आनंदी बेन का जाना: गुजरात में दलित-अल्पसंख्यक आन्दोलन को दबाने की एक कवायद

हम प्रतिवर्ष समूचे राष्ट्र को उद्वेलित कर देने वाले “स्वतंत्रता दिवस” समारोह धूमधाम से मनाते हैं. इस अवसर पर भारत छोड़ो आन्दोलन का याद आना स्वाभाविक ही है. भारत छोड़ो आन्दोलन का वह समय था जब हमारे लक्ष्यों और आदर्शों की निष्ठा ने राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो दिया था. उस आन्दोलन के न तो जातियाँ ही आड़े आईं और न ही धर्म. फिर आजादी प्राप्त होने के बाद क्या हो गया कि सामाजिक न्याय के सूत्रधार जाति-भेद की विषमता मिटाने के नाम पर व धार्मिक ठेकेदार धर्म के नाम पर जातिगत एवं धार्मिक विद्वेष और राजनैतिक मोर्चोंबन्दी को पुख्ता कर रहे हैं. आदमी को आदमी से दूर करने लगे हैं. आजादी प्राप्ति से पूर्व के जो राष्ट्रीय लक्ष्य एवं मूल्य, जो आदर्श भारतीयों को सामूहिक रूप से स्फुरित करते थे, जैसे बिखर गए हैं. आत्मनिर्भरता के सुस्वप्न में देखा राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे आज विलुप्त हो गया है. हमारी राजनीति का तो लगता है, शील ही भंग हो गया है. आस्थाएं डगमगा रही हैं. सामाजिक न्याय का लक्ष्य मात्र भाषणों या फिर कागजों में सिमटकर रह गया है. आजादी प्राप्ति के बाद की राजनीति ने अवसरवादिता एवं शून्यवाद को ही जन्म दिया है. नीति और नीयत दोनों ही गुड़-गोबर हो गई हैं. मूल्यों के बिखराव के वर्तमान दौर में सभी राजनैतिक पार्टियां उठापटक में लगी हैं. “आओ! सरकार सरकार खेलें” के खेल में लिप्त हैं. भारतीयता जैसे नैपथ्य में चली गई है. धर्मांधता, जातीयता, धन-लोलुपता और विलासता राजनैतिक मंच पर निर्वसन थिरक रही है. राजनैतिक नारे दिशाहीनता ही पैदा कर रहे हैं. सरकारी स्तर से ग्रामीणों हेतु शिक्षा की आड़ में विदेशियों को पुन: भारत आने का न्यौता दिया गया. सरकार ने बेशक इसे आर्थिक सुधार की मुहिम कहा था, किंतु ये था तो परतंत्रता का ही द्योतक. भारत जैसे स्वाभिमानी और विकासशील राष्ट्र के लिए यह गर्वित होने की बात नहीं है. भारत की आम-जनता के लिए यह हानिकारक ही सिद्ध होगी. समाज में हिंसा और भ्रष्टाचार निरंतर निर्बाध गति से बढ़ता जा रहा है. लोगों की मानसिकता हिंसक होती जा रही है. ऐसे में बेहतर प्रशासन की उम्मीद रखना मिथ्या विचार ही होगा.

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि भ्रष्टाचार संत्री से लेकर मंत्री तक अपनी पहुँच बना चुका है. सुनने को मिलता है कि आजादी प्राप्त होने से पहले देश में केवल पाँच प्रतिशत काला धन था जबकि आज देश में 80 प्रतिशत से भी अधिक काला धन है. यह निरंतर सिकुड़ती और कलुषित मानसिकता का ही परिणाम है. भ्रष्टाचार का ये आलम है कि कभी कोई भूखा शायद ही रोटी की चोरी करता होगा, किंतु आज अमीर और अमीर बनने के लिए चोरी करता है. सरकारी सौदों में पनपता भ्रष्टाचार करोड़ों-अरबों से कम नहीं होता. ऐसे तमाम घोटालों के पीछे किन-किन ताकतों का हाथ होता है, किसको नहीं पता? जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो फिर कोई क्या कर सकता है? हाँ! अगर जनता ही एकजुट हो जाए तो कुछ बात बन सकती है.

