नसबंदी से लेकर नोटबंदी तक- वोट बैंक की प्रयोगशाला बन चुकी है देश की जनता

देशवाशियों को “बंदी” को सहन करना जैसे उनकी आदत में सुमार हो चुका है. नसबंदी, नशाबंदी, नकलबंदी, भारतबंदी और आजकल नोटबंदी, जिसने देश के अब तक के सारे बंदियों और बंदों को पीछे धकेल दिया है. देश का दुर्गभाग्य कहा जाये या अक्लमंदी, जब भी देश में किसी भी प्रकार की बंदी हुई है, उसी का सबसे ज्यादा उल्लंघन या दुरूपयोग हुआ है. जैसे आजकल नोटबंदी के बाद भारी मात्रा में नये नोटों की काला बाजारी हो रही है. जिस मकसद से नोटबंदी की गयी थी, कि काला धन बाहर आयेगा और लोगों के खातों में 15 लाख न सही15 हजार तो जमा हो ही जायेंगे. मगर अब भी प्रधानमंत्री जी के 50 दिन का वायदा पूरा भी नहीं हुआ है. गुलाबी नोटों को काला करने का धंधा युद्ध स्तर पर पूरे देश में शुरू हो गया है. एक मछली पूरे तालाब को गंदा करती है कहावत आज सार्थक प्रतीत होती है.

काली कमाई के चंद गुनाहगारों के फेर में आज पूरा देश जैसे खड़े होने की सजा काट रहा है. चाहे बीमार हो या बूढ़ा, महिला हो या मजदूर बैंकों या एटीएम के सामने घंटों योगा करने को मजबूर नहीं तो क्या शौक से खड़ा है? भारत की जनता ने सिकंदर से लेकर गजनवी, हूणों से लेकर मुगलों, गोरखाओं से लेकर पुर्तगालियों और अंत में अंग्रेजों के जुल्मों को सहा है. भुखमरी को सहा है, अकाल को सहा है, सुनामी तथा भूकंप की त्रासदी को सहा है. इतना ही नहीं लोकतांत्रिक देश ने 1975 में आपातकाल के जख्मों को भी सह-सह कर देश के आन-मान और सम्मान को बचाया है. मगर ये कुर्बानी सिर्फ वोटों में तब्दील होकर दफन होती रही है.

अगर हम तीन-चार सौ सालों की गुलामी की जंजीरों को सहन कर सकते हैं तो मोदी जी के 50 दिनों की वचनबद्धता को निभाने में क्यों पीछे रहें! अगर 50 दिनों के बाद खुशनुमा अहसास और अच्छे दिनों की बहार आने वाली है तो ये कढ़वी घूंट हर देशवाशी को पीनी ही चाहिए. परिवर्तन प्रकृति का नियम है.

प्राचीनकाल में भी शासकों ने कई क्रांतिकारी परिवर्तन के फैसले लिए हैं, कुछ सफल तो कुछ विफल भी रहे है. मुद्रा परिवर्तन का जब भी जिक्र आयेगा इतिहास में मुहम्मद बिन तुगलक का नाम भी जरूर आयेगा. गुलाम भारत में कुछ “बंद” तो भारत की तस्वीर और संस्कृति(मान्यतायें) ही बदल गये. जिनमें सति प्रथा का अंत, बालविवाह का अंत, विधवा विवाह को मान्यता, बलिप्रथा का अंत, साथ ही ठगी प्रथा आदि का अंत. तब देश में लोकतंत्र भी नहीं था और वोटों की चिंता भी नहीं थी. आजादी के बाद संवैधानिक भारत में इन 70 वर्षों में हम पूर्ण रूप से एक भी ऐसी चीज का अंत नहीं कर पाये जो समाज और देश की प्रगति में बाधा हो! संपत्ति का मूल अधिकार समाप्त होने के बाद भी काला धन किस प्रकार जमा हुआ क्या सरकारें अनजान थी? इन 70 सालों में क्या सिर्फ वोट बैंक ही नजर आया नोट बैंक की ओर नजरें फेर दी? अभी भी नोट बंदी देश हित या गरीब हित में होगी तभी पता चलेगा जब इसका चुनावीकरण होगा. भारत अहिंसा परमो धर्मः और वसुधैव कुटम्बकम का राष्ट्र है. इसलिए चाहे आतंकी देश पाकिस्तान हो या काला बाजारी, रिश्वतखोरी, बलात्कारी, शोषणकारी, और भ्रष्टाचार के देशी नायक जिनमें 2 जी, राष्ट्रमंडल खेल,कोल ब्लाक,स्टांप घोटाला,बैंक घोटाला, आईपीएल घोटाला और  वर्तमान में 9 हजार करोड़ की बैंक राशि को हजम कर विजय माल्या ने आज देश की जनता को जैसे फुटपाथ पर लाकर खडा़ कर दिया है.फिर भी सभी हमारे कुटंब के मेहमान बने हुए हैं और आगे भी ऐसे कितने सदस्य इस कुटंब में जुड़ते जायेंगे हैरानी की कोई बात नहीं.

