“आरक्षण से चयनित दलितों की क्षमता व उत्पादकता विषयक भ्रांति का वास्तविक मूल्यांकन”

आजकल सोशल मीडिया में आरक्षण से चयनित दलितों के संबध में उनकी क्षमता व दक्षता पर अति रंजित प्रचार प्रसार किया जा रहा है. अधिसंख्य लोंगों ने तो यहां तक अवधारणा बना ली है कि परीक्षा में 10% अंक पाने वाले दलित अभ्यर्थियों का इंजीनियरिंग व मेडिकल में दाखिला हो जाता है और ये लोग इंजीनियर डाक्टर बन जाते हैं. आरक्षण विरोधियों का मानना है कि आरक्षण कोटे से बने डॉक्टर मरीजों का क्या ईलाज करेंगे? ऐसे डॉक्टर मरीजों को मारेंगे ही. इसी प्रकार कोटे से बने इंजीनियर द्वारा निर्मित पुल तो गिरेगा ही, क्योंकि दलितों में योग्यता तो होती नहीं. वे ठीक से पढ़ना लिखना भी नहीं जानते. इस प्रकार की नकारात्मक सोच के चलते दलितों का हर पल मनोबल गिराने का प्रयास आज भी जारी है. डॉक्टर इंजीनियर ही नहीं किसी भी सेवा में अक्षमता और अयोग्यता के मनगढ़ंत दोषारोपण का सामना करना तो दलितों की चिरकाल से नियति बन चुकी है.

फेसबुक पर आरक्षण विरोधियों ने आरक्षण समाप्त कराने के लिए एक मंच बना लिया है औरसामान्य जाति के लोंगो को इसमें शामिल होने का आह्वान किया जा रहा है. ताकि पूरी शक्ति के साथ आरक्षण पद्धति का विरोध किया जासके. आरक्षण विरोधियों की समझ में आरक्षण के कारण दलितों के अयोग्य और अक्षम लोग तो नौकरियों में चुने जा रहे हैं, परन्तु योग्य और क्षमता सम्पन्न सामान्य जाति के लोग परेशान घूम रहे हैं. इन आरक्षण विरोधियों के मन में यह भी चिन्ता है कि केन्द्र सरकार द्वारा जो 15% आरक्षण “प्रेसीडेन्सियल आर्डर, 1950” द्वारा दलितों को अनुमन्य किया गया था, उसे भी वे अपने हिस्सा मानकर दलितों से क्षुब्ध प्रतीत होते हैं, जैसे कि देश की नौकरियों पर केवल उन्हीं का अधिकार हो. वे विगत हजारों साल से शत-प्रतिशत सरकारी सेवाओं पर काबिज रहे हैं. क्या हजारों साल मानवाधिकारों से वंचित समाज को यदि 70 वर्षों के स्वतंत्र भारत के कालखंड में कुछ सुविधाएं या संरक्षण संविधान में प्रवृत प्रावधान से मिल भी गयी तो ऐसा क्या अनर्थ हो गया, जो आरक्षण विरोधी इतना तिल मिलाए हुए हैं.

साथ ही यह भी आरक्षण विरोधियों को सोचना होगा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, केन्द्रीय मंत्रिमंडल, सभी राज्यों के मंत्रिमंडलों, आईएएस, आईपीएस, अन्य केन्द्रीय व राज्य सेवाओं, राज्यों के मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों देश के विभिन्न राज्यों के राज्यपालों तथा विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के पदों में सवर्ण लोगों की कितनी-कितनी संख्या है और इनके सापेक्ष वंचितों का प्रतिनिधित्व इन पदों पर कितना है? सब पदों के आंकड़ें रखकर तथ्यात्मक बात रखनी चाहिए न कि एक सिरे से सब मिलकर दलितों और पिछड़ों के आरक्षण को ही कोसना शुरु कर दें और प्रलाप करें कि यह तो सब कुछ गलत हो रहा है और उनके हिस्से के पद आरक्षण के कारण अक्षम और अयोग्य दलितों में बांटे जा रहे हैं.