इन्दिरा गान्धी का “गरीबी हटाओ” नारा, राजीव गान्धी का 21वीं सदी में प्रवेश करने का नारा, सत्ता में आई प्रत्येक राजनैतिक पार्टी, सत्ता में आने के बाद के 100 दिनों में मंहगाई कम करने का वायदा बड़े जोर-शोर से करती है किंतु मंहगाई है कि निरंतर बढ़ती ही जा रही है. तमाम के तमाम राजनैतिक वायदे आम-जनता की आँख में धूल झोंकने का काम करते हैं. मोदी जी का “सबका साथ, सबका विकास” नारा एक जुमला ही सिद्ध हुआ है. 100 दिन में काले धन की वापसी के वादे को भाजपा के अध्यक्ष “एक राजनीतिक जुमला” सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी कर चुके हैं. राजनैतिक मंचों से धार्मिक-घोष ने राजनीति में और कालिख घोल दी है. मनुवादी प्रयोगशाला में फला-फूला भारतीय समाज आज भी पूरी तरह साम्प्रदायिकता के चंगुल में फँसा हुआ है. साम्प्रदायिकता को लेकर जिस प्रकार की समस्या भारत देश में है, शायद ही किसी अन्य देश में हो. यह भी सत्य है कि विविधताओं और विभिन्नताओं से भरा भारत जैसा कोई दूसरा देश हो. जाति-दर-जाति से निर्मित हमारे सामजिक ढाँचे को देखकर सब दाँतों तले उँगलियाँ दबाते हैं. जाति-प्रथा का सम्पूर्ण ढाँचा ही सामाजिक दृष्टि से ऊँच-नीच की मानसिकता पर आधारित है. वर्तमान में गौ-रक्षा के नाम पर हो रहे जातीय दंगे, मारपीट, और दलित जातियों की महिलाओं के साथ हो रहे निरंतर बलात्कार, सरकारी और सामाजिक स्तर पर अल्पसंख्यकों और दलितों के हितों की अनदेखी कोई नई बात नहीं किंतु वर्तमान सरकार के समय में तो अति ही हो गई है. भाजपा और भाजपा की पैत्रिक संस्था को लगता है कि शायद यह उनकी अंतिम सरकार होगी तभी तो वह अपने तमाम एजेंडों को इसी काल में पूरा करने के फिराक में धार्मिक और जातीय दंगे भड़काने के काम जुटी है. सामाजिक वैमनस्य को बढ़ाकर सत्ता में बने रहना उनका एक मात्र मकसद बनकर रह गया है.

व्यापक स्तर पर जाति या मजहब आधारित सांप्रदायिक झगड़े भारत में बेशक नए लगते हों किंतु इसके मूल में जो घृणा-भाव काम करता है, वह नया नहीं है. अंग्रेजों के आने तक शायद यें बातें भारतीयों को ज्यादा परेशान न करती हों. विभिन्न जातियों के लोग कभी-कभार आपस में थोड़ी-बहुत गाली-गलौज अथवा सिर-फुट्टवल तो कर लेते थे, किंतु इस प्रकार के द्वेष को देर तक न ढोते थे. आज जो भी सांप्रदायिक झगड़े भारत में हो रहे हैं, वे सब राजनीति की देन हैं. आश्चर्यजनक तो यह है कि जाति-प्रथा के पोषक ही आज जाति-पाँति के उभरने की बात करने लगे हैं. उनसे कोई तो पूछे कि भारत में जाति-पाँति का वर्चस्व कब नहीं था. अंतर केवल इतना है कि पहले का दलित लुट-पिटकर भी चुप रहने को बाध्य था, पर आज का दलित में जातीय चेतना जाग उठी है. वह सामाजिक न्याय और सम्मान पाने की बात पर उतारू है. हालिया हिंसक वारदातों पर प्रधान मंत्री की चुप्पी न केवल प्रधान मंत्री पद की गरिमा पर प्रहार है अपितु उनके गुप्त एजेंडे का खुलासा भी कर रही है. लगता है कि मोदी जी ने असामाजिक तत्वों को दलितों और अल्पसंख्यकों की आवाज को कुचलने की खुली छूट दे रखी है.

