जीत पक्की है, बस लड़ाई शुरू करना है

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vemulaरोहित ने आत्महत्या कर ली है. रोहित होनहार छात्र था, आम्बेडकरवादी था, बावजूद उसने आत्महत्या कर ली, इस बात से मैं परेशान हूं. तमाम लोग रोहित के जाने को शहादत मान रहे हैं, मैं उसे लड़ाई से भागना मान रहा हूं. हो सकता है कि वो ज्यादा परेशान हो, लेकिन रोहित के साथ निकाले तो चार अन्य छात्र भी गए थे. वो तो लड़ रहे हैं. फिर आखिर रोहित ने क्योंकर हार मान लिया. हालांकि मेरा इस बात पर भी संदेह है कि रोहित ने आत्महत्या की है. इस तथ्य को मैं शक की नजर से देख रहा हूं.

तमाम लोग कह सकते हैं कि दलित समाज पर काफी जुल्म होते हैं और रोहित उसी जुल्म का शिकार हुआ है. जो लोग सिर्फ दलित समाज की बेहाली का रोना रोते हैं, उनसे मुझे हमेशा से चिढ़ रही है. आप लोगों ने भी कभी न कभी इस कहावत को सुना होगा कि “यह देखने वाले पर निर्भर करता है कि गिलास आधा खाली है या फिर आधी भरी हुई.” मैं हमेशा से ही गिलास के आधे भरे हिस्से को महत्व देता हूं. शायद यही सोच काम करने की ताकत भी देती है. जब कोई मुझसे यह कहता है कि वंचित और शोषित समाज की स्थिति काफी बुरी है तो उसके जवाब में मैं यह कहता हूं कि हजारों साल की गुलामी के बाद महज 7 दशक में ही जो समाज प्रताड़ित करने वाले समाज को चुनौती देने की स्थिति में आ जाए वह कमजोर कैसे हो सकता है.? मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सब कुछ ठीक हो गया, लेकिन मैं ठीक होने की गति को देखकर काफी आशान्वित हूं.

मैं इस स्थिति को बहुत बड़ा अजूबा मानता हूं. यह वंचित समाज की मेहनत, कमर्ठता और जिद्द है, जिसके बूते वह तेज गति से आगे की ओर दौड़ रहा है. देश की अर्थव्यवस्था, शिक्षण केंद्र, राजनीति और न्याय व्यवस्था में जन्म से ही आरक्षण लेकर पैदा हुए देश की आबादी में मौजूद ‘मुट्ठी भर’ लोगों ने जिस तरह सत्ता के तमाम केंद्रों पर कब्जा किया हुआ है, वहां पहुंच कर उन्हें चुनौती देने का जज्बा यही वंचित समाज दिखा रहा है. दलित अत्याचार के विरोध को लेकर भी यही स्थिति है. हर रोज घटने वाली अत्याचार की घटनाओं के बीच अब सबकुछ चुपचाप सहने की बजाय जिस तरह लोग विरोध में सामने आ रहे हैं, वह भी गौर करने वाली बात है. हालांकि विरोध का स्तर अभी और तेज होना है और मेरा मानना है कि जैसे जैसे यह समाज शिक्षित और आत्मनिर्भर होगा, विरोध का स्तर जरूर बढ़ेगा.

देखने में यह भी आ रहा है कि दलित अत्याचार के खिलाफ अब लोगों ने संगठित होकर लड़ना शुरू कर दिया है. हाल ही में मध्यप्रदेश की सड़कों पर ‘मेघ सेना’ के सैकड़ों लोगों ने संगठित होकर रोड शो के द्वारा अपनी ताकत का प्रदर्शन किया. आने वाले दिनों में इस संगठन का प्रभाव देखना बाकी है. लेकिन इस संगठन ने ‘दलित पैंथर’ की याद को ताजा कर दिया है, जिसने एक समय में नामदेव ढ़साल की अगुवाई में महाराष्ट्र में सामंतवादियों में दहशत पैदा कर दिया था. तमाम मौकों पर देश के अन्य हिस्सों में सक्रिय अन्य संगठनों की बात सामने आती रहती है. यानि आज का युवा एकजुट हो रहा है. जो विरोध करने की स्थिति में है, वह विरोध कर रहा है और जो नहीं है वो छटपटा तो जरूर रहा है.

