धर्म हमारे ठेंगे पर

वह एक पत्रकार है. वो जिससे प्यार करता था हाल ही में उसने उससे शादी कर ली है. लेकिन दिक्कत यह थी कि लड़के का नाम सुमित था और लड़की का अजरा. लड़का अम्बेडकरवादी नास्तिक और लड़की पांच वक्त की नमाजी. जब इस जोड़े ने फेसबुक पर अपनी शादी की खबर और तस्वीर साझा कि तो लोग उन्हें ईश्वर और अल्लाह के नाम पर बधाई देने लगे. बस्स… फिर क्या था, सुमित भड़क गए और उन्होंने कह दिया …धर्म हमारे ठेंगे पर. सुमित ने अपने सफरनामे को दलित दस्तकसे साझा किया है. पढ़िए, सुमित के प्यार और समाज द्वारा खड़ी की गई दीवार की कहानी सुमित की जुबानी…।

जिन प्रेम कहानियों पर आधारित फिल्मों को देखकर मैं बड़ा हुआ उन्हीं को जीने का मौका भी मिला. कॉलेज के फर्स्ट ईयर में अजरा से दोस्ती हुई और सेकेंड ईयर तक ये दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई. 2010 में शुरू हुआ ये सफर आज शादी के मुकाम पर आ पहुंचा है. 6 साल का सफर किसी सुहाने सपने से कम नहीं.

हम दोनों राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी रहे हैं तो वाद-विवाद अमूमन हर विषय पर होता है. धर्म को लेकर भी खूब संवाद हुआ है. मैं हिंदू परिवार में पैदा हुआ नास्तिक और अंबेडकरवादी व्यक्ति और मेरी लाइफ पार्टनर पांच वक्त की नमाज़ी. धर्म को लेकर स्पष्ट मत विभाजन लेकिन ये धर्म कभी प्यार में रुकावट नहीं बना. लेकिन कुछ लोगों के लिए हमारा मजहब ज्यादा मायने रखता है. ऐसे धर्मांधकारी किसी के रिश्ते की खूबसूरती नहीं देख सकते. खैर किसी और के कुछ भी सोचने से फर्क नहीं पड़ता. फर्क पड़ता है तो अपने परिवार के सोचने और बोलने से. परिवार को मनाना लोहे के चने चबाने जैसा ही है. हां मेरे हिस्से के चने कुछ नर्म थे जिन्हें मैं जल्दी हजम कर पाया लेकिन अजरा के हिस्से असली लोहे के चने ही आए. पिछले साल दिसंबर में जब मैंने अजरा की अम्मी से बात कि तो उनका कहना यही था कि हम दोनों के मजहब अलग हैं और इस रिश्ते की कोई गुंजाइश नहीं. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं तो नास्तिक आदमी हूं और मैं ना इस्लाम को मानता हूं और ना ही हिंदू धर्म को, तब उनका जवाब था… ये तो और भी बड़ा गुनाह है.

बताइए, जिस धर्म से मुझे कुछ लेना देना नहीं वो मेरे जीवन में सबसे बड़ी मुश्किल बन कर खड़ा हो गया. आप धर्म को छोड़ सकते हैं लेकिन धर्म आपको छोड़ने के लिए तैयार नहीं क्योंकि शायद हम पर सबसे ज्यादा कब्जा धर्म ने किया हुआ है. जीवन के हर पहलू में धर्म सीधा दखल देता है. मार्क्स बाबा ने धर्म को अफीम यूं ही थोड़े ना कहा है.

खैर हम भी कहां मानने वाले थे, इश्क तो वैसे भी हठी होता है. धर्म को हमने घी से मक्खी के जैसे निकाल कर अलग कर लिया और इसे बेहद निजी मामला मानते हुए अपने रोमांस में इसे कहीं भी जगह नहीं दी. हां हम दोनों ने हिंदू धर्म में फैली देवदासी, दहेज, कन्या भ्रूण हत्या, पर्दा प्रथा और इस्लाम में व्याप्त बुर्का, कई शादियां करना, संपत्ति के अधिकार और तीन बार तलाक प्रथा पर घंटों बहस की है. लेकिन कभी मनभेद नहीं हुआ.

दो दिन पहले फेसबुक पर मैंने अपनी शादी की जानकारी साझा की. सैकड़ों लोगों ने शुभकामनाएं दी. ज्यादातर बधाई संदेशों में ईश्वर आपको खुश रखे, अल्लाह आपको सलामत रखे जैसी दुआएं दी गई हैं. मैं अपने तमाम दोस्तों की इन शुभकामनाओं को दिल से स्वीकार करता हूं. लेकिन दोस्तों एक बात बताऊं, हमारी पूरी प्रेम कहानी में सबसे ज्यादा दिक्कत इन ईश्वर और अल्लाह नाम के शब्दों ने ही खड़ी की है. धर्म नाम की दीवार शायद सबसे ज्यादा मजबूत होती है जो अपने साथ कई रिश्तों को लेकर ही जमींदौज होती है. कई लोगों के लिए हमारा धर्म ज्यादा मायने रखता है…. रखता होगा. आपका ये ढकोसले वाला धर्म हमारे ठेंगे पर.

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