हिंदू त्यौहार और बहुजन समाज

Details Published on 31/10/2016 15:34:39 Written by Ashok Das


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अभी-अभी दस दिनों का दशहरा बीता है. मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि दुर्गा कौन थीं और उनका महिषासुर के साथ क्या संबंध था और राजा महिषासुर ने दुर्गा का क्या बिगाड़ा था जो उन्होंने उसे मार डाला. और मार भी डाला तो नौ दिनों का वह क्रम क्या था और उन नौ दिनों में क्या हुआ था? क्योंकि समाज के एक बड़े हिस्से से अब यह सवाल भी उटने लगा है. मैं यह भी नहीं समझ पाता कि दशहरे में रामलीला क्यों दिखाते हैं, जबकि होना यह चाहिए था कि दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिनों में जो हुआ था उसे लोगों को बतातें, तब जाकर दशहरा ज्यादा सार्थक होता. 


मैं तो महज यह पूछना चाहता हूं कि जो ''भक्तजन'' इन दस दिनों तक धूनी रमाए रहें आखिर उन्हें मिला क्या? क्या आपका धन बढ़ा, या फिर यश में वृद्धि हो गई या फिर रातों रात आपके सभी कष्ट दूर हो गए. यह सवाल इसलिए है क्योंकि हर काम करने के पीछे इंसान की कुछ मंशा, कोई चाहत तो रहती ही है. उन्हें सोचना चाहिए कि उन्हें क्या हासिल हो गया. मैं यह सवाल इसलिए भी उठा रहा हूं क्योंकि मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूं जो सालों से इन नौ दिनों भक्ति में आकंठ डूबते रहे हैं लेकिन आज भी वहीं हैं, जहा एक दशक पहले तक थे. जाहिर है कि इंसान की उन्नति मेहनत से होती है ना कि किसी औऱ तरीके से. 


ऐेसे ही आने वाले दिनों में दीपावली है. हिंदू धर्म के मुताबिक कथित तौर पर राम उस दिन अयोध्या लौटे थे तो दिपावली का पर्व मनाया जाता है. ठीक. मान लिया कि राम लौटे थे तो फिर लक्ष्मी को क्यों पूजते हो? वह अचानक से कहां से बीच में आ जाती है. तर्क करने पर लोग इसे साफ-सफाई से जोड़ कर देखने लगते हैं कि इसी बहाने घरों की ठीक से सफाई हो जाती है. इस तर्क पर बड़ी हंसी आती है; क्योंकि भारत इस मायने में अनोखा देश है जहां घरों की सफाई के लिए ''दीपावली'' और ठीक से नहाने के लिए ''होली'' का इंतजार किया जाता है. खैर, यह आपकी श्रद्धा है, आपकी भक्ति है, आपकी इच्छा है, लेकिन यह बताओ कि उस एक रात में कथित तौर पर ''धन की देवी'' के आगे रखे नोट दोगुने हुए या नहीं हुए?


अजब देश है भारत. यहां हर काम के लिए अलग देवता है. शक्ति के लिए अलग, धन के लिए अलग, ब्रह्मचर्य के लिए अलग, शादी कराने (अच्छा वर दिलाने) के लिए अगल, बारिश कराने के लिए अलग, पढ़ाई-लिखाई के लिए अलग, शुभ वाले अलग, अशुभ वाले अलग और तो और यहां भोग के लिए भी कामदेव जैसे देव हैं. और इतने सारे देवों के होने के बावजूद भारत गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूखा और बीमारी से बेहाल है. सवाल है कि जो लोग लाचार, बेरोजगार और बीमार है, क्या वो इस भगवान को नहीं मानते होंगे, फिर क्या आखिर इनके दुख क्यों नहीं दूर होते? सूखे से बर्बाद हुई फसलों को देख किसान रोज पेड़ों पर टंग जा रहे है फिर आखिर यह भगवान उन पर रहम कर उनके लिए बारिश क्यों नहीं कराता? शहीद भगत सिंह ने समाज में फैली इसी विषमता और गैरबराबरी को देखते हुए ईश्वर को मानने से इंकार कर दिया था और खुद को नास्तिक घोषित कर दिया था.