यही नहीं, इस पर भी आरक्षण विरोधी बंधुओं को विचार करने की आवश्यकता है कि दुनियां के दूसरे देशों में सामाजिक न्याय के तहत भारत जैसी सुविधाएं या संरक्षण समाज के कमजोर तबकों को उपलब्ध है या नहीं? यहां विश्व के सबसे ताकतवर देश (अमेरिका) का उल्लेख करना समीचीन होगा. अमेरिका में जब यह अहसास किया गया कि अश्वेतों के साथ सामाजिक न्याय नहीं हो पा रहा है तो वहां सकारात्मक कृत्य (एफरमेटिव एक्शन) के द्वारा ऐसे वंचितों को सरकारी व निजी क्षेत्र की सेवाओं में कुछ संरक्षण व रियायतें देने का निर्णय लिया गया जो वहां सबको स्वीकार है,

इसी प्रकार द.अफ्रीका, मलेशिया व ब्राजील आदि देशों में भी अमेरिका की भांति ही वंचितों को एफरमेटिव एक्शन के द्वारा वहां के समाज ने विकास में सहर्ष सहभागिता दी है. लेकिन अत्यंत विडम्बना पूर्ण है कि भारत में सवर्णों में कुछ लोग (सभी सवर्ण नहीं) सदियों से सामाजिक न्याय से वंचित दलितों को न्याय मिलते देखना नहीं चाहते. इसीलिए आये दिन ऐसे लोग योग्यता व प्रतिभा के बहाने आरक्षण को समाप्त कराने के लिए सवर्ण समाज को लामबंद करने की गुहार लगाते रहते हैं. नि:संदेह उनका यह प्रयास सफल नहीं हो सकेगा, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 16(4) व 16(4-ए) द्वारा पिछड़ चुके अनु.जाति तथा अनु.जन जाति के लोंगो को जो आरक्षण अनुमन्य किया गया है, वह संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों के संवर्ग में आता है. सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार मौलिक अधिकारों में संशोधन या इन्हें रद्द करने का अधिकार किसी को नहीं है. लेकिन लगता है जानकारी के अभावमें आरक्षण विरोधी अकारण हो हल्ला मचाए हुए हैं.

कदाचित आरक्षण विरोधियों के परिज्ञान में यह भी नहीं है कि दलित/वंचित वर्ग की आर्थिक स्थिति आरक्षण केलिए प्रासंगिक नहीं है. वंचित वर्ग को आरक्षण उनके आर्थिक पिछड़ेपन के कारण नहीं मिला हुआ है, बल्कि यह उनके“सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन” को दृष्टिगत रखकर संविधान में प्रवृत्त किया गया है. इस पिछड़ेपन का प्रमुख कारण समाज में प्रचलित जातिगत भेदभाव को माना गया है. नि:संदेह जब तक भारतीय समाज जातीय विद्वेष से ग्रसित रहेगा, कदाचित आरक्षण को समाप्त करना संभव नहीं होगा. कुछ यही विचार रा.स्व.संघ सहित अन्य समाजसेवी संस्थाओं व राजनीतिक दलों का भी है.

शायद आज की पीढ़ी के लोग यह भी जानने की जिज्ञाशा नहीं रखते कि जाति प्रथा का दंश वंचित तबके के लोग विगत लगभग तीन हजार वर्षों से झेल रहे हैं. समाज ने इनके ऊपर इतने जुल्म ढाये हैं कि सुनकर ही आदमी के रोंगटे खड़े हो जायें. प्रबुद्ध लोग जरा विचार करके देखें कि कितनी प्रताड़ना, अन्याय व मानवाधिकारों से वंचना के दुर्दिन दलितों ने हजारों साल देखे. क्या यह ईश्वर का बनाया कानून हो सकता है? जिसमें दलितों को न शिक्षा काअधिकार हो, न संपत्ति रखने का अधिकार हो और यहां तक कानून हो कि सवर्ण जब चाहें दलितों की संपत्ति लूटसकते हैं.इस अन्याय पूर्ण व्यवहार पर उस समय का शासनतंत्र इनकी रक्षा बिल्कुल नहीं करता था. इसी कारण हजारों वर्षों तक इस वर्ग ने भयावह प्रताड़ना और उत्पीड़न अपने ही सहधर्मियों के हाथों झेला है. तब जाकर इस अन्याय को चुनौति देने के लिए ईश्वर ने एक अंबेडकर पैदा किया. श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है कि:-

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत.
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्..
परित्राणाय साधुनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्.
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे..”

भावार्थ:-जब भी जहां धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है तब-तब मैं आता हूं. भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना के लि मैं हर युग में प्रकट होता हूं.