लगता है देश भक्ति 15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद लगभग खत्म हो गयी. आजादी के बाद पार्टी भक्ति, व्यक्ति भक्ति और सत्ता भक्ति ही राजनीति की प्रमुखता बन चुकी है. बड़ी योजनाओं और क्रांतिकारी परिवर्तन की ओर जरूर विधेयक और कानून पारित हुए हैं मगर वो सिर्फ और सिर्फ वोट की राजनीति का सहारा बनकर रह गयी हैं. शिक्षा समाज के विकास का अहम अंग है मगर आज हम शतप्रतिशत देश को साक्षर नहीं बना सके हैं. रोजगार गारंटी के रूप में मनरेगा लाये वह भी मन का रोग बन कर ही रह गया. शिक्षा का अधिकार अधिनियम का लक्ष्य अभी भी अधूरा ही है. खाद्य सुरक्षा अधिनियम भी लाये हैं मगर देश में भूख से मरने वालों की कमी नहीं है. लू से मरने वालों, ठंड से मरने वालों की कोई गिनती नहीं है. इनको हमने सायद गर्मी और ठंड के पैमाने मान लिए है. अर्थात जिस वर्ष लू से ज्यादा लोग मरें कहें उस साल गर्मी भयानक थी और जिस वर्ष ठंड से ज्यादा जानें जायें कहें कि अमुक वर्ष तापमान सबसे नीचले स्तर पर था. वही इस वक्त भी नोटबंदी के कारण हो रहा है. 1975 के इमरजेंसी में भी गरीब ही ज्यादातर जबरदस्ती नसबंदी के शिकार हुए थे.

इस मापदण्ड को अगर हम बंद कर सकें तो तब हम गर्व से वयां कर सकते हैं कि देश अब मंत्रों से यत्रों की ओर अर्थात एनालॉग से डिजिटल की ओर बड़ रहा है. कहने को तो आसान है मेरा देश बदल रहा है मगर इस बदलाव में हमेशा बलि का बकरा गरीब ही बना है. आजादी के बाद के सब नीतियों का विश्लेषण किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलता है कि गरीबी मिटी नहीं, गरीब जरूर मिट रहे हैं, कृषि क्षेत्र में बेहतर बदलाव नहीं हुआ इसलिए किसान आत्महत्या करते रहे. गरीबों की हालत गुलामी के दौर जैसी है. भिखारी तब भी थे और आज भी हैं, कुछ लोगों के पास छत तब भी नहीं थी आज भी नहीं है, कुपोषण तब भी था और आज भी है. कुरीतियां तब भी थीं और आज भी है, भेदभाव असमानता आजादी से पहले भी थी और आज भी है, तो क्या बदला है इन 70 वर्षों में? सिर्फ तकनीक जरूर बदली है, मगर गरीबों, दलितों की तकदीर नहीं बदली. लोग नशबंदी के दौर में मरे थे और आज नोट बंदी के दौर में मर रहे हैं. ये तस्वीर अवश्य ही बदलनी चाहिए. पक्ष तथा विपक्ष के सत्ता के शतरंज के खेल में मात हमेशा देश की जनता को ही मिलती है.

लेखक प्रवक्ता (भौतिक विज्ञान) हैं. अल्मोडा़ (उत्तराखण्ड) में रहते हैं. संपर्क- iphuman88@gmail.com

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