गौरतलब है कि साम्प्रदायिक घृणा देश के स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं है. पंजाब में सिख साम्प्रदायिकता, असम में बोडो समस्या, कश्मीर में मुस्लिम साम्प्रदायिकता, अब गाय के नाम पर तथाकथित गौ-रक्षकों का तांडव ..तो कहीं कोई और समस्या, यह है आज के भारत में साम्प्रदायिकता का विकराल रूप. इन सबको पीछे छोड़ती हुई, एक और बड़ी समस्या है, साम्प्रदायिक ताकतों के सिर पर चढ़ा “हिन्दू-राष्ट्र” की स्थापना का भूत. पहले से ही जातियों में विभाजित जनता को किसी न किसी मुद्दे पर और बाँटना, विभिन्न वर्गों में मतभेदों को मनभेद में बदलना और उसे बढ़ावा देना सत्ता-लाभ प्राप्त करना ही आज की राजनीति की नियति बन गई है.

नवभारत टाइम्स (24.07.2016) में राजनीतिक एक्सपर्ट नीरजा चौधरी कहती है कि राजनीति में ह्युमर कम होता जा रहा है क्योंकि इसकी जगह राजनीतिक कटुता ने ले ली है. जहाँ कटुता होती है वहाँ ह्युमर नहीं रहता. जब सब अपने आप को सीरियसली लेने लगते हैं, तब भी ह्युमर दूर भागता है. पहले लोगों के विचारों में मतभेद होता था लेकिन हंसी-खुशी का माहौल बना रहता था. राजनेता एक दूसरे के विचारों से सहमत नहीं होते थे, एक-दूसरे का विरोध भी किया करते थे लेकिन माहौल में मधुरता होती थी. अब सोच का दायरा बेहद संकीर्ण हो गया है, जिसमें ह्युमर की जगह ही नहीं बची है. जाहिर है कि अब मतभेद से ज्यादा मनभेद होता है. ….जब दिल ही नहीं मिल रहे तो ह्युमर कैसा? सबसे प्रमुख दो दलों के शीर्ष नेताओं तक में बातचीत नहीं होती…सब एक संकुचित दायरे में सोचने लगे हैं. अब सरकार और विपक्षी दलों के बीच के संबंध सामान्य हो पाएंगे, ऐसा भी नहीं लगता. खेद की बात है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही एक दूसरे के आमने सामने ऐसे खड़े नजर आते हैं…. जैसे दो देशों की सैनाएं जबकि रिश्तों को सामान्य बनाना सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों पर ही निर्भर करता है. लेकिन ज्यादा.सत्ता पक्ष पर क्योंकि सत्ता पक्ष ऐसा करने की स्थिति में होता है. यहाँ इस सवाल का उठना लाजिम है कि राजनेताओं के बीच रोजाना होने वाली गाली-गलौज से क्या लोकतंत्र की मर्यादा को आहत नहीं हो रही है?