अत: ईश्वर का मनुष्य मात्र से यह वादा है कि जब भी पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ेगा, ईश्वर इस अत्याचार को समाप्त करने की चिंता स्वयं करेंगे या फिर ऐसे किसी महापुरुष को उत्पन्न करेंगे जो मनुष्य मात्र पर होने वाले अन्याय व उत्पीड़न का शमन कर सके. कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में डॉ० अंबेडकर दलित, वंचित वर्ग के परित्राण हेतु दलित घर में जन्म लेते हैं और उनके कष्टों का शमन करने के लिए प्रयास आरंभ करते हैं. डॉ० अम्बेडकर के अथक प्रयासों से वंचितों के नरकीय जीवन का अंत तो कुछ सीमा तक हुआ, लेकिन यह दलितों का दुर्भाग्य रहा कि जातीय विद्वेष की समाप्ति का जो सपना डॉ० अम्बेडकर ने संजोया था, उस सपने का अनुष्ठान पूर्ण होने से पूर्व ही वे संसार से महाप्रयाण कर गये. आरक्षण विरोधी लोगों का मत तो यह भी है कि देश से प्रतिभा पलायन भी बहुतांश में आरक्षण से तंग हो कर सामान्य वर्ग के युवक कर रहे हैं. यह बिल्कुल झूठ है. पलायन सरकारी नौकरी न मिलने के कारण नहीं, बल्कि निजीक्षेत्र में मिलने वाले हाई पैकेजेज के प्रलोभन में हो रहा है और दोष आरक्षण व्यवस्था के सिर मढ़ा जा रहा है. अस्तु, दलितों के विरुद्ध नकारात्मक सामाजिक अवधारणा के चलते और सहधर्मियों द्वारा इन पर बलताः थोंपी गयी आत्महीनता से दलितों को निस्तेज बनाने के प्रयास सदियों से होते रहे हैं. इसके बावजूद भी ये लोग संघर्ष करके अपनी कार्य दक्षता विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में भी यह दृष्टिगत रखकर बनाये हुए हैं कि कहीं इनकी नौकरी खतरे में न पड़ जाये. कुछ यही सोचकर ऐसी विकट छवि के संकट के बीच भी दलित अपनी क्षमता व दक्षता के सामंजस्य को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं. इन सभी परिस्थितियों की वास्तविकता की परख के लिए दिल्ली स्कूल आफ इकोनोमिक्स (दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली) के श्री अश्विनी देशपांडे और अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के श्री टॉमस ए वेस्काप्फ ने वर्ष 2010 में भारतीय रेल सेवा के आठ जोन के 1980 से 2002 के बीच के आंकड़े एकत्र करके आरक्षण से भर्ती हुए कर्मचारियों व अधिकारियों की दक्षता और उत्पादकता का अध्ययन किया है. यह पेपर इंटरनेट पर उपलब्ध है. वैसे इस भ्रांति पर कि क्या आरक्षण के कोटे से आये कर्मचारियों/अधिकारियों के आने से उत्पादकता और दक्षता बढ़ी है या घटी है? आम तौर पर इस विषय में अधिक अध्ययन नहीं हुआ है. अश्विनी देशपांडे व टामस की जोड़ी ने जो अध्ययन किया, उनके अध्ययन का निष्कर्ष चौंकाने वाला था. शोधकर्ताओं के अनुसार कोटे से आये लोगों से भारतीय रेल की उत्पादकता और दक्षता बढ़ी है घटी नहीं. जबकि इस विषय में दलितों के लिए आरक्षण विरोधियों ने बिल्कुल विपरीत अवधारणा बना रखी है.

