दलितों को राजनीति में मोहरा बनाए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाया सवाल

नई दिल्ली। धर्म, भाषा और जाति के आधार पर वोट मांगने के मुद्दे पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संवैधानिक पीठ ने बुधवार को जाति और भाषाई आधार पर वोट मांगने पर सवाल पूछे. चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने पूछा, कोई उम्मीदवार दलितों के विकास की बात कहकर वोट मांग सकता है या नहीं? क्या यह गलत तरीका माना जाएगा? एक कांग्रेस उम्मीदवार की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि दलितों के विकास के नाम पर वोट मांगना सही है. दलितों को संविधान के तहत संरक्षण मिला है. बहुत सी जगहों पर राजनीतिक दल दलितों के विकास को चुनावी मुद्दा भी बनाते हैं.

चीफ जस्टिस ने पूछा कि किसी भाषा विशेष के लोगों के विकास की बात कहकर वोट मांगने को क्या कहेंगे? जैसे महाराष्ट्र में मराठी-हिंदी विवाद. इस पर सिब्बल ने बताया कि किसी एक भाषा के लोगों के विकास पर वोट मांगने को लेकर कानून स्पष्ट नहीं है. इस मुद्दे पर निर्णय संवैधानिक पीठ को करना है. उन्होंने बताया कि अगर कोई नेता दलित समाज से जुड़ा होने के आधार पर वोट मांगता है तो आरपी एक्ट की धारा 123 के तहत यह गलत है. सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी.

चीफजस्टिस ने पूछा कि सोशल मीडिया के जरिये मतदाताओं को लुभाने पर क्या कानून लागू होता है? इस पर सिब्बल ने बताया कि किसी उम्मीदवार, उसके एजेंट या किसी अन्य द्वारा धर्म के नाम पर वोट मांगना भ्रष्ट आचरण है. ऐसे में चुनाव रद्द करना चाहिए. हालांकि, चुनाव में सोशल मीडिया या इंटरनेट के प्रयोग पर रोक की बात कानून में नहीं है. इंटरनेट के जमाने में उम्मीदवार सोशल मीडिया पर भी धर्म के नाम पर वोटरों को लुभा सकता है. ऐसे में संविधान पीठ इंटरनेट पर चुनाव के लिए धर्म के प्रयोग पर रोक लगाने पर भी विचार करें.

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