कितनी गहरी हैं सामाजिक भेदभाव की सदियों पुरानी दीवारें

भारत के मूलनिवासी दलित समाज की दशा और दिशा किसी से छुपी नहीं है. आए दिन दलितों पर भंयकर जुल्म से हाथ रंग कर अपने आप को उच्च जाति बताने वाले लोगों का देश में अपराध की श्रेणी में ग्राफ कम होता नजर नहीं आ रहा हैं. आखिर क्या अपराधों में लिप्त मानव भी उच्च जाति का हो सकता है. असलियत तो यह कि कोई जाति उच्च और निम्न नहीं हो सकती है. केवल इन्सान के कार्य ही उच्च एवं नीचे हो सकते है. कुछ अमानवता की सोच से ग्रहस्त  लोगों ने एक ऐसे से मूलनिवासी समाज से घृणा की जो हमेशा ही कड़ी मेहनत करता आया हैं. मानव जीवन से जुड़े किसी भी कार्य को करने में कभी पीछे नहीं रूका, जो मानव जीवन के यापन में अतिआवश्यक माना जाता है.

दरअसल देश में ऐसे योगदान को महानता की संज्ञा दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. ऐसे ही मावन को तिरस्कृत कर निम्न जाति की संज्ञा दे दी गई. जो दलित वर्ग के रूप में अब पहचान रखता हैं. दलित समाज किसी भी कार्य को करने में सक्षम है. उसे निम्न किस आधार पर कहा जा सकता हैं. वर्षो से अत्याचार की मार सहन करते आए दलित समाज में अब नई चेतना की लहर पैदा हो रही है. जिसका का बीजारोपण ज्योतिबा फुले जैसे महान पुरूषों ने कर दिया था. लेकिन दलित समाज को अपने अधिकरों की असली दिशा में लाने का काम डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने किया और भारत देश में समानता की राह दिखाई. इतना ही नहीं, दलित समाज को असली अधिकार दिलाएं जो एक मानव होने के नाते मिलने चाहिए.

सवाल यह कि क्या दलित समाज जिस सामाजिक भेदभाव से पीड़ित था, उस वजह को जान पाया हैं? शायद पूर्णरूप से नहीं. क्योंकि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने जीवन में कठिनाईयों को सहन कर दलित समाज को भारतीय समाज की मुख्य धारा में लाकर तो खड़ा कर दिया. लेकिन दलित समाज के लोगों में आज भी चेतना की कमी हैं. मानवता के आपसी रिश्ते को तोड़कर धार्मिक अन्धविश्वास में दलित समाज को जकड़ कर हमेशा ही कुछ स्वार्थी लोगों ने इंसानियत के बीच भेदभाव की जड़ो को गहरा करने का काम किया. मगर आधुनिक दौर में लोगों में शिक्षा का संचार तेजी से हो रहा है. इसी दौर में भी दलित समाज पूर्ण रूप से जागरूक नहीं हुआ और सवर्णों के अन्धविश्वास से निकलने के बजाय उन्ही की राग में राग मिलाने में लगा है. जो एक सोचनीय विषय तो बनता ही है. क्योंकि दलित वर्ग को आज सभी अधिकार प्राप्त होने के बाद भी अमानवीय अत्याचार सहन करने को मजबूर हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय समाज में संस्कृति की विभिन्नता के साथ धर्म-जाति के नाम पर भी काफी असमानताएं पाई जाती है. जो मानव जीवन के लिए एक अभिशाप तो है ही बल्कि एक इंसान से दूसरे इंसान के बीच दरार भी है. हमारे देश में मजहब के नाम पर हमेशा मानव के बीच असमंजस की स्थिति रही हैं. लेकिन इससे भी बड़ी समस्या बनी हुई दलित वर्ग की, जो हमेशा ही अत्याचारों की मार झेलता आ रहा है. लेकिन सवाल यह है कि क्या दलित वर्ग हमेशा ही अपने अधिकार से अनजान रहेगा? क्या दलित वर्ग स्वयं अपने आपको वहां नहीं रख सकता? जहां उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़े.

वैसे आज के दौर में दलित समाज के लोगों ने भी शिक्षा के क्षेत्र मे कदम रख दिया है जो निरंतर आगे बढ़ रहे हैं. वे किसी भी बन्धन में नहीं जीना चाहते हैं. वे अपना भाग्य खुद लिखना चाहते हैं. वर्षो से दलित समाज पर कई तरह के अत्याचार होते आए हैं, जो आज भी रूके नहीं है. उन्हें धार्मिक बन्धन के नाम पर अन्धविश्वास ने जकड़ा  हुआ हैं. लेकिन दलित समाज की वर्तमान पीढ़ी जो अपने अधिकारों को पहचानने लगी हैं.