यही नहीं, एनडीटीवी इंडिया के हृदयेश जोशी ने भी अपनी एक स्टोरी में कुछ ऐसा ही अनुभव बताया .कहा कि उनके पिता बीमार थे, वे ईलाज के लिए उन्हें भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स),नई दिल्ली ले गये. वहां जो चिकित्सकों की टीम उनके पिता का ईलाज कर रही थी, उस टीम में प्रोफेसर राजन सहित सभी डॉक्टर दलित ही थे. जोशी जी ने माना कि उन्हें यह देखकर पहले तो वैसा ही डर लगा, जैसी अवधारणा दलितों के विषय में समाज में बनी हुई है, क्योंकि बीमारी भी थोड़ा गंभीर ही थी. बाद में उनके पिता जब बिल्कुल ठीक हो गये तो प्रोफेसर राजन से हृदयेश जोशी ने उत्सुकतावश पूछा कि आप लोग सभी दलित डॉक्टर एक ही टीम में क्यों काम करते हो? तो उन्होंने कहा कि हम लोग अलग-अलग टीम में काम करेंगे तो सामान्य वर्ग के दूसरे डॉक्टरों की गलती भी हमारे सिर आसानी से मढ़ दी जायेगी. इसका अर्थ यह हुआ कि दलित वर्ग का कर्मचारी समाज की आरक्षण विरोधी मानसिकता के चलते कितना सतर्कता से काम करता है, फिर भी हर पल अक्षमता के दोषारोपण से कितना डरा रहता है.

जहां तक दलित छात्रों के विरुद्ध जातिगत भेद आधारित आक्रामकता का प्रश्न है, इसमें एक स्टोरी में एनडीटीवी इंडिया ने बताया कि नई दिल्ली में एक बहुत ही प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज है, जिसका नाम वर्द्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज है. इसके 35 छात्रों को फीजियोलॉजी के एक पेपर में जान-बूझकर कई वर्षों तक फेल किया जाता रहा, जबकि सामान्य जाति का एक भी छात्र इस पेपर में फेल नहीं किया गया. इनमें से 14 छात्र तो ऐसे थे, जिन्हें 4 से 14 बार तक फीजियोलॉजी के पेपर में फेल किया गया. यह सब कॉलेज प्रशासन द्वारा दलितों के प्रति उनकी अतिशय घृणा के परिणाम स्वरूप हुआ. इस अन्याय से विक्षुब्ध होकर 30 नवम्बर,2010 को 35 अनु.जा./अनु.ज.जा.के छात्रों ने राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग से इसकी शिकायत की. आयोग ने इसकी जांच भालचन्द्र मुंगेकर, पूर्व सदस्य योजना आयोग, जो राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके थे,को सौंप दी. उन्होंने जांच के बाद पाया कि कॉलेज प्रशासन ने जातिगत भेदभाव से छात्रों को फेल किया. इसी बीच छात्रों ने दिल्ली हाईकोर्ट से गुहार लगाई कि उनके साथ कॉलेज द्वारा परीक्षाओं में जातिगत भेदभाव से फ़ेल किया जा रहा है. हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद किसी स्वतंत्र एजेंसी से परीक्षा आयोजित करा कर मामले को निबटारा करने का निर्णय दिया. तद्नुसार छात्रों की परीक्षा दिल्ली हाईकोर्ट की निगरानी में कराई गयी और सभी छात्र फीजियोलॉजी के पेपर में उत्तीर्ण हो गये. इस पेपर में उत्तीर्ण घोषित होने पर भी इन छात्रों को द्वितीय वर्ष के छात्रों के साथ बैठकर पढ़ने पर भी आपत्ति की गई. किसी तरह कोर्ट के हस्तक्षेप से ही विवाद निपटा.

इस प्रकार दलित वंचित लोगों के विकास के रास्ते में लगातार अतिरंजित विचारधारा के लोग रोड़े अटकाने सेचूक नहीं रहे. जो देश 21 वीं सदी में विश्व मंच पर शक्ति सम्पन्न देशों की कतार में खड़े होने को आतुर है, उस भारतदेश में यदि वही तीन हजार वर्षों पूर्व की दलित वंचित विरोधी आक्रामक अवधारणा जारी रहेगी तो किस मुंह से हम अपने आपको प्रगतिशील कह सकेगें और क्या यह कदाचित वेद ऋचाओं से पुष्पित व पल्लवित उदात्त भारतीय संस्कृति की अद्वितीय अवधारणा “सर्वे भवन्तु सुखिन:”और “वसुधैव कुटुम्बकम” की अवमानना नहीं है? इस पर खुले दिमाग से हर भारतवासी को विचार करने की आवश्यकता है.

प्रेम चन्द्र छाछर,
ज्वाइंट कमिश्नर(से.नि.),
वाणिज्य कर विभाग,उ.प्र.,
पंजाबी कॉलोनी,नि.शिव मंदिर, धामपुर(बिजनौर)
Email- premc.chhachhar@yahoo.com

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