गैर दलित आलोचकों का असली चेहरा

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जिस जाति अथवा समाज का साहित्य नहीं होता, वह जाति मृत समान ही होती है. वैसे भी हमारे देश में पहले से ही दलितों का लिखा कोई साहित्य नहीं है. वर्ण-व्यवस्था के अनुसार भारत के दलितों को पढ़ने-लिखने का कोई अधिकार ही नहीं था. अतः हमारा कोई साहित्य भी नहीं था. समाज के उत्थान का कोई प्रेरणा-स्त्रोत होता है तो वह उसका अपना साहित्य ही होता है. दलित समाज का जो थोड़ा बहुत साहित्य था वह मौखिक साहित्य था. लिखित साहित्य के अभाव में समाज कोई प्रेरणा नहीं ले सकता. अतः समाज का अपना साहित्य होना अति आवश्यक है.
दलित समाज या कहें अछूत समाज कहे जाने वाले लोगों के समाज का साहित्य कोई गैर  दलित तो लिखने से रहा. यदि लिखेगा भी तो उसकी निष्ठा पर सवाल हमेशा बना रहेगा, क्योंकि गैर-दलित लेखकों ने हमेशा से दलित-साहित्य और इतिहास से छल-कपट ही किया है. गैर दलित लेखकों ने हमेशा से अपने गप्पी साहित्य और पराजित इतिहास के गीत ही गाए हैं. दलित समाज के साहित्यकारों, महापुरुषों व वीर और वीरांगनाओं के नामों को हम गैर दलित लेखकों व साहित्यकारों ने पुस्तकों के पन्नों से गायब ही नहीं किया बल्कि उनका चरित्र-चित्रण तक बिगाड़ कर रख दिया है. यदि उदाहरण गिनाने लग जाऊं तो कागज ही कम पड़ जाएगा.
देश की आजादी के पश्चात दलितों के मुक्तिदाता डॉ. भीमराव आम्बेडकर जी के अथक प्रयासों के बाद देश के तथाकथित निम्न जातियों को शिक्षा प्राप्ति का अवसर प्राप्त हुआ. परिणाण स्वरूप अब शिक्षित व्यक्तियों का कर्तव्य बनता है कि वे अपनी शोधपरक दृष्टि से अपने समाज के साहित्य का सृजन करें. जैसे-जैसे शोध कार्य आगे बढ़ेगा, नई-नई विषय सामग्री का समावेश होगा. अतः लेखन ही साहित्य सृजन की पहली कसौटी है.
गैर- दलित पत्र-पत्रिकाओं के साथ अब दलित समाज की पत्रिकाओं ने दलित रचनाकारों को पूरे मनोयोग के साथ प्रकाशित करना शुरू कर दिया है. अतः इन पत्रिकाओं के सम्पादकों ने अपने-अपने मंच प्रदान करके दलित-साहित्य का पूरी लगन के साथ प्रचार-प्रसार किया है. यह खुशी की बात है कि अब दलित-समाज की महत्वपूर्ण पत्रिकाएं सामने आ रही हैं और दलित लेखक उनमें खूब प्रकाशित भी हो रहे हैं. अब दलित लेखकों को गैर-दलित लेखकों का मुंह ताकने की जरूरत नहीं है. रही उनके स्तर की बात तो जब दलित पत्र-पत्रिकाओं में स्तरीय रचनाएं प्रकाशित होना शुरू हो जाएंगी तो स्तर अपने आप बन जाएगा. यह हम दलित लेखकों की कमी है कि हम में से अधिकतर लेखक यही चाहते हैं कि हमारी रचना किसी चर्चित या नामी-गिरामी पत्रिका में ही प्रकाशित हो. लेकिन जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह लेखक निराश और हताश होकर कलम उठाकर एक ओर को रख देता है. यह दलित लेखन के विकास के लिए कतई भी उचित नहीं है.
इसी प्रकार गैर-दलित आलोचकों द्वारा जब कभी दलित लेखकों के लेखन की झूठी तारीफ या प्रशंसा कर दी जाती है तो ये दलित लेखक गुब्बारे की तरह फूल जाते हैं और उनके अंदर हवा भर जाती है. वे भूल जाते हैं कि सच्ची और अच्छी आलोचना अपने ही करते हैं. दूसरे गैर-दलित आलोचक तो झूठी प्रशंसा करके अपनी साहित्यिक रोटियां सेकते रहते हैं. ऐसे गैर- दलित आलोचक कभी भी अपनी कलम की पैनी नौंक घुसेड़ कर गुब्बारे की हवा निकाल कर पल भर में ही फुस्स कर देते हैं. असली मान-सम्मान अपनों से ही मिलता है. अभी कुछ महीने पहले हिन्दी के एक गैर-दलित आलोचक ने केरल में जाकर एक कार्यक्रम में कहा कि वह ही हिन्दी दलित साहित्य का बड़ा और मुख्य लेखक है.
