दलित उद्धार के लिए सवर्ण संजीव ने छोड़ दी जाति

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खगडिय़ा। समाज में अपनी ही पिछड़ी-दलित जाति के लोगों के लिए दिल्ली में बैठकर आंदोलन जैसे कुछ काम करने के बाद अपने बड़े से ड्राइंग रूम में बैठकर जातिविहीन समाज का सपना काफी लोग देखते हैं. ऐसे लोगों को संजीव डोम के बारे में पढ़कर सोचने की जरूरत पड़ेगी. संजीव उस जाति से ताल्लुक नहीं रखते जिन्हें गांवों में ‘डोम’ कहा जाता है. बावजूद इसके उन्होंने अपना सरनेम ‘डोम’ रख लिया है और शहर की अच्छी जिंदगी छोड़कर महादलित बस्ती में कुटिया डालकर रहते हैं. दरअसल यह उन जैसा दिखने की कोशिश है, ताकि वो संजीव को अपने बीच का समझ सके.

अगर संजीव की जाति की बात करें तो भारतीय जाति व्यवस्था में संजीव सवर्ण परिवार में जन्मे हैं. दिल्ली के प्रसिद्ध किरोड़ीमल कॉलेज से बीकॉम तक पढ़ाई की. पढ़ाई के बाद संजीव एक बड़े शहर की रंग-बिरंगी दुनिया में रच-बस रहे थे. उन्हें मॉडल बनना था सो वह मॉडलिंग का सपना देख रहे थे. फिर 2005 में पूस की एक रात में अचानक उनका दिमाग घूम गया. सवर्ण होकर महादलितों के साथ उठना-बैठना उनके परिचितों के लिए ‘दिमाग घूमने’ जैसा ही काम था. जिसके बाद उनके मित्रों, रिश्तेदारों का साथ भी छूट गया.

जो हुआ उसकी अपनी एक कहानी है. संजीव के अंदर यह बदलाव सन् 2005 में आया. वे बताते हैं कि पूस की सर्द रात थी. गंगा किनारे बिहार के खगड़िया जिले के सुदूर गांव कन्हैयाचक में श्राद्ध का भोज चल रहा था. इस गांव में संजीव के बहन की ससुराल है सो संजीव बहन से मिलने आए थे. जाड़े की उस रात जूठे पत्तलों से खाना बटोर रहे महादलित परिवार के लोगों को देखकर संजीव सकते में आ गए. बहन से मिलकर संजीव दिल्ली तो लौटे, लेकिन मन कन्हैयाचक में उलझ गया था. उनके दिलो-दिमाग में हलचल मची रही.

हर रात संजीव को वही रात याद आती. संजीव सोने लेटते तो आंखों में उस रात का दृश्य सामने आ जाता. हर रोज संजीव को वह रात परेशान करने लगी. उनके आंखों की नींद उड़ चुकी थी. आखिर संजीव से बर्दास्त नहीं हुआ और एक दिन दिल्ली से विक्रमशीला एक्सप्रेस पकड़ फिर वह कन्हैयाचक पहुंच गए. अगले दिन से संजीव ने महादलित बस्ती में उठना-बैठना शुरू कर दिया. वे कुछ उन्हें समझ रहे थे, तो कुछ समझा रहे थे. जाहिर है संजीव अपनी बहन के यहां रुके हुए थे. बहन के परिवार वालों को संजीव का महादलितों के साथ उठना बैठना रास नहीं आया. पहले तो संजीव को समझाने की कोशिश हुई. संजीव हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय कर के जिस काम के लिए आए थे, जाहिर है संजीव को मानना नहीं था. नतीजा महादलित लोगों के साथ उठने-बैठने के ‘अपराध’ में बहन की ससुराल से उन्हें निकाल दिया गया. इसके बाद वह अपने पैतृक गांव शिरोमणि टोला, नयागांव रहने लगे. हालांकि उनका मन वहीं कन्हैयाचक की डोम बस्ती में अटका था. आखिरकार संजीव उन्हीं लोगों के बीच पहुंच गए जिनकी दशा उन्हें बेचैन करती थी. संजीव ने परबत्ता के महादलित डोम टोला में रहना शुरू किया और वहीं एक झोपड़ी बना ली.

अब तक तमाम बेचैनियों और परेशानियों से निकलकर संजीव यह मन बना चुके थे कि उन्हें डोम समाज के लोगों के हित के लिए, उनके जीवन स्तर, शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए काम करना है. संजीव ने जागरुकता और शिक्षा को अपना हथियार बना लिया. इसके लिए वे सबसे पहले छुआछूत से लड़े. सामने खुद वो लोग थे, जिनके बीच संजीव ने जन्म लिया था और उनका अब तक का जीवन बीता था. उस क्षेत्र में महादलित बस्ती के लोगों को गंगा की मुख्य धारा में स्नान से रोका जाता था. संजीव ने इस कुप्रथा को दूर करने के लिए 2006 में गंगा तट से परबत्ता तक कलश यात्रा निकाली. महादलित महिला-पुरुषों ने एकत्रित होकर गंगा की मुख्यधारा से जल भरा, जिसके बाद रामधुनी यज्ञ हुआ. उस वक्त यह छुआछूत पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तरह था. फिर संजीव ने 2009 से लेकर 2012 तक ‘बहिष्कृत चेतना यात्रा’ निकाली. इसमें कुछ तथाकथित बड़े दलित नेता भी आए. तब से संजीव ‘लौट चलो स्कूल की ओर’ अभियान चला रहे हैं.

इस अभियान का नतीजा निकला. अब महादलित परिवार के बच्चे स्कूल जाते हैं. उन्होंने जूठन उठाना बंद कर दिया गया है. नशे के खिलाफ भी संजीव की जंग जारी है. संजीव की चर्चा धारावाहिक सत्यमेव जयते में भी हुई. काम को स्वीकृति मिलने लगी, लेकिन वे अब भी जूझ रहे हैं. कहते हैं, “मेरे जैसे बहुत सारे लोगों को बिहार के साथ- साथ अन्य राज्यों की महादलित बस्तियों में जाने की जरूरत है.”

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