गुजरात से बदलाव की बयार…

Details Published on 13/08/2016 19:23:19 Written by Hitesh Chavda


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गुजरात के उना में मर चुकी गाय की खाल उतारने को लेकर दलित जाति के युवकों की पिटाई पर पूरा गुजरात उबल गया है. राज्य में घटी दलित उत्पीड़न की इस विभत्स घटना पर देश भर के दलितों में रोष है. इसने गुजरात में कोढ़ की तरह रिस रहे जातिवाद के सच को भी सामने ला दिया है. असल में गुजरात की सड़कों पर उतरे दलितों का यह गुस्सा एक दिन का गुस्सा नहीं है, बल्कि सालों से दलितों पर हो रहे अत्याचार की इंतहा हो जाने पर प्रदेश का सारा दलित समाज एक साथ सामने आ गया है. गुजरात में दलितों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के 116 गांवों में रहने वाले दलित समाज के लोग पुलिस प्रोटेक्शन में हैं. वजह, इन गांवों के दलितों को वहां के जातिवादी गुंडों से खतरा है. उना की घटना ने गुजरात के साथ ही देश भर में हो रहे दलित उत्पीड़न की घटनाओं को बहस के केंद्र में लाकर रख दिया है. उना में कथित गौरक्षकों द्वारा दलित युवकों की पिटाई के बाद फिर यह सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर दलित समुदाय के खिलाफ उत्पीड़न के मामले क्यों नहीं रुक रहे हैं? देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिन्होंने लोकसभा चुनावों के समय अपने आप को ''''अछूत'''' बताया था, आज उनके राज्य में ही दलितों-अछूतों को भरे बाजार में पुलिस के सामने पीटा गया. इन्हें आसानी से न्याय भी नहीं मिल पाया जिसके बाद न्याय के लिए इन्हें आंदोलन करना पड़ा.


पीड़ित युवकों का कहना है कि गाय मर चुकी थी और उसके मालिक ने उन्हें गाय को ले जाने के लिए बुलाया था, जिसके बाद दलित युवक वहां पहुंचे थे. मरी हुई गाय के मालिक ने भी इस बात की पुष्टी की थी. बावजूद इसके समाज के ठेकेदार और हिन्दू राष्ट्र की रक्षा करने को आतुर गुंडों ने पीड़ित युवकों की एक न सुनी और उन्हें बुरी तरह से पीटा. इस घटना को लेकर भी पुलिस की नींद तब टूटी जब इस घटना का विडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. सरेआम घटी इस घटना के बाद भी पुलिस ने एक सप्ताह बीत जाने के बाद तक सिर्फ 6 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. जबकि स्थानीय लोग 30-40 आरोपी के होने की बात कह रहे हैं. इस घटना से स्थानीय लोग इतने आहत हो गए कि दो दर्जन से ज्यादा युवकों ने इंसाफ मिलने में देरी के कारण जहर खाकर जान देने की कोशिश की जबकि एक युवक ने खुद को आग लगा ली. पूरे प्रदेश में बंद का ऐलान किया गया और पत्थरबाजी की गई.