मैनें कुछ दलित वर्ग के सोच- विचारों को बयां करने का प्रयास किया है जो डॉ. अम्बेडकर की मुख्य धारा से हटकर भेदभाव के खिलाफ असफल प्रयास कर रहे हैं. राजस्थान में दलित समाज के लोगों का कहना है कि ब्राह्मणों द्वारा बनाए गए रीति-रिवाजों से वे स्वयं निकालना चाहते हैं. अब दलित समाज भी अपने आप को छोटा या नीचा कहना पंसद नहीं करता है.

राजस्थान में दलितों का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक, पारिवारिक और धार्मिक कार्यों के लिए जो पहले ब्रह्माणों पर आश्रित थे, अब वे खुद अपने दलित समाज के बीच से ही पंडित (पुरोहित) तैयार कर लिए हैं. राजस्थान में दलित समुदाय के ये पुरोहित अपने समाज में कर्मकाण्ड और धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं. वैसे भारत में अब भी धार्मिक कर्मकांड मुख्यतः ब्रह्माणों का ही काम माना जाता है. ये दलित पुरोहित वैसे ही कर्मकाण्ड सम्पन्न करते हैं जैसे ऊंची जाति के ब्राह्मण कराते हैं. दलितों का कहना है कि इससे उनके साथ ऊंची जाति के लोगों द्वारा किए जाने वाले सामाजिक भेदभाव कम होंगे. लेकिन कुछ दलित पंडितों का कहना है इतना सब करने के बाद भी उनके सामाजिक दर्जे में कोई सुधार नहीं हुआ है। शादी-विवाह के दिनों में इन दलित पंडितो की अपनी बिरादरी में बड़ी मांग रहती है.

राजस्थान कोटा के नाथूलाल वाल्मीकि समाज से हैं. मगर वे अपने नाम के आगे पंडित लिखते है. पंडित नाथूलाल की ध्वनि और भाव भंगिमा में पंडित होने के दर्शन इस कदर होते है जब वे वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हैं. क्योंकि मन्त्र इन्सान की तरह ये नहीं देखते कि उसे स्वर देने वाला किस जाति धर्म से है. नाथूलाल ने सभी तरह के कर्मकाण्ड, यज्ञ-हवन और मंत्रोच्चार तब सीखा जब दलितों को धार्मिक अनुष्ठान के लिए पंडित नहीं मिले. नाथूलाल को अपमानकारी तब लगा जब दलितों के एक वैवाहिक समारोह में पंडित वादा करके भी नहीं आए. इसके बाद उन्होंने पुरोहिताई का काम सीखने की ठान ली.

पंडित नाथूलाल ने न केवल खुद पुरोहिताई का काम सीखा बल्कि अपने समुदाय के करीब एक दर्जन लोगों को इस काम में प्रशिक्षित कर दिया. वह कहते हैं- मैं अब गृह प्रवेश, पाणिग्रहण संस्कार, गृह शांति हवन जैसे काम संपन्न करता हूं. किसी के बच्चा पैदा होने पर कुंडली बना देता हूं. मुंडन संस्कार के लिए मुहूर्त का भी काम भी करता हूं. मैं भी हिन्दू हूं, पूरी तरह सात्विक जीवन जीता हूं, फिर भी हमें अछूत समझा जाता है. इससे मेरा दिल दुखता है. कुछ पंडित इसे ठीक नहीं मानते. वो सामने दिखावे के तौर पर सम्मान देते हैं मगर पीठ पीछे बुराई करते हैं. वहीं दलितों के पुरोहिती करने पर जयपुर में धर्म शास्त्रों के जानकार पंडित के. के. शर्मा कहते हैं- शास्त्रों में समाहित ज्ञान जाति बिरादरी में नहीं बंधा है. कोई भी व्यक्ति इस ज्ञान का इस्तेमाल कर पूजा पाठ और अनुष्ठान सम्पन्न करा सकता है. अगर दलित समाज के लोग ये कर रहे हैं तो कुछ भी गलत नहीं है.

