शिक्षा और ज्ञान से डरता है धार्मिक भारत

भारत के ग्रामीण या शहरी बच्चों से बात करके देखिये, वे बहुत कुछ जानना चाहते हैं. जैसी जिज्ञासा यूरोप के सभ्य समाज के बच्चे करते हैं वैसी ही जिज्ञासा भारत के बच्चे भी करते हैं. जीवन, मन, शरीर, प्रकृति, मशीनें, समाज व्यवस्था और संबंधों पर उनकी जिज्ञासाएं इतनी रंग बिरंगी होती हैं कि उनको उत्तर देना कठिन हो जाता है. उनकी जिज्ञासाओं का उत्तर देने के लिए अक्सर जिन लोगों को समाज द्वारा “अधिकृत” किया गया है उन्होंने इन जिज्ञासाओं की बहुत बारीकी से ह्त्या की है. उनकी जिज्ञासाओं को उत्तर देकर नयी जिज्ञासाओं और नये प्रश्नों की तरफ बढ़ाने का अर्थ होता है पुराने सामाजिक ताने बाने और धर्म से आगे बढना. लेकिन अगर आपका समाज किसी आखिरी किताब, आखिरी मसीहा या अपौरुषेय किताबों या विश्वगुरु होने के अहंकार से पीड़ित है तो इस अहंकार की ठीक बगल में एक भयानक डर से भी वह लगातार पीडित रहेगा. यही पूरे इस्लामिक जगत और भारत की कहानी है.

आसमानी या अपौरुषेय किताबों का या विश्वगुरु के अहंकार का आभामंडल इतना असुरक्षित और डरपोक होता है कि वो बच्चों और स्त्रियों के प्रश्नों से सबसे अधिक डरता है. इसीलिये ऐसे समाज के लोग पठन-पाठन का अधिकार अपनी बड़ी जनसंख्या को और स्त्रियों को नहीं देना चाहते. भारतीय होशियारों ने इस विषय में महारथ हासिल कर ली थी. उन्होंने इस काम लिये वर्ण और जाति व्यवस्था ही बना डाली थी और वर्णाश्रम को ही धर्म बना डाला था, और ये व्यव्वस्था उनके आधिपत्य को बनाये रखने के लिए यह बहुत हद तक सफल भी रही. अलबरूनी ने अपने यात्रा संस्मरणों में लिखा है कि काश भारत जैसी जाति व्यवस्था हमारे पास होती तो हम भी करोड़ों लोगों को सैकड़ों हजारों साल गुलाम रखकर निष्कंटक राज करते और दबी कुचली कौमें कोई आवाज भी न उठा पातीं. अलबरूनी की भारत से ये इर्ष्या बहुत महत्वपूर्ण है. वह स्वयं जिस समाज से आ रहे हैं वहां कभी ज्ञान के फूल खिले थे लेकिन बाद में सब रेगिस्तान हो गया.

भारत में भी श्रमणों (बौद्धों, जैनों), लोकायतों, आजीवकों के युग में ज्ञान विज्ञान की बहुत खोज हुई थी और आज गिनाई जाने वाली सारी सफलताएं उसी दौर की हैं. शून्य, रेखागणित, अंकशास्त्र, खगोल, व्याकरण, भेषज, धातुविज्ञान, आयुर्वेद, योग और मनोविज्ञान (जो कि अध्यात्म में पतित हुआ) की खोज श्रमणों अर्थात बौद्धों और जैनों ने की थी. तांत्रिक अनुशासन के साथ लोकायतों ने भारी काम किया था. लेकिन वेद वेदान्त के प्रसार के साथ ज्ञान विज्ञान की ये प्रेरणाएं समाप्त होने लगीं और खगोलशास्त्र ज्योतिष बन गया, रसायन और भेषज जादूगरी और राजगुरुओं की गोपनीय विद्या बन गयी और एक वर्ण विशेष के लोगों के रोजगार की चिंता ने समूचे दक्षिण एशिया की ज्ञान की परम्पराओं का नाश कर डाला. राजसत्ता और व्यापरसत्ता को लग्न, मुहूर्त, ज्योतिष और कर्मकांड से डराकर गुलाम बनाया गया और शेष समाज को अंधविश्वास के दलदल में ऐसा डुबोया कि वो आज तक बाहर नहीं निकल सका है. खगोल के ज्योतिष में पतन पर अलबरूनी ने विस्तार से चर्चा करते हुए गजब की टिप्पणियाँ की हैं, वे पढ़ने योग्य हैं.