दलित समाज के लोग इस घटना से इतने आहत थे कि उन्होंने ट्रकों में मरी हुई गायों को भरकर शहरों में फेंक दिया. यहां तक की सुरेन्द्र नगर कलेक्ट्रेट में इन गायों को उतार दिया गया और लोगों ने इसे नहीं उठाने की कसम खाई. मीडिया में मामला आने के बाद भी स्थानीय नेता और सांसद ने भी पीड़ित दलितों की सुध नहीं ली. हैरानी की बात यह थी कि इस घटना के दौरान ही संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ. लेकिन बहुजन समाज के तकरीबन 250 सांसदों में से किसी के खून में उबाल नहीं आया. तब बसपा प्रमुख मायावती ने अकेले ही इस मामले पर सरकार से मोर्चा लिया और मामले को राज्य सभा में जोर शोर से उठाया. बसपा के विरोध के बीच इस मुद्दे पर लगातार संसद की कार्रवाई रोकनी पड़ी. लेकिन अन्य दलों के दलित सांसदों की चुप्पी चुभने वाली रही. अनुसूचित जाति आयोग ने भी घटना को गंभीरता से लिया और गिर-सोमनाथ जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को फैक्स भेज कर घटना की शीघ्रता से जांच की मांग की. हालांकि देश भर में समरसता का संदेश देने वाले प्रधानमंत्री मोदी इस पर चुप ही रहे. ना कोई ट्विट ना कोई बयान. बाबासाहेब के इस स्वघोषित ‘भक्त’ को एक बार भी बाबासाहेब के लोगों का दर्द नहीं दिखा.


क्यों मारा गया दलित युवकों को

गुजरात के उना के समढ़ियाला गांव में बड़ा बाबूलाल सरवैया का परिवार रहता है, जोकि समाज द्वारा थोपे गए पेशे के मुताबिक पारंपरिक तरीके से मरे हुए पशु के चमड़े उतारने का काम करते हैं. 11 जुलाई को बाबूलाल सरवैया को फोन आया की पास के गांव में रह रहे नाजाभाई अहिर की गाय को शेर ने मार दिया है तो उसे ले जाए और अंतिम क्रिया कर दे. फोन के बाद बाबूलाल ने अपने बेटे और अन्य 3 लोगों को मरी हुई गाय को ले आने के लिए बोला. उनके बेटे सहित अन्य तीन युवक जब अपने गांव से दूर सुनसान इलाके में मरी हुई गाय का चमड़ा निकाल रहे थे; तब चार गाड़िया मौके पर आई. गाड़ी में से कुछ लोग उतरे और चिल्ला कर उन्हें गलियां देने लगे. उस समय चमड़ा निकाल रहे वशराम, रमेश, बेचर और अशोक को ये बोल कर मारना चालू किया की ''''सालों तुम लोग जिंदा गाय काट रहे हो''''? उसके बाद धर्म के स्वघोषित ठेकेदारों ने पाईप और लकड़ियो से चारों युवकों को बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया. दलितों ने गौरक्षक दल को बहुत बार बताया कि गाय पहले से ही मरी हुई है और गाय के मालिक ने हमें फोन करके के बुलाया है, लेकिन गौरक्षक दल ने उनकी कोई बात नहीं सुनी. पिटाई के कारण दो दलित व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गए और अन्य दो लोगों को भी काफी चोटें आयी.


पुलिस स्टेशन पर पुलिस वालों के सामने पिटाई होती रही, पर पुलिस नहीं आई

मनुवादी गुंडों का आतंक यहीं नहीं रुका. ये लोग चारों युवकों को ''''गौरक्षक गिर-सोमनाथ जिला शिव सेना- प्रमुख'''' लिखी हुई कार से बांधकर उना शहर में ले गए और पुलिस थाने के सामने पुलिस के सामने ही उनको लगभग 30 लोगों ने मारना शुरू कर दिया. दलित युवक रोते रहे और हाथ-पैर जोड़ते रहे लेकिन फिर भी बारी-बारी से लोग उनको पीट रहे थे. वहां पुलिस थाना था, पुलिस थी लेकिन कोई बाहर नहीं आया और किसी ने युवकों को नही बचाया. ये घटना मोबाईल के कैमरे में रिकार्ड हुई और वायरल हुई. घटना जैसे ही मीडिया तक पहुंची तब जाकर लोग इन युवकों को बचाने के लिए दौड़े.

