बड़ा संदेश था डॉ. अम्बेडकर का बौद्ध बनना

मेरा प्रिय अखबार बॉम्बे क्रॉनिकल अब नहीं है. 1910 में इसकी स्थापना एक राष्ट्रवादी विकल्प के रूप में हुई थी. यह बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध था, जब बंबई (अब मुंबई) रहने और काम करने के लिहाज से रोमांचक शहर माना जाता था. बंबई ब्रिटिश भारत की आर्थिक राजधानी होने के साथ ही फिल्म उद्योग और राष्ट्रवादी राजनीति की धुरी भी थी. बॉम्बे क्रॉनिकल समाज की नब्ज पर जबर्दस्त पकड़ वाला अखबार था. अम्बेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने पर लिखने का ख्याल आया, तो मैंने सबसे पहले बॉम्बे क्रॉनिकल की पुरानी फाइलें ही पलटीं. इस अखबार ने सार्वजनिक जीवन में आने के बाद से अम्बेडकर की हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी थी और मेरे लिए यह जानना रोचक था कि बाबासाहेब के जीवन के अंतिम महत्वपूर्ण घटनाक्रम पर इस अखबार ने क्या लिखा होगा? अंबेडकर ने आज से ठीक 60 साल पहले, यानी 14 अक्तूबर 1956 को नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाया था. यह बताने से पहले कि बॉम्बे क्रॉनिकल ने उस पूरे आयोजन को किस तरह कवर किया, संदर्भवश कुछ जानकारियां जरूरी हैं-

अक्तूबर 1935 की बात है. गुजरात के गांव कविथा में सवर्ण हिंदुओं ने ‘अछूतों’ का इसलिए बहिष्कार कर दिया कि उन्होंने स्थानीय स्कूलों में अपने बच्चों को भी पढ़ाने की मंशा जाहिर करने का ‘दुस्साहस’ किया था. अम्बेडकर ने घटना पर टिप्पणी की, ‘यदि हम किसी और धर्म के अनुयायी होते, तो कोई ऐसी हिम्मत न कर पाता’. उन्होंने अपने चाहने वालों से कहा,‘कोई ऐसा धर्म चुन लें, जो आपको समानता का अधिकार और दर्जा देता हो’. अम्बेडकर की सलाह पर ही दलित वर्ग के तमाम लोगों ने नासिक बैठक में प्रस्ताव पारित किया कि वे हिंदू धर्म छोड़कर कोई ऐसा धर्म अपनाएंगे, जो अपने धर्मावलंबियों के साथ उन्हें भी बराबरी का दर्जा व अधिकार दे.

अक्तूबर 1935 में अम्बेडकर ने स्वयं भी हिंदू धर्म छोड़ने की इच्छा जाहिर कर दी. हालांकि इसे अमलीजामा पहनाने में उन्हें 21 वर्ष और लगे. क्यों? पहली बात यह कि वह सभी विकल्पों पर पूरी सावधानी के साथ सोच-विचार लेना चाहते थे. दूसरी बात, सुधारों व प्रतिनिधित्व जैसे जरूरी सवालों पर भी वह रोजमर्रा के अनुभवों के आधार पर सोच-विचार करना जरूरी मानते थे. हिंदू धर्म छोड़ने की बात करते ही मुस्लिम समाज और ईसाई मिशनरियों ने उनसे संपर्क साधा, लेकिन अम्बेडकर ने दोनों को इस सोच के साथ दरकिनार कर दिया कि ये धर्म भारतीय मूल के नहीं हैं. थोड़ी देर के लिए ही सही, उन्होंने सिख धर्म अपनाने के बारे में जरूर सोचा, लेकिन यह पता चलते ही कि सिखों के सामाजिक ताने-बाने में भी हिंदू धर्म जैसी जाति व्यवस्था हावी है, इरादा त्याग दिया.

अम्बेडकर की तलाश जारी रही. उनका आकर्षण तो 1940 से ही बौद्ध धर्म के प्रति बढ़ने लगा था, जब वह बुद्ध और उनकी विरासत पर पढ़-लिख रहे थे. वह दिसंबर 1954 में रंगून के विश्व बौद्ध सम्मेलन में शामिल हुए और तभी बौद्ध धर्म अपनाने का फैसला किया. यह अलग बात है कि राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता और खराब स्वास्थ्य के चलते क्रियान्वयन में थोड़ा वक्त लगा. मई 1956 में अंबेडकर ने अपनी किताब द बुद्ध ऐंड द धर्म पूरी करने के साथ ही अपने इरादे की औपचारिक घोषणा कर दी. इसके लिए अपने अनुयायियों की बड़ी फौज वाले शहर नागपुर को चुना. तारीख रविवार 14 अक्तूबर की तय की, जिस दिन देश में विजयदशमी मनाई जा रही थी.

