पिंडदान, श्राद्ध और मृत्युभोज ब्राह्मणों का ढोंगी विधान!

मेरे एक मित्र गया में अपने पितरों का पिंडदान करने के बाद कल ब्रह्मभोज देने वाले हैं. मेरे मन में कुछ शंकाए उमड़-घुमड़ रही हैं, उसे आपके समक्ष बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत कर रहा हूं. पिंडदान का विस्तृत वर्णन गरुण पुराण, अग्नि पुराण और वायु पुराण में किया गया है. कुआर(आश्विन) के अंधरिया को कृष्णपक्ष कहते हैं. इसी कृष्णपक्ष में अपने पितरों (मरे हुए पूर्वजों) को तृप्त करने के लिए, मोक्ष दिलाने के लिए और स्वर्ग भेजने के लिए पिंडदान किया जाता है. पिंडदान के लिए “गया” की महिमा अपरम्पार है. इस कार्य के लिए पूरे ब्रह्माण्ड में इससे उत्तम स्थान दूसरा कोई नहीं है! ये मैं नहीं कह रहा हूं बंधुओं, ऐसा शास्त्र कह रहे हैं. मैं तो आपके साथ मिलकर इसपर विचार करना चाहता हूं कि “शवदाह संस्कार से लेकर ब्रह्मभोज के बीच ब्राह्मणों ने कितनी बार मृतक को मोक्ष, स्वर्ग इत्यादि दिला चुके है? फिर भी ब्राह्मण पण्डे आप जैसे यजमानों का पिंड नहीं छोड़ते हैं! पुनः पिंडदान के नाम पर हर साल दान-दक्षिणा लेने का जुगाड़ किये हुए हैं! इस पर एक बार पुनः संक्षिप्त प्रकाश डाल लिया जाय:-

मोक्ष – जीते जी भले ही आपने परमपिता परमेश्वर (कृष्णभक्ति) की भक्ति की हो या नहीं, मरते समय गंगाजल पिला देने से, मोक्षदायनी (गंगा, नर्मदा) नदियों में शवदाह करने से या हड्डियों को गंगा में विसर्जित कर देने से ही मोक्ष मिल जाता है. जीवनभर व्यक्ति चाहे जितना कुकर्म और अपराध किया हो, मरते वक्त कृष्ण-कृष्ण/राम-राम का जाप (रटा) करा दीजिए, मोक्ष मिल जाता है. ये मैं नहीं, गीता और अन्य शास्त्र कहते हैं! मोक्ष के बाद आत्मा का मिलन ईश्वर (परमात्मा) से हो जाता है. उस व्यक्ति की आत्मा अब किसी भी योनी में जन्म नहीं लेगी. फिर पिंडदान का औचित्य क्या है?

स्वर्ग – किसी का अन्तिम समय आ गया हो, उसके प्राण निकलने वाले हो, तो बछिया अथवा गाय का पूंछ पकड़वा कर ब्राह्मण को दान कर दीजिये; उस व्यक्ति की आत्मा को बैकुंठ(स्वर्ग) निश्चित मिलेगा? यह झूठ नहीं है! शास्त्रों का कथन है. इस लोक में जितना आपने पूर्ण कमाया है, उसी के अनुपात में स्वर्ग सुख भोगेगें – “सूरा-सुंदरी-छप्पन भोग!” अब भला बताइए, जो स्वर्ग चला गया, वहां का आनंद छोड़कर कोई मृतक गया में आंटे का लोंदा खाने आयेगा? पिंडदान में पितरों को यही अर्पित किया जाता है. ये ब्राह्मण क्या बकवास करते हैं? बंधुओं, सोंचो, विचार करो!

 

नरक – विष्णु पुराण, गरुण पुराण, अग्नि पुराण और वायु पुराण में साफ़ शब्दों में बताया गया है कि पापियों को नरक मिलता है. भईया, जिसको नरक मिल गया, उसे भुगते बिना मृतक किसी अन्य लोक में नहीं जा सकता! नरकवासी आत्मा को बिना समय पूरा किये, पृथ्वीलोक में रिश्तेदारी निभाने की छुट्टी यमराज नहीं देते हैं! कहीं नहीं लौटा तो? अतः वह रक्त, पीव, मल-मूत्र (ये नरकवासियों के भोजन हैं) छोड़कर, गया में पिन्डा खाने नहीं आ सकता!