लेकिन दलित अधिकार संगठन के प्रवक्ता पी.एल मीमरोठ इसे एक अच्छी शुरुआत मानते हैं. वह कहते हैं इससे समाज में बड़ा बदलाव आएगा, ””””बिलकुल इससे बड़ा फर्क पड़ा है. पहले लोग जुबान नहीं खोलते थे. चेतना की कमी थी. दरअसल भूमंडलीकरण से चीजें बदली हैं. दलित पहले गांव तक सीमित थे. भूमंडलीकरण के साथ वो शहरों में आने लगे. उनकी आर्थिक हालत सुधरी है और सोच में बदलाव आया है. न केवल वाल्मीकि समाज बल्कि दलितों में जाटव, बैरवा और धोबी समाज में भी इस तरह प्रयास हुए है और उनके अपने लोग पंडित बनकर कार्य सम्पन कराते हैं.” यह एक मात्र उदाहरण था. मगर आज दलित वर्ग देश के हर विकास के कार्य करने में भागीदारी निभा रहा है. किन्तु उसे सामाजिक भेदभाव की पीड़ा हर क्षेत्र में दस्तक देती हैं. वो कहते है ना कि अन्धविश्वास की जड़े उतनी ही गहरी होती है जितनी विश्वास की. लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि अन्धविश्वास मानव जीवन के खिलाफ काम करता है जबिक विश्वास मानव के पक्ष में काम करता है.

इसी तरह के कई उदाहरण दलित समाज में देखे जा सकते हैं, जो आज बड़ी संख्या में दलित वर्ग वही कार्य कर रहे हैं जो सामान्य वर्ग के लोग करते आए हैं. दलित वर्ग के शिक्षित एवं अशिक्षित सभी अपने सम्मान को ही सर्वोच्च समझते हैं. कहा जाता है कि दलित वर्ग से भेदभाव सिर्फ इसलिए होता आ रहा कि उसके समाज के कार्य अच्छे नहीं. वह सही तरीके से नहीं रहते हैं. अब हम सोच सकते है कि दलित समाज अगर पूर्ण रूप से वही कार्य करने में लग जाता है. जो ब्रह्माण (सामान्य) वर्ग के लोग करते आए हैं। इस तरह के प्रयास से क्या दलित वर्ग को भी सामान्य वर्ग की दृष्टि से देखा जाएगा. शायद नहीं. क्योंकि हम भारतीय समाज में ये प्रत्यक्ष रूप से देख सकते है कि आज दलित समाज के साथ इसलिए भेदभाव नहीं किया जाता कि वह अच्छे कार्य नहीं करता है. बल्कि सिर्फ इसलिए भेदभाव किया जाता है कि उसके नाम पर दलित होने की मुहर लगी हुई है. चाहे वह कोई हो किसी पद पर क्यों ना कार्य कर रहा हो.इसे विडम्बना ही कहेगें कि अगर दलित समाज भी ब्रह्माणों के विचारों में उलझता रहेगा तो वह देश में फैले भेदभाव के जहर को खत्म नहीं कर सकता हैं. दलित समाज चाहे कितना ही विकास की सीड़ियां क्यों ना पार कर लें, दलित समाज के लिए सामाजिक भेदभाव की बेड़िया तोड़ना मुश्किल होगा .हम यह मामने के इनकार नहीं कर रहे कि भारतीय संविधान के बदोलत आज भेदभाव में कमी जरूर आई है. लेकिन वह दिन कब होगा जब मानव की पहचान उसके मानव होने से मिलेगी. बल्कि किसी धर्म या जाति से नहीं.

दलित समाज को इस बात से वाकिफ होना होगा, कि उन्हें वर्षो की सामाजिक भेदभाव की बेड़ियों को तोड़ने के लिए समाज को दिशा देने वाले दलित समाज के प्रेरणास्रोत व्‍यक्ति डॉ. भीमराव अम्बेडकर, संत कबीर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, गाडगे बाबा, गुरू रविदास, जगजीवन राम, के. आर. नारायणन व मान्यवर कांशीराम जी के विचारों को समाज में जनसंचार कर ही, देश में फैले ऊंच-नीच और छुआछूत के जहर की सदियों पुरानी दीवार तोड़ने में सफल होगें. डॉ. अम्बेडकर के प्रयासों का ही ये परिणाम है कि दलितों के अधिकारों को भारतीय संविधान में जगह दी गई. यहां तक कि संविधान के मौलिक अधिकारों के जरिए भी दलितों के अधिकारों की रक्षा करने में ध्यान दिया गया.

मोहन जयपाल जयपुर में पत्रकार हैं. इनसे 918432550709 पर संपर्क किया जा सकता है.

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