वह हिन्दी दलित लेखन का ‘मेन्टर’ है. उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए यहां तक कहा कि वह हिन्दी के दलित लेखकों की रचनाएं ठीक-ठाक करके पत्रिकाओं में प्रकाशित करवाने हेतु प्रेषित करता है. हिन्दी के दलित लेखकों को तो कुछ आता ही नहीं है. वैसे कुछ हिन्दी के दलित लेखकों ने जो बेचारे छपास के भूखे हैं सचमुच में इस बामन को लेखन में अपना अधिनायक माना हुआ है. मैं इन दलित लेखकों को समझा-समझा कर थक गया हूं, लेकिन इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती. इन दलितों की कोई भी गोष्ठी उसके बिना मजाल है पूरी हो जाए. मैं समझ गया हूं कि ऐसे दलित (छपास के भूखे) लेखक अफनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे और धीरे-धीरे आदरणीय डॉ.  धर्मवीर की बात को सही साबित करके रहेंगे कि एक दिन ‘दलित लेखक संघ’ ‘गैर- दलित लेखक संघ’ बनकर रह जाएगा. हिन्दी के इस गैर-दलित आचोलक ने कुछ महीने पहले मुंबई के एक साहित्यिक कार्यक्रम में भी इसी प्रकार शोर मचाया था. उस समय इस सूचना पर मैंने ज्यादा ध्यान देना उचित नहीं समझा. लेकिन अब जो केरल में हुआ, वह तो बर्दाश्त से बाहर है. धुंआ तभी उठता है जब सचमुच में आग लगती है. कुछ दिनों बाद मुझे ज्ञात  हुआ है कि यह वही गैर-दलित आलोचक है जो कई वर्ष पहले डॉ. धर्मवीर, ओमप्रकाश वाल्मीकि और मुझे आपस में लड़वाता रहा है. मैं समय रहते उसकी चालों को समझ गया और छिटक कर उससे दूर हो गया.
इसी प्रकार 18 फरवरी, 2018 के दिन एक दलित लेखिका के पत्र-संकलन पुस्तक का लोकार्पण का कार्यक्रम दिल्ली में ही था. फोन कर कार्यक्रम में मुझे भी आने को कहा गया. मैं कार्यक्रम में गया. इस कार्यक्रम में दलित लेखकों व बुद्धिजीवियों के अलावा गैर-दलित लेखक भी आए हुए थे. कार्यक्रम में मुझसे भी दो शब्द बोलने को कहा गया. अब मैं पुस्तक पर क्या बोलता, समय रहते पुस्तक मेरे पास पहुंची ही नहीं थी. हां, मुझे भीड़ का हिस्सा बनाने के लिए बुलाया जरूर था. जबकि गैर-दलित लेखकों/आलोचकों को कई दिनों पहले पुस्तक पहुंचा दी थी.  एक कहावत है… ‘घर का जोगी जोड़गा… आन गांव का सिद्ध’. खैर… उस कार्यक्रम में अब गैर-दलित आलोचक द्वारा कही बातों पर ध्यान देने की जरूत है. पुस्तक पर तो वह कम बोले लेकिन हिन्दी के दलित-लेखन पर कही गई उसकी टिप्पणियां देखिए. उसने टिप्पणी कि की, “ऐसा जान पड़ता है कि हिन्दी के दलित लेखन में अब ठहराव आ गया है… आगे नहीं बढ़ पा रहा.”
उस गैर-दलित लेखक की बातें सुनकर मैं हैरान होकर रह गया था. आज दलित साहित्य कहां से कहां पहुंच गया है. अब देश तो छोड़ो, विदेशों में भी इसकी खूब चर्चा है. हिन्दी के दलित लेखन की एक युवा पीढ़ी पूरी तैयारी के साथ लेखन के मैदान में आ चुकी है. यदि नाम गिनाने लग जाऊं तो कई महत्वपूर्ण युवा दलित लेखकों के नाम छूट जाने का डर है. और यह चौबे जी महाराज कह रहे हैं कि हिन्दी के दलित लेखन में ठहराव आ गया है. गलती इनकी कतई नहीं है, हम दलित लेखकों व दलित संस्थाओं की है जो बिना सोचे-समझे हम इन गैर-दलित आलोचकों को अपने साहित्यिक आयोजनों में बुला लेते हैं और मुखिया बनाकर मंचों पर बैठा देते हैं, फिर ये गैर-दिलत आलोचक दलित-लेखन के विषय में इधर-उधर की हांक कर चलते बनते हैं. ये गैर-दलित आलोचक यह भूल गये हैं कि हिन्दी के दलित साहित्य पर कार्य कर के ही इनकी सहायक प्रोफेसरों के पद पर नियुक्तियां हुई है. और आझ वे पूरी तरह से प्रोफेसरों के पदों पर कार्यरत है. धन्य हैं ऐसे बजरंगी और चौबे जी जैसे हिन्दी दलित-साहित्य के आलोचक जो दलित साहित्य के बारे में ऐसा सोचते या बोलते हैं. हमारे दलित लेखकों व उनकी संस्थाओं के पदाधिकारियों को भी न जाने कब सुध आएगी और उनसे छिटक कर कब दूर होंगे?
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