तो वो सड़क पर आ गए एक मोमबत्ती लेकर और इन्साफ की मांग की. हम तो सिर्फ इतना जानते थे कि व्रत रखना, भगवन की पूजा करना, चौथ से लेकर एकादशी तक सब के सब नारी के हिस्से हैं, उन्ही के बस में है, उन्ही के लिए बने हैं. पर नहीं साहब, नहीं..!! माफ़ करें ज़िन्दगी हर कदम एक नई जंग है. फिर एक दिन पता चला कि साहब अभी तो कुछ हुआ ही नहीं. नारी के नाम पर इतना ढोंग रचने वाले वो और उनका समाज सिर्फ आईआईटी का फॉर्म फ्री करवा पाया है, और कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. यकीन मानिये एक औरत कढ़ाई में तेल डालते ही खाने को स्वादिष्ट बना देती है, एक माँ ही सिर में तेल डाल थके हुए दिमाग को ताज़गी दे सकती है, जब शनि देव घर आते थे तो माँ ही तेल डालकर एक-दो रूपए दान देती थी, हमे तो समझ ही नहीं आया ये सब आज तक. पर फिर उधर वो कहते हैं नारी ने तेल डाल दिया है शुद्धिकरण करो. अरे साहब! तेल तो वही था सरसों का था कि रिफाइंड, इस से एक बार को फिर भी फ़र्क़ पड़ सकता है? वो कहते हैं जिस महिला को पीरियड्स होता है उसके मन्दिर में घुसते ही मन्दिर अपवित्र हो जाएगा. सब खत्म हो जाएगा. महिला के घूसते ही दरगाहें कब्रगाह बन जाएँगी.

और एक दिन कानून की मोटी मोटी किताबों में दबा खुद कानून नींद से जागा और उसने कहा : “कानून कहता है कि स्त्री पुरुष सब एक समान. स्त्रियों को मन्दिर जाने से कोई नहीं रोक सकता “

क्या समाज बदल गया है? या हम बदल गए?

नही !उस देश में औरत का रुतबा कैसे बुलंद हो सकता है.जहाँ मर्दों की लड़ाई में गालियां मां -बहन को दी जाती है.
बीते कई दिनों फिजाओं में शोर हैं, लाख कान बंद करो पर ये शोर छन छन के पर्दों को फाड़ रहा हैं.
शोर का नाम हैं “ केरल के सबरीमाला मन्दिर में एक उम्र की लडकियों या महिलाओं का प्रवेश. “ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी किसी महिला का प्रवेश मन्दिर में नहीं हो सका. बड़ी आसानी से कानून, समानता, इन्सनित जैसे शब्द हार गये और धार्मिक प्रोपोगंडा जीत गया.और ये उसी देश में हुआ जहां हम स्त्री को देवी रूप में पूजते हैं.

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… इस व्यवस्था के समर्थक ये तर्क दे रहे है की ये परम्परा सदियों से चली आ रही है, इस लिए इसका निर्वहन जरुरी है. मासिक धर्म के समय मन्दिर में प्रवेश से मंदिर की पवित्रता खत्म हो जाएगी. और हजारो मन्दिर भी तो हैं जहां महिलाएं आसानी से जा सकती है तो उन्हें सिर्फ सबरीमाला ही जाना जरूरी है क्या?

सच कहूँ आपके सदियों पुराने सड गल चुके धर्मों ने या आपके कथित देवताओ, अल्लाह,यीशु,पैगम्बरों और संतो ने ( इंद्र से ले कर आशाराम और रामपाल तक, मौलाना से लेकर पॉप तक ) महिलो के साथ साथ हमेशा दोयम दर्जे का व्यवहार किया है. तो अब जब हम 21वी सदी में खड़े है तो थोडा तार्किक बनिए, सालो पहले अपने ऊपर लाद दी गयी फालतू की मान्यताओ ( वैसे पागलपन ज्यादा अच्छा शब्द है ) से बहार निकालिए. सोचिये जिस सनातन के नाम पर ये कर रहे है उसका मूल क्या हैं? आपके सनातन धर्म ने ही सदियों से चली आ रही रुढियों को थोड़ा है, चाहे वो सती प्रथा हो या बालविवाह या विधवा विवाह.