अन्य 84 लाख योनी में जन्म – जिसको स्वर्ग-नरक और मोक्ष नहीं मिला, उनकी आत्मा चौरासी लाख योनियों में बारम्बार जन्म-मरण के चक्र में घूमती रहती है. जब आत्मा किसी योनी में जन्म ले चुकी हो, अर्थात, आत्मा ने वस्त्र बदल लिया और वह मजे में है. उसे पिंडदान के नाम पर तृप्त करने का ढोंग क्यों रचते हैं? अब आपको इतनी बात न समझ में आये, तो आप दिमागी रूप से ब्राह्मणों के गुलाम हैं या फिर मंदबुद्धि.

भूत-प्रेत योनी – जिनकी आकाल मृत्यु होती है (जैसे, किसी दुर्घटना आदि द्वारा) उनकी आत्मा भूत-प्रेत की योनी में चली जाती है. ऐसे मरे लोगों की आत्मा को ऊपर वर्णित किसी लोक या योनी में जगह नहीं दिया जाता. इनकी आत्मा पृथ्वी पर भटकती रहती है. ऐसे आत्मा को भूत-प्रेत योनी से मुक्त और तृप्त करने के लिए ही दसवें दिन दसगात्र किया जाता है. बड़ा फाडू आविष्कार है -दसगात्र! पीपल के पेड़ पर मटकी(घड़ा) टंगवाइये, पानी डलवाईये, वेदी बनवाइए, अंट-संट मन्त्र बचवाईये, ब्राह्मणों को खिलाईये और अंत में ब्राह्मणों के गिराए जूठन पर मृत व्यक्ति के नाम पर पिंडदान कीजिए! प्रेतात्मा को मिल गई शांति, हो गई तृप्ति, पा गई मुक्ति. झंझट समाप्त!

बंधुओं, आपने देखा न तेरहवीं तक अस्तित्व विहीन आत्मा को मोक्ष, स्वर्ग, मुक्ति इत्यादि दिलाने के नाम पर ब्राह्मणवादी कितना ढोंग, पाखंड और कर्मकांड करवाते हैं. अपने परिजन को मोक्ष और स्वर्ग दिलाने के लिए सनातनी हिन्दू पुरोहितों को भरपूर दान-दक्षिणा भी देता है. फिर भी ये ढोंगी ब्राह्मण और दान-दक्षिणा के लालच में पितरों की तृप्ति हेतु, पितृपक्ष में पिंडदान का विधान खोजा है. पिंडदान ब्राह्मण धन की लालच के लिए करवाता है. अरे भाई, आत्मा तो अजर- अमर है न? तेरहवीं तक जो कर्मकांड पुरोहित करवाता है, वह सब तो पितरों की आत्मा को मोक्ष, स्वर्ग आदि दिलाने के लिए ही न किया जाता है? नहीं समझे न! भाई, ब्रह्मभोज तक का कर्मकांड ठगी और पिंडदान महाठगी है.

सन 1998 से 2002 के बीच मैं चिकित्सा पदाधिकारी के पद पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, फतेहपुर, जिला- गया में पदस्थापित था. पितृपक्ष काल में अतिरिक्त चिकित्सकों की प्रतिनियुक्ति गया शहर में की जाती है, ताकि पितृपक्ष मेले में उमड़ी भीड़ को स्वाथ्य सेवा उपलब्ध कराई जाय और महामारी न फैलने दिया जाय. देश-विदेश से लाखों लोग यहां पिंडदान करने आते हैं. जहाँ तक मुझे याद है दो बार मेरी भी प्रतिनियुक्ति हुई थी. उस समय गया के कई पंडों से बात हो जाया करती थी. कुछ पंडों ने यह राज खोला कि “हमें पितृपक्ष का बेसब्री से इंतजार रहता है. इन 15 दिनों में दान-दक्षिणा में इतना धन मिल जाता है कि हम साल भर बैठकर खाते हैं.” अब आप स्वयं विचार करे! ब्राह्मण इस व्यवस्था को क्यों तोड़ना चाहेगा? आप ध्यान दीजिये, किसी भी कर्मकांड (जन्म से मरण तक) में ब्राह्मणों ने कदम-कदम पर दान लेने का विधान किया है!