एक सवाल दलित/पिछड़े/आदिवासी समाज से है कि मंदिरों से लतिया कर भगा दिए जाने के बावजूद भी आप इसी ईश्वर को सालो से गोहराते रहे लेकिन देश का संविधान लागू होने से पहले करोड़ों भगवानों के इस देश में किसी इृकलौते ईश्वर ने भी आपके लिए रोटी, कपड़ा और मकान का जुगाड़ क्यों नहीं किया? आप गांवो के दक्षिण में पड़े सड़ते रहे, चमड़ा छीलते रहे, मैला, ढोते रहे, हल चलाते रहे, बेगार करते रहे, जूठन खाते रहे, बिन कपड़ों के रहे, बिना छत और बिस्तर के सोए, और यहां तक की गुलामी करते रहे तब चौरासी करोड़ ईश्वरों की यह फौज कहां थी? टीवी, बीवी, व्हाट्सएप और फेसबुक से वक्त नहीं मिले तो एक बार सोचिएगा जरूर और ऐसा भी नहीं है कि ये सवाल नए हैं और आप लोग जानते नहीं हैं बल्कि आपलोग शतुर्मुग हो गए हैं जो अपने सर को रेत में धंसा कर ऑल इज वेल के मुगालत में जी रहे हैं. 


बात बस इतनी भर है कि आपका भला किसमें है? तीर्थ करने में या फिर पढ़ाई कर नौकरी हासिल कर लेने में. क्योंकि आपकी जमीनों पर हजारों साल पहले किसी और ने कब्जा कर लिया है और आपके पास खाने भर का अनाज उगा लेने तक की जमीन नहीं है. दलित/पिछड़े/आदिवासी समाज में आपको सैकड़ों ऐसे परिवार मिल जाएंगे जिनकी पिछली पीढ़ी के सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद वर्तमान पीढ़ी वापस उसी अंधकार की ओर लौटने लगी है, यह इसलिए हो रहा है क्योंकि मेहनत के जरिए खुद को सबल बनाने की बजाय ज्यादातर युवा धर्म और देवताओं पर निर्भर हो आर्शिवाद के जुगाड़ में लगे हैं. बंधु, आपको न तो आर्शिवाद मिला है और न ही आगे मिलने वाला है. इसलिए बेहतर यह होगा कि किसी धाम की ट्रेन पकड़िए. आपका उद्धार मंदिर की सीढ़ियां चढ़ कर नहीं बल्कि उच्च शिक्षा के माध्य से नौकरी हासिल कर के होगा. और नौकरी मंदिरों में नहीं बंटती, शायद इसीलिए बनाने वालों ने ''नौकरी दिलाने वाले'' को ईश्वर को नहीं बनाया.



  • Comments(26)  


    Dharmesh kumar

    Karamkand mai uljhaye rakhna aur jhooti kahaniyon se apna varchasva banaye rakhna ...yeh siddhant Hai , unka jinhone varn-vyavastha mai swayam ko raja se bhi upper rakha ,sabse upper , apne Liye , braham-bhoj jaisa brahmastra banaa rakha hai !!! Phir bhi Mujhe lagta Hai Ki ,brahmin parampra , pittar-sattatmak Hai , aur sindhu ghati sabhyata ,jo ki Bharat Ki sabse purani khoji gayi sabhyata Hai , matra -sattatmak Hai ,brahmin sanskriti Istri aur shudra virodhi rahi hai , arthat devi-poojan , mool rup se , brahmin parampra nahi jaan padti Hai , jabse brahmin Sanskriti mai , tantra-vaad samil hua hai , tab se shudra aur istri ko kucch sthan mila Hai , kyonki brahmino ne jan jatiyon ke devi-devtao ko apnaya hai ..moorti puja ko apnaya Hai , bas farak itna hi Hai Ki , brahmino ne yagya ke sthan per , 64 Upchar poojan se , aam jan manas ko karamkand se Jode rakha ...