 इस दलित दमन के विरोध में उना और गुजरात के कई क्षेत्रों में रैलिया और प्रदर्शन हुए तब जाकर पुलिस ने 6 लोगों को गिरफ्तार किया. अनुसूचित जाति आयोग को फैक्स के बाद सरकार ने पीड़ितों को मुआवजे का चेक दिया और राज्य सभा के दलित सांसद ने पीड़ितों से मुलाकात की. अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य राजू परमार का कहना है कि राज्य सरकार दलितों पर हो रहे अत्याचार को लेकर गंभीर नहीं है, इसी कारण राज्य में आए दिन दलितों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं. दलित युवकों ने बताया की जब हमें गाड़ी से बांधकर ले जा रहे थे तब पुलिस की एक गाड़ी रास्ते में मिली और पूछने के बाद भी उन्होंने आरोपियों को कुछ नहीं बोला औऱ न ही हमारी मदद की. जब इन्हें आरोपी पुलिस थाने के बाहर डंडों और पट्टे से पीट रहे थे, तब भी पुलिस खामोश रही. पीड़ित युवक के चाचा ने जब 100 नंबर पर पुलिस को फोन किया तब भी पुलिस घटना स्थल पर समय से नहीं पहुंची और इतनी बड़ी दुर्घटना हो गई. इस दुर्घटना की जिम्मेदार पुलिस प्रशासन और राज्य सरकार भी है.


समढ़ियाला गांव में मंदिर में नहीं जा सकते दलित 

गुजरात के समढ़ियाला गांव में तीन हजार लोग रहते हैं, जिसमें 250 पाटीदार परिवार और 25 दलित परिवार के लोग हैं, जबकि अन्य संख्या दूसरे अन्य समुदाय के लोगों की है. गांव में दलित मुख्य रूप से मजदूरी का काम करते हैं. गांव का सरपंच जोकि अन्य समुदाय का है उसने बाबूलाल सरवैया को छह महीने पहले भी धमकी दी थी. समढ़ियाला गांव की पंचायत में दलितों को कोई न्याय नहीं मिलता हैं. इस गांव में दलितों का मन्दिर में प्रवेश वर्जित है. यहां दलित किसी भी सार्वजनिक जगह का उपयोग भी नहीं कर सकते. इस गांव में दलितों की स्थिति अत्यंत दयनीय है, लेकिन दलित होने के कारण अन्य जाति का सरपंच भेदभाव कर के बीपीएल आदि में दलितों का नाम भी नहीं रख रहा और मोदी जी का हर घर शौचालय सपना इन पीड़ित दलितों के घर भी नहीं पहुंच सका है. गुजरात में 13 विधायक और तीन सांसद दलित हैं. एक राज्यसभा और दो लोकसभा से सांसद हैं लेकिन एक भी दलित नेता बाहर नहीं आया और उसने घटना का विरोध नहीं किया. किसी ने भी अपने मुंह से ये नहीं बोला कि युवकों को गाड़ी से बांधकर पीटा गया वो गलत हैं. और न ही उन्होंने कसूरवार लोगों को सजा दिलाने की बात की.


गुजरात के दलितों का हाल बेहाल

गुजरात के उना में हुई दलित अत्याचार की घटना ने पूरे देश में गुजरात की सुरक्षित राज्य की प्रतिष्ठा की पोल खोल दी है, क्योंकि जिस राज्य में दलितों को खुले आम पुलिस थाने के सामने बिना किसी कसूर के पीटा जाए और पुलिस तमाशा बनी देखती रहे; उस राज्य में दलित और गरीब कैसे चैन से रहते होंगें और उनकी हालत क्या होगी? उना की घटना महज एक उदाहरण भर है. ऐसे दर्जनों अत्याचार गुजरात के अलग-अलग जिलों में हर रोज हो रहे हैं. सरकारी आंकडों के मुताबिक गुजरात में हर साल एक हजार दलित अत्याचार का शिकार हो रहे हैं. साल में औसतन 20 हत्या हो रही है तो 45 दलित महिलाओं से दुष्कर्म की घटनाएं हो रही है. ये तथ्य आरटीआई से मिले हैं. बीते दस वर्ष (2006-2015) में दलितों पर हुए अत्याचार की दर्जनों घटनाओं के आंकड़ें मौजूद हैं. यही कारण है की आज गुजरात का हर दलित सड़क पर आकर अपनी सुरक्षा के लिए विरोध कर रहा है. जब दलित सड़कों पर आये तब राज्य की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल उना में पीड़ितों का हालचाल पूछने के लिए घटना के नौ दिन बाद पहुंची. वो भी तब जब राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल ने उना जाने की घोषणा कर दी थी. गुजरात में हर चौथे दिन एक दलित महिला बलात्कार की शिकार होती है.