भौतिक या प्राकृतिक विज्ञानों की बात एक तरफ रखते हुए हम अगर समाज विज्ञानों जैसे कला, भाषा, साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, इतिहास और इतिहास लेखन सहित राजनीति, शासन प्रशासन की भी बातें करें तो हम देखते हैं कि इन विषयों का और अधिक बुरा हाल किया गया है. आज के बच्चे समाजशास्त्र, साहित्य, भाषा, मनोविज्ञान इतिहास या राजनीतिशास्त्र नहीं पढ़ना चाहते. जो बच्चे ये सब पढ़ते हैं उन्हें दयनीय, कमजोर और पिछड़ा समझा जाता है. विषयों की भी जातियां हैं भारत में. विज्ञान, तकनीक, मेनेजमेंट, मेडिसिन आदि सवर्ण विषय हैं और मानविकी,आर्ट्स आदि अछूत विषय हैं. इसी का स्वाभाविक परिणाम ये है कि हमारे स्कूल कैसे हों, राजनीतिक व्यवस्था कैसी हो, शासन प्रशासन का ढंग कैसा हो, पत्रकारिता, सामाजिक विमर्ष, नारीवाद, सबाल्टर्न विमर्श सहित संस्कृति और दर्शन का विमर्श कैसा हो-ये सब हमें यूरोप के सभ्य देशों से सीखना होता है.

याद कीजिये, डॉ. अम्बेडकर ने जो संविधान रचा वो पश्चिमी लोकतंत्र और समाजवाद से प्रेरणा लेता है. भारत के अतीत में भविष्य के समाज को दिशा देने लायक बातें लगभग न के बराबर हैं. आज की संसदीय प्रणाली से लेकर कानून, प्रशासन, चुनाव आदि सभी बातें यूरोप ने विकसित कीं और भारत के गुलामी के दौर में यूरोप अमेरिका में पढ़ने गये वकीलों ने इस देश को यूरोपीय सभ्यता के आदर्शों पर खड़ा किया. इसीलिये हम थोड़ा सा बदलाव, सामाजिक सुधार और विकास भारत में देख पाते हैं.

लेकिन भारत के स्वतंत्र होते ही और आत्मनिर्णय का अधिकार मिलते ही विश्वगुरु का जिन्न फिर से जाग गया. भूमि सुधारों और दलित आंदोलनों के दबाव से पुराने शोषक तिलमिला उठे और उन्होंने फिर से गुरुकुल स्टाइल मूर्खताओं की तारीफ़ शुरू कर दी और बहुत गहरे षड्यंत्र के तहत दलितों, शूद्रों (ओबीसी), आदिवासियों और स्त्रियों को ज्ञान से वंचित करने का काम आरंभ कर दिया. राष्ट्र निर्माण के लिए जितना जरुरी था उतना भर विज्ञान और तकनीक सीखने सिखाने का इन्तेजाम कर लिया. देश को प्रबंधन और तकनीक के बड़े बड़े संस्थान दिए गये लेकिन जनमानस में विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के प्रसार को रोकने के लिए गुप्त रूप से कहीं अधिक शक्ति लगाईं गयी.

