खतरे में आदिवासी धरोहरें

Details Published on 05/01/2017 14:56:01 Written by Dalit Dastak


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मध्य प्रदेश औऱ छत्तीसगढ़ की आदिवासी परंपराएं सुदृढ़ रही हैं. यही वजह है कि अक्सर कई मौकों पर खुदाई के दौरान मूलनिवासी आदिवासी समाज की समृद्ध धरोहर की छाप छोड़ते चिन्ह दिखाई पड़ते हैं. सरकार ने इन धरोहरों को छिंदवारा में एक संग्रहालय बनाकर रखने की व्यवस्था तो कर दी, लेकिन इसे इसके अपने हाल पर छोड़ दिया. जिससे आदिवासियों की परंपरा नष्ट होने के कगार पर है. हर साल इसके रख-रखाव के लिए पैसे कागजों पर तो चलते हैं लेकिन संग्रहालय तक पहुंचते नहीं है, जिसकी वजह से दिनों-दिन इसकी हालत खराब होती जा रही है.


छिंदवारा के बहादलभोई आदिवासी संग्रहालय में हर वर्ष राज्यस्तरीय आदिवासी महोत्सव के दौरान लाखों रुपये का बजट हर साल खर्च किया जा रहा है, लेकिन इसकी मरम्मत और संचालन के लिए चंद हजार रुपये तक नहीं मिल रहे हैं. अव्यवस्था का आलम यह है कि यहां के सीसीटीवी कैमरे बंद पड़े हुए हैं. अंदर मौजूद कलाकृतियों को संभाल कर नहीं रखा जा रहा है. इसकी वजह से मंगलवार 3 जनवरी को गोंड कक्ष की जर्जर मॉडल कुर्सी टूट गई.


इस म्यूजियम में आदिवासियों के वस्त्र, गहने, खान-पान की वस्तुएं और उनकी जीवन शैली से जुड़े सामान को सहेजकर रखा गया है. यहां पहले ही चांदी के जेवर समेत अन्य सामान चोरी हो चुका है. मेंटनेंस के अभाव के चलते कलाकृतियों में भी लगातार टूट-फूट हो रही है. आदिवासी म्यूजियम से 26 बेशकीमती पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं. असल में सारी गड़बड़ी की जड़ यहां तैनात कर्माचिरयों की अगंभीरता और उदासीनता है. क्योंकि म्यूजियम देखने के नाम पर दर्शकों से 5-10 रुपये लिए जाते हैं. इसके अलावा मेंटनेंस के नाम पर सलाना 12 हजार रुपये का बजट आता है. अगर यहां का प्रशासन और म्यूजिक के अधिकारी जिम्मेदार होते तो यह पैसे यहां के मेंटनेंस के लिए काफी था.

- इनपुट पत्रिका से भी


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