यहाँ यह कहने में कोई आपत्ति नहीं कि आज की केन्द्र सरकार बैसाखियों के सहारे नहीं टिकी है, बल्कि पूरे बहुमत से सता में है. जिससे सरकार का रवैया एक तानाशाह जैसा दिख रहा है. ऐसा लगता है कि सरकार की शह पर ही देश में कमजोर वर्गों को किसी न किसी मुद्दे पर निशाना बनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री की इन मुद्दों पर चुप्पी साधे रखना, इस बात का प्रमाण है. अभी हाल में ही गुजरात के मुख्यमंत्री को महज इसलिए हटाया गया कि वो गुजरात में तारी दंगों/फसादातों को सुलझाने में नहीं, बल्कि दबाने में ना कामयाब रहीं. कहना ये है कि वर्तमान सरकार चाहे तो पटेल आन्दोलन हो, या फिर गुजरात में ही तथाकथित गौ-रक्षकों द्वारा चर्मकार दलितों पर अमानवीय मारपीट का मामला हो, या हरियाणा में दलित किशोरियों के साथ हुए दोहरे बलात्कार का मामला हो, या फिर  उत्तर प्रदेश में इखलाख का मामला हो, या फिर मुम्बई में बाबा साहेब अम्बेडकर भवन को तहस-नहस करना हो. ….आज की केन्द्र सरकार इन मामलों को सुलझाने के बजाय इन मामलों को दबाने का प्रयास करती रही है, किंतु ऐसा कर नहीं पाई. परिणाम स्वरूप अब बीजेपी ने गुजरात के मुख्यमंत्री को सबसे पहले अपना शिकार बनाया है. हो सकता है कि कल हरियाणा के मुख्य मंत्री की बारी आ जाए…उन्हें भी मुख्यमंत्री पद से इसलिए हटा दिया जाए कि वो जाट आन्दोलन को दबाने में असफल रहे. बारी राजस्थान की भी आ सकती है. अखबारों की छपी टिप्पणियों तो यह ही स्पष्ट हो रहा कि गुजरात की मुख्य मंत्री आनंदी बेन का जाना गुजरात में दलित आन्दोलन को दबाने की एक साजिश है. बीजेपी का मानना है कि गुजरात के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री में दलित और पटेल आन्दोलन की क्षमता है.

चलते-चलते…. आनन्दी बेन के त्यागपत्रके एक दिन बाद ही गौ-रक्षा के नाम पर चल रही गुंडागर्दी को केन्द्र में रखकर प्रधानमंत्री के बयान का आना क्या कोई सवाल खड़ा नहीं करता? इससे यह कतई स्पष्ट होता है कि अब प्रधानमंत्री ने भी देशभर में तेजी से पनप रहे गौरक्षा के नाम पर दलित और मुस्लिम अत्याचार के खिलाफ चल रहे दलित और मुस्लिम आन्दोलन को दबाने का ही प्रयास है. पता नहीं कि जब प्रधान मंत्री को इतना पता है कि गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी चल रही है और तथाकथिक गौरक्षकों में लगभग 80 प्रतिशत असामाजिक तत्व शामिल है और अपनी-अपनी दुकानदारी को चमका रहे हैं, तो फिर ऐसा क्या कारण रहा कि  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गौररक्षकों के खिलाफ इतनी देर बाद छह जुलाई को पहली बार मुंह खोला. माना तो ये जा रहा है कि मोदी जी ने संघ और बीजेपी शासित राज्यों पर अप्रत्यक्ष रुप से निशाना साधा है किंतु ऐसा लगता नहीं है. उनका ये बयान अगामी वर्ष में कई राज्यों होने वाले चुनावों के मद्देनजर दलितों और अल्पसंख्यकों में उपजे आक्रोश को कुछ ठंडा करने की एक राजनीतिक कवायद है. लेकिन उनका ये मकसद किस सीमा तक पूरा होगा यह एक प्रश्नचिन्ह ही है. हार्दिक पटेल ने तो ऐलान कर दिया है कि इस कवायद से पटेल आन्दोलन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और उनका आन्दोलन और तेजी से चलेगा. दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को भी इस छलावे में नहीं आना चाहिए और अपने आन्दोलन पर अडिग रहना चाहिए अन्यथा उनकी आगामी पीढ़ियां उन्हें सदियों तक माफ नहीं करेंगी.

लेखक तेजपाल सिंह तेज (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से, तूफाँ की ज़द में ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कविता संग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), दो निबन्ध संग्रह  और अन्य. तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक और चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक रहे हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक का संपादन कर रहे हैं. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित.

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