क्यों जोर पकड़ा आन्दोलन ने

उना की घटना का विरोध करते हुए दलित समाज के हजारों लोगों ने नगरपालिका और सुरेन्द्रनगर डिप्टी कलेक्टर के ऑफिस को घेर लिया और मृत पशुओं के शव पालिका के ऑफिस में घुसकर टेबल पर रख दिए. इसके अलावा गुस्साए लोगों द्वारा मृत पशुओं के शव ट्रॉली में भरकर जिले के विभिन्न सरकारी कार्यालयों में भी फेंके गए. दलित समाज ने हुंकार किया की गौरक्षक अब करें इन मृत गायों का अंतिम संस्कार. अब हम नहीं करेंगें ये काम. इसके अतिरिक्त दलित उत्पीड़न के विरोध में 25 लोगों ने कीटनाशक दवाई पीकर आत्महत्या करने का प्रयास किया. 20 जुलाई को विरोध प्रदर्शन में शामिल एक प्रदर्शनकारी ने खुद को आग लगा ली, जिसमें वह 40 फीसदी तक जल गया. घटना बोटाड जिले की है. प्रदर्शनकारी दलित समाज के युवकों पर हुए अत्याचार को लेकर इतना क्रोध्रित था कि उसने खुद को आग लगा ली. विरोध प्रदर्शन में बसें फूंकी गई और चक्का जाम किया गया. गुजरात में दलित समाज का आंदोलन उग्र रूप ले चुका है और अन्य राज्यों के दलित गुजरात के इस दलित आंदोलन से जुड़ रहे हैं. इस लड़ाई में दलितों के साथ कुछ ओबीसी नेताओं ने भी विरोध किया और अहमदाबाद में मुस्लिम युवाओं ने भी आवेदन पत्र देकर अपनी हमदर्दी व्यक्त की लेकिन सवर्ण समाज से दलितों के पक्ष में कोई नहीं आया.


जांच के आदेश

मामले में चारो ओर से फजीहत होने के बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने इस घटना की जांच करने का आदेश सीआईडी को दे दिया है, लेकिन जांच कब तक पूरी होगी इसका कोई अनुमान नहीं है. सरकार मामला शांत कराने के लिए जांच के आदेश तो दे देती है लेकिन डेढ़-दो महीने में पोथी बना कर फेंक देती है. वैसे भी देश में ज्यादातर सीबीआई और सीआईडी जांच का यही हश्र होता है. सवाल उठता है कि आखिर जब घटना का विडियो मौजूद है और तमाम आरोपी चिन्हित किए जा चुके हैं तो ऐसे में उनके खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई कर दलितों को इंसाफ क्यों नहीं दिलाया जा सकता?


पहले भी हुई है इस तरह की घटना

उना से पहले भी गुजरात के राजुला में दलितों को इसी तरह पीटा गया था. कथित गौभक्तों ने दलितों को लोहे की रॉड से बुरी तरह से मारा था. इस पूरे मामले में पीड़ितों द्वारा कथित गौभक्तों पर कार्रवाई करने के लिए आवेदन किया, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं की गई. इस घटना का ऑडियो-वीडियो भी जारी हुआ था. इस मामले में कथित गौरक्षक राजुला में दस से अधिक काठी कौम के स्वघोषित गौरक्षक गाड़ी से पहुंचे थे. वो दलितों को बुरी तरह से मार कर उन्हें पुलिस स्टेशन ले गए. उन्हें झूठे मामले में फंसा देने की धमकी दी. दलित समाज की गुहार के बाद भी पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया. मामला अभी तक ठंडे बस्ते में है.