किसी के पास कोई प्रमाण नहीं है कि आत्मा कहां गई, स्वर्ग मिला या नरक, मोक्ष मिला या प्रेत बना! कोई माई का लाल प्रमाणित नहीं कर सकता? बंधुओं, मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नही बचता है? 26 तत्वों से बना जीव 26 तत्त्वों में बदल जाता है. आत्मा नहीं है, स्वर्ग नहीं है, नरक नहीं है. मोक्ष, भूत-प्रेत आदि की अवधारणा बकवास है. जीवों की उत्पत्ति, विकास और विनाश भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान के निश्चित नियमों के कारण होता है. यही सच है.

पिंडदान, श्राद्ध और मृत्युभोज का आयोजन ढोंग है, इसे न करें. श्राद्ध के चक्कर में कितने कंगाल हो जाते हैं. मैं तो आपसे यह अपील करता हूं कि शवयात्रा में “राम-नाम सत्य है” कहना भी पाखंड है; इसे न बोलें. शवयात्रा में मौन रहें. और यदि बोलना ही है तो समाज को यह सच्चा सन्देश दे “जीना-मरना सत्य है” बोलें.

ये कर्मकांड, बहुराष्ट्रीय कंपनी की तरह एक जाति विशेष (ब्राह्मण) द्वारा संगठित रूप से जनता का शोषण अभियान है, जिसमें बिना शारीरिक श्रम किये लाखों ब्राह्मण परिवार अनगिनत कर्मकांडों के नाम पर धनोपार्जन करते हैं. जनता की खून-पसीने की कमाई को दान-दक्षिणा के नाम पर ऐंठकर गुलछरे उड़ाते हैं. ऐसे असंख्य कर्मकांडों का जाल इन्होंने फैला रखा है! ये बड़े चालाक और धूर्त लोग हैं. क्या आपने ब्राह्मण समाज के उंच्च शिक्षित डाक्टर, इंजिनियर, प्रोफ़ेसर, जज, डीएम, इत्यादि को किसी यजमान के घर पुरोहिती करते देखा है? भाई, मैंने तो नहीं देखा है! इसका अर्थ क्या है? इसका मतलब है, ब्राह्मण समाज का सबसे निकम्मा और नाकारा सदस्य ही पुरोहिती के धंधे को अपनाता है. मेरी बात पर विश्वास मत कीजिए? गांव या शहर कहीं भी अपने आस-पास 10-20 पुरोहितों का सर्वेक्षण कर लीजिये और साक्षात्कार ले लीजिए. मित्रों, आप उनके बुने हुए जाल में बुरी तरह उलझे हुए हैं! आप अपने शिक्षित एवं बुद्धिजीवी होने का धर्म नहीं निभा रहे हैं? आस्था और अन्धविश्वास के कारण वाहियात बातों पर भी प्रश्न-चिन्ह लगाने का साहस आप में नही है? जो भी गलत धार्मिक कुरुतियां हैं, उसे ठीक कौन करेगा? आपके पूर्वज? जो मर-खप गए हैं! या वह जो जिन्दा हैं और जिनके पास ज्ञान और विज्ञान का भरपूर भंडार है! जिनके पास तर्क करने की, खंडन करने की और प्रमाणित करने की क्षमता है.

वह व्यक्ति आप और हम हैं?

अब सोचिये मत, तैयार हो जाइये और समाज को ढोंग, ढकोसला एवं पाखंड से मुक्त कराईए? अब आत्मा की शांति के नाम पर मृत्युभोज और पिंडदान बंद होना चाहिए? दुनिया में परिवर्तन मुर्दे नहीं किया करते! नवीन खोजें और बदलाव वर्तमान पीढ़ी ही करती हैं?

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