‘मैं अछूत हूं: मैं रोहित वेमुला हूं’

केरल के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटकार और अभिनेता रामचन्द्रन माकरी उर्फ डागटर माकरी के हालिया के मलयालम भाषा के नाटक का शीर्षक है- ‘मैं अछूत हूं: मैं रोहित वेमुला हूं’। कौन कितनी उम्र तक जीया, यह कोई मायने नहीं रखता, कैसे जीया, किस उद्देश्य के लिए जीया और मरा, इतिहास इसी का लेखा-जोखा रखता है। इतिहास में कुछ लोग चन्द वर्षों की उम्र में ऐसा कुछ कर जाते है कि वे नायक और महानायक की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों के आदर्श और प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं।

ऐसा ही एक नायक रोहित वेमुला है। 26 वर्ष का यह नौजवान आज पूरे देश के भीतर उर्जा और प्रेरणा का स्रोत बन गया है, क्योंकि वह अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। उसकी मौत और जिंदगी, न केवल राजनीति और समाज को आंदोलित किए हुए है, बल्कि सांस्कृतिक जगत का भी प्रेरणा स्रोत बन गई है। उस पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बन चुकी है और दूसरी बन रही है। हाल ही में प्रसिद्ध मलयालम नाटकार का यह नाटक केरल में लोगों के सामने आया। इसके नाटककार अभिनेता रामचन्द्रन माकरी हैं, जिनहोंने स्वयं छुआछूत का दंश झेला है। उनका यह नाटक केरल में दलित-आदिवासियों की स्थिति और संघर्ष को भी सामने लाता है।

माकरी शूद्र समुदाय के पहले पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें कोलकात्ता विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ड्रामा में नियुक्ति मिली। 28 फरवरी को केरल में संपन्न हुए अंतरराष्ट्रीय थियेटर महोत्सव में उन्होंने रोहित वेमुला द्वारा झेले गए आंतक और उसकी आत्महत्या से लगे धक्के को विषय- वस्तु बनाकर ‘मै अछूत हूं: मैं रोहित वेमुला हूं’ नाटक प्रस्तुत किया। इस पूरे संदर्भ में उनका साक्षात्कार ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’  अखबार में एक मार्च को प्रकाशित हुआ, जिसे साभार अनुवादित कर “दलित दस्तक” में प्रकाशित किया जा रहा है।

किस चीज ने आपको इस नाटक की रचना के लिए प्रेरित किया?

मैं रोहित की आत्महत्या से आवाक् हो गया था। इसने देश के नौजवानों को स्तब्ध कर दिया था। एक नए भारत निर्माण की चेतना दलितों के भीतर की आग से उभर रही है। रोहित वेमुला एक भावुक नौजवान था। उसने कहा था कि “ मैं हमेशा लेखक बनना चाहता था। विज्ञान का एक लेखक, कार्ल सगन की तरह का।” दलितों का अस्तित्व मायने रखता है और यह नई राजनीति, सौंदर्यशास्त्र और इतिहास के पुर्नपाठ का प्रभावी हिस्सा हो गया है। एक अभिनेता के तौर पर रोहित ने मेरे शरीर, आत्मा, मांसपेशियों, खून और नस-नस को उत्तेजित कर दिया। यह नाटक मेरी भीतरी जरूरत से पैदा हुआ।

आपने इस प्रस्तुति के लिए सोशल मीडिया, मुख्य रूप से फेसबुक का इस्तेमाल किया?

मैंने सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल रोहित वेमुला पर बात-चीत करने के लिए किया। मैंने केरल और केरल के बाहर के अन्य नाटकारों से संपर्क किया। उनसे कहा कि वे अपने तरीके से रोहित वेमुला पर प्रस्तुति करने से लिए मेरे साथ शामिल हों। मुझे उम्मीद थी कि अभिनेताओं को निर्देशकों के चंगुल से मुक्त होकर रोहित पर नाटक प्रस्तुत करना चाहिए। लगभग 26 अभिनेताओं ने इसका जवाब दिया। इसमें से ज्यादातर कार्यकर्ता थे, जो राजनीतिक नाटकों की प्रस्तुति में मशगूल हैं।

आपके नाटक की प्रस्तुति का स्वरूप क्या है?

इस नाटक में मैं एक ठेला खींच रहा हूं, जिसका परंपरागत तौर पर इस्तेमाल सब्जियों को ले जाने के लिए किया जाता है। इसमें एक अभिनेता चटाई में लिपटे मृत शरीर को खींच कर ले जा रहा है। मैं ठेले के सामने हूं और एक महिला पीछे है। हम लोग दलितों के संघर्ष के इतिहास का गीत गा रहे हैं। प्रस्तुति रोहित वेमुला की कविताओं के माध्यम से टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी है, साथ ही साथ पूरे इतिहास में दलितों की निर्मम हत्याओं से इसे संयोजित किया गया है। नाटक सीधी रेखा में नहीं चलता है, इतिहास के एक समय से दूसरे समय में छलांग लगाता रहता है। आखिरकार मैं शव को अपनी बांहों में ले लेता हूं और दर्शको की ओर ले जाता हूं। नाटक का अन्त तब होता है, जब मैं शव को अपनी बाहों में लेकर लेट जाता हूं और शव के मुंह से ‘जय’ और ‘भीम’  जैसे शब्द निकलते हैं।

क्या आप भी पिछड़ी जाति के हैं? 

जब मैं बच्चा था, तो भेदभाव का अनुभव किया। यदि मैं अपने घर के पास के उंची जाति के हिन्दू के घर जाता था, तो यदि मैं चाय पीता था, तो मुझे कप धुल कर रखना पड़ता था। हमारे जैसे लोगों के पीने के कप अलग रखे रहते थे। इस चीज ने मेरे ऊपर गहरा असर डाला, खास कर उस स्थिति में जब ऊंची जाति का लड़का मेरे साथ पढ़ता था और मेरे साथ ही स्कूल जाता था।

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