आईआईटी और आईआईएम को देखिये. आईआईटी असल में तकनीक के संस्थान हैं. यहां विज्ञान के बाबू पैदा होते हैं जो विज्ञान और मशीनरी के प्रश्नों के उत्तर जानते हैं. विज्ञान वे कितना जानते हैं इसका उत्तर इन संस्थानों के विद्यार्थियों को अब तक मिले नोबेल पुरस्कारों की संख्या से अंदाजा लगता है. लेकिन इतनी प्रशंसा उनकी की जा सकती है कि उनके यूरोपीय या अमेरीकी शिक्षक जब कुछ खोज लेते हैं तो वे उसका सस्ता संस्करण तैयार कर देते हैं. इतनी प्रतिभा उनमे जरुर है. ऐसे ही हमारे चिकित्सक और मैनेजर हैं. वे नया कुछ नहीं खोज सकते लेकिन एक बार ह्रदय का किडनी का मस्तिष्क के काम करने के विज्ञान को कोई यूरोपीय या अमेरिकन खोज ले तो उसके बाद हमारे डाक्टर आँख, नाक, ह्रदय के आपरेशन का या नसबंदी का विश्वरिकार्ड बना लेते हैं. इस बात के लिए उनकी प्रशंसा हो सकती है.

क्या समाज विज्ञान, मानविकी में भारत कुछ बेहतर कर रहा है? उत्तर है कि समाज विज्ञानों को समझने की भारत की तैयारी ही नहीं है. हजारों साल के विविधतापूर्ण सामाजिक इतिहास में समाजशास्त्र और समाज मनोविज्ञान को जन्म दे सकने वाले धार्मिक-सामाजिक बदलाव, आक्रमण, युद्ध, राजनीतिक परिवर्तन आदि घटनाएँ घटती रहीं लेकिन यहाँ समाज विज्ञान का जन्म ही नहीं हुआ. यूरोप में पुनर्जागरण के बाद औद्योगीकरण और नगरीकरण की छाया में समाजशास्त्र का जन्म हुआ लेकिन भारत में ऐसा बहुत कुछ हो चुकने के बाद भी समाज विज्ञान की कोई प्रेरणा नहीं हुई. ये एक चमत्कार है. भारत के धर्म और अध्यात्म ने नये ज्ञान की संभावना और नए समाज की प्रेरणा को बहुत खूबसूरती से और कुशलता से नष्ट किया है. देश के मानव संसाधन को कैसे नष्ट किया जाता है ये कोई भारत से सीखे. आज मानविकी विषयो में भारत की मौलिक रिसर्च बहुत ही कम है. हां, भारत के समाज, राजनीति और संस्कृति के संबंध में भारतीय लोग लिखते लिखाते रहते हैं लेकिन उनका ये लेखन या शोध विश्व स्तर पर ज्ञान को बढ़ाने में कोई ख़ास योगदान नहीं देता है.

आधुनिक युग के सभी बड़े सिद्धांतकार यूरोपीय हैं. राजनीति, समाजशास्त्र, इतिहास, मनोविज्ञान, लोकतंत्र, शासन, प्रशासन, पत्रकारिता, व्यापार प्रबंधन, बैंकिंग, मीडिया, शिक्षा व्यवस्था, रिसर्च और यहां तक कि अब वैज्ञानिक अध्यात्म विद्या और कांशियसनेस स्टडीज जैसे एकदम नये विषय भी यूरोप से ही आ रहे हैं. और मजा ये कि भारतीय समाज उसपर भी अपना “सनातन अधिकार” जमाते हुए यह कह रहा है कि ये सब तो हमारे शास्त्रों में न जाने कब से लिखा हुआ है.

भारत में शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों को गौर से देखिये वे इन प्रश्नों पर ज़रा भी जागरूक नहीं हैं. उपर उपर से लगता है कि वे अनजान हैं. लेकिन थोड़ा कुरेदो तो पता चलेगा कि वे एक बहुत बड़े और प्राचीनतम षड्यंत्र के पुर्जे हैं. उन्हें पता है शिक्षा और ज्ञान को कैसे बर्बाद करना है और शोषक धर्म की सत्ता को कैसे बनाये रखना है. बच्चों को पढ़ाने वाले स्कूल कालेज के लोगों से बात कीजिये आपको लगेगा कि ये किस जमाने के जीवाश्म हैं जो अभी भी जीये जा रहे हैं. ग्रामीण बच्चों की तकदीर जिन लोगों के हाथ में है उन लोगों के स्तर की तो बात ही करना व्यर्थ है. ऊपर से धर्म और राष्ट्रवाद की जहरीली खिचड़ी ने उन्हें एकदम पागल बना दिया है.

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