मंदिर के बाबाओ ( मैनेजरों, माफियाओ ) को समझना होगा की जब हमारा संविधान स्त्री और पुरुष में कोई फर्क नही करता तो आपकी आँखों में सिर्फ और सिर्फ परमात्मा की भक्ति होनी चाहिए, स्त्री या किसी समुदाय के लिए भेदभाव नही.

इस विषय में सबसे शर्मनाक बात हैं, मंदिर प्रवेश को महिला के मासिक धर्म से जोड़ देना. मैं कभी नहीं समझ पाता हूँ की एक स्त्री जो देवी का रूप है वो एकदम से महीनों के कुछ दिनों के लिए अछुत सी क्यों हो जाती हैं? ये तो एक सामन्य शारीरिक प्रक्रिया भर हैं, जिसकी वजह से ही हम और आप इस दुनियां में आ सकें हैं. तो एक शारीरिक प्रकिया के लिए किसी इन्सान से ये भेदभाव क्यों?तो क्यों हम उन दिनों में स्त्री को उ देवी तो क्या इंसान तक नहीं समझते हैं. जिस वजह से हमारा वजूद है हम क्यों उस पर ही सवाल उठाते हैं?
धर्म के नाम पर अपना लंगोट कस कर मर्दानगी दिखाने वाले सिर्फ एक दिन उस दर्द और उलझन को जी कर देखिये जिसे स्त्रिया हर महीने सालों साल जीती हैं.
लेकिन मैं ये भी जानता हूँ की ये समझने और होने में अभी वक्त लगेगा.

सच बात तो ये है कि महिलाएं पुरुषों से अधिक धर्मभीरू होती है. किसी भी धर्मिक आयोजन में महिलाओं की संख्या देख आसानी से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता हैं. और अपनी इसी धर्मभीरुता की वजह से वो धर्मिक शिकारियों की आसान शिकार होती हैं. वो खुद महीनों के उन दिनों में खुद को अलग सी कर लेती हैं, वो अपने घर के मन्दिर तक नहीं जाती हैं. तो भला वो वहाँ क्यों जायेंगी जहां उन्हें मालुम की इस अवस्था में नहीं जाना हैं.

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पर जरा सोचिये कोई महिला पूरे साल आपके और आपके बच्चो कि सलामती की लिए उपवास रखे ( भले ही आप बाहर मुर्गा उड़ाते रहे हो ), पूजा करे और जब आप उसके साथ इस मंदिर में जायेगे तो उसे बाहर बैठना पड़े, वो भी इस लिए की वो एक अपवित्र महिला है और आप पीला कपडा पहन कर अंदर जाने का टिकट थाम ले क्युकी आप पवित्र पुरुष है.

हाँ, ये सच है की सबरीमाला में प्रवेश की अनुमति मिल जाने के बाद भी बहुत कुछ नहीं बदलने वाला. अभी वो कोख में मारी जायेंगी,हर दिन उनका रेप होगा, हर दिन उनकी बोली लगेगी, कभी इज्जत, कभी दहेज, कभी दंगे कभी युद्ध के नाम पर मारी जाएंगी. कुछ भी नहीं बदलेगा कुछ वैसे ही जैसे शनि शिंगणापुर प्रवेश के बाद कुछ नहीं बदला.
या शायद कुछ बदले भी…!!लेकिन क्या आपको नहीं लगता है की धर्म की आड़ पर बनाई गयी इन बेहूदा दीवारों का गिरना आवश्यक हैं? आवश्यक है इंसान इंसान होना.

मेरा हर धर्म के ठेकेदारों से एक ही सवाल है की क्या आपका धर्म इतना कमजोर है की किसी के छू देने से, पूजा कर देने या उसके के बारे में कुछ सच बोल देने से, उसके कार्टून बना देने से वो गिर जायेगा,खत्म हो जायेगा???
..

और यदि ऐसा है तो माफ़ करियेगा हमे आपके धर्म की कोई जरूरत नही है. तुम्हारी है तुम ही सम्हालों ये दुनियां.

डॉ. सिद्धार्थ

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