पंजाब के दलितों के सवालों को दबा रहा है मीडिया

पंजाब के चुनाव में सिद्धू के कांग्रेस में जाने की चर्चा जोरो पर है जो भाजपा-अकाली और आम आदमी के चुनावी मुद्दे का भी मीडिया में खूब जोर-शोर से प्रचार चल रहा है. लेकिन पंजाब की जिस दलित आबादी के भरोसे वहां की सत्ता का सारा समीकरण टिका हुआ है, मीडिया उसी मुद्दे को नजरअंदाज कर रही है. पंजाब चुनाव को लेकर मीडिया दलितों के मुद्दों की ओर से आंखे मूंदे हैं तो वहीं उस आंदोलन का भी जिक्र नहीं कर रही है, जो 29 जनवरी को हुआ.

बीते रविवार यानि 29 जनवरी को संगरूर की अनाज मंडी में हजारों भूमिहीन दलितों ने प्रदर्शन कर अपनी मांगें रखी, लेकिन यह मुद्दा तमाम चैनलों और अखबारों की सुर्खियों से गायब रहा. ये लोग पंजाब में 33 फीसदी पंचायत जमीन में अपनी हिस्सेदारी की मांग कर रहे थे. अपने हक के लिए पंजाब के दलित काफी दिनों से संघर्ष कर रहे हैं. अपने हक़ की ज़मीन पर कब्ज़ाा लेने की कोशिश करने वाले दलितों को संगरूर जिले के झलूर गांव में अक्टूबर की पांच तारीख को जाट सिक्खों  और उनके समर्थित एक अन्यस समूह द्वारा बुरी तरह से पीटा गया, औरतों पर हमला किया गया, बड़ी संख्या में लोगों को चोटें आईं और बड़ी संख्या में लोगों को जेल भेजा गया.

यहां भी झलूर कांड के खिलाफ़ 21 अक्टूनबर को एक लंबी प्रतिरोध यात्रा दलितों ने निकाली. इस संघर्ष में दलित गुरदेव कौर की मौत हो गई. उनके समर्थक लाश को लाल झंडे में लपेट कर दो हफ्ते तक चक्का जाम किए रहे पर नतीजा सिफर रहा. लिहाजा आज चुनाव के मौसम में इनके गांव के गांव नोटा का बटन दबाने का फैसला कर चुके हैं.

हालांकि पंजाब का दलित भी दो हिस्सों में बंटा हुआ है जिससे उसकी ताकत भी बंट जाती है. एक हिस्साि वह है जिसके पास राजनीतिक नुमाइंदगी के रूप में मायावती हैं या फिर जिसे अकाली या अन्यस दलों की सरपरस्तीत हासिल है. दूसरा तबका वह है जो इनमें से किसी को अपना तारणहार नहीं मानता. वह हक़ की बात करता है. हक़ उस 33 फीसदी पंचायती ज़मीन पर, जो 1961 के पंजाब जमीन नियमन कानून में उसे मिला था, लेकिन आज तक असलियत में नहीं मिला. ऐसा नहीं है कि मायावती ज़मीन के प्रश्न  को नज़रंदाज करती हैं. 30 जनवरी को फगवाड़ा की अनाज मंडी में उन्होंाने ज़मीन का सवाल तो उठाया, हालांकि इतना ही कहा कि दलितों को उनका वाजिब हक तभी मिल पाएगा जब \””पंजाब में मेरी सरकार आएगी.\””

इस बात की संभावना है कि 11 मार्च को चुनावी नतीजों के बाद पंजाब में आई नई सरकार को सबसे पहले इसी सवाल से जूझना पड़ेगा, क्योंंकि अप्रैल से 33 फीसदी पंचायती ज़मीन की नई बोली लगने वाली है.

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