    UDHEY Gautam

    Sir very nice


    Rajesh Kumar

    Ours God Dr baba saheb ambedkar


    Raj

    Thanks


    Rameshwar Prasad

    I agree with you


    iphuman

    सम्पादकीय लेख ने पखण्डी समाज को झकझोर कर रख दिया है। बहुत खूब ऐसे ही क्रांतिकारी विचारों से जरूर वंचित समाज जागेगा।


    Sagar Kumar

    Yahi baat main baar baar ghar ke logo ko samjhata hoon. Magar har koi meri baaton ko andekha kar dete hai


    SUBODH DAS

    NAMASKAR SIR, Aapke ye prayas, aapke ye vichar, aapke ye pariwartan lane ka sangharsh, aapke ye soch, zaroor dalit/pichhare / aadiwasi sammaz me chetna layegi,. main aapke in vicharo se bahut hi prabhavit hoon........


    Chandra kiran singh

    Mr. Dass please change the name of dalit dastak , write mulniwasi national because dalit is not ours name


    Chandra kiran singh

    Mr. Dass please change the name of dalit dastak , write mulniwasi national because dalit is not ours name


    Rahul Neemia

    sir aap bilkul sahi kah rahe hai aapke sabhi kathan gaur karne layak hai hame in Devi devtao ne jatiwad or bhedbhav ke alawa kuchh nahi diya hame keval baba sahab ambedkar KO hi god mankar pujna chahiye


    umesh prasad

    BEHTAR EDUCATION SE HI AAP APNI DASHA SUDHAR SAKTEN HAI.


    Pratap Narain Gangwar

    Enlarge your views in the internet of society .


    Ramesh nirala

    Hamari Ladayi es pakhandwad se hamesa hi rahegi, lekin Afsos ki hamara padha-likha yuva varg bahut hi nalayak hai,,, jo samjhne ke bajay uljhna sahi manta hai,,,, "kismat ke naam jo Royega, wo apna sab kuchh khoyega."


    Haresh kumar chandra

    Please Enter Your Message महोदय आपके लेख मैने पढा आपकी सारी बाते सही हैपर आज लोक अन्थविश्वासियों क। बहुमत है लेकिन ठगने वाले एक नही कई हैं और अन्धविशवास के खिलाफ बोलने वालों की सख्य्।कम है ईस कारण यह लङाई कमजोर पङ जारही है hkchandra


    Ravi

    You are right sir


    Ravish kumar

    Very nic sir hum apke sath hai


    harish

    Apka lekh bahut hi jabrjast h yubao ko iesse seekh leni chahiye


    advocate R.K.Marwal

    सम्पादकीय लेख ने पखण्डी समाज को झकझोर कर रख दिया है। बहुत खूब ऐसे ही क्रांतिकारी विचारों से जरूर वंचित समाज जागेगा।


    prabhat kumar

    your thoughts are totally applicable &true.these helpful in awakening the dalit brothers.


    manoj kumar

    Plz make your aap on play store we will be very greatful to you .


    Sumedh

    अनेक कोटि साधुवाद ! Pl keep it up.


    jaswant rao

    Ab logho ko aghar ye na shamjh aaye ki ye dashra depaawli durgha pooja aur duniya bhar ke dhong adambar. Iss pravarti ko banaaye rakhne aur in brahmanvaadiyo ka posan ka shaadhan banthe he. Aur samaaj me gharo ki mahilaao ki maanshiktha ko jakdhe rahti he. Aur parivaar me apne andhvishvaas ko mahilaaho duvra felaathe he. Fir chahe bivi ho maa ho ya fir behen . Aghar hame ishe meethaana he tho mandirho me jaane aur dhongh adhambarho ka bhahiskaar karna hogha..........Jai bhim


    Kapil dev

    भगवान बुद्ध की एक सिद्धांत सम्यक् दृष्टि की सबको आवशयकता है । यह दृष्टि अपनाने से तथा बाबा साहब् की मूल मंत्र से ही हम लोगो का उत्थान निश्चित है। आपका लेख बहुत बढ़िया....जरी रखें


    jitendra

    very good


    Surendra Kumar

    Mai aapke Patrika me apne Bhim lekh, poem de sakta hu .


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