बॉम्बे क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट के अनुसार, कार्यक्रम के एक सप्ताह पहले ही अम्बेडकर के नागपुर स्थित ‘शिड्यूल कास्ट फेडरेशन’ के दफ्तर के भारी जुटान शुरू हो चुका था. 12 अक्तूबर तक तो हालात ऐसे हो गए कि नागपुर आने वाली हर ट्रेन या बस अम्बेडकर के अनुयायियों से अटी दिख रही थी. 14 अक्तूबर को सब पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हुआ. बॉम्बे क्रॉनिकल की रिपोर्ट बताती है कि धर्म परिवर्तन स्थल पर तड़के से ही लगी हजारों लोगों की लाइनें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं. सड़कों पर तिल रखने तक की जगह नहीं थी. उस दिन अंबेडकर के तीन लाख से भी ज्यादा अनुयायियों ने बौद्ध धर्म अपनाया.

रिपोर्ट के अनुसार, सबसे पहले अम्बेडकर और उनकी पत्नी सविता बाई ने बौद्ध धर्म अपनाया. बर्मा से आए 83 वर्षीय बौद्ध भिक्षु भिखू चंद्रमणि ने उन्हें नए धर्म में स्वीकार किया. इसके बाद बिल्कुल झक सफेद परिधान पहने अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को मराठी भाषा में सामूहिक शपथ दिलाई. अगले दिन यानी 15 अक्तूबर को अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों की एक विशाल रैली में धर्मांतरण के पीछे के कारण बताए. उन्होंने कहा कि जिस तरह जीवन स्तर में आर्थिक बेहतरी और विधायिका में प्रतिनिधित्व जरूरी है, उसी तरह ‘धर्म हमारी आस्था का मामला है और चहुंमुखी विकास के लिए यह भी बहुत जरूरी है’. उन्होंने आगे जोड़ा कि यह हिंदू धर्म की हठधर्मिता ही थी, जो अब तक हरिजनों की मुक्ति में बाधक बनी हुई थी (क्रॉनिकल ने ‘हरिजन’ शब्द का ही इस्तेमाल किया है, हालांकि अम्बेडकर ने निश्चित तौर पर मराठी में किसी और शब्द का इस्तेमाल किया होगा).

रिपोर्ट के अनुसार, अम्बेडकर आगे कहते हैं, ‘हिंदू धर्म में ऐसा कुछ नहीं है, जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के अलावा किसी और को चमत्कृत करे. यही कारण है कि हमें दूसरा धर्म अपनाने का बड़ा फैसला लेना पड़ा.’उन्होंने अपने अनुयायियों को आश्वस्त किया कि उनकी आने वाली किताब हर उस सवाल का जवाब देगी, जो उनके मन में उठ रहे हैं.

अम्बेडकर ने धर्मांतरण के लिए 14 अक्तूबर की तारीख ही क्यों चुनी? क्या सिर्फ इसलिए कि यह रविवार था या हिंदू कैलेंडर में उस वर्ष महत्वपूर्ण दिन के रूप में दर्ज था. यदि दूसरी बात को ही लें, तो क्या अपने फैसले को वह बड़ी जीत या ‘विजय’ के रूप में ले रहे थे, क्योंकि बौद्ध धर्म अपनाकर वह और उनके अनुयायी हिंदू धर्म की जातिवादी जकड़न से खुद को आजाद कर रहे थे?

इन सवालों के जवाब कहीं नहीं मिलते. लेकिन एक दिलचस्प सवाल या अटकल मन में जरूर उठती है- धर्मांतरण के बाद इतने कम समय के अंदर यदि उनका निधन न हुआ होता, तब क्या होता? नागपुर कार्यक्रम के सात सप्ताह बाद ही जब उनका निधन हुआ, तब वह 65 साल के थे. अंबेडकर यदि एक दशक और जीवित रहते, तो कोई शक नहीं कि इस अभिशाप को झेलते आए न जाने कितने और लोग बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख हो गए होते. तब शायद यह संख्या लाखों की अपेक्षा कहीं ज्यादा होती और यह देश के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में बहुत बड़ी और परिवर्तनकारी घटना के रूप में दर्ज होती. एक महान मुक्तिदाता असमय जा चुका था और हमारा हिंदू समाज बहुत जल्द ही अपने पुरातन और गहरे पूर्वाग्रहों की ओर लौट चुका था.

(साभारः हिंदुस्तान). रामचन्द्र गुहा प्रसिद्ध इतिहासकार हैं.

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