सौराष्ट्र में दलितों पर अत्याचार

अभी तक दलितों को मार डालने से लेकर उन्हें घायल करने तक के मामले अमरेली, पोरबंदर, सुरेंद्र नगर, गिर-सोमनाथ समेत सौराष्ट्र के कई जिलों में हुए हैं. इस मामले में अभी तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई है. पोरबंदर के सोढाणा में तो सरपंच समेत 40 लोगों के दल ने जुलाई की शुरुआत में दलितों पर एक जमीन के मामले में हमला बोल दिया था, जिसमें शींगरखिया नाम के दलित समुदाय के व्यक्ति की मौत हो गई थी.


थानगढ़ में पुलिस ने 3 दलितों को गोली मार दी थी!

22-23 सितम्बर 2012 को सुरेंद्रनगर के थानगढ़ में पुलिस फायरिंग में 26 साल के युवा पंकज अमरसिंह सुमरा, 16 साल के मेहुल वालजीभाई राठौर और 15 वर्षीय प्रकाश बाबुभाई परमार की मौत हो गई थी. स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस ने इन्हें जानबूझ कर मार डाला था. मृतक परिवार को अभी तक न्याय नहीं मिला है.


कई गांवों से दलितों ने किया है पलायन

- पोरबंदर के विंजराणा गांव के अनुसूचित जाति के लोगों पर स्थानीय लोगों ने हमला किया, जिसके बाद वह गांव से पलायन कर गए. फिलहाल वो पोरबंदर एयरपोर्ट के पास सीतानगर की एक झोपड़ी में रहने को विवश हैं.

- पोरबंदर के कुतियाणा के भोडदर में कुछ उग्र लोगों ने दलित परिवार के चार मकानों को तोड़ दिया और फसल को भी नुकसान पहुंचाया. कुछ दिन तो पुलिस सुरक्षा मिली लेकिन बाद में पुलिस द्वारा दिए गए संरक्षण को वापस ले लिया गया. पूरा परिवार गांव से पलायन कर गया.

- ऊना तहसील के आकोलाणी गांव में एक दलित युवा को जिंदा जला दिया गया. इस घटना के बाद दलित परिवार के 14 सदस्यों ने वहां से पलायन कर दिया.

-डीसा के घाडा के दलित युवा को ट्रैक्टर से रौंद कर मारा डाला गया. इसके बाद डरे हुए 27 दलित परिवार गांव से पलायन कर गए.

-पाटण की मीठीवावड़ी में दलितों के साथ झगड़ा होने पर स्थानीय ग्रामवासियों ने उनका सामाजिक बहिष्कार किया था, जिससे दो दलित परिवार पाटण से पलायन कर गए।

-पाटण के बावरडा में दलितों पर हमला कर उग्र तत्वों ने जमीनें हथिया ली. इस समय वह परिवार कच्छ के गांधीधाम में अपना जीवन गुजार रहा है.

- साणंद के कुंडल में दलितों को स्थानीय शिवमंदिर में जाने की इजाजत नहीं थी. दलितों ने इसकी शिकायत पुलिस से की. लेकिन गांव के आतंकी गुंडों को इसकी जानकारी मिल गई और उन्होंने दलितों को धमकाया. इससे डर कर दलित परिवारों को वहां से पलायन करना पड़ा.


"दलित दस्तक" मासिक पत्रिका की यह कवर स्टोरी है।

गुजरात से हितेश चावड़ा (संपर्क- 9016078505) की रिपोर्ट


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