एक छटपटाहट बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर के विरोधी विचारधारा वाले लोगों में भी है. इस छटपटाहट की वजह यह है कि जैसे जैसे बाबासाहेब के लोग मजबूत होंगे, विरोधी विचारधारा के लोग कमजोर होंगे. शह मात के इसी खेल में बाबासाहेब के विरोधी अब अपने मुंह पर बाबासाहेब का मुखौटा पहनकर उनके अनुयायियों के बीच जा रहे हैं. सिक्के जारी करने से लेकर सेल्फी तक खिंचाई जा रही है. और ‘फिक्की’ से आगे निकलने की होड़ में जो बड़े-बड़े उद्योगपति अभिभूत दिख रहे हैं वो कुछ दिन पहले तक किसी ‘दूसरे’ दरवाजे पर भी यूं ही हाथ बांधे खड़े थे. खैर यह उद्योगपतियों की फितरत होती है और पैसा कमाना उनका अधिकार. खैर, किसी के ‘अधिकार’ पर ऊंगली उठाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. लेकिन आम अम्बेडकरवादी को सचेत करना भी जरूरी है. आने वाले दिनों में यह सब और बढ़ने वाला है. वजह उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा के चुनाव है, जहां सीधे सीधे बाबासाहेब के अनुयायियों और बाबासाहेब के विरोधियों के बीच मुकाबला होना है.

एक बार फिर गिलास के आधा भरे हिस्से की बात. यह खुशी तो देता है लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि यह कहीं न कहीं स्थिर जैसा है. देश के विभिन्न हिस्सों से एकजुटता की खबर तो आ रही है. सफलता और संघर्ष की कहानियां भी सुनने को मिलती है लेकिन यह प्यासे के मुंह में पानी की कुछ बूंद जैसा है. यहां सफल और आत्मनिर्भर लोगों का दायित्व बनता है कि वह समाज के पिछड़े हिस्से को आगे लाने में अपनी भागीदारी निभाए. यह एक और तरीके से लाई जा सकती है. देश और विभिन्न प्रदेशों में बाबासाहेब की विचारधारा वाले राजनीतिक दल को सत्ता में लाकर इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जा सकता है. ध्यान रखने की बात यह है कि डॉ. अम्बेडकर को मानने वालों को एकजुट रहना होगा. क्योंकि जिस विचारधारा को बाबासाहेब वर्षों पहले खारिज कर चुके हैं, वह कभी हमारी हितैषी नहीं हो सकती. बाबासाहेब के सिपाहियों को चाहिए कि वो सिक्के और सेल्फी में ना फंसे. ‘शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, जाल में फंसना मत.’ मुझे यकीन है कि बचपन की यह कहानी भ्रम को दूर करने के लिए काफी होगी.

अशोक दास

अशोक दास

बुद्ध भूमि बिहार के छपरा जिले का मूलनिवासी हूं।गोपालगंज कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक (आनर्स) करने के बाद सन् 2005-06 में देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान, जेएनयू कैंपस दिल्ली’ (IIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा। 2006 से मीडिया में सक्रिय। लोकमत, अमर उजाला, भड़ास4मीडिया और देशोन्नति (नागपुर) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। पांच साल तक कांग्रेस, भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दलों, विभिन्न मंत्रालयों और पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग की।
'दलित दस्तक' मासिक पत्रिका के संस्थापक एवं संपादक। मई 2012 से लगातार पत्रिका का प्रकाशन। जून 2017 से दलित दस्तक के वेब चैनल (www.youtube.com/c/dalitdastak) की शुरुआत